भगवद्गीता अध्याय 18, श्लोक 71–78 | मोक्षसंन्यासयोग | अर्थ सहित
अठारहवें अध्याय में श्रीकृष्ण ने अर्जुन को संन्यास, कर्म, ज्ञान, भक्ति और मोक्ष का सम्पूर्ण उपदेश दे दिया है। अब इस अंतिम खंड में श्रीकृष्ण गीता-श्रवण के फल की बात करते हैं, अर्जुन अपना मोह-नाश स्वीकार करते हैं, और संजय इस दिव्य संवाद को स्मरण करते हुए अपनी भावना व्यक्त करते हैं।
श्लोक 18.71
वक्ता: श्रीकृष्ण
श्रद्धावाननसूयश्च श्रृणुयादपि यो नरः।
सोऽपि मुक्तः शुभाँल्लोकान्प्राप्नुयात्पुण्यकर्मणाम् ॥18.71॥
śhraddhāvān anasūyaśh cha śhṛiṇuyād api yo naraḥ / so ‘pi muktaḥ śhubhāl lokān prāpnuyāt puṇya-karmaṇām
हिंदी अनुवाद: जो मनुष्य श्रद्धा के साथ और दोष-दृष्टि से रहित होकर इस गीता को सुन भी लेगा, वह भी समस्त पापों से मुक्त होकर पुण्यात्माओं के शुभ लोकों को प्राप्त करेगा।
भावार्थ: श्रीकृष्ण यहाँ गीता के श्रवण-मात्र का फल बताते हैं। 'श्रद्धावान्' अर्थात् जिसके मन में विश्वास हो, और 'अनसूय' अर्थात् जो दोष न निकाले — ऐसा व्यक्ति यदि इस ज्ञान को केवल सुने, तो भी वह पुण्यकर्मियों को मिलने वाले शुभ लोकों का अधिकारी बनता है। पाठ और मनन से भी अधिक सुलभ है श्रद्धापूर्वक श्रवण — यह संदेश यहाँ दिया गया है।
आज के जीवन में: किसी भी श्रेष्ठ ज्ञान को श्रद्धा और खुले मन से सुनना ही उसका पहला और महत्त्वपूर्ण लाभ है।
श्लोक 18.72
वक्ता: श्रीकृष्ण
कच्चिदेतच्छ्रुतं पार्थ त्वयैकाग्रेण चेतसा।
कच्चिदज्ञानसंमोहः प्रनष्टस्ते धनञ्जय ॥18.72॥
kachchid etach chhrutaṁ pārtha tvayaikāgreṇa chetasā / kachchid ajñāna-sammohaḥ pranaṣhṭas te dhanañjaya
हिंदी अनुवाद: हे पार्थ! क्या तुमने इसे एकाग्र चित्त से सुना? हे धनंजय! क्या तुम्हारा अज्ञान से उत्पन्न मोह नष्ट हो गया?
भावार्थ: सम्पूर्ण उपदेश देने के बाद श्रीकृष्ण अर्जुन से दो प्रश्न पूछते हैं — पहला, क्या उन्होंने एकाग्रता से सुना; दूसरा, क्या उनका मोह दूर हुआ। 'एकाग्रेण चेतसा' — एकाग्र चित्त से — यह शब्द बताता है कि ज्ञान तभी फलदायी होता है जब मन बिखरा न हो। यह प्रश्न गुरु की वह स्वाभाविक चिंता है जो शिष्य के हृदय-परिवर्तन की जाँच करती है।
आज के जीवन में: कोई भी उपदेश या शिक्षा तभी सार्थक होती है जब उसे एकाग्र मन से ग्रहण किया जाए।
श्लोक 18.73
वक्ता: अर्जुन
नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादान्मयाच्युत।
स्थितोऽस्मि गतसन्देहः करिष्ये वचनं तव ॥18.73॥
arjuna uvācha / naṣhṭo mohaḥ smṛitir labdhā tvat-prasādān mayāchyuta / sthito ‘smi gata-sandehaḥ kariṣhye vachanaṁ tava
हिंदी अनुवाद: अर्जुन बोले — हे अच्युत! आपकी कृपा से मेरा मोह नष्ट हो गया है और मुझे स्मृति प्राप्त हो गई है। मैं संदेह-रहित होकर स्थिर हूँ और आपकी आज्ञा का पालन करूँगा।
भावार्थ: अर्जुन का यह उत्तर गीता का सबसे महत्त्वपूर्ण क्षण है। 'नष्टो मोहः' — मोह नष्ट हुआ; 'स्मृतिर्लब्धा' — स्मृति, अर्थात् अपने स्वरूप और कर्तव्य का बोध, वापस मिला। 'अच्युत' अर्थात् जो कभी च्युत न हो — इस संबोधन से अर्जुन श्रीकृष्ण की अटल शक्ति को स्वीकार करते हैं। संदेह गया, भ्रम गया, और अब वे कर्म के लिए तैयार हैं — यही गीता का लक्ष्य था।
आज के जीवन में: सच्चे ज्ञान की पहचान यह है कि वह मन के संदेह और भ्रम को दूर कर कर्म की शक्ति देता है।
श्लोक 18.74
वक्ता: संजय
इत्यहं वासुदेवस्य पार्थस्य च महात्मनः।
संवादमिममश्रौषमद्भुतं रोमहर्षणम् ॥18.74॥
sañjaya uvācha / ity ahaṁ vāsudevasya pārthasya cha mahātmanaḥ / saṁvādam imam aśhrauṣham adbhutaṁ roma-harṣhaṇam
हिंदी अनुवाद: संजय बोले — इस प्रकार मैंने भगवान् वासुदेव और महात्मा अर्जुन के इस अद्भुत और रोमांचित करने वाले संवाद को सुना।
भावार्थ: अब वक्ता बदलता है — संजय, जो धृतराष्ट्र को युद्धभूमि का वृत्तांत सुना रहे थे, इस संवाद पर अपनी भावना व्यक्त करते हैं। 'रोमहर्षणम्' — रोमांचित करने वाला — यह शब्द बताता है कि यह संवाद केवल बौद्धिक नहीं, हृदय को स्पर्श करने वाला था। संजय ने यह संवाद व्यास की कृपा से दिव्य दृष्टि द्वारा सुना था, और वे इसकी महानता से अभिभूत हैं।
श्लोक 18.75
वक्ता: संजय
व्यासप्रसादाच्छ्रुतवानेतद्गुह्यमहं परम्।
योगं योगेश्वरात्कृष्णात्साक्षात्कथयतः स्वयम् ॥18.75॥
vyāsa-prasādāch chhrutavān etad guhyam ahaṁ param / yogaṁ yogeśhvarāt kṛiṣhṇāt sākṣhāt kathayataḥ svayam
हिंदी अनुवाद: व्यासजी की कृपा से मैंने इस परम गोपनीय योग को साक्षात् योगेश्वर भगवान् श्रीकृष्ण के मुख से स्वयं कहते हुए सुना।
भावार्थ: संजय बताते हैं कि उन्हें यह दिव्य ज्ञान व्यास की कृपा से प्राप्त हुआ। 'गुह्यमहं परम्' — परम गोपनीय — यह ज्ञान सबके लिए सुलभ नहीं, केवल पात्र को ही मिलता है। 'योगेश्वरात् कृष्णात्' — योगों के ईश्वर श्रीकृष्ण से — यह संबोधन श्रीकृष्ण की सर्वोच्च स्थिति को दर्शाता है। संजय की कृतज्ञता और विनम्रता इस श्लोक में स्पष्ट है।
आज के जीवन में: श्रेष्ठ ज्ञान की प्राप्ति में गुरु-कृपा और पात्रता दोनों आवश्यक हैं।
श्लोक 18.76
वक्ता: संजय
राजन्संस्मृत्य संस्मृत्य संवादमिममद्भुतम्।
केशवार्जुनयोः पुण्यं हृष्यामि च मुहुर्मुहुः ॥18.76॥
rājan sansmṛitya sansmṛitya saṁvādam imam adbhutam / keśhavārjunayoḥ puṇyaṁ hṛiṣhyāmi cha muhur muhuḥ
हिंदी अनुवाद: हे राजन्! श्रीकृष्ण और अर्जुन के इस पवित्र और अद्भुत संवाद को बार-बार स्मरण करके मैं बार-बार हर्षित हो रहा हूँ।
भावार्थ: संजय कहते हैं कि इस संवाद का स्मरण उन्हें बार-बार आनंद देता है। 'संस्मृत्य संस्मृत्य' — बार-बार याद करके — यह पुनरावृत्ति उस आनंद की गहराई को दर्शाती है। 'पुण्यम्' — पवित्र — यह संवाद केवल ज्ञान नहीं, एक पवित्र अनुभव है। संजय की यह भावना बताती है कि दिव्य ज्ञान का स्मरण स्वयं में एक आनंददायक साधना है।
आज के जीवन में: जो ज्ञान सच्चा और पवित्र हो, उसका बार-बार स्मरण मन को निरंतर प्रसन्न और ऊर्जावान बनाता है।
श्लोक 18.77
वक्ता: संजय
तच्च संस्मृत्य संस्मृत्य रूपमत्यद्भुतं हरेः।
विस्मयो मे महान् राजन् हृष्यामि च पुनः पुनः ॥18.77॥
tach cha sansmṛitya saṁsmṛitya rūpam aty-adbhutaṁ hareḥ / vismayo ye mahān rājan hṛiṣhyāmi cha punaḥ punaḥ
हिंदी अनुवाद: हे राजन्! भगवान् श्रीकृष्ण के उस अत्यंत अद्भुत विराट रूप को बार-बार स्मरण करके मुझे महान् आश्चर्य हो रहा है और मैं पुनः-पुनः हर्षित हो रहा हूँ।
भावार्थ: संजय केवल संवाद नहीं, श्रीकृष्ण के विराट रूप का भी स्मरण करते हैं जो ग्यारहवें अध्याय में प्रकट हुआ था। 'अत्यद्भुतम्' — अत्यंत अद्भुत — वह रूप इतना विलक्षण था कि उसका स्मरण भी विस्मय से भर देता है। 'विस्मयो मे महान्' — मुझे महान् आश्चर्य है — संजय की यह अनुभूति बताती है कि उस दर्शन का प्रभाव अमिट है।
आज के जीवन में: परमात्मा की महिमा का चिंतन मन में सदा विस्मय और आनंद का संचार करता है।
श्लोक 18.78
वक्ता: संजय
यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः।
तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम ॥18.78॥
yatra yogeśhvaraḥ kṛiṣhṇo yatra pārtho dhanur-dharaḥ / tatra śhrīr vijayo bhūtir dhruvā nītir matir mama
हिंदी अनुवाद: जहाँ योगेश्वर श्रीकृष्ण हैं और जहाँ गाण्डीव-धनुषधारी अर्जुन हैं, वहीं श्री, विजय, विभूति और अचल नीति है — यही मेरा मत है।
भावार्थ: यह गीता का अंतिम श्लोक है जिसमें संजय अपना दृढ़ निष्कर्ष देते हैं। 'योगेश्वरः कृष्णः' — दिव्य शक्ति का प्रतीक, और 'पार्थो धनुर्धरः' — समर्पित कर्मयोगी का प्रतीक। जहाँ ईश्वर की कृपा और मनुष्य का सत्कर्म एक साथ हों, वहाँ 'श्री' (समृद्धि), 'विजय', 'भूति' (वैभव) और 'ध्रुवा नीति' (अटल नीति) स्वाभाविक रूप से होती है। यह केवल युद्ध का नहीं, जीवन का सत्य है।
आज के जीवन में: जहाँ ईश्वर की कृपा और मनुष्य का निष्ठापूर्ण प्रयास एक साथ हों, वहाँ सफलता और समृद्धि निश्चित है।
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