गुस्से पर काबू कैसे करें | भगवद् गीता 2.63
भगवद् गीता 2.63
क्रोधाद्भवति संमोहः संमोहात्स्मृतिविभ्रमः।
स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति।।2.63।।
krodhād bhavati sammohaḥ sammohāt smṛiti-vibhramaḥ smṛiti-bhranśhād buddhi-nāśho buddhi-nāśhāt praṇaśhyati
अर्थ: ।।2.62 -- 2.63।। विषयोंका चिन्तन करनेवाले मनुष्यकी उन विषयोंमें आसक्ति पैदा हो जाती है। आसक्तिसे कामना पैदा होती है। कामनासे क्रोध पैदा होता है। क्रोध होनेपर सम्मोह (मूढ़भाव) हो जाता है। सम्मोहसे स्मृति भ्रष्ट हो जाती है। स्मृति भ्रष्ट होनेपर बुद्धिका नाश हो जाता है। बुद्धिका नाश होनेपर मनुष्यका पतन हो जाता है।
कृष्ण क्या कह रहे हैं
कुरुक्षेत्र के मैदान में अर्जुन बिखरा हुआ है। वह लड़ना नहीं चाहता, उसका मन डाँवाडोल है। कृष्ण उसे समझा रहे हैं कि मन कैसे काम करता है और इंसान कैसे खुद अपनी बर्बादी की तरफ चलता जाता है। यह श्लोक उसी बातचीत का हिस्सा है।
कृष्ण एक सीधी चेन बताते हैं। किसी चीज़ के बारे में बार-बार सोचो, तो उससे लगाव हो जाता है। लगाव से इच्छा जन्म लेती है। इच्छा पूरी न हो तो गुस्सा आता है। गुस्से में इंसान का दिमाग काम करना बंद कर देता है, यही है सम्मोह यानी मूढ़भाव, जब सब धुंधला हो जाता है। उस धुंध में याददाश्त जाती है, यानी आपको याद नहीं रहता कि आप कौन हैं, क्या चाहते हैं, क्या सही है। और जब यह सब चला जाए तो बुद्धि काम नहीं करती। बुद्धि गई तो इंसान का पतन तय है।
जो बात आज काम आ सकती है वह यह है कि गुस्सा अचानक नहीं आता। वह एक सीढ़ी है जिसका पहला डंडा है, किसी चीज़ के बारे में बार-बार सोचते रहना। अगर आप उस पहले डंडे पर ही रुक जाएं, तो बाकी सीढ़ी चढ़ने की नौबत नहीं आती।
यह आप पर कैसे लागू होता है
जो माँ या पिता बच्चे पर चिल्लाते हैं और बाद में पछताते हैं
आप जानते हैं यह सब। बच्चे ने होमवर्क नहीं किया, या कमरा फिर गंदा छोड़ा, और आपने ऊँची आवाज़ में कुछ ऐसा कह दिया जो नहीं कहना चाहिए था। बाद में खुद को माफ नहीं कर पाते। कृष्ण की यह सीढ़ी देखिए, आपका गुस्सा उस पल शुरू नहीं हुआ। वह तब शुरू हुआ जब आप दिनभर यही सोचते रहे कि यह बच्चा कुछ नहीं सुनता, यह आदत नहीं बदलेगी।
कल सुबह एक काम करें। जब वही पुरानी बात मन में आए, तो उसे वहीं रोकें और खुद से पूछें कि क्या मैं अभी सिर्फ सोच रहा हूँ या सच में कुछ हुआ है। अगर सिर्फ सोच रहे हैं तो उस सोच को वहीं छोड़ दें। गुस्सा नहीं जाएगा एकदम से, लेकिन चिल्लाने और पछताने का चक्र धीरे-धीरे टूटेगा।
जो ट्रैफिक में या लाइन में खड़े होकर भड़क जाते हैं
गाड़ी आगे नहीं बढ़ रही, या कोई बीच में घुस आया, और आपका ब्लड प्रेशर चढ़ने लगा। यह गुस्सा असल में उस पल से पहले शुरू होता है। आप घर से निकलते वक्त ही मन में यह लेकर चलते हैं कि आज भी ट्रैफिक होगा, आज भी कोई न कोई बेवकूफी करेगा। यही वह चिंतन है जिसकी बात कृष्ण करते हैं।
कल जब गाड़ी में बैठें तो एक छोटा सा फर्क करें। रेडियो लगाएं, कोई पॉडकास्ट सुनें, या बस चुप रहें, लेकिन ट्रैफिक के बारे में पहले से कहानी मत बनाइए। जब कोई काट कर निकले तो खुद से कहें कि यह मेरी कहानी नहीं है। आप ट्रैफिक नहीं बदल सकते, लेकिन उस पहले डंडे पर चढ़ने से रुक सकते हैं।
जो मैनेजर हैं और टीम बार-बार डेडलाइन चूक जाती है
आप मीटिंग में बैठे हैं और फिर वही खबर आई। काम अधूरा है। आपका गुस्सा बाहर निकला और टीम सिकुड़ गई। काम तो फिर भी नहीं हुआ, बस माहौल और खराब हो गया। कृष्ण की सीढ़ी यहाँ बिल्कुल साफ दिखती है। आपने हफ्तेभर से यह सोचा कि ये लोग कभी नहीं सुधरेंगे, यह लगाव आपकी उस उम्मीद से है जो पूरी नहीं हो रही।
कल एक काम करें। डेडलाइन से एक दिन पहले एक छोटी जाँच करें, बिना लहजे के, सिर्फ यह पूछने के लिए कि कहाँ तक पहुँचे। इससे आपको पहले पता चलेगा और गुस्से की जगह हल निकालने का मौका मिलेगा। टीम नहीं बदलेगी रातोरात, लेकिन आपकी बुद्धि काम करती रहेगी क्योंकि आप सीढ़ी के पहले डंडे पर ही रुक गए।
जो पति-पत्नी एक ही बात पर बार-बार झगड़ते हैं
पैसों का मसला हो, बच्चों की परवरिश हो, या घर के काम, आप दोनों जानते हैं कि यह बहस कहाँ से शुरू होगी और कहाँ खत्म होगी। फिर भी हर बार वही होता है। यहाँ वह चिंतन है जो कृष्ण बताते हैं, आप दोनों में से कोई एक या दोनों उस पुरानी बात को मन में लेकर चलते हैं और जैसे ही मौका मिलता है, वह बाहर आ जाती है।
कल अगर वही बात फिर शुरू हो तो एक काम करें। बोलने से पहले दस सेकंड रुकें और खुद से पूछें कि क्या मैं अभी हल चाहता हूँ या सिर्फ जीतना चाहता हूँ। यह सवाल आपकी बुद्धि को वापस लाता है। झगड़ा खत्म नहीं होगा एक दिन में, लेकिन उस एक पल में आप सम्मोह से बाहर निकल सकते हैं।
आज क्या करें
आज रात सोने से पहले एक कागज़ पर लिखें कि आज आप किस बात के बारे में सबसे ज़्यादा सोचते रहे। बस पहचानिए, बदलने की कोशिश मत कीजिए अभी।
कल जब भी गुस्सा आने लगे तो खुद से एक सवाल पूछें कि यह कब शुरू हुआ था, उस पल से पहले मैं क्या सोच रहा था। यह सवाल आपको सीढ़ी का पहला डंडा दिखाएगा।
एक दिन के लिए बस एक काम करें, उस एक चीज़ के बारे में जानबूझकर कम सोचें जो आपको सबसे ज़्यादा गुस्सा दिलाती है। फोन रखें, टहलने जाएं, या बस कोई और काम करें।
आख़िरी बात
गुस्सा आपकी कमज़ोरी नहीं है, लेकिन उसे अनदेखा करना ज़रूर कमज़ोरी है। कृष्ण ने अर्जुन को यह नहीं कहा कि गुस्सा मत करो, उन्होंने बताया कि गुस्सा कहाँ से आता है। जब आपको वह जगह पता हो, तो आप वहीं रुक सकते हैं। बुद्धि बचाना ही असली जीत है।
मन में कुछ भारी लग रहा है?
अपनी बात कृष्ण से कहिए — बिना किसी फ़ैसले के, बस एक सच्ची बातचीत। शुरुआत मुफ़्त।
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