मन की शांति

मन की शांति कैसे पाएं | भगवद् गीता 2.71

19 सितंबर 2026·4 min read
मन की शांति कैसे पाएं | भगवद् गीता 2.71

भगवद् गीता 2.71

विहाय कामान्यः सर्वान्पुमांश्चरति निःस्पृहः।
निर्ममो निरहंकारः स शांतिमधिगच्छति।।2.71।।

vihāya kāmān yaḥ sarvān pumānśh charati niḥspṛihaḥ nirmamo nirahankāraḥ sa śhāntim adhigachchhati

अर्थ: ।।2.71।। जो मनुष्य सम्पूर्ण कामनाओंका त्याग करके स्पृहारहित, ममतारहित और अहंकाररहित होकर आचरण करता है, वह शान्तिको प्राप्त होता है।

कृष्ण क्या कह रहे हैं

अर्जुन उस वक्त कुरुक्षेत्र के मैदान में खड़ा है, हाथ से धनुष गिर चुका है, मन टूटा हुआ है। वह सोच रहा है कि अगर युद्ध जीत भी लिया तो क्या मिलेगा? कृष्ण उसे दूसरे अध्याय के आखिर में यह बताते हैं कि शांति का रास्ता जीत या हार से नहीं, बल्कि भीतर से गुज़रता है।

इस श्लोक में तीन शब्द ध्यान से समझने लायक हैं। 'स्पृहारहित' यानी किसी चीज़ की तड़प न हो। 'ममतारहित' यानी हर चीज़ को 'मेरी' न मानना। 'अहंकाररहित' यानी यह भाव न हो कि 'मैं' ही सब कुछ हूँ। कृष्ण कह रहे हैं कि जो इन तीनों को छोड़ देता है, वही सच्ची शांति पाता है। यह त्याग चीज़ों का नहीं, उनसे जुड़ी जकड़न का है।

आज के लिए एक काम की बात यह है कि जो बेचैनी हम महसूस करते हैं, वह अक्सर किसी चीज़ की कमी से नहीं आती, बल्कि इस डर से आती है कि जो है वह कहीं छिन न जाए। यह श्लोक उसी डर की जड़ पर बात करता है।

यह आप पर कैसे लागू होता है

जब सब कुछ है, फिर भी चैन नहीं

आपके पास घर है, नौकरी है, परिवार है, फिर भी रात को नींद नहीं आती। अंदर एक खालीपन है जिसे आप खुद भी समझा नहीं पाते। यह इसलिए नहीं है कि आपके पास कम है, बल्कि इसलिए है कि जो है उसे आप इतनी कसकर पकड़े हुए हैं कि हाथ थकने लगे हैं।

कल सुबह उठकर एक छोटा काम कीजिए। जो चीज़ सबसे ज़्यादा आपको डराती है कि 'यह चली गई तो क्या होगा', उसे कागज़ पर लिखिए और उसके आगे लिखिए 'यह मेरी नहीं, मुझे सौंपी गई है।' यह एक वाक्य आपकी पकड़ को थोड़ा ढीला करेगा। चीज़ें नहीं जाएंगी, लेकिन उनका बोझ ज़रूर हल्का होगा।

जब पैसों की चिंता सोने नहीं देती

आप हर महीने हिसाब लगाते हैं, हर खर्च पर नज़र रखते हैं, फिर भी मन में एक डर बना रहता है कि कहीं कुछ कम पड़ न जाए। यह चिंता ज़रूरी सतर्कता से अलग होती है, यह एक ऐसी तड़प है जो कभी शांत नहीं होती क्योंकि 'पर्याप्त' की कोई सीमा नहीं होती।

कल से एक फ़र्क करने की कोशिश कीजिए। जो काम आपके हाथ में है, वह पूरी मेहनत से कीजिए, लेकिन नतीजे को एक दिन के लिए 'अपना' मानना बंद कीजिए। यह सोचिए कि मैंने अपना काम किया, आगे जो होगा वह होगा। यह लापरवाही नहीं है, यह उस जकड़न को तोड़ना है जो चिंता को और गहरा करती है। पैसों की स्थिति तुरंत नहीं बदलेगी, लेकिन उसके बारे में सोचने का तरीका बदलेगा।

जब घर में कोई बीमार है और आप थक चुके हैं

आप दिन-रात उनकी देखभाल में लगे हैं। दवाइयाँ, डॉक्टर, रातों की नींद, सब कुछ उन्हीं के इर्द-गिर्द है। इस बीच आप खुद से पूछते हैं कि यह कब तक चलेगा, और फिर उस सवाल के लिए खुद को ही बुरा महसूस होता है।

कृष्ण का यह श्लोक आपको देखभाल छोड़ने को नहीं कह रहा। वह कह रहा है कि देखभाल करते हुए भी यह भाव रखिए कि 'मैं अकेले इन्हें ठीक कर लूँगा' या 'यह सब मेरी वजह से हो रहा है', यह अहंकार है जो आपको तोड़ता है। कल से सिर्फ आज का दिन देखिए। उनके लिए जो कर सकते हैं वह कीजिए, बाकी को थोड़ा छोड़िए। आप बेहतर देखभाल तब करेंगे जब आप खुद टूटे नहीं होंगे।

जब रिटायरमेंट के बाद लगता है कि अब कोई मतलब नहीं

पूरी ज़िंदगी एक पहचान रही, एक पद, एक दफ्तर, एक ज़िम्मेदारी। अब वह सब नहीं है और आप खुद से पूछते हैं कि अब मैं कौन हूँ। यह खालीपन असल में उस पहचान का जाना है जिसे आपने 'मैं' मान लिया था।

कृष्ण यहाँ कह रहे हैं कि जो 'मैं' किसी पद या भूमिका से नहीं बना, वह कभी जाता नहीं। कल सुबह कुछ ऐसा कीजिए जो सिर्फ इसलिए हो क्योंकि आपको अच्छा लगता है, किसी को दिखाने के लिए नहीं, किसी पद के लिए नहीं। वह छोटा काम आपको याद दिलाएगा कि आप उस भूमिका से बड़े हैं जो अब नहीं रही। उद्देश्य खत्म नहीं हुआ, बस उसका रूप बदला है।

आज क्या करें

  1. आज रात सोने से पहले एक मिनट बैठकर सोचिए कि आज आप किस चीज़ को लेकर सबसे ज़्यादा 'मेरा-मेरा' करते रहे, और मन ही मन उसे थोड़ा ढीला छोड़ दीजिए।

  2. कोई एक काम चुनिए जो आज करना है, उसे पूरी तरह कीजिए लेकिन उसका नतीजा अपने नाम न कीजिए, बस काम को काम की तरह होने दीजिए।

  3. अगर मन में कोई पुरानी इच्छा है जो पूरी नहीं हुई और बार-बार कचोटती है, तो उसे कागज़ पर लिखिए और उसके नीचे लिखिए 'मैंने कोशिश की थी, अब यह मेरे हाथ में नहीं।'

आख़िरी बात

शांति कोई इनाम नहीं है जो सब कुछ सही हो जाने पर मिलती है। वह एक तरीका है जीने का, जब हम चीज़ों को पकड़ना थोड़ा कम कर देते हैं। कृष्ण ने अर्जुन को यह बात उस वक्त कही थी जब सब कुछ दाँव पर था, इसलिए यह सिर्फ अच्छे वक्त की सलाह नहीं है। जो 'मेरा' कम होगा, वह 'मैं' ज़्यादा होगा और उस 'मैं' को कोई छीन नहीं सकता।

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