आलोचना का सामना कैसे करें | भगवद् गीता 2.15
भगवद् गीता 2.15
यं हि न व्यथयन्त्येते पुरुषं पुरुषर्षभ।
समदुःखसुखं धीरं सोऽमृतत्वाय कल्पते।।2.15।।
yaṁ hi na vyathayantyete puruṣhaṁ puruṣharṣhabha sama-duḥkha-sukhaṁ dhīraṁ so ’mṛitatvāya kalpate
अर्थ: ।।2.15।। कारण कि हे पुरुषोंमें श्रेष्ठ अर्जुन! सुख-दुःखमें सम रहनेवाले जिस धीर मनुष्यको ये मात्रास्पर्श (पदार्थ) व्यथित (सुखी-दुःखी) नहीं कर पाते, वह अमर होनेमें समर्थ हो जाता है अर्थात् वह अमर हो जाता है।
कृष्ण क्या कह रहे हैं
अर्जुन उस वक्त युद्धभूमि पर खड़ा है, हाथ-पाँव काँप रहे हैं, धनुष छूट गया है। वह इतना टूटा हुआ है कि लड़ना तो दूर, उठना भी नहीं चाहता। कृष्ण उसे समझाने बैठे हैं, और इस श्लोक में वे एक बहुत ज़रूरी बात कहते हैं, जो इंसान सुख और दुख दोनों में एक जैसा रहता है, उसे दुनिया की कोई चीज़ हिला नहीं पाती।
"मात्रास्पर्श" का मतलब है बाहरी चीज़ों का छूना, यानी वो सब जो बाहर से आता है और हमें अच्छा या बुरा महसूस कराता है। किसी की तारीफ, किसी की आलोचना, किसी का ताना, ये सब मात्रास्पर्श हैं। कृष्ण कह रहे हैं कि "धीर" इंसान, यानी जो भीतर से स्थिर है, इन चीज़ों से व्यथित नहीं होता। वह इन्हें महसूस करता है, लेकिन इनसे बिखरता नहीं।
आज के लिए एक काम की बात यह है कि आलोचना को रोकना आपके हाथ में नहीं है, लेकिन उसे अपने अंदर कितना घुसने देना है, यह पूरी तरह आपके हाथ में है।
यह आप पर कैसे लागू होता है
जब किसी ने आपके काम की समीक्षा में धज्जियाँ उड़ा दी हों
आपने महीनों मेहनत की, और किसी ने एक रिव्यू में लिख दिया कि यह काम "औसत" है, "कमज़ोर" है, या "सोचा नहीं गया।" वह पढ़कर पेट में कुछ डूबता है। यह स्वाभाविक है। लेकिन ध्यान दीजिए, क्या वह रिव्यू आपके काम की बात कर रहा है, या आपकी पूरी काबिलियत पर फैसला सुना रहा है? ये दोनों बिल्कुल अलग हैं।
कल सुबह उस रिव्यू को एक बार फिर पढ़िए, लेकिन इस बार एक कागज़ लेकर, जो बात सच में काम आ सकती है उसे एक तरफ लिखिए, और जो सिर्फ राय है उसे दूसरी तरफ। आप पाएँगे कि जो आपको इतना तकलीफ दे रहा था, उसका बड़ा हिस्सा सिर्फ किसी की राय थी। काम सुधरेगा, लेकिन हर रिव्यू से आपकी नींव नहीं हिलेगी।
जब ससुराल वाले हर बात पर टोकते हों
घर में रहते हुए रोज़ कोई न कोई बात निकलती है, खाना बनाने का तरीका, बच्चों को संभालने का ढंग, या बस आपका होना। यह आलोचना इसलिए ज़्यादा चुभती है क्योंकि यह घर के भीतर से आती है, जहाँ आप सुरक्षित महसूस करना चाहते हैं। कृष्ण की बात यहाँ यह है कि जब बाहरी बातें हर बार आपकी नींव हिला दें, तो आप हमेशा दूसरों के मूड पर निर्भर हो जाते हैं।
कल से एक छोटा काम करिए, जब कोई टोके, तो जवाब देने से पहले तीन सेकंड रुकिए और खुद से पूछिए: "क्या यह बात सच है?" अगर हाँ, तो सीखिए। अगर नहीं, तो उसे अपने भीतर मत उतरने दीजिए। रिश्ते वैसे ही रहेंगे, लेकिन आप उनसे हर बार टूटना बंद कर देंगी।
जब आप एक क्रिएटर हैं और कमेंट पढ़ते हैं
आपने कुछ बनाया, वीडियो, लेख, डिज़ाइन, कुछ भी, और कमेंट में किसी ने लिख दिया कि "बेकार है" या "यह तो कोई भी कर सकता है।" इंटरनेट पर राय सस्ती है और हर कोई देता है। लेकिन जो इंसान कमेंट लिखकर चला गया, उसने आपकी उस रात की नींद छीन ली, यह सोदा बराबर का नहीं है।
कल से एक नियम बनाइए, कमेंट पढ़ने का एक तय वक्त हो, और वह वक्त सोने से पहले का न हो। जो कमेंट काम का हो, नोट कर लीजिए। बाकी को स्क्रॉल करके आगे बढ़ जाइए। आपका काम बनता रहेगा, और धीरे-धीरे आप देखेंगे कि एक बुरे कमेंट का वज़न पहले जितना नहीं रहा।
जब माँ या पिता ने कभी "शाबाश" नहीं कहा
यह सबसे गहरी चोट है। आपने पढ़ाई की, नौकरी पाई, घर बसाया, और हर बार उम्मीद रही कि शायद इस बार वे कहें "बहुत अच्छा किया।" लेकिन वे चुप रहे, या फिर अगली कमी गिना दी। यह आलोचना नहीं, यह एक खालीपन है जो बहुत पुराना है। कृष्ण की बात यहाँ यह है कि जब हम अपनी कीमत किसी एक इंसान की मंज़ूरी से तय करने लगते हैं, तो हम हमेशा कम ही रहते हैं।
कल एक काम कीजिए, वह एक चीज़ लिखिए जो आपने इस साल की और जिस पर आपको खुद गर्व है। सिर्फ आपको, किसी और को नहीं। यह अभ्यास छोटा लगता है, लेकिन यही वह जगह है जहाँ से अपनी नींव खुद बनाना शुरू होता है। माँ-पिता नहीं बदलेंगे, लेकिन आपकी ज़रूरत धीरे-धीरे कम होती जाएगी।
आज क्या करें
आज जो भी आलोचना आपके दिमाग में घूम रही है, उसे कागज़ पर लिखिए और उसके बगल में लिखिए कि उसमें से क्या सच है और क्या सिर्फ किसी की राय। दोनों को अलग करना ही पहला कदम है।
अगली बार जब कोई आपको टोके या नकारे, तो उसी वक्त कोई जवाब मत दीजिए। बस एक गहरी साँस लीजिए और खुद से पूछिए कि दस दिन बाद यह बात कितनी बड़ी लगेगी।
आज रात सोने से पहले एक काम याद कीजिए जो आपने अच्छा किया, चाहे कितना भी छोटा हो। यह आदत बनाइए, क्योंकि अपनी नज़र में खड़े रहना सीखना पड़ता है।
आख़िरी बात
आलोचना बंद नहीं होगी। दुनिया में हमेशा कोई न कोई होगा जो कुछ कहेगा। लेकिन गीता यह नहीं कहती कि पत्थर बन जाओ, वह कहती है कि इतने मज़बूत बनो कि हर लहर तुम्हें बहा न ले जाए। जो इंसान तारीफ से फूलता नहीं और बुराई से टूटता नहीं, वही लंबे समय तक टिकता है। यही असली ताकत है, और यह ताकत बाहर से नहीं, भीतर से आती है।
मन में कुछ भारी लग रहा है?
अपनी बात कृष्ण से कहिए — बिना किसी फ़ैसले के, बस एक सच्ची बातचीत। शुरुआत मुफ़्त।
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