राधा अष्टमी

राधा अष्टमी व्रत: क्या खाएं, क्या न खाएं, कब खोलें

19 सितंबर 2026·5 min read
राधा अष्टमी व्रत: क्या खाएं, क्या न खाएं, कब खोलें

राधा अष्टमी व्रत: क्या खाएं, क्या न खाएं, कब खोलें

छोटा जवाब

राधा अष्टमी भाद्रपद शुक्ल अष्टमी को आती है, जनमाष्टमी के ठीक पंद्रह दिन बाद। 2026 में यह 19 सितंबर को है। व्रत परंपरागत रूप से दोपहर की आरती के बाद खुलता है, क्योंकि राधा रानी का प्राकट्य दोपहर में हुआ था। व्रत में अनाज, साधारण नमक, प्याज-लहसुन और मांसाहार नहीं लेते। फल, दूध, साबूदाना, सिंघाड़े या कुट्टू का आटा और सेंधा नमक चलता है। आरती के बाद प्रसाद लेकर व्रत तोड़ते हैं।


चरण दर चरण

  1. सुबह उठकर स्नान करें। साफ, हो सके तो सफेद या पीले रंग के कपड़े पहनें। ये राधा रानी के प्रिय रंग माने जाते हैं।

  2. संकल्प लें। मन में या बोलकर कह दें कि आज राधा अष्टमी का व्रत रख रहे हैं। यह एक पल का काम है, कोई लंबी विधि नहीं।

  3. राधा-कृष्ण की तस्वीर या मूर्ति के सामने दीपक जलाएं। घर में तुलसी हो तो एक पत्ता चढ़ाएं; न हो तो सफेद या पीले फूल रखें।

  4. पंचामृत तैयार करें। दूध, दही, घी, शहद और शक्कर मिलाकर भोग लगाएं। घर में खीर या माखन-मिश्री हो तो वह भी रखें।

  5. सुबह से दोपहर तक फल या दूध ले सकते हैं। अगर निर्जला व्रत नहीं रख रहे तो पानी और बिना अनाज की चाय भी चलती है।

  6. राधा रानी का नाम जपते रहें। "राधे राधे" या "श्री राधे", बस इतना काफी है। काम करते हुए भी मन में चलता रह सकता है।

  7. दोपहर में मध्याह्न आरती करें या उसमें शामिल हों। घर पर करें तो दीपक घुमाएं, भजन गाएं या सुनें।

  8. आरती के बाद प्रसाद लेकर व्रत खोलें। यही सबसे प्रचलित तरीका है। कुछ लोग शाम तक रुकते हैं, यह परिवार की परंपरा पर निर्भर है।

  9. व्रत का पहला भोजन हल्का रखें। साबूदाना खिचड़ी, कुट्टू की पूरी, या फल, जो भी घर में हो। भारी खाने से बचें।


क्या खा सकते हैं, क्या छोड़ दें

ये चीज़ें व्रत में चलती हैं, ज़्यादातर घरों में:

  • फल: केला, सेब, अमरूद, अंगूर, पपीता
  • दूध, दही, छाछ, पनीर, घी
  • साबूदाना (खिचड़ी या खीर)
  • सिंघाड़े या कुट्टू का आटा (पूरी, चीला)
  • आलू (उबला, भुना, या सेंधा नमक के साथ)
  • सेंधा नमक, साधारण नमक की जगह
  • पानी, दूध वाली चाय (बिना अनाज के बिस्कुट)

ये चीज़ें आज के दिन छोड़ दें:

  • गेहूं, चावल, दाल और हर तरह का अनाज
  • साधारण नमक (आयोडाइज़्ड)
  • प्याज और लहसुन
  • मांस, मछली, अंडा
  • शराब

अगर आप ऐसे हैं

जो पहली बार व्रत रख रहे हैं

पूरे दिन निर्जला रहने की कोई ज़रूरत नहीं है। फल और दूध लेते हुए व्रत रखें, दोपहर की आरती के बाद प्रसाद लें और व्रत खोलें। पहली बार में सबसे ज़रूरी है नीयत और याद, बाकी सब धीरे-धीरे आता है।

जिन्हें शुगर है या रोज़ दवा लेते हैं

आप व्रत मत रखिए, यह परंपरा खुद कहती है कि बीमार, बुज़ुर्ग और दवा पर निर्भर लोगों के लिए व्रत की जगह जप, दान या राधा रानी की कथा पढ़ना उतना ही पुण्य का काम है। अपनी दवा समय पर लें और भोजन न छोड़ें, राधा रानी आपकी भक्ति देखती हैं, शरीर को कष्ट देना उनकी इच्छा नहीं।

जिन्हें व्रत रखते हुए पूरा दिन काम करना है

साबूदाना खिचड़ी या कुट्टू की पूरी सुबह बनाकर साथ ले जाएं, ये टिफिन में आसानी से चलते हैं। दोपहर में अगर आरती का समय न मिले तो बस मन में "राधे राधे" कहें और शाम को घर आकर आरती करके व्रत खोलें। व्रत का मतलब काम छोड़ना नहीं, याद रखना है।

जो सबसे कठिन रूप में व्रत रखना चाहते हैं

निर्जला व्रत, यानी पानी भी नहीं, सबसे कठिन रूप है और यह ज़रूरी नहीं है, पर जो रखना चाहते हैं वे रख सकते हैं। इसमें सुबह से दोपहर की आरती तक कुछ भी नहीं लेते, आरती के बाद प्रसाद से व्रत खोलते हैं। अगर तबीयत बिगड़े तो तुरंत पानी लें, शरीर को कष्ट देना भक्ति नहीं है।


यह दिन क्यों मायने रखता है

राधा रानी को कृष्ण की शक्ति, उनकी भक्ति का सबसे ऊंचा रूप माना जाता है। वे कोई साधारण पात्र नहीं हैं, ब्रज की परंपरा में उन्हें कृष्ण से भी पहले याद किया जाता है। "राधे कृष्ण" कहते हैं, "कृष्ण राधे" नहीं। इसके पीछे यह भाव है कि जहाँ राधा हैं, वहाँ कृष्ण खुद चले आते हैं।

कृष्ण का जन्म आधी रात को हुआ था, अंधेरे में, कारागार में। राधा का प्राकट्य दोपहर में हुआ, खुले आसमान के नीचे, बरसाने में। यही वजह है कि इस व्रत का समय दोपहर है, उस पल को याद करने के लिए जब राधा इस धरती पर आईं।

ब्रज में एक कहावत है कि कृष्ण सबके हैं, पर राधा कृष्ण की हैं। इसीलिए जो कृष्ण तक पहुँचना चाहते हैं, वे पहले राधा को याद करते हैं। उनका नाम लेना एक तरह का शॉर्टकट माना जाता है, प्रेम का, भक्ति का।

लोग राधा रानी से परंपरागत रूप से प्रेम, सौहार्द और घर में सुख माँगते हैं। कुछ लोग अच्छे जीवनसाथी के लिए प्रार्थना करते हैं। पर सबसे गहरी माँग यही होती है कि मन में कृष्ण की भक्ति बनी रहे, और यह माँग राधा से बेहतर कौन पूरी कर सकता है।


आम सवाल

क्या बिना पूरे व्रत के भी यह दिन मना सकते हैं? बिल्कुल। अगर व्रत नहीं रख सकते तो राधा रानी का नाम जपें, कोई भजन सुनें, या किसी ज़रूरतमंद को कुछ दान करें। परंपरा खुद कहती है कि जप, दान और कथा-श्रवण व्रत के बराबर फल देते हैं।

क्या निर्जला व्रत में पानी भी नहीं पी सकते? निर्जला का मतलब है पानी भी नहीं, यह सबसे कठिन रूप है। लेकिन यह अनिवार्य नहीं है। अगर गर्मी ज़्यादा हो, तबीयत ठीक न हो, या आप पहली बार व्रत रख रहे हों, तो पानी और फल लेते हुए व्रत रखना पूरी तरह सही है।

दफ्तर में काम करते हुए व्रत कैसे निभाएं? सुबह व्रत का खाना बनाकर साथ ले जाएं। दोपहर में एक मिनट के लिए मन में राधा रानी को याद करें। शाम को घर आकर दीपक जलाएं, आरती करें और प्रसाद लेकर व्रत खोलें। व्रत जगह से नहीं, नीयत से होता है।

क्या पुरुष या अविवाहित लोग यह व्रत रख सकते हैं? हाँ, बिल्कुल। यह व्रत किसी एक वर्ग के लिए नहीं है। राधा रानी की भक्ति सबके लिए है, स्त्री, पुरुष, विवाहित, अविवाहित। ब्रज में तो पुरुष भक्त भी इस दिन को बड़े उत्साह से मनाते हैं।

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