दशहरे पर शमी पूजा: पत्ते सोना बनकर क्यों बँटते हैं
Shami puja on Dussehra: why leaves are given as gold
छोटा जवाब
दशहरा यानी विजयादशमी पर शमी के पेड़ की पत्तियाँ तोड़कर एक-दूसरे को "सोना" कहकर देने की परंपरा है। इसके पीछे दो कहानियाँ हैं: पांडवों ने अपने अज्ञातवास के आखिरी साल में अपने हथियार इसी पेड़ पर छुपाए थे और विजयादशमी के दिन उतारे थे। दूसरी कहानी कौत्स और राजा रघु की है, जिसमें कुबेर ने शमी के पेड़ पर सोना बरसाया था। इसीलिए यह पत्ती सोने का प्रतीक बन गई। आज के दिन शमी पूजा दोपहर में करें, पत्तियाँ घर लाएँ, और परिवार-पड़ोसी को दें।
चरण दर चरण
सुबह स्नान करें और संकल्प लें। मन में तय करें कि आज विजयादशमी की पूजा करनी है। कोई लंबा मंत्र नहीं चाहिए, इरादा काफी है।
घर की सफाई करें और अपने औज़ार, किताबें या वाहन साफ करके रखें। आयुध पूजा इसी दिन होती है। जो भी आपका काम का साधन है, उसे पोंछकर एक फूल या रोली का टीका लगाएँ।
दोपहर से पहले शमी के पेड़ की तलाश करें। पार्क, मंदिर परिसर या किसी के घर के बाहर अक्सर मिलता है। नहीं मिले तो आगे पढ़ें, विकल्प है।
दोपहर में पूजा करें। दिल्ली के लिए अपराह्न पूजा का समय लगभग 1:14 बजे से 3:32 बजे के बीच है और विजय मुहूर्त लगभग 2:00 बजे से 2:46 बजे तक है। अपने शहर में यह कुछ मिनट आगे-पीछे हो सकता है।
शमी पेड़ के पास दीया जलाएँ, जल चढ़ाएँ, थोड़े चावल और मौली रखें। यह श्लोक पढ़ें या मन में दोहराएँ: शमी शमयते पापं शमी शत्रुविनाशिनी। अर्जुनस्य धनुर्धारी रामस्य प्रियदर्शिनी॥
कुछ पत्तियाँ तोड़कर घर लाएँ। इन्हें परिवार के बड़ों को दें और बड़े छोटों को आशीर्वाद के साथ लौटाएँ। यही "सोना" देने की परंपरा है।
नवरात्रि का कलश जल घर में छिड़कें और जवारे (जौ के अंकुर) किसी बहते जल में प्रवाहित करें। कुछ लोग जवारे कान के पीछे या टोपी में लगाते हैं, यह परिवार की परंपरा के अनुसार करें।
शाम को रावण दहन देखने जाएँ या घर पर रामायण की कोई चौपाई पढ़ें। राम की रावण पर विजय और दुर्गा की महिषासुर पर विजय, दोनों आज के दिन याद की जाती हैं।
उत्तर भारत में हैं तो नीलकंठ पक्षी (Indian roller) देखना शुभ माना जाता है। अगर दिखे तो अच्छा, नहीं दिखा तो पूजा में कोई कमी नहीं।
क्या अर्पित करें
शमी पेड़ पर चढ़ाने के लिए ये पाँच चीज़ें काफी हैं:
- जल (लोटे में साफ पानी)
- दीया और तेल या घी
- अक्षत (साबुत चावल)
- मौली (लाल धागा)
- रोली या कुमकुम
घर की पूजा की थाली के लिए:
- फूल (गेंदे या जो भी मिले)
- धूपबत्ती
- मिठाई या गुड़ का एक टुकड़ा
- नवरात्रि के जवारे (अगर घर में हों)
अगर आप ऐसे हैं
जो पहली बार घर पर कर रहे हैं
आपको किसी विशेष सामग्री की ज़रूरत नहीं है। एक दीया, थोड़ा जल और यह श्लोक, बस इतने से शमी पूजा हो जाती है। अगर पेड़ नहीं मिला, तो किसी मंदिर में जाकर वहाँ के शमी पेड़ के पास खड़े होकर श्लोक पढ़ें और दो पत्तियाँ माँगकर ले आएँ।
नौकरी वाले जिनके पास आज आधा घंटा है
लंच ब्रेक में या दफ्तर से निकलते वक्त किसी पार्क में शमी का पेड़ ढूँढें, वहाँ एक मिनट रुककर श्लोक पढ़ें और कुछ पत्तियाँ जेब में रख लें। घर पहुँचकर परिवार को दें। पूजा का दिल इरादे में है, घंटे भर के अनुष्ठान में नहीं।
जिनके बच्चे इसका मतलब समझना चाहते हैं
बच्चों को बताएँ कि पाँच भाइयों (पांडवों) ने एक साल तक अपनी तलवारें और धनुष इसी पेड़ में छुपाए थे, और आज के दिन वापस लिए थे। इसीलिए यह पेड़ बहादुरी और जीत का निशान है। पत्ती देना मतलब है "तुम्हें जीत मिले", यह बच्चों को आसानी से समझ आता है।
जो विदेश में हैं और आसपास कोई रामलीला नहीं
शमी का पेड़ न मिले तो कोई बात नहीं, श्लोक पढ़ें और मन में पूजा करें, परंपरा यही कहती है कि भावना ही असली अर्पण है। यूट्यूब पर रावण दहन लाइव देखें, घर में दीया जलाएँ, और किसी दोस्त को फोन करके "सोना" की शुभकामना दें।
यह दिन क्यों मायने रखता है
दशहरे पर शमी पूजा सिर्फ एक रस्म नहीं है, इसमें दो अलग-अलग युगों की कहानियाँ जुड़ी हैं। महाभारत के विराट पर्व में पांडवों ने अज्ञातवास के आखिरी साल में अपने हथियार शमी के पेड़ पर छुपाए थे। जब वह साल पूरा हुआ, तो विजयादशमी के दिन उन्होंने हथियार उतारे और फिर से क्षत्रिय धर्म अपनाया। इसीलिए शमी विजय और साहस का प्रतीक बन गया।
दूसरी कहानी रघुवंश की है। कौत्स नाम के शिष्य को अपने गुरु को गुरु-दक्षिणा देनी थी। वह राजा रघु के पास गया, लेकिन रघु ने अभी-अभी सारा खजाना दान में दे दिया था। रघु ने कुबेर से माँगा, और कुबेर ने शमी और आप्त के पेड़ों पर सोना बरसाया। कौत्स ने वह सोना गाँव वालों में बाँट दिया। तब से शमी की पत्तियाँ सोने का प्रतीक हैं और लोग एक-दूसरे को देते हैं।
रावण की कहानी भी सीधी नहीं है। वह शिव का महान भक्त था, शिव तांडव स्तोत्र उसी का रचा हुआ माना जाता है। चारों वेद और छह शास्त्र उसे कंठस्थ थे। उसके दस सिर विद्वता के प्रतीक हैं, लेकिन परंपरा उन्हें दस कमज़ोरियों से भी जोड़ती है: काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर्य, स्वार्थ, अन्याय, अमानवता और अहंकार। इतनी विद्वता के बावजूद एक इच्छा ने उसे डुबोया। रावण दहन इसीलिए सिर्फ दुश्मन को जलाना नहीं, अपने भीतर की इन्हीं कमज़ोरियों को पहचानना भी है।
यह दिन साढ़े तीन मुहूर्तों में से एक है। मतलब यह कि आज कोई भी नया काम शुरू करने के लिए अलग से मुहूर्त निकालने की ज़रूरत नहीं। नई नौकरी, नया व्यापार, बच्चे की पहली पाठशाला, कोई भी शुरुआत, आज का पूरा दिन उसके लिए शुभ है।
आम सवाल
क्या शमी का पेड़ न मिले तो पूजा अधूरी रहती है? नहीं। श्लोक और भावना पूजा का असली हिस्सा है। अगर पेड़ नहीं मिला, तो मन में पूजा करें और किसी को फोन करके शुभकामना दें। कुछ लोग आप्त (अपटा) के पत्ते भी उपयोग करते हैं, यह महाराष्ट्र और कर्नाटक में आम है।
20 अक्टूबर और 21 अक्टूबर, दशहरा किस दिन है? दशमी तिथि 20 अक्टूबर दोपहर से शुरू होकर 21 अक्टूबर दोपहर तक है। जो पंचांग उदया तिथि (सूर्योदय के समय जो तिथि हो) मानते हैं, वे 21 को मनाएँगे। दोनों परंपराएँ सही हैं। अपने परिवार या स्थानीय मंदिर का पंचांग देखें।
क्या पुरुष या अविवाहित लोग शमी पूजा कर सकते हैं? हाँ, बिल्कुल। शमी पूजा किसी एक वर्ग के लिए नहीं है। पांडवों की कहानी योद्धाओं की है और कौत्स की कहानी एक विद्यार्थी की। यह पूजा हर कोई कर सकता है।
क्या आज कोई नई चीज़ खरीदना सच में शुभ है? यह दिन साढ़े तीन मुहूर्तों में गिना जाता है, इसलिए परंपरागत रूप से आज की गई खरीदारी या शुरुआत के लिए अलग मुहूर्त नहीं देखा जाता। यह मान्यता है, इसे मानना या न मानना आप पर है, लेकिन परंपरा यही कहती है।
मन में कुछ भारी लग रहा है?
अपनी बात कृष्ण से कहिए — बिना किसी फ़ैसले के, बस एक सच्ची बातचीत। शुरुआत मुफ़्त।
कृष्ण से बात करें →