दशहरा

दशहरा दो विजयों का दिन क्यों है: राम और रावण, दुर्गा और महिषासुर

20 अक्तूबर 2026·6 मिनट में पढ़ें
दशहरा दो विजयों का दिन क्यों है: राम और रावण, दुर्गा और महिषासुर

Why Dussehra is two victories: Rama over Ravana, Durga over Mahishasura

छोटा जवाब

विजयदशमी 2026 मंगलवार, 20 अक्टूबर को है, नवरात्रि की नौ रातों के ठीक बाद, अश्विन शुक्ल दशमी। यह दिन एक साथ दो विजयों का उत्सव है: राम की रावण पर और देवी दुर्गा की महिषासुर पर। दोपहर लगभग 1:14 बजे से 3:32 बजे के बीच अपराजिता पूजा करें, और अगर दिल्ली में हैं तो विजय मुहूर्त करीब 2:00 बजे से 2:46 बजे तक है। यह दिन साढ़े तीन मुहूर्तों में से एक है, यानी कोई भी नया काम, खरीदारी या शुरुआत बिना अलग मुहूर्त देखे की जा सकती है। शाम को रावण दहन देखें और घर में शमी या अपराजिता की पूजा करें।


चरण दर चरण

  1. सुबह स्नान और संकल्प: जल्दी उठें, स्नान करें। मन में यह भाव रखें कि आज विजय का दिन है, बुराई पर अच्छाई की, अज्ञान पर ज्ञान की।

  2. नवरात्रि कलश का जल: अगर घर में नवरात्रि का कलश था, तो उसका जल पूरे घर में छिड़कें। जवारे (जौ के अंकुर) परिवार के बड़े सदस्य कान के पीछे या टोपी में लगाएं, यह शुभता का प्रतीक है।

  3. शमी पूजा: शमी के पत्ते लाएं (न मिलें तो आंवला या तुलसी चलेगी)। पत्तों को धोकर, रोली-अक्षत लगाएं और "शमी शमयते पापं" मंत्र पढ़ें। महाराष्ट्र और कर्नाटक में शमी या आप्टा के पत्ते "सोना" मानकर आपस में बांटे जाते हैं।

  4. औजार, किताब और वाहन पूजा (आयुध पूजा): घर के काम के औजार, किताबें, लैपटॉप, वाहन, सब साफ करें और उन पर रोली-फूल चढ़ाएं। जो जिस काम से रोजी कमाता है, वह चीज़ पूजनीय है।

  5. अपराजिता पूजा (दोपहर): दोपहर 1:14 बजे के बाद अपराजिता देवी की पूजा करें। अगर मूर्ति या चित्र न हो, तो किसी साफ जगह पर रोली से स्वस्तिक बनाएं और फूल-अक्षत चढ़ाएं। परंपरागत रूप से यह पूजा घर की सीमा पार करने से पहले होती थी, आज के समय में दरवाजे पर भी कर सकते हैं।

  6. नीलकंठ दर्शन (उत्तर भारत): अगर घर के पास कोई नीलकंठ (Indian roller) पक्षी दिख जाए, तो इसे बहुत शुभ माना जाता है। जानबूझकर ढूंढने की जरूरत नहीं, दिख जाए तो मन में प्रसन्नता रखें।

  7. शाम: रावण दहन: शाम को रामलीला मैदान या पास के कार्यक्रम में जाएं। रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतले जलते देखें। अगर बाहर नहीं जा सकते, तो घर पर रामायण का पाठ करें या राम-नाम लिखें।

  8. बंगाल की परंपरा: अगर आप बंगाली हैं या बंगाली समुदाय के पास हैं, तो आज दुर्गा विसर्जन है, सिंदूर खेला के साथ। विवाहित महिलाएं एक-दूसरे को सिंदूर लगाती हैं।

  9. नया काम शुरू करें: कोई नई शुरुआत करनी हो, व्यापार, पढ़ाई, खरीदारी, आज कर सकते हैं। साढ़े तीन मुहूर्तों में यह दिन शामिल है, अलग मुहूर्त की जरूरत नहीं।


क्या अर्पित करें

अपराजिता और शमी पूजा के लिए, ये चीजें किसी भी रसोई में मिल जाती हैं:

  • शमी के पत्ते या तुलसी (विकल्प: आंवला के पत्ते)
  • रोली, अक्षत (चावल), हल्दी
  • पीले या सफेद फूल
  • धूप, दीपक, घी या तेल
  • जल (तांबे के लोटे में हो तो बेहतर)

रावण दहन और विजय के प्रतीक के रूप में घर पर:

  • जवारे (जौ के अंकुर), नवरात्रि में बोए हों तो
  • मिठाई, गुड़ और चना भी पर्याप्त है
  • शमी या आप्टा के पत्ते, परिवार और पड़ोसियों में बांटें

अगर आप ऐसे हैं

जो पहली बार घर पर कर रहे हैं

घबराइए नहीं, इस दिन की पूजा बहुत लचीली है। एक थाली में रोली, अक्षत, दीपक और फूल रखें, शमी के पत्ते लाएं, और दोपहर को शांत मन से बैठकर "शमी शमयते पापं" मंत्र पढ़ें। बाकी सब परंपरा है, नियम नहीं, जो हो सके वही करें, भाव सच्चा हो।

नौकरी वाले जिनके पास आज आधा घंटा है

सुबह स्नान के बाद घर के औजार या लैपटॉप पर एक फूल और रोली लगाएं, यही आयुध पूजा है। लंच ब्रेक में या दोपहर 2 बजे के आसपास दो मिनट के लिए हाथ जोड़ें और मन में विजय का संकल्प लें। शाम को रावण दहन देखने जाएं, बस इतना काफी है।

जिनके बच्चे इसका मतलब समझना चाहते हैं

बच्चों को दो कहानियां सुनाएं: राम ने दस सिर वाले रावण को हराया क्योंकि रावण अपना एक गलत काम नहीं छोड़ पाया; और देवी दुर्गा ने नौ दिन-रात लड़कर महिषासुर को हराया। फिर पूछें, रावण के दस सिर दस बुराइयों के निशान थे, तुम्हारी एक बुराई कौन सी है जो आज छोड़ोगे? यह सवाल दशहरे का असली पाठ है।

जो विदेश में हैं और आसपास कोई रामलीला नहीं

आप घर पर ही एक छोटा दीपक जलाएं और रामायण का कोई एक अध्याय पढ़ें या सुनें। अगर शमी का पत्ता न मिले, तो तुलसी का पत्ता रखें और मंत्र पढ़ें। विदेश में समय का फर्क होगा, दिल्ली के विजय मुहूर्त (दोपहर 2:00 से 2:46 IST) के हिसाब से अपने शहर का समय निकालें और उस वक्त दो मिनट शांत बैठें।


यह दिन क्यों मायने रखता है

नवरात्रि की नौ रातें देवी दुर्गा की हैं। देवी महात्म्य (मार्कंडेय पुराण) के अनुसार, महिषासुर नाम के भैंसे-रूपी राक्षस ने देवताओं को परास्त कर दिया था। तब सभी देवताओं की शक्ति मिलकर दुर्गा के रूप में प्रकट हुई और नौ दिन-रात के युद्ध के बाद दसवें दिन उन्होंने महिषासुर का वध किया। यही दसवां दिन विजयदशमी है, "विजय" यानी जीत, "दशमी" यानी दसवीं तिथि।

दूसरी विजय राम की है। वाल्मीकि रामायण के अनुसार, राम ने इसी दिन लंका में रावण को हराया। "दशहरा" शब्द आता है "दश-हर" से, दस सिरों वाले का अंत। रावण महाज्ञानी था, शिव का भक्त था, शिव तांडव स्तोत्र उसी का रचा हुआ माना जाता है। उसके दस सिर चार वेदों और छह शास्त्रों की महारत के प्रतीक थे। फिर भी उसका पतन हुआ, क्योंकि एक कामना उसने नहीं छोड़ी। परंपरा उसके दस सिरों को दस दोषों से भी जोड़ती है: काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर्य, स्वार्थ, अन्याय, अमानवता और अहंकार।

महाभारत की परंपरा भी इसी दिन से जुड़ती है। पांडवों ने अज्ञातवास के आखिरी साल अपने हथियार एक शमी वृक्ष में छुपाए थे और विजयदशमी के दिन उन्हें वापस उठाया (विराट पर्व)। इसीलिए शमी की पूजा होती है और महाराष्ट्र-कर्नाटक में शमी या आप्टा के पत्ते "सोना" कहकर बांटे जाते हैं, कौत्स और राजा रघु की कथा से जुड़ी यह परंपरा बताती है कि कुबेर ने शमी पर सोना बरसाया था ताकि रघु गुरु-दक्षिणा दे सकें।

यह दिन इसलिए भी अनूठा है कि दोनों विजयें एक ही भाव की हैं, बुराई पर अच्छाई की, भीतर की कमजोरी पर संकल्प की। नौ रातें साधना की हैं, दसवां दिन उस साधना का फल है। केरल और दक्षिण के कुछ हिस्सों में इसी दिन बच्चों का विद्यारंभ होता है, पहला अक्षर लिखवाया जाता है। जीत सिर्फ युद्ध की नहीं, ज्ञान की भी है।


आम सवाल

क्या 20 अक्टूबर को मनाएं या 21 को? दशमी तिथि 20 अक्टूबर को दोपहर करीब 12:50 बजे शुरू होती है और 21 अक्टूबर को दोपहर करीब 2:11 बजे तक रहती है। जो पंचांग उदया तिथि (सूर्योदय की तिथि) मानते हैं, वे 21 को मना सकते हैं। दोनों परंपराएं सही हैं, अपने परिवार या स्थानीय मंदिर का पंचांग देखें।

क्या आज कोई नई खरीदारी या काम शुरू कर सकते हैं? हां, बिल्कुल। विजयदशमी साढ़े तीन मुहूर्तों में से एक है। नया व्यापार, वाहन खरीदना, बच्चे की पढ़ाई शुरू करना, कोई भी नई शुरुआत, अलग मुहूर्त निकालने की जरूरत नहीं।

क्या बिना व्रत रखे भी पूजा कर सकते हैं? विजयदशमी पर व्रत अनिवार्य नहीं है। यह मुख्यतः विजय और पूजा का दिन है। अपराजिता पूजा, शमी पूजा और रावण दहन, ये सब बिना व्रत के भी पूरे भाव से किए जा सकते हैं।

अगर घर में शमी का पेड़ या पत्ते न मिलें तो? तुलसी के पत्ते या आंवला के पत्ते विकल्प के रूप में उपयोग कर सकते हैं। मुख्य भाव शमी का सम्मान और पांडवों की विजय की याद है, पत्ते का प्रकार नहीं, भाव मायने रखता है।

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