भगवद्गीता अध्याय 1, श्लोक 11–20 | अर्जुनविषादयोग | अर्थ सहित
पहले खंड में दुर्योधन ने अपनी और पाण्डवों की सेना का वर्णन किया और गुरु द्रोणाचार्य को दोनों पक्षों के प्रमुख योद्धाओं से परिचित कराया। इस खंड में युद्ध आरंभ होने की वह घड़ी आती है जब पहले भीष्म पितामह शंख बजाते हैं, फिर कौरव-पक्ष के सभी वाद्य एक साथ गूँज उठते हैं, और उत्तर में पाण्डव-पक्ष के योद्धा भी अपने-अपने शंख बजाते हैं। उस भीषण ध्वनि से धृतराष्ट्र-पक्ष के हृदय काँप उठते हैं और अर्जुन धनुष उठाकर श्रीकृष्ण से कुछ कहने को तत्पर होते हैं।
श्लोक 1.11
वक्ता: संजय
अयनेषु च सर्वेषु यथाभागमवस्थिताः।
भीष्ममेवाभिरक्षन्तु भवन्तः सर्व एव हि ॥1.11॥
ayaneṣhu cha sarveṣhu yathā-bhāgamavasthitāḥ / bhīṣhmamevābhirakṣhantu bhavantaḥ sarva eva hi
हिंदी अनुवाद: दुर्योधन की आज्ञा थी कि आप सभी अपने-अपने मोर्चों पर दृढ़ता से डटे रहते हुए पितामह भीष्म की चारों ओर से रक्षा करें।
भावार्थ: संजय धृतराष्ट्र को बता रहे हैं कि दुर्योधन ने अपने सेनापतियों को क्या निर्देश दिया। वह चाहता था कि प्रत्येक योद्धा अपनी-अपनी निर्धारित जगह पर स्थिर रहे और साथ ही पितामह भीष्म की विशेष सुरक्षा सुनिश्चित करे। 'अयनेषु' का अर्थ है सेना के विभिन्न मोर्चे या व्यूह-स्थान। भीष्म सबसे अनुभवी और शक्तिशाली योद्धा थे, इसलिए दुर्योधन उन्हें कौरव-सेना का आधार-स्तंभ मानता था और उनकी रक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देता था।
आज के जीवन में: किसी भी दल में सबसे अनुभवी और महत्त्वपूर्ण व्यक्ति की रक्षा और सहयोग करना पूरे दल की सफलता के लिए आवश्यक होता है।
श्लोक 1.12
वक्ता: संजय
तस्य संजनयन्हर्षं कुरुवृद्धः पितामहः।
सिंहनादं विनद्योच्चैः शङ्खं दध्मौ प्रतापवान् ॥1.12॥
tasya sañjanayan harṣhaṁ kuru-vṛiddhaḥ pitāmahaḥ / siṁha-nādaṁ vinadyochchaiḥ śhaṅkhaṁ dadhmau pratāpavān
हिंदी अनुवाद: दुर्योधन के मन में उत्साह भरते हुए कुरुवंश के वृद्ध और प्रतापी पितामह भीष्म ने सिंह की गर्जना के समान ऊँचे स्वर में शंख बजाया।
भावार्थ: संजय वर्णन करते हैं कि भीष्म पितामह ने दुर्योधन को ढाढ़स देने के लिए सिंहनाद किया और शंख फूँका। 'कुरुवृद्धः' अर्थात् कुरुवंश के सबसे वयोवृद्ध और 'प्रतापवान्' अर्थात् तेजस्वी। दुर्योधन के मन में जो चिंता थी, उसे भाँपकर भीष्म ने यह उद्घोष किया। सिंहनाद केवल शब्द नहीं था, वह पूरी सेना में साहस और विश्वास भरने का संकेत था। इस एक कार्य से भीष्म ने अपने सेनापतित्व का परिचय दिया।
आज के जीवन में: नेतृत्व का एक गुण यह भी है कि कठिन क्षण में अपने दल का मनोबल ऊँचा रखा जाए।
श्लोक 1.13
वक्ता: संजय
ततः शङ्खाश्च भेर्यश्च पणवानकगोमुखाः।
सहसैवाभ्यहन्यन्त स शब्दस्तुमुलोऽभवत् ॥1.13॥
tataḥ śhaṅkhāśhcha bheryaśhcha paṇavānaka-gomukhāḥ / sahasaivābhyahanyanta sa śhabdastumulo ’bhavat
हिंदी अनुवाद: इसके बाद कौरव-पक्ष से शंख, भेरी, ढोल, मृदंग और नरसिंघे एक साथ बज उठे और उनका वह संयुक्त शब्द अत्यंत भयंकर हो गया।
भावार्थ: भीष्म के शंखनाद के साथ ही कौरव-सेना के सभी वाद्य-यंत्र एक साथ गूँज उठे। 'भेरी' बड़े नगाड़े को, 'पणवानक' छोटे ढोल को और 'गोमुख' नरसिंघे को कहते हैं। 'तुमुलः' का अर्थ है अत्यंत कोलाहलपूर्ण। यह ध्वनि केवल युद्ध-घोष नहीं थी, बल्कि सेना के उत्साह और युद्ध के आरंभ की सूचना थी। इस वर्णन से युद्धभूमि का वातावरण जीवंत हो उठता है।
श्लोक 1.14
वक्ता: संजय
ततः श्वेतैर्हयैर्युक्ते महति स्यन्दने स्थितौ।
माधवः पाण्डवश्चैव दिव्यौ शङ्खौ प्रदध्मतुः ॥1.14॥
tataḥ śhvetairhayairyukte mahati syandane sthitau / mādhavaḥ pāṇḍavaśhchaiva divyau śhaṅkhau pradadhmatuḥ
हिंदी अनुवाद: उसके बाद सफेद घोड़ों से जुते हुए विशाल रथ पर विराजमान लक्ष्मीपति श्रीकृष्ण और पाण्डुपुत्र अर्जुन ने अपने दिव्य शंखों को बड़े जोर से बजाया।
भावार्थ: कौरव-पक्ष के शंखनाद के उत्तर में पाण्डव-पक्ष से भी शंख-ध्वनि हुई। 'माधवः' लक्ष्मी के पति श्रीकृष्ण का नाम है और 'पाण्डवः' यहाँ अर्जुन के लिए प्रयुक्त है। श्वेत अश्वों से युक्त रथ और 'दिव्यौ शङ्खौ' — दोनों शंखों का दिव्य होना — यह संकेत देता है कि पाण्डव-पक्ष केवल मानवीय शक्ति पर नहीं, बल्कि दैवीय सहयोग पर भी आश्रित है। श्रीकृष्ण का सारथि के रूप में होना इस पक्ष की विशेषता है।
श्लोक 1.15
वक्ता: संजय
पाञ्चजन्यं हृषीकेशो देवदत्तं धनंजयः।
पौण्ड्रं दध्मौ महाशङ्खं भीमकर्मा वृकोदरः ॥1.15॥
pāñchajanyaṁ hṛiṣhīkeśho devadattaṁ dhanañjayaḥ / pauṇḍraṁ dadhmau mahā-śhaṅkhaṁ bhīma-karmā vṛikodaraḥ
हिंदी अनुवाद: अंतर्यामी श्रीकृष्ण ने पाञ्चजन्य नामक शंख बजाया, अर्जुन ने देवदत्त नामक शंख बजाया और भयंकर कर्म करने वाले वृकोदर भीम ने पौण्ड्र नामक महाशंख बजाया।
भावार्थ: संजय तीन प्रमुख योद्धाओं के शंखों के नाम बताते हैं। 'हृषीकेशः' अर्थात् इंद्रियों के स्वामी श्रीकृष्ण, 'धनंजयः' अर्थात् धन जीतने वाले अर्जुन और 'वृकोदरः' अर्थात् भेड़िये के समान उदर वाले भीम। प्रत्येक शंख का अपना नाम था, जो उस योद्धा की पहचान और गौरव का प्रतीक था। भीम को 'भीमकर्मा' कहा गया है, जो उनके असाधारण पराक्रम की ओर संकेत करता है।
श्लोक 1.16
वक्ता: संजय
अनन्तविजयं राजा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः।
नकुलः सहदेवश्च सुघोषमणिपुष्पकौ ॥1.16॥
anantavijayaṁ rājā kuntī-putro yudhiṣhṭhiraḥ / nakulaḥ sahadevaśhcha sughoṣha-maṇipuṣhpakau
हिंदी अनुवाद: कुन्तीपुत्र राजा युधिष्ठिर ने अनन्तविजय नामक शंख बजाया और नकुल तथा सहदेव ने क्रमशः सुघोष और मणिपुष्पक नामक शंख बजाए।
भावार्थ: पाँचों पाण्डवों में से तीन और का वर्णन है। युधिष्ठिर का शंख 'अनन्तविजय' — अर्थात् जिसकी विजय का कोई अंत नहीं — उनके धर्मपरायण स्वभाव और राजसी गरिमा का प्रतीक है। नकुल का 'सुघोष' और सहदेव का 'मणिपुष्पक' — दोनों नाम उनके शंखों की विशेषता बताते हैं। इस प्रकार पाँचों पाण्डवों के शंखों का नामोल्लेख उनकी व्यक्तिगत पहचान और युद्ध में उनकी उपस्थिति को रेखांकित करता है।
श्लोक 1.17
वक्ता: संजय
काश्यश्च परमेष्वासः शिखण्डी च महारथः।
धृष्टद्युम्नो विराटश्च सात्यकिश्चापराजितः ॥1.17॥
kāśhyaśhcha parameṣhvāsaḥ śhikhaṇḍī cha mahā-rathaḥ / dhṛiṣhṭadyumno virāṭaśhcha sātyakiśh chāparājitaḥ
हिंदी अनुवाद: श्रेष्ठ धनुर्धर काशिराज, महारथी शिखण्डी, धृष्टद्युम्न, राजा विराट और अजेय सात्यकि — इन सभी ने भी अपने-अपने शंख बजाए।
भावार्थ: संजय अब पाण्डव-पक्ष के अन्य प्रमुख योद्धाओं का उल्लेख करते हैं। 'परमेष्वासः' का अर्थ है श्रेष्ठ धनुर्धर और 'महारथः' का अर्थ है वह योद्धा जो अकेले हज़ारों से लड़ सकता हो। 'अपराजितः' अर्थात् जिसे कभी पराजित न किया जा सका हो — यह सात्यकि की विशेषता है। इन योद्धाओं के शंखनाद से पाण्डव-सेना की शक्ति और विस्तार का बोध होता है।
श्लोक 1.18
वक्ता: संजय
द्रुपदो द्रौपदेयाश्च सर्वशः पृथिवीपते।
सौभद्रश्च महाबाहुः शङ्खान्दध्मुः पृथक्पृथक् ॥1.18॥
drupado draupadeyāśhcha sarvaśhaḥ pṛithivī-pate / saubhadraśhcha mahā-bāhuḥ śhaṅkhāndadhmuḥ pṛithak pṛithak
हिंदी अनुवाद: हे पृथ्वीपते! राजा द्रुपद, द्रौपदी के पाँचों पुत्र और महाबाहु सुभद्रापुत्र अभिमन्यु — इन सभी ने अलग-अलग अपने-अपने शंख बजाए।
भावार्थ: इस श्लोक में पाण्डव-पक्ष के शेष प्रमुख योद्धाओं का उल्लेख है। 'द्रौपदेयाः' अर्थात् द्रौपदी के पुत्र — ये पाँच थे, प्रत्येक पाण्डव से एक-एक। 'सौभद्रः' अर्थात् सुभद्रा के पुत्र अभिमन्यु, जो 'महाबाहु' — विशाल भुजाओं वाले — थे। 'पृथक् पृथक्' का अर्थ है अलग-अलग, अर्थात् प्रत्येक ने अपना शंख स्वतंत्र रूप से बजाया। इससे पाण्डव-सेना की सामूहिक शक्ति और प्रत्येक योद्धा की व्यक्तिगत प्रतिष्ठा दोनों प्रकट होती हैं।
श्लोक 1.19
वक्ता: संजय
स घोषो धार्तराष्ट्राणां हृदयानि व्यदारयत्।
नभश्च पृथिवीं चैव तुमुलो व्यनुनादयन् ॥1.19॥
sa ghoṣho dhārtarāṣhṭrāṇāṁ hṛidayāni vyadārayat / nabhaśhcha pṛithivīṁ chaiva tumulo nunādayan
हिंदी अनुवाद: आकाश और पृथ्वी को गुँजाते हुए पाण्डव-पक्ष के उस भयंकर शंखनाद ने धृतराष्ट्र के पक्ष के लोगों के हृदय विदीर्ण कर दिए।
भावार्थ: संजय बताते हैं कि पाण्डव-पक्ष का शंखनाद इतना प्रचंड था कि उसने आकाश और पृथ्वी दोनों को कंपित कर दिया। 'व्यदारयत्' का अर्थ है विदीर्ण करना — अर्थात् हृदय को भीतर से तोड़ देना। 'धार्तराष्ट्राणाम्' अर्थात् धृतराष्ट्र के पुत्रों और उनके साथियों के। यह केवल ध्वनि का प्रभाव नहीं था, बल्कि पाण्डव-पक्ष की नैतिक शक्ति और दैवीय सहयोग का मनोवैज्ञानिक प्रभाव भी था जो शत्रु-पक्ष को भीतर से कमज़ोर कर रहा था।
आज के जीवन में: जिस पक्ष में धर्म और न्याय का बल होता है, उसका उद्घोष भी विरोधियों के मन में कंपन उत्पन्न करता है।
श्लोक 1.20
वक्ता: संजय
अथ व्यवस्थितान् दृष्ट्वा धार्तराष्ट्रान्कपिध्वजः।
प्रवृत्ते शस्त्रसंपाते धनुरुद्यम्य पाण्डवः ॥1.20॥
atha vyavasthitān dṛiṣhṭvā dhārtarāṣhṭrān kapi-dhwajaḥ / pravṛitte śhastra-sampāte dhanurudyamya pāṇḍavaḥ / hṛiṣhīkeśhaṁ tadā vākyam idam āha mahī-pate
हिंदी अनुवाद: हे राजन्! शस्त्र चलने की तैयारी हो ही रही थी कि उस समय कपिध्वज अर्जुन ने धृतराष्ट्र-पक्ष के योद्धाओं को व्यवस्थित रूप से सामने खड़े देखकर अपना धनुष उठाया और श्रीकृष्ण से ये वचन बोले।
भावार्थ: यह श्लोक एक महत्त्वपूर्ण मोड़ है — युद्ध आरंभ होने से ठीक पहले का क्षण। 'कपिध्वजः' अर्थात् जिनके रथ की ध्वजा पर वानर का चिह्न है — यह अर्जुन का विशेषण है। 'प्रवृत्ते शस्त्रसंपाते' अर्थात् शस्त्र चलने की तैयारी के उस क्षण में। अर्जुन ने सामने खड़े विरोधियों को देखा और धनुष उठाया — यह उनके योद्धा-स्वभाव का स्वाभाविक कार्य था। किंतु अगले ही क्षण वे श्रीकृष्ण से कुछ कहने को उद्यत होते हैं, जो आगे के विषाद का संकेत है।
आज के जीवन में: निर्णायक क्षण में मन में उठने वाले प्रश्न और संशय ही कभी-कभी गहरे आत्म-विवेचन का द्वार खोलते हैं।
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