भगवद्गीता

भगवद्गीता अध्याय 1, श्लोक 21–30 | अर्जुनविषादयोग | अर्थ सहित

6 अक्तूबर 2026·7 मिनट में पढ़ें
भगवद्गीता अध्याय 1, श्लोक 21–30 | अर्जुनविषादयोग | अर्थ सहित

दोनों सेनाएँ कुरुक्षेत्र में आमने-सामने खड़ी हो चुकी हैं और शंखनाद से युद्ध का आरंभ हो चुका है। अब अर्जुन श्रीकृष्ण से अपना रथ दोनों सेनाओं के बीच ले जाने का अनुरोध करते हैं, ताकि वे देख सकें कि उनके सामने कौन-कौन खड़े हैं। जब रथ मध्य में पहुँचता है, तो अर्जुन अपने परिजनों को देखकर गहरे विषाद में डूब जाते हैं और उनका शरीर तथा मन दोनों शिथिल पड़ने लगते हैं।

श्लोक 1.21

वक्ता: अर्जुन

हृषीकेशं तदा वाक्यमिदमाह महीपते।
सेनयोरुभयोर्मध्ये रथं स्थापय मेऽच्युत ॥1.21॥

arjuna uvācha / senayor ubhayor madhye rathaṁ sthāpaya me ’chyuta

हिंदी अनुवाद: अर्जुन ने श्रीकृष्ण से कहा — हे अच्युत! दोनों सेनाओं के बीच मेरा रथ खड़ा कीजिए, जिससे मैं यहाँ युद्ध की इच्छा से आए हुए योद्धाओं को देख सकूँ।

भावार्थ: यह श्लोक अर्जुन की वह माँग है जो उन्होंने श्रीकृष्ण से युद्ध आरंभ होने से पहले की। 'हृषीकेश' अर्थात् इंद्रियों के स्वामी — यह श्रीकृष्ण का एक नाम है। 'अच्युत' का अर्थ है जो कभी अपने स्वभाव से च्युत न हो, अर्थात् अविचल। अर्जुन चाहते हैं कि वे देख सकें कि इस युद्ध में उनके सामने कौन-कौन से योद्धा हैं, जिनसे उन्हें लड़ना होगा।

आज के जीवन में: किसी भी कठिन निर्णय से पहले परिस्थिति को स्पष्ट रूप से देखना और समझना आवश्यक है।


श्लोक 1.22

वक्ता: अर्जुन

यावदेतान्निरीक्षेऽहं योद्धुकामानवस्थितान्।
कैर्मया सह योद्धव्यमस्मिन्रणसमुद्यमे ॥1.22॥

yāvadetān nirīkṣhe ’haṁ yoddhu-kāmān avasthitān / kairmayā saha yoddhavyam asmin raṇa-samudyame

हिंदी अनुवाद: जब तक मैं यहाँ युद्ध की इच्छा से खड़े हुए इन सभी को भली-भाँति देख न लूँ कि इस युद्ध के उद्यम में मुझे किन-किनके साथ लड़ना उचित है।

भावार्थ: यह श्लोक 1.21 की माँग का विस्तार है। 'योद्धुकामान्' अर्थात् युद्ध की इच्छा रखने वाले, और 'रणसमुद्यमे' अर्थात् युद्ध के इस महान उद्यम में। अर्जुन यह जानना चाहते हैं कि उनके प्रतिपक्ष में कौन-कौन से वीर हैं। यह एक योद्धा की स्वाभाविक जिज्ञासा है — शत्रु को पहचानकर ही युद्ध की रणनीति बनाई जाती है।


श्लोक 1.23

वक्ता: अर्जुन

योत्स्यमानानवेक्षेऽहं य एतेऽत्र समागताः।
धार्तराष्ट्रस्य दुर्बुद्धेर्युद्धे प्रियचिकीर्षवः ॥1.23॥

yotsyamānān avekṣhe ’haṁ ya ete ’tra samāgatāḥ / dhārtarāṣhṭrasya durbuddher yuddhe priya-chikīrṣhavaḥ

हिंदी अनुवाद: दुर्बुद्धि धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधन का युद्ध में प्रिय करने की इच्छा से जो राजागण यहाँ एकत्र हुए हैं, उन सबको मैं देखना चाहता हूँ।

भावार्थ: यहाँ अर्जुन 'धार्तराष्ट्रस्य दुर्बुद्धेः' कहकर दुर्योधन को दुर्बुद्धि अर्थात् कुटिल बुद्धि वाला बताते हैं। 'प्रियचिकीर्षवः' का अर्थ है — प्रिय करने की इच्छा रखने वाले। अर्जुन यह देखना चाहते हैं कि किस दुर्बुद्धि के पक्ष में लड़ने के लिए इतने राजा आए हैं। इस श्लोक में अर्जुन की दृष्टि अभी भी एक योद्धा की है — वे शत्रु पक्ष को पहचानना चाहते हैं।


श्लोक 1.24

वक्ता: संजय

एवमुक्तो हृषीकेशो गुडाकेशेन भारत।
सेनयोरुभयोर्मध्ये स्थापयित्वा रथोत्तमम् ॥1.24॥

sañjaya uvācha / evam ukto hṛiṣhīkeśho guḍākeśhena bhārata / senayor ubhayor madhye sthāpayitvā rathottamam

हिंदी अनुवाद: संजय बोले — हे भरतवंशी धृतराष्ट्र! निद्राजयी अर्जुन के इस प्रकार कहने पर भगवान् श्रीकृष्ण ने उस श्रेष्ठ रथ को दोनों सेनाओं के मध्य में लाकर खड़ा कर दिया।

भावार्थ: यहाँ से संजय का वर्णन आरंभ होता है। 'गुडाकेश' अर्जुन का एक नाम है जिसका अर्थ है निद्रा को जीतने वाला — अर्थात् जो सदा जागरूक और सावधान रहता है। 'हृषीकेश' श्रीकृष्ण का नाम है। संजय धृतराष्ट्र को बता रहे हैं कि श्रीकृष्ण ने अर्जुन की बात मानकर रथ को दोनों सेनाओं के बीच ले जाकर खड़ा किया।


श्लोक 1.25

वक्ता: संजय

भीष्मद्रोणप्रमुखतः सर्वेषां च महीक्षिताम्।
उवाच पार्थ पश्यैतान्समवेतान्कुरूनिति ॥1.25॥

bhīṣhma-droṇa-pramukhataḥ sarveṣhāṁ cha mahī-kṣhitām / uvācha pārtha paśhyaitān samavetān kurūn iti

हिंदी अनुवाद: भीष्म पितामह और आचार्य द्रोण के सामने तथा समस्त राजाओं के सामने रथ खड़ा करके श्रीकृष्ण ने कहा — 'हे पार्थ! इन एकत्र हुए कुरुवंशियों को देखो।'

भावार्थ: 'पार्थ' अर्थात् पृथा (कुंती) के पुत्र — यह अर्जुन का एक नाम है। श्रीकृष्ण ने रथ को ठीक उस स्थान पर खड़ा किया जहाँ भीष्म और द्रोण जैसे महारथी खड़े थे। इस प्रकार अर्जुन को दोनों सेनाओं का पूरा दृश्य दिखाई दे सके। यह श्लोक संजय के वर्णन का अंग है जो धृतराष्ट्र को युद्धभूमि का चित्र प्रस्तुत करता है।


श्लोक 1.26

वक्ता: संजय

तत्रापश्यत्स्थितान्पार्थः पितृ़नथ पितामहान्।
आचार्यान्मातुलान्भ्रातृ़न्पुत्रान्पौत्रान्सखींस्तथा ॥1.26॥

tatrāpaśhyat sthitān pārthaḥ pitṝīn atha pitāmahān / āchāryān mātulān bhrātṝīn putrān pautrān sakhīṁs tathā / śhvaśhurān suhṛidaśh chaiva senayor ubhayor api

हिंदी अनुवाद: तब अर्जुन ने उन दोनों सेनाओं में अपने पिताओं को, पितामहों को, आचार्यों को, मामाओं को, भाइयों को, पुत्रों को, पौत्रों को और मित्रों को खड़े हुए देखा।

भावार्थ: यह श्लोक उस क्षण का वर्णन करता है जब अर्जुन की दृष्टि युद्धभूमि पर पड़ती है। 'आचार्यान्' अर्थात् गुरुजन, 'मातुलान्' अर्थात् मामा। दोनों सेनाओं में — पांडव और कौरव दोनों पक्षों में — अर्जुन को अपने ही परिजन दिखाई देते हैं। यह दृश्य ही आगे के विषाद का मूल कारण बनता है।


श्लोक 1.27

वक्ता: संजय

श्वशुरान्सुहृदश्चैव सेनयोरुभयोरपि।
तान्समीक्ष्य स कौन्तेयः सर्वान्बन्धूनवस्थितान् ॥1.27॥

tān samīkṣhya sa kaunteyaḥ sarvān bandhūn avasthitān / kṛipayā parayāviṣhṭo viṣhīdann idam abravīt

हिंदी अनुवाद: दोनों सेनाओं में ससुरों को और प्रिय मित्रों को भी देखकर, उन सभी बंधु-बांधवों को अपने सामने खड़े देख, कुंतीपुत्र अर्जुन अत्यंत करुणा से भर गए और विषाद करते हुए बोले।

भावार्थ: 'श्वशुरान्' अर्थात् ससुर, 'सुहृदः' अर्थात् हृदय से प्रिय मित्र। 'कौन्तेय' अर्थात् कुंती के पुत्र — यह अर्जुन का नाम है। जब अर्जुन ने देखा कि दोनों ओर उनके अपने ही लोग हैं — गुरु, बंधु, पुत्र, मित्र — तो उनका मन करुणा और विषाद से भर उठा। यहीं से अर्जुन के विषाद का वास्तविक आरंभ होता है।

आज के जीवन में: जब अपने ही लोग विपरीत पक्ष में हों, तब मन का विचलित होना स्वाभाविक मानवीय स्वभाव है।


श्लोक 1.28

वक्ता: अर्जुन

कृपया परयाऽऽविष्टो विषीदन्निदमब्रवीत्।
दृष्ट्वेमं स्वजनं कृष्ण युयुत्सुं समुपस्थितम् ॥1.28॥

arjuna uvācha / dṛiṣhṭvemaṁ sva-janaṁ kṛiṣhṇa yuyutsuṁ samupasthitam

हिंदी अनुवाद: अर्जुन बोले — हे कृष्ण! युद्ध की इच्छा से उपस्थित इस अपने कुटुंब को सामने देखकर मेरे अंग शिथिल पड़ रहे हैं और मुख सूख रहा है।

भावार्थ: यहाँ से अर्जुन अपनी मनोदशा श्रीकृष्ण के सामने व्यक्त करते हैं। 'स्वजनम्' अर्थात् अपने लोग, 'युयुत्सुम्' अर्थात् युद्ध की इच्छा वाले। 'कृपया परया आविष्टः' — अत्यंत करुणा से भर जाना। अर्जुन देख रहे हैं कि जिन्हें वे प्रेम करते हैं, वे ही उनके सामने शत्रु के रूप में खड़े हैं — यह दृश्य उनके शरीर और मन दोनों को प्रभावित करने लगता है।

आज के जीवन में: गहरे प्रेम और कर्तव्य के बीच का द्वंद्व मनुष्य को भीतर से हिला देता है।


श्लोक 1.29

वक्ता: अर्जुन

सीदन्ति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति।
वेपथुश्च शरीरे मे रोमहर्षश्च जायते ॥1.29॥

sīdanti mama gātrāṇi mukhaṁ cha pariśhuṣhyati / vepathuśh cha śharīre me roma-harṣhaśh cha jāyate

हिंदी अनुवाद: मेरे शरीर में कँपकँपी हो रही है और रोंगटे खड़े हो रहे हैं।

भावार्थ: 'वेपथुः' अर्थात् कँपकँपी, 'रोमहर्षः' अर्थात् रोंगटे खड़े होना — ये दोनों अत्यंत तीव्र भावनात्मक आघात के शारीरिक लक्षण हैं। अर्जुन का शरीर उनके मन की पीड़ा को बाहर प्रकट कर रहा है। यह श्लोक उस मनोवैज्ञानिक सत्य को दर्शाता है कि जब मन पर गहरा आघात होता है, तो उसका प्रभाव शरीर पर भी स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।


श्लोक 1.30

वक्ता: अर्जुन

गाण्डीवं स्रंसते हस्तात्त्वक्चैव परिदह्यते।
न च शक्नोम्यवस्थातुं भ्रमतीव च मे मनः ॥1.30॥

gāṇḍīvaṁ sraṁsate hastāt tvak chaiva paridahyate / na cha śhaknomy avasthātuṁ bhramatīva cha me manaḥ

हिंदी अनुवाद: हाथ से गाण्डीव धनुष छूट रहा है, त्वचा जल रही है, मैं खड़े रहने में असमर्थ हो रहा हूँ और मेरा मन भ्रमित-सा हो रहा है।

भावार्थ: 'गाण्डीव' अर्जुन का प्रसिद्ध धनुष है जो उनकी वीरता का प्रतीक है — उसका हाथ से छूटना उनकी आंतरिक दुर्बलता का सबसे बड़ा संकेत है। 'भ्रमतीव च मे मनः' — मन का भटकना। एक महान योद्धा, जो कभी युद्धभूमि में अडिग रहता था, आज अपने परिजनों को सामने देखकर न शरीर से स्थिर है, न मन से। यह विषाद अर्जुन की कायरता नहीं, बल्कि उनके गहरे मानवीय प्रेम की अभिव्यक्ति है।

आज के जीवन में: जब कर्तव्य और ममता आमने-सामने आ जाएँ, तो सबसे दृढ़ मनुष्य भी भीतर से डगमगा सकता है।


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