भगवद्गीता अध्याय 1, श्लोक 31–40 | अर्जुनविषादयोग | अर्थ सहित
अर्जुन कुरुक्षेत्र के रणक्षेत्र में दोनों सेनाओं के बीच खड़े होकर अपने स्वजनों को देख चुके हैं और उनका मन विचलित हो गया है। इस खंड में अर्जुन श्रीकृष्ण के सामने अपने मन की पीड़ा और तर्क विस्तार से रखते हैं — वे विजय, राज्य और सुख को व्यर्थ बताते हैं, स्वजनों को मारने से इनकार करते हैं, और कुल-नाश के दुष्परिणामों की चिंता प्रकट करते हैं।
श्लोक 1.31
वक्ता: अर्जुन
निमित्तानि च पश्यामि विपरीतानि केशव।
न च श्रेयोऽनुपश्यामि हत्वा स्वजनमाहवे ॥1.31॥
nimittāni cha paśhyāmi viparītāni keśhava / na cha śhreyo ’nupaśhyāmi hatvā sva-janam āhave
हिंदी अनुवाद: हे केशव! मैं यहाँ विपरीत लक्षण देख रहा हूँ और युद्ध में अपने स्वजनों को मारकर कोई श्रेय — कोई भला — नहीं देख पा रहा।
भावार्थ: अर्जुन श्रीकृष्ण को 'केशव' कहकर संबोधित करते हैं। वे कहते हैं कि युद्धभूमि पर जो संकेत दिख रहे हैं, वे सब अशुभ हैं। 'निमित्तानि' का अर्थ है लक्षण या संकेत। इससे भी बड़ी बात यह है कि अर्जुन को अपने स्वजनों का वध करने में कोई 'श्रेय' — अर्थात् कल्याण या लाभ — नहीं दिखता। उनका मन भीतर से यह मानने लगा है कि यह युद्ध उचित नहीं है।
आज के जीवन में: जब मन भीतर से किसी कार्य को अनुचित बताए, तो उस संकेत को अनदेखा नहीं करना चाहिए।
श्लोक 1.32
वक्ता: अर्जुन
न काङ्क्षे विजयं कृष्ण न च राज्यं सुखानि च।
किं नो राज्येन गोविन्द किं भोगैर्जीवितेन वा ॥1.32॥
na kāṅkṣhe vijayaṁ kṛiṣhṇa na cha rājyaṁ sukhāni cha / kiṁ no rājyena govinda kiṁ bhogair jīvitena vā
हिंदी अनुवाद: हे कृष्ण! मुझे न विजय की चाह है, न राज्य की, न सुखों की। हे गोविन्द! हमें राज्य से क्या मिलेगा, भोगों से क्या, या जीवन से भी क्या लाभ?
भावार्थ: अर्जुन यहाँ अपनी विरक्ति को स्पष्ट शब्दों में कहते हैं। 'काङ्क्षे' का अर्थ है चाहना या इच्छा करना। वे श्रीकृष्ण को 'गोविन्द' कहकर पुकारते हैं और कहते हैं कि विजय, राज्य और भोग — ये सब तभी अर्थपूर्ण हैं जब उन्हें भोगने वाले प्रियजन जीवित हों। जब प्रियजन ही सामने मरने के लिए खड़े हों, तो इन सबका क्या मूल्य? अर्जुन का यह प्रश्न उनकी गहरी पीड़ा को दर्शाता है।
आज के जीवन में: जो सुख और सफलता अपनों को खोकर मिले, वह वास्तव में सुख नहीं होती — यह भाव मनुष्य को रुककर सोचने पर विवश करता है।
श्लोक 1.33
वक्ता: अर्जुन
येषामर्थे काङ्क्षितं नो राज्यं भोगाः सुखानि च।
त इमेऽवस्थिता युद्धे प्राणांस्त्यक्त्वा धनानि च ॥1.33॥
yeṣhām arthe kāṅkṣhitaṁ no rājyaṁ bhogāḥ sukhāni cha / ta ime ’vasthitā yuddhe prāṇāṁs tyaktvā dhanāni cha
हिंदी अनुवाद: जिनके लिए हम राज्य, भोग और सुख चाहते थे, वे ही लोग अपने प्राण और धन की परवाह छोड़कर इस युद्ध में सामने खड़े हैं।
भावार्थ: अर्जुन का तर्क और गहरा होता है। वे कहते हैं कि राज्य और सुख की इच्छा तो गुरुजनों, पिता, पुत्रों और अन्य प्रियजनों के लिए थी — किंतु वे ही अब युद्धभूमि में प्राण और धन की आशा त्यागकर खड़े हैं। 'प्राणांस्त्यक्त्वा' का अर्थ है प्राणों का त्याग करके। जब जिनके लिए सब कुछ चाहिए था, वे ही नहीं रहेंगे, तो वह सब पाकर क्या होगा?
आज के जीवन में: जीवन में लक्ष्य और उद्देश्य का संबंध अपनों से होता है — यदि अपने ही न रहें, तो लक्ष्य की सार्थकता पर विचार करना स्वाभाविक है।
श्लोक 1.34
वक्ता: अर्जुन
आचार्याः पितरः पुत्रास्तथैव च पितामहाः।
मातुलाः श्चशुराः पौत्राः श्यालाः सम्बन्धिनस्तथा ॥1.34॥
āchāryāḥ pitaraḥ putrās tathaiva cha pitāmahāḥ / mātulāḥ śhvaśhurāḥ pautrāḥ śhyālāḥ sambandhinas tathā
हिंदी अनुवाद: आचार्य, पिता, पुत्र, पितामह, मामा, ससुर, पौत्र, साले और अन्य सभी संबंधी — ये सब यहाँ युद्ध में उपस्थित हैं।
भावार्थ: इस श्लोक में अर्जुन उन सभी संबंधियों की सूची देते हैं जो विपक्षी सेना में खड़े हैं। 'आचार्याः' अर्थात् गुरुजन, 'पितरः' अर्थात् पिता-तुल्य जन, 'पितामहाः' अर्थात् दादा। यह सूची इसलिए महत्त्वपूर्ण है क्योंकि अर्जुन यह दिखाना चाहते हैं कि सामने केवल शत्रु नहीं, बल्कि जीवन के हर रिश्ते के प्रतिनिधि खड़े हैं — गुरु से लेकर नाती तक।
श्लोक 1.35
वक्ता: अर्जुन
एतान्न हन्तुमिच्छामि घ्नतोऽपि मधुसूदन।
अपि त्रैलोक्यराज्यस्य हेतोः किं नु महीकृते ॥1.35॥
etān na hantum ichchhāmi ghnato ’pi madhusūdana / api trailokya-rājyasya hetoḥ kiṁ nu mahī-kṛite
हिंदी अनुवाद: हे मधुसूदन! ये मुझ पर प्रहार करें तो भी मैं इन्हें मारना नहीं चाहता — तीनों लोकों का राज्य मिले तो भी नहीं, फिर इस पृथ्वी के लिए तो कहना ही क्या?
भावार्थ: श्लोक 1.34 में जिन संबंधियों की सूची दी गई, उनके विषय में अर्जुन यहाँ अपना निर्णय सुनाते हैं। 'एतान्न हन्तुमिच्छामि' — इन्हें मारने की मेरी इच्छा नहीं है। 'त्रैलोक्यराज्य' अर्थात् तीनों लोकों का राज्य — यह अतिशयोक्ति के रूप में कहा गया है कि इतना बड़ा पुरस्कार भी मिले तो भी यह कार्य उचित नहीं लगता। अर्जुन की यह भावना उनके प्रेम और पीड़ा दोनों को एक साथ व्यक्त करती है।
आज के जीवन में: कुछ संबंध इतने गहरे होते हैं कि उनके सामने बड़े से बड़ा लाभ भी तुच्छ लगता है — यह मानवीय स्वभाव की सच्चाई है।
श्लोक 1.36
वक्ता: अर्जुन
निहत्य धार्तराष्ट्रान्नः का प्रीतिः स्याज्जनार्दन।
पापमेवाश्रयेदस्मान्हत्वैतानाततायिनः ॥1.36॥
nihatya dhārtarāṣhṭrān naḥ kā prītiḥ syāj janārdana / pāpam evāśhrayed asmān hatvaitān ātatāyinaḥ
हिंदी अनुवाद: हे जनार्दन! इन धृतराष्ट्र के संबंधियों को मारकर हमें क्या प्रसन्नता होगी? इन आततायियों को मारने से हमें पाप ही लगेगा।
भावार्थ: अर्जुन यहाँ 'आततायिनः' शब्द का प्रयोग करते हैं, जिसका अर्थ है अत्याचारी या दुराचारी। वे स्वयं मानते हैं कि दुर्योधन पक्ष के लोग अन्यायी हैं, फिर भी कहते हैं कि उन्हें मारने से प्रसन्नता नहीं, केवल पाप मिलेगा। 'जनार्दन' — जो सबके कष्ट हरते हैं — ऐसे कृष्ण से वे पूछते हैं कि इस वध में कौन-सा कल्याण है? यह अर्जुन की नैतिक उलझन को दर्शाता है।
आज के जीवन में: किसी के अन्याय का बदला लेने से पहले यह विचार करना उचित है कि उस कार्य से वास्तव में क्या प्राप्त होगा।
श्लोक 1.37
वक्ता: अर्जुन
तस्मान्नार्हा वयं हन्तुं धार्तराष्ट्रान्स्वबान्धवान्।
स्वजनं हि कथं हत्वा सुखिनः स्याम माधव ॥1.37॥
tasmān nārhā vayaṁ hantuṁ dhārtarāṣhṭrān sa-bāndhavān / sva-janaṁ hi kathaṁ hatvā sukhinaḥ syāma mādhava
हिंदी अनुवाद: इसलिए अपने बंधु-बांधव इन धृतराष्ट्र के संबंधियों को मारना हमारे लिए उचित नहीं है। हे माधव! अपने कुटुंबियों को मारकर हम सुखी कैसे होंगे?
भावार्थ: 'माधव' — लक्ष्मी के पति, श्रीकृष्ण — को संबोधित करते हुए अर्जुन कहते हैं कि यह कार्य हमारे योग्य नहीं है। 'स्वबान्धवान्' अर्थात् अपने बंधु-बांधव। अर्जुन का तर्क सीधा है — जो अपने हैं, उन्हें मारकर सुख की कल्पना ही असंभव है। यह श्लोक पिछले श्लोक के विचार को और दृढ़ करता है और अर्जुन के मन में उठ रहे नैतिक प्रश्न को और स्पष्ट करता है।
आज के जीवन में: अपनों के साथ किया गया अन्याय कभी सुख नहीं देता — यह सत्य हर काल में लागू होता है।
श्लोक 1.38
वक्ता: अर्जुन
यद्यप्येते न पश्यन्ति लोभोपहतचेतसः।
कुलक्षयकृतं दोषं मित्रद्रोहे च पातकम् ॥1.38॥
yady apy ete na paśhyanti lobhopahata-chetasaḥ / kula-kṣhaya-kṛitaṁ doṣhaṁ mitra-drohe cha pātakam
हिंदी अनुवाद: यद्यपि ये लोग — जिनका विवेक लोभ से नष्ट हो गया है — कुल-नाश के दोष को और मित्रों से द्वेष के पाप को नहीं देख पाते —
भावार्थ: यह श्लोक अगले श्लोक के साथ मिलकर एक पूरा विचार बनाता है। अर्जुन यहाँ दुर्योधन आदि की स्थिति का वर्णन करते हैं। 'लोभोपहतचेतसः' — जिनकी बुद्धि लोभ से दब गई है। ऐसे लोग 'कुलक्षयकृतं दोषं' — कुल-नाश से होने वाले दोष को — और मित्रों से विरोध के पाप को नहीं देख पाते। अर्जुन यह कहकर स्वयं को उनसे अलग और अधिक विवेकशील बताते हैं।
आज के जीवन में: लोभ मनुष्य की विवेक-शक्ति को ढक देता है और वह उचित-अनुचित का भेद भूल जाता है।
श्लोक 1.39
वक्ता: अर्जुन
कथं न ज्ञेयमस्माभिः पापादस्मान्निवर्तितुम्।
कुलक्षयकृतं दोषं प्रपश्यद्भिर्जनार्दन ॥1.39॥
kathaṁ na jñeyam asmābhiḥ pāpād asmān nivartitum / kula-kṣhaya-kṛitaṁ doṣhaṁ prapaśhyadbhir janārdana
हिंदी अनुवाद: — तो भी हम, जो कुल-नाश के दोष को भली-भाँति जानते हैं, हे जनार्दन! इस पाप से विमुख होने का विचार क्यों न करें?
भावार्थ: श्लोक 1.38 में जो बात अधूरी थी, वह यहाँ पूरी होती है। 'प्रपश्यद्भिः' — जो स्पष्ट रूप से देख रहे हैं। अर्जुन कहते हैं कि यदि दुर्योधन पक्ष अंधा है, तो हम तो देख सकते हैं — फिर हम इस पाप में क्यों पड़ें? 'पापादस्मान्निवर्तितुम्' — इस पाप से लौट जाना। यह अर्जुन का आत्म-परीक्षण है — वे स्वयं से पूछ रहे हैं कि जब हम जानते हैं, तो रुकना क्यों न उचित हो?
आज के जीवन में: जो व्यक्ति किसी कार्य के दुष्परिणाम को जानता हो, उसका दायित्व है कि वह उस कार्य से विरत हो।
श्लोक 1.40
वक्ता: अर्जुन
कुलक्षये प्रणश्यन्ति कुलधर्माः सनातनाः।
धर्मे नष्टे कुलं कृत्स्नमधर्मोऽभिभवत्युत ॥1.40॥
kula-kṣhaye praṇaśhyanti kula-dharmāḥ sanātanāḥ / dharme naṣhṭe kulaṁ kṛitsnam adharmo ’bhibhavaty uta
हिंदी अनुवाद: कुल का नाश होने पर उस कुल के सनातन धर्म नष्ट हो जाते हैं और धर्म के नष्ट होने पर अधर्म समस्त कुल को अपने अधीन कर लेता है।
भावार्थ: अर्जुन अब व्यक्तिगत पीड़ा से आगे बढ़कर सामाजिक और नैतिक परिणामों की बात करते हैं। 'कुलधर्माः सनातनाः' — कुल में पीढ़ियों से चले आ रहे धर्म और परंपराएँ। जब कुल के लोग ही नहीं रहेंगे, तो ये परंपराएँ भी समाप्त हो जाएँगी। और जब धर्म नष्ट होगा, तो 'अधर्मः अभिभवति' — अधर्म हावी हो जाएगा। अर्जुन यहाँ युद्ध के दीर्घकालिक सामाजिक दुष्प्रभावों की ओर संकेत कर रहे हैं।
आज के जीवन में: परिवार और समाज की परंपराएँ और मूल्य तभी जीवित रहते हैं जब उन्हें सँजोने वाले लोग और उनमें आपसी सद्भाव बना रहे।
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