भगवद्गीता

भगवद्गीता अध्याय 1, श्लोक 41–47 | अर्जुनविषादयोग | अर्थ सहित

6 अक्तूबर 2026·5 मिनट में पढ़ें
भगवद्गीता अध्याय 1, श्लोक 41–47 | अर्जुनविषादयोग | अर्थ सहित

अर्जुन अपने स्वजनों को देखकर पहले से ही विचलित हो चुके हैं। अब वे कुल के नाश से उत्पन्न होने वाले दोषों की एक लंबी श्रृंखला गिनाते हैं — अधर्म, वर्णसंकर, पितरों का पतन और कुलधर्म का विनाश। अंत में वे शस्त्र त्यागकर रथ पर बैठ जाते हैं और संजय इस दृश्य का वर्णन धृतराष्ट्र को सुनाते हैं।

श्लोक 1.41

वक्ता: अर्जुन

अधर्माभिभवात्कृष्ण प्रदुष्यन्ति कुलस्त्रियः।
स्त्रीषु दुष्टासु वार्ष्णेय जायते वर्णसङ्करः ॥1.41॥

adharmābhibhavāt kṛiṣhṇa praduṣhyanti kula-striyaḥ / strīṣhu duṣhṭāsu vārṣhṇeya jāyate varṇa-saṅkaraḥ

हिंदी अनुवाद: हे कृष्ण! अधर्म के बढ़ जाने पर कुल की स्त्रियाँ दूषित हो जाती हैं, और हे वार्ष्णेय! स्त्रियों के दूषित होने पर वर्णसंकर उत्पन्न होते हैं।

भावार्थ: अर्जुन श्रीकृष्ण को 'वार्ष्णेय' — अर्थात वृष्णि वंश में उत्पन्न — कहकर संबोधित करते हैं। वे तर्क देते हैं कि जब कुल में अधर्म फैलता है, तो कुल की स्त्रियाँ अपने आचरण से भटक जाती हैं। इसके परिणामस्वरूप 'वर्णसंकर' — अर्थात परंपरागत व्यवस्था से बाहर की संतानें — उत्पन्न होती हैं। अर्जुन इस युद्ध को ऐसे अधर्म का कारण मान रहे हैं।

आज के जीवन में: जब किसी समाज या परिवार में नैतिक व्यवस्था टूटती है, तो उसके दूरगामी परिणाम पूरी पीढ़ियों को भुगतने पड़ते हैं।


श्लोक 1.42

वक्ता: अर्जुन

सङ्करो नरकायैव कुलघ्नानां कुलस्य च।
पतन्ति पितरो ह्येषां लुप्तपिण्डोदकक्रियाः ॥1.42॥

saṅkaro narakāyaiva kula-ghnānāṁ kulasya cha / patanti pitaro hy eṣhāṁ lupta-piṇḍodaka-kriyāḥ

हिंदी अनुवाद: वर्णसंकर कुलघातियों को और उनके कुल को नरक में ले जाने वाला होता है; श्राद्ध और तर्पण न मिलने से उनके पितर भी अपने स्थान से गिर जाते हैं।

भावार्थ: अर्जुन कहते हैं कि वर्णसंकर की स्थिति में कुल की परंपरागत क्रियाएँ — 'पिण्डोदकक्रिया' अर्थात पितरों को दिए जाने वाले पिंड और जल का अर्पण — रुक जाती हैं। इससे पितर अपने लोक से च्युत हो जाते हैं। अर्जुन यह दिखाना चाहते हैं कि युद्ध से होने वाला कुलनाश केवल जीवितों को नहीं, बल्कि पूर्वजों को भी कष्ट देता है।

आज के जीवन में: परिवार की परंपराएँ और पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता का भाव पीढ़ियों को जोड़े रखता है।


श्लोक 1.43

वक्ता: अर्जुन

दोषैरेतैः कुलघ्नानां वर्णसङ्करकारकैः।
उत्साद्यन्ते जातिधर्माः कुलधर्माश्च शाश्वताः ॥1.43॥

doṣhair etaiḥ kula-ghnānāṁ varṇa-saṅkara-kārakaiḥ / utsādyante jāti-dharmāḥ kula-dharmāśh cha śhāśhvatāḥ

हिंदी अनुवाद: वर्णसंकर उत्पन्न करने वाले इन दोषों से कुलघातियों के सदा से चले आ रहे कुलधर्म और जातिधर्म नष्ट हो जाते हैं।

भावार्थ: अर्जुन कहते हैं कि ये दोष केवल एक पीढ़ी तक सीमित नहीं रहते। 'शाश्वताः' — अर्थात युगों से चले आ रहे — कुलधर्म और जातिधर्म सदा के लिए मिट जाते हैं। कुलधर्म वह आचरण है जो एक परिवार की पहचान और मर्यादा को बनाए रखता है। अर्जुन इस विनाश को अपूरणीय क्षति मानते हैं।

आज के जीवन में: किसी भी समाज की सांस्कृतिक और नैतिक परंपराएँ बड़ी कठिनाई से बनती हैं और एक क्षण की अविवेकी क्रिया से नष्ट हो सकती हैं।


श्लोक 1.44

वक्ता: अर्जुन

उत्सन्नकुलधर्माणां मनुष्याणां जनार्दन।
नरकेऽनियतं वासो भवतीत्यनुशुश्रुम ॥1.44॥

utsanna-kula-dharmāṇāṁ manuṣhyāṇāṁ janārdana / narake ‘niyataṁ vāso bhavatītyanuśhuśhruma

हिंदी अनुवाद: हे जनार्दन! जिन मनुष्यों के कुलधर्म नष्ट हो जाते हैं, उनका बहुत काल तक नरक में वास होता है — ऐसा हम सुनते आए हैं।

भावार्थ: अर्जुन 'जनार्दन' — सबका पालन करने वाले — कहकर श्रीकृष्ण को संबोधित करते हैं। वे कहते हैं कि यह बात उन्होंने परंपरा से सुनी है — 'अनुशुश्रुम' — अर्थात पूर्वजों से सुनते आए हैं। जिनके कुलधर्म नष्ट हो जाते हैं, उन्हें दीर्घकाल तक नरक-वास भोगना पड़ता है। अर्जुन इस युद्ध को उसी दुर्गति का द्वार मान रहे हैं।

आज के जीवन में: अपने पूर्वजों से मिली नैतिक शिक्षाओं को सँजोकर रखना ही सच्चे अर्थों में कुल की रक्षा है।


श्लोक 1.45

वक्ता: अर्जुन

अहो बत महत्पापं कर्तुं व्यवसिता वयम्।
यद्राज्यसुखलोभेन हन्तुं स्वजनमुद्यताः ॥1.45॥

aho bata mahat pāpaṁ kartuṁ vyavasitā vayam / yad rājya-sukha-lobhena hantuṁ sva-janam udyatāḥ

हिंदी अनुवाद: आश्चर्य और खेद की बात है कि हम बड़ा भारी पाप करने का निश्चय कर बैठे हैं — राज्य और सुख के लोभ से अपने स्वजनों को मारने के लिए तैयार हो गए हैं!

भावार्थ: 'अहो बत' — यह विस्मय और वेदना का उद्गार है। अर्जुन अब अपने आप को ही दोषी ठहराते हैं। वे कहते हैं कि राज्य और सुख का लोभ — 'राज्यसुखलोभ' — हमें इतना अंधा कर गया है कि हम अपने ही स्वजनों का वध करने पर उतारू हो गए हैं। यह उनके विषाद की पराकाष्ठा है जहाँ वे स्वयं अपने निर्णय पर पछता रहे हैं।

आज के जीवन में: लोभ मनुष्य की विवेकशक्ति को ढक देता है; जब भी कोई निर्णय केवल स्वार्थ से प्रेरित हो, तब एक बार रुककर सोचना आवश्यक है।


श्लोक 1.46

वक्ता: अर्जुन

यदि मामप्रतीकारमशस्त्रं शस्त्रपाणयः।
धार्तराष्ट्रा रणे हन्युस्तन्मे क्षेमतरं भवेत् ॥1.46॥

yadi mām apratīkāram aśhastraṁ śhastra-pāṇayaḥ / dhārtarāṣhṭrā raṇe hanyus tan me kṣhemataraṁ bhavet

हिंदी अनुवाद: यदि हाथों में शस्त्र लिए धृतराष्ट्र के पक्षपाती लोग युद्धभूमि में सामना न करने वाले और शस्त्रहीन मुझे मार भी दें, तो वह मेरे लिए अधिक हितकारक होगा।

भावार्थ: अर्जुन अब इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि युद्ध करने से बेहतर है कि वे बिना प्रतिरोध के मृत्यु स्वीकार कर लें। 'क्षेमतरम्' — अर्थात अधिक कल्याणकारी — शब्द से वे यह जताते हैं कि स्वजनों का वध करके जीना उन्हें मृत्यु से भी अधिक कष्टकर लगता है। यह उनके विषाद और नैतिक संकट की चरम अवस्था है।

आज के जीवन में: जब मनुष्य गहरे नैतिक द्वंद्व में हो, तो वह कभी-कभी अतिवादी निर्णय की ओर झुक जाता है — ऐसे में सच्चे मार्गदर्शन की आवश्यकता होती है।


श्लोक 1.47

वक्ता: संजय

एवमुक्त्वाऽर्जुनः संख्ये रथोपस्थ उपाविशत्।
विसृज्य सशरं चापं शोकसंविग्नमानसः ॥1.47॥

sañjaya uvācha / evam uktvārjunaḥ saṅkhye rathopastha upāviśhat / visṛijya sa-śharaṁ chāpaṁ śhoka-saṁvigna-mānasaḥ

हिंदी अनुवाद: संजय बोले — ऐसा कहकर, शोक से व्याकुल मन वाले अर्जुन ने बाण सहित धनुष को त्यागकर युद्धभूमि में रथ के मध्यभाग में बैठ गए।

भावार्थ: यहाँ वक्ता बदलता है — संजय धृतराष्ट्र को यह दृश्य सुना रहे हैं। 'शोकसंविग्नमानसः' — अर्थात शोक से अत्यंत व्याकुल मन वाले — अर्जुन ने 'सशरं चापम्' — बाण सहित धनुष — त्याग दिया और रथ पर बैठ गए। यह क्रिया उनके पूर्ण समर्पण और असमर्थता की प्रतीक है। पहले अध्याय का यहीं समापन होता है और गीता के उपदेश की भूमिका तैयार होती है।


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