भगवद्गीता

भगवद्गीता अध्याय 2, श्लोक 1–10 | सांख्ययोग | अर्थ सहित

6 अक्तूबर 2026·8 मिनट में पढ़ें
भगवद्गीता अध्याय 2, श्लोक 1–10 | सांख्ययोग | अर्थ सहित

पहले अध्याय में अर्जुन ने कुरुक्षेत्र की रणभूमि में दोनों सेनाओं को देखकर अपने प्रियजनों के प्रति गहरा मोह अनुभव किया और वे शोक से व्याकुल होकर रथ पर बैठ गए। दूसरे अध्याय के इस पहले खंड में संजय धृतराष्ट्र को बताते हैं कि अर्जुन की वह दशा देखकर भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें उठाने का प्रयास किया, किंतु अर्जुन ने अपनी विवशता और मोह के कारण स्पष्ट कह दिया कि वे युद्ध नहीं करेंगे। अंत में अर्जुन ने स्वयं को श्रीकृष्ण का शिष्य स्वीकार करते हुए उनसे मार्गदर्शन माँगा।

श्लोक 2.1

वक्ता: संजय

तं तथा कृपयाऽविष्टमश्रुपूर्णाकुलेक्षणम्।
विषीदन्तमिदं वाक्यमुवाच मधुसूदनः ॥2.1॥

sañjaya uvācha / taṁ tathā kṛipayāviṣhṭamaśhru pūrṇākulekṣhaṇam / viṣhīdantamidaṁ vākyam uvācha madhusūdanaḥ

हिंदी अनुवाद: संजय बोले — जो अर्जुन करुणा से भर गए थे, जिनके नेत्र आँसुओं से भरे और व्याकुल थे, और जो विषाद में डूबे हुए थे, उन्हें देखकर भगवान मधुसूदन ने ये वचन कहे।

भावार्थ: संजय धृतराष्ट्र को अर्जुन की उस दशा का वर्णन कर रहे हैं जो पहले अध्याय के अंत में थी। 'कृपया आविष्टम्' अर्थात करुणा से पूरी तरह घिरे हुए, और 'अश्रुपूर्णाकुलेक्षणम्' अर्थात आँसुओं से भरी और व्याकुल आँखों वाले अर्जुन को देखकर भगवान श्रीकृष्ण, जिन्हें 'मधुसूदन' कहा गया है, बोलने के लिए प्रवृत्त हुए। यह श्लोक दूसरे अध्याय का द्वार है — एक ओर शोकमग्न अर्जुन हैं, दूसरी ओर उनके सारथी और मित्र श्रीकृष्ण, जो अब उपदेशक की भूमिका में आने वाले हैं।


श्लोक 2.2

वक्ता: श्रीकृष्ण

कुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम्।
अनार्यजुष्टमस्वर्ग्यमकीर्तिकरमर्जुन ॥2.2॥

śhrī bhagavān uvācha / kutastvā kaśhmalamidaṁ viṣhame samupasthitam / anārya-juṣhṭamaswargyam akīrti-karam arjuna

हिंदी अनुवाद: श्रीभगवान बोले — हे अर्जुन! इस कठिन अवसर पर तुम्हें यह कायरता कहाँ से आ गई? यह न तो श्रेष्ठ पुरुषों के योग्य है, न स्वर्ग देने वाली है और न ही कीर्ति दिलाने वाली।

भावार्थ: श्रीकृष्ण अर्जुन को सीधे प्रश्न करते हैं — 'कुतः' अर्थात यह कहाँ से आया? वे इस मनोदशा को 'अनार्यजुष्टम्' कहते हैं, यानी जिसे श्रेष्ठ और विवेकशील लोग नहीं अपनाते। साथ ही यह 'अस्वर्ग्यम्' — स्वर्ग न दिलाने वाली — और 'अकीर्तिकरम्' — अपयश लाने वाली — है। श्रीकृष्ण यहाँ अर्जुन को झकझोरने का प्रयास कर रहे हैं, ताकि वे अपनी वास्तविक स्थिति को पहचानें और इस मोह से बाहर निकलें।

आज के जीवन में: जब कर्तव्य के मार्ग पर मन कमज़ोर पड़ने लगे, तो स्वयं से पूछना चाहिए कि यह दुर्बलता कहाँ से आई और क्या यह वास्तव में उचित है।


श्लोक 2.3

वक्ता: श्रीकृष्ण

क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते।
क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परन्तप ॥2.3॥

klaibyaṁ mā sma gamaḥ pārtha naitat tvayyupapadyate / kṣhudraṁ hṛidaya-daurbalyaṁ tyaktvottiṣhṭha parantapa

हिंदी अनुवाद: हे पृथानन्दन! इस नपुंसकता को मत अपनाओ, यह तुम्हें शोभा नहीं देती। हे परंतप! हृदय की इस तुच्छ दुर्बलता को त्यागकर युद्ध के लिए खड़े हो जाओ।

भावार्थ: श्रीकृष्ण यहाँ अर्जुन को दो नामों से पुकारते हैं — 'पार्थ' अर्थात पृथा (कुंती) के पुत्र, जो उनके कुल की वीरता की याद दिलाता है; और 'परंतप' अर्थात शत्रुओं को तपाने वाले, जो उनके पराक्रम की याद दिलाता है। 'क्लैब्यम्' का अर्थ है नपुंसकता या कायरता। श्रीकृष्ण स्पष्ट कहते हैं कि यह दुर्बलता 'क्षुद्र' — तुच्छ और छोटी — है और इसे त्यागकर उठ खड़े होना ही उचित है।

आज के जीवन में: कर्तव्य के समय हृदय की दुर्बलता को पहचानकर उसे दृढ़ता से त्यागना ही वीरता का पहला कदम है।


श्लोक 2.4

वक्ता: अर्जुन

कथं भीष्ममहं संख्ये द्रोणं च मधुसूदन।
इषुभिः प्रतियोत्स्यामि पूजार्हावरिसूदन ॥2.4॥

arjuna uvācha / kathaṁ bhīṣhmam ahaṁ sankhye droṇaṁ cha madhusūdana / iṣhubhiḥ pratiyotsyāmi pūjārhāvari-sūdana

हिंदी अनुवाद: अर्जुन बोले — हे मधुसूदन! मैं रणभूमि में भीष्म और द्रोण के विरुद्ध बाणों से युद्ध कैसे करूँ? हे अरिसूदन! ये दोनों तो पूजा के योग्य हैं।

भावार्थ: अर्जुन श्रीकृष्ण के आह्वान का उत्तर देते हुए अपनी पीड़ा का मूल कारण बताते हैं। भीष्म उनके पितामह हैं और द्रोण उनके गुरु — दोनों 'पूजार्ह' अर्थात पूजनीय हैं। अर्जुन का प्रश्न केवल भावनात्मक नहीं, बल्कि नैतिक भी है — जो पूजा के योग्य हों, उन पर बाण कैसे चलाए जाएँ? वे श्रीकृष्ण को 'मधुसूदन' और 'अरिसूदन' कहकर पुकारते हैं, मानो उनसे इस असमंजस का हल माँग रहे हों।

आज के जीवन में: जब कर्तव्य और आदर के बीच टकराव हो, तो उस द्वंद्व को ईमानदारी से सामने रखना ही समाधान की पहली शर्त है।


श्लोक 2.5

वक्ता: अर्जुन

गुरूनहत्वा हि महानुभावान् श्रेयो भोक्तुं भैक्ष्यमपीह लोके।
हत्वार्थकामांस्तु गुरूनिहैव भुञ्जीय भोगान् रुधिरप्रदिग्धान् ॥2.5॥

gurūnahatvā hi mahānubhāvān / śhreyo bhoktuṁ bhaikṣhyamapīha loke / hatvārtha-kāmāṁstu gurūnihaiva / bhuñjīya bhogān rudhira-pradigdhān

हिंदी अनुवाद: इन महानुभाव गुरुजनों को न मारकर इस संसार में भिक्षा का अन्न खाना भी मुझे श्रेयस्कर लगता है। क्योंकि गुरुजनों को मारकर जो भोग मिलेंगे, वे उनके रक्त से सने होंगे।

भावार्थ: अर्जुन यहाँ अपने मन की गहरी पीड़ा व्यक्त करते हैं। वे कहते हैं कि गुरुजनों — जो 'महानुभाव' अर्थात महान और आदरणीय हैं — को मारकर जो राज्य और सुख मिलेगा, वह 'रुधिरप्रदिग्ध' अर्थात रक्त से सना हुआ होगा। ऐसे भोग की अपेक्षा भिक्षा माँगकर जीना उन्हें उचित लगता है। यह श्लोक अर्जुन की नैतिक संवेदनशीलता को दर्शाता है — वे केवल भावुक नहीं, बल्कि गहरे विचार में भी हैं।

आज के जीवन में: जो सफलता किसी प्रिय या आदरणीय के अहित से मिले, उसका आनंद कभी निर्मल नहीं होता।


श्लोक 2.6

वक्ता: अर्जुन

न चैतद्विद्मः कतरन्नो गरीयो यद्वा जयेम यदि वा नो जयेयुः।
यानेव हत्वा न जिजीविषाम स्तेऽवस्थिताः प्रमुखे धार्तराष्ट्राः ॥2.6॥

na chaitadvidmaḥ kataranno garīyo / yadvā jayema yadi vā no jayeyuḥ / yāneva hatvā na jijīviṣhāmas / te ’vasthitāḥ pramukhe dhārtarāṣhṭrāḥ

हिंदी अनुवाद: हम यह भी नहीं जानते कि युद्ध करना या न करना — इन दोनों में से कौन हमारे लिए श्रेयस्कर है, और यह भी नहीं जानते कि हम उन्हें जीतेंगे या वे हमें। जिन्हें मारकर हम जीना भी नहीं चाहते, वे धृतराष्ट्र के वे पुत्र हमारे सामने खड़े हैं।

भावार्थ: अर्जुन की व्याकुलता अब चरम पर है। वे स्वीकार करते हैं कि उन्हें न जीत की निश्चितता है, न इस बात का बोध कि क्या करना उचित है। 'गरीयः' अर्थात अधिक श्रेयस्कर — यह शब्द उनकी उलझन को दर्शाता है। जिन्हें वे मारना नहीं चाहते, वे ही सामने हैं। यह श्लोक अर्जुन के संपूर्ण मानसिक संकट का सार है — वे न आगे बढ़ पा रहे हैं, न पीछे हट पा रहे हैं।

आज के जीवन में: जब मन दोनों विकल्पों में उलझ जाए और निर्णय न हो सके, तब किसी विवेकशील का मार्गदर्शन लेना आवश्यक हो जाता है।


श्लोक 2.7

वक्ता: अर्जुन

कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः पृच्छामि त्वां धर्मसंमूढचेताः।
यच्छ्रेयः स्यान्निश्िचतं ब्रूहि तन्मे शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम् ॥2.7॥

kārpaṇya-doṣhopahata-svabhāvaḥ / pṛichchhāmi tvāṁ dharma-sammūḍha-chetāḥ / yach-chhreyaḥ syānniśhchitaṁ brūhi tanme / śhiṣhyaste ’haṁ śhādhi māṁ tvāṁ prapannam

हिंदी अनुवाद: कायरतारूपी दोष से मेरा स्वभाव दब गया है और धर्म के विषय में मेरा मन मोहित हो गया है। मैं आपसे पूछता हूँ — जो निश्चित रूप से कल्याणकारी हो, वह मुझे बताइए। मैं आपका शिष्य हूँ, आपकी शरण में आया हूँ, मुझे शिक्षा दीजिए।

भावार्थ: यह श्लोक एक महत्त्वपूर्ण मोड़ है। अर्जुन अब तर्क और विलाप छोड़कर समर्पण की स्थिति में आते हैं। 'कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः' — कायरतारूपी दोष से जिनका स्वभाव दब गया है — और 'धर्मसंमूढचेताः' — धर्म के विषय में जिनका चित्त मोहित हो गया है — ऐसे अर्जुन 'शिष्यः ते अहम्' कहकर श्रीकृष्ण के सामने शिष्य बनकर खड़े होते हैं। यहीं से गीता के उपदेश का वास्तविक आधार बनता है।

आज के जीवन में: जब अपनी बुद्धि उत्तर न दे सके, तब विनम्रतापूर्वक किसी ज्ञानी की शरण लेना और उनसे सीखने की इच्छा रखना ही सच्ची समझदारी है।


श्लोक 2.8

वक्ता: अर्जुन

न हि प्रपश्यामि ममापनुद्या द्यच्छोकमुच्छोषणमिन्द्रियाणाम्।
अवाप्य भूमावसपत्नमृद्धम् राज्यं सुराणामपि चाधिपत्यम् ॥2.8॥

na hi prapaśhyāmi mamāpanudyād / yach-chhokam uchchhoṣhaṇam-indriyāṇām / avāpya bhūmāv-asapatnamṛiddhaṁ / rājyaṁ surāṇāmapi chādhipatyam

हिंदी अनुवाद: मुझे ऐसा कोई उपाय नहीं दिखता जो इस शोक को दूर कर सके, जो मेरी इंद्रियों को सुखा रहा है — चाहे पृथ्वी पर समृद्ध और शत्रुरहित राज्य मिल जाए, या स्वर्ग में देवताओं का आधिपत्य भी मिल जाए।

भावार्थ: अर्जुन यहाँ अपने शोक की गहराई बताते हैं। 'उच्छोषणम् इन्द्रियाणाम्' — इंद्रियों को सुखा देने वाला — यह शोक इतना गहरा है कि संसार का सर्वोच्च सुख भी उसे मिटा नहीं सकता। पृथ्वी का निष्कंटक राज्य और देवताओं का आधिपत्य — दोनों को सामने रखकर भी अर्जुन कहते हैं कि उनका दुःख दूर नहीं होगा। यह श्लोक यह भी दर्शाता है कि अर्जुन का संकट केवल बाहरी नहीं, भीतरी है।

आज के जीवन में: जो दुःख भीतर से उठता है, उसे बाहरी सुख-सुविधाएँ नहीं मिटा सकतीं — उसके लिए भीतरी ज्ञान और विवेक ही एकमात्र उपाय है।


श्लोक 2.9

वक्ता: संजय

एवमुक्त्वा हृषीकेशं गुडाकेशः परन्तप।
न योत्स्य इति गोविन्दमुक्त्वा तूष्णीं बभूव ह ॥2.9॥

sañjaya uvācha / evam-uktvā hṛiṣhīkeśhaṁ guḍākeśhaḥ parantapa / na yotsya iti govindam uktvā tūṣhṇīṁ babhūva ha

हिंदी अनुवाद: संजय बोले — हे धृतराष्ट्र! इतना कहकर निद्राजित अर्जुन ने भगवान गोविंद से 'मैं युद्ध नहीं करूँगा' — यह स्पष्ट कहकर मौन धारण कर लिया।

भावार्थ: संजय धृतराष्ट्र को बताते हैं कि अर्जुन ने अपनी बात पूरी करने के बाद एक निर्णायक वाक्य कहा — 'न योत्स्ये' अर्थात मैं युद्ध नहीं करूँगा — और फिर चुप हो गए। 'गुडाकेश' अर्थात निद्रा को जीतने वाले — यह नाम यहाँ विशेष रूप से उल्लेखनीय है, क्योंकि जो निद्रा को जीत सकता है, वह इस मोहरूपी निद्रा में क्यों डूबा है? यह मौन अर्जुन की पराजय नहीं, बल्कि एक शिष्य का समर्पण है।


श्लोक 2.10

वक्ता: संजय

तमुवाच हृषीकेशः प्रहसन्निव भारत।
सेनयोरुभयोर्मध्ये विषीदन्तमिदं वचः ॥2.10॥

tam-uvācha hṛiṣhīkeśhaḥ prahasanniva bhārata / senayorubhayor-madhye viṣhīdantam-idaṁ vachaḥ

हिंदी अनुवाद: हे भरतवंशी धृतराष्ट्र! दोनों सेनाओं के बीच विषाद में डूबे उस अर्जुन से भगवान हृषीकेश मुस्कुराते हुए-से ये वचन बोले।

भावार्थ: संजय यहाँ एक महत्त्वपूर्ण विवरण देते हैं — श्रीकृष्ण 'प्रहसन्निव' अर्थात मुस्कुराते हुए-से बोले। यह मुस्कान भर्त्सना की नहीं, बल्कि एक ज्ञानी की शांत करुणा की है — जो जानता है कि इस मोह का उत्तर उसके पास है। 'हृषीकेश' अर्थात इंद्रियों के स्वामी — यह नाम यहाँ सार्थक है, क्योंकि जो इंद्रियों के स्वामी हैं, वे इंद्रियों से व्याकुल अर्जुन को मार्ग दिखाने वाले हैं। अगले श्लोक से गीता का मुख्य उपदेश आरंभ होता है।


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