भगवद्गीता

भगवद्गीता अध्याय 11, श्लोक 11–20 | विश्वरूपदर्शनयोग | अर्थ सहित

6 अक्तूबर 2026·8 मिनट में पढ़ें
भगवद्गीता अध्याय 11, श्लोक 11–20 | विश्वरूपदर्शनयोग | अर्थ सहित

अध्याय ११ में भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को दिव्य दृष्टि देकर अपना विश्वरूप दिखाया। पहले दस श्लोकों में संजय ने उस विराट रूप का प्रारंभिक वर्णन किया। अब इस खंड में संजय उस रूप की अपार दीप्ति और विस्तार का वर्णन करते हैं, और फिर अर्जुन स्वयं उस अनुभव से अभिभूत होकर हाथ जोड़कर भगवान की स्तुति आरंभ करते हैं।

श्लोक 11.11

वक्ता: संजय

दिव्यमाल्याम्बरधरं दिव्यगन्धानुलेपनम्।
सर्वाश्चर्यमयं देवमनन्तं विश्वतोमुखम् ॥11.11॥

divya-mālyāmbara-dharaṁ divya-gandhānulepanam / sarvāśhcharya-mayaṁ devam anantaṁ viśhvato-mukham

हिंदी अनुवाद: वे दिव्य मालाएँ और वस्त्र धारण किए हुए हैं, उनके शरीर पर दिव्य सुगंधित लेप लगा है। वे सर्वथा आश्चर्यमय, अनंत और चारों ओर मुखवाले देव हैं।

भावार्थ: संजय धृतराष्ट्र को उस विराट रूप के बाह्य वैभव का वर्णन कर रहे हैं। 'दिव्यमाल्याम्बरधरम्' अर्थात दिव्य माला और वस्त्र धारण करनेवाले, 'दिव्यगन्धानुलेपनम्' अर्थात दिव्य सुगंध से अनुलिप्त। यह रूप किसी एक दिशा में सीमित नहीं, 'विश्वतोमुखम्' — सब ओर मुखवाला है। 'अनन्तम्' शब्द बताता है कि इस रूप का कोई छोर नहीं। संपूर्ण रूप आश्चर्य से परिपूर्ण है — मानो सृष्टि की समस्त सुंदरता और शक्ति एक साथ प्रकट हो गई हो।


श्लोक 11.12

वक्ता: संजय

दिवि सूर्यसहस्रस्य भवेद्युगपदुत्थिता।
यदि भाः सदृशी सा स्याद्भासस्तस्य महात्मनः ॥11.12॥

divi sūrya-sahasrasya bhaved yugapad utthitā / yadi bhāḥ sadṛiśhī sā syād bhāsas tasya mahātmanaḥ

हिंदी अनुवाद: यदि आकाश में एक साथ हज़ारों सूर्य उदय हो जाएँ, तो भी उन सबका सम्मिलित प्रकाश उस महात्मा के प्रकाश के समान शायद ही हो सके।

भावार्थ: संजय उस विराट रूप की दीप्ति को समझाने के लिए सबसे बड़े प्रकाश-स्रोत — सूर्य — का उदाहरण देते हैं। एक सूर्य से समस्त संसार प्रकाशित होता है; यहाँ हज़ारों सूर्यों की कल्पना की गई है। फिर भी 'सदृशी सा स्यात्' — 'शायद' वह तुलना हो सके, निश्चित नहीं। यह 'शायद' शब्द बताता है कि भगवान का तेज मानवीय कल्पना की सीमा से परे है। संजय भाषा की सीमा को स्वीकार करते हुए भी वर्णन करने का प्रयास करते हैं।

आज के जीवन में: जो सत्य मानवीय बुद्धि और भाषा की सीमा से परे हो, उसे समझने के लिए विनम्रता और खुले मन की आवश्यकता होती है।


श्लोक 11.13

वक्ता: संजय

तत्रैकस्थं जगत्कृत्स्नं प्रविभक्तमनेकधा।
अपश्यद्देवदेवस्य शरीरे पाण्डवस्तदा ॥11.13॥

tatraika-sthaṁ jagat kṛitsnaṁ pravibhaktam anekadhā / apaśhyad deva-devasya śharīre pāṇḍavas tadā

हिंदी अनुवाद: उस समय अर्जुन ने देवों के देव भगवान के उस एक शरीर में अनेक प्रकार से विभक्त संपूर्ण जगत को एक ही स्थान पर स्थित देखा।

भावार्थ: यह श्लोक विश्वरूप दर्शन का सार है। 'एकस्थम्' — एक ही स्थान पर, और 'प्रविभक्तमनेकधा' — अनेक प्रकार से विभक्त। अर्थात संपूर्ण सृष्टि, जो बाहर से अनेक और बिखरी हुई दिखती है, वह भगवान के एक शरीर में एकत्र थी। 'देवदेवस्य' — देवों के देव। अर्जुन ने यह अनुभव किया कि जो विविधता संसार में दिखती है, वह सब एक ही चेतना में समाई हुई है। यह दर्शन अद्वितीय और अवर्णनीय था।

आज के जीवन में: संसार की विविधता के भीतर एक ही मूल सत्ता है — यह बोध मनुष्य को संकीर्णता से ऊपर उठाता है।


श्लोक 11.14

वक्ता: संजय

ततः स विस्मयाविष्टो हृष्टरोमा धनञ्जयः।
प्रणम्य शिरसा देवं कृताञ्जलिरभाषत ॥11.14॥

tataḥ sa vismayāviṣhṭo hṛiṣhṭa-romā dhanañjayaḥ / praṇamya śhirasā devaṁ kṛitāñjalir abhāṣhata

हिंदी अनुवाद: तब अर्जुन विस्मय से भर गए, उनके शरीर के रोंगटे खड़े हो गए। वे हाथ जोड़कर भगवान के विश्वरूप को मस्तक से प्रणाम करके बोले।

भावार्थ: संजय यहाँ अर्जुन की मनोदशा का वर्णन करते हैं। 'विस्मयाविष्टः' — विस्मय से आविष्ट, 'हृष्टरोमा' — रोमांचित। यह रोमांच भय और श्रद्धा दोनों का मिला-जुला भाव है। अर्जुन जैसे महान योद्धा, जो युद्धभूमि में निर्भय रहते हैं, वे भी इस दर्शन से अभिभूत हो गए। 'प्रणम्य शिरसा' — सिर झुकाकर प्रणाम करना, यह पूर्ण समर्पण का भाव है। इसके बाद अर्जुन की स्तुति आरंभ होती है।

आज के जीवन में: जब कोई अनुभव हमारी सोच से बड़ा हो जाए, तो विनम्रता और कृतज्ञता ही उचित प्रतिक्रिया है।


श्लोक 11.15

वक्ता: अर्जुन

पश्यामि देवांस्तव देव देहे सर्वांस्तथा भूतविशेषसङ्घान्।
ब्रह्माणमीशं कमलासनस्थ मृषींश्च सर्वानुरगांश्च दिव्यान् ॥11.15॥

arjuna uvācha / paśhyāmi devāns tava deva dehe / sarvāns tathā bhūta-viśheṣha-saṅghān / brahmāṇam īśhaṁ kamalāsana-stham / ṛiṣhīnśh cha sarvān uragānśh cha divyān

हिंदी अनुवाद: अर्जुन बोले — हे देव! मैं आपके शरीर में समस्त देवताओं को, प्राणियों के विविध समुदायों को, कमलासन पर विराजमान ब्रह्माजी को, शंकरजी को, समस्त ऋषियों को और दिव्य सर्पों को देख रहा हूँ।

भावार्थ: अर्जुन अब स्वयं जो देख रहे हैं उसका वर्णन करते हैं। 'कमलासनस्थम् ब्रह्माणम्' — कमल पर बैठे ब्रह्माजी, 'ईशम्' — शंकरजी। सृष्टि के रचयिता और संहारक, दोनों उस एक विराट रूप में समाए हैं। ऋषि और दिव्य सर्प — ज्ञान और शक्ति के प्रतीक — भी वहाँ हैं। यह दृश्य बताता है कि जो भी महान और दिव्य है, वह सब उस एक परम सत्ता का ही अंश है।


श्लोक 11.16

वक्ता: अर्जुन

अनेकबाहूदरवक्त्रनेत्रं पश्यामि त्वां सर्वतोऽनन्तरूपम्।
नान्तं न मध्यं न पुनस्तवादिं पश्यामि विश्वेश्वर विश्वरूप ॥11.16॥

aneka-bāhūdara-vaktra-netraṁ / paśhyāmi tvāṁ sarvato ’nanta-rūpam / nāntaṁ na madhyaṁ na punas tavādiṁ / paśhyāmi viśhveśhvara viśhva-rūpa

हिंदी अनुवाद: हे विश्वेश्वर! हे विश्वरूप! मैं आपको अनेक भुजाओं, उदरों, मुखों और नेत्रों से युक्त तथा सब ओर अनंत रूपों में देख रहा हूँ। मुझे न आपका आदि दिखता है, न मध्य और न अंत।

भावार्थ: अर्जुन दो नामों से पुकारते हैं — 'विश्वेश्वर' अर्थात विश्व के स्वामी, और 'विश्वरूप' अर्थात जिनका रूप ही विश्व है। 'नान्तं न मध्यं न पुनस्तवादिम्' — न अंत, न मध्य, न आदि। यह अनुभव किसी भी सीमित वस्तु का नहीं हो सकता। अर्जुन स्वीकार करते हैं कि यह रूप उनकी दृष्टि और बुद्धि की पकड़ से परे है। यह श्लोक परमात्मा की अनंतता की सबसे सरल और सीधी स्वीकृति है।

आज के जीवन में: परमात्मा को किसी एक सीमा या परिभाषा में बाँधना संभव नहीं — यह विनम्रता ही सच्ची आस्था की नींव है।


श्लोक 11.17

वक्ता: अर्जुन

किरीटिनं गदिनं चक्रिणं च तेजोराशिं सर्वतोदीप्तिमन्तम्।
पश्यामि त्वां दुर्निरीक्ष्यं समन्ता द्दीप्तानलार्कद्युतिमप्रमेयम् ॥11.17॥

kirīṭinaṁ gadinaṁ chakriṇaṁ cha / tejo-rāśhiṁ sarvato dīptimantam / paśhyāmi tvāṁ durnirīkṣhyaṁ samantād / dīptānalārka-dyutim aprameyam

हिंदी अनुवाद: मैं आपको किरीट, गदा और चक्र धारण किए हुए देख रहा हूँ — तेज के पुंज, सब ओर प्रकाशमान, प्रज्वलित अग्नि और सूर्य के समान कांतिवाले, आँखों से देखने में अत्यंत कठिन और सब दिशाओं में अप्रमेय।

भावार्थ: 'किरीटिनम्' — मुकुटधारी, 'गदिनम्' — गदाधारी, 'चक्रिणम्' — चक्रधारी। ये भगवान विष्णु के परिचित चिह्न हैं, जो यहाँ विराट रूप में भी दिखते हैं। 'दुर्निरीक्ष्यम्' — जिसे देखना कठिन हो। 'दीप्तानलार्कद्युतिम्' — जलती अग्नि और सूर्य जैसी आभा। 'अप्रमेयम्' — जिसे मापा न जा सके। अर्जुन का यह वर्णन बताता है कि वह रूप परिचित भी है और अकल्पनीय भी — एक साथ सौम्य और उग्र।


श्लोक 11.18

वक्ता: अर्जुन

त्वमक्षरं परमं वेदितव्यं त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम्।
त्वमव्ययः शाश्वतधर्मगोप्ता सनातनस्त्वं पुरुषो मतो मे ॥11.18॥

tvam akṣharaṁ paramaṁ veditavyaṁ / tvam asya viśhvasya paraṁ nidhānam / tvam avyayaḥ śhāśhvata-dharma-goptā / sanātanas tvaṁ puruṣho mato me

हिंदी अनुवाद: आप ही जानने योग्य परम अक्षर हैं, आप ही इस संपूर्ण विश्व के परम आश्रय हैं। आप ही सनातन धर्म के रक्षक और अविनाशी सनातन पुरुष हैं — ऐसा मेरा विश्वास है।

भावार्थ: अर्जुन यहाँ दर्शन से स्तुति की ओर आते हैं। 'अक्षरम्' — जो कभी नष्ट न हो, 'परमं वेदितव्यम्' — जो सबसे अधिक जानने योग्य है। 'परं निधानम्' — परम आश्रय, अर्थात सब कुछ अंततः इन्हीं में टिका है। 'शाश्वतधर्मगोप्ता' — सनातन धर्म के रक्षक। 'मतो मे' — यह मेरा मत है, यह कहकर अर्जुन अपनी श्रद्धा को व्यक्त करते हैं। यह श्लोक भगवान के स्वरूप का दार्शनिक सार है।

आज के जीवन में: जो सत्य अविनाशी और सबका आश्रय हो, उसे जानना ही जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि है।


श्लोक 11.19

वक्ता: अर्जुन

अनादिमध्यान्तमनन्तवीर्य मनन्तबाहुं शशिसूर्यनेत्रम्।
पश्यामि त्वां दीप्तहुताशवक्त्रम् स्वतेजसा विश्वमिदं तपन्तम् ॥11.19॥

स्वतेजसा विश्वमिदं तपन्तम् || 19||

हिंदी अनुवाद: मैं आपको आदि, मध्य और अंत से रहित, अनंत सामर्थ्यवाले, अनंत भुजाओंवाले, चंद्र और सूर्य को नेत्र रूप में धारण किए हुए, प्रज्वलित अग्नि के समान मुखवाले और अपने तेज से इस संसार को तपाते हुए देख रहा हूँ।

भावार्थ: 'अनादिमध्यान्तम्' — जिसका न आरंभ है, न मध्य, न अंत। 'शशिसूर्यनेत्रम्' — चंद्रमा और सूर्य जिनके नेत्र हैं। इसका अर्थ है कि रात और दिन, शीतलता और उष्णता — दोनों उनकी दृष्टि में हैं। 'दीप्तहुताशवक्त्रम्' — जलती अग्नि जैसे मुख। 'स्वतेजसा विश्वमिदं तपन्तम्' — अपने तेज से संसार को तपाते हुए। यह वर्णन उस रूप की सर्वव्यापी ऊर्जा को दर्शाता है।


श्लोक 11.20

वक्ता: अर्जुन

द्यावापृथिव्योरिदमन्तरं हि व्याप्तं त्वयैकेन दिशश्च सर्वाः।
दृष्ट्वाऽद्भुतं रूपमुग्रं तवेदं लोकत्रयं प्रव्यथितं महात्मन् ॥11.20॥

dyāv ā-pṛithivyor idam antaraṁ hi / vyāptaṁ tvayaikena diśhaśh cha sarvāḥ / dṛiṣhṭvādbhutaṁ rūpam ugraṁ tavedaṁ / loka-trayaṁ pravyathitaṁ mahātman

हिंदी अनुवाद: हे महात्मन्! स्वर्ग और पृथ्वी के बीच का यह सारा अंतराल और सब दिशाएँ केवल आपसे ही परिपूर्ण हैं। आपके इस अद्भुत और उग्र रूप को देखकर तीनों लोक व्याकुल हो रहे हैं।

भावार्थ: 'द्यावापृथिव्योः अंतरम्' — आकाश और पृथ्वी के बीच का विस्तार, और 'दिशश्च सर्वाः' — सब दिशाएँ — सब केवल आपसे भरी हैं। 'एकेन' — अकेले आपसे। यह एकत्व का बोध है। 'उग्रम् रूपम्' — उग्र रूप देखकर 'लोकत्रयं प्रव्यथितम्' — तीनों लोक काँप रहे हैं। यह उग्रता विनाश का नहीं, परम शक्ति का भाव है। अर्जुन इस रूप की विशालता और प्रभाव दोनों को एक साथ अनुभव कर रहे हैं।

आज के जीवन में: जो सत्ता संपूर्ण अस्तित्व में व्याप्त हो, उसके सामने समस्त अहंकार और संकीर्णता स्वतः गल जाती है।


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