भगवद्गीता

भगवद्गीता अध्याय 11, श्लोक 1–10 | विश्वरूपदर्शनयोग | अर्थ सहित

6 अक्तूबर 2026·7 मिनट में पढ़ें
भगवद्गीता अध्याय 11, श्लोक 1–10 | विश्वरूपदर्शनयोग | अर्थ सहित

दसवें अध्याय में श्रीकृष्ण ने अपनी विभूतियों और ऐश्वर्य का विस्तार से वर्णन किया था। उस उपदेश को सुनकर अर्जुन का मन श्रद्धा और जिज्ञासा से भर उठा। अब ग्यारहवें अध्याय में अर्जुन भगवान के उस विराट ईश्वरीय रूप को प्रत्यक्ष देखने की विनती करता है, और भगवान उसे दिव्य दृष्टि देकर अपना विश्वरूप दिखाते हैं।

श्लोक 11.1

वक्ता: अर्जुन

मदनुग्रहाय परमं गुह्यमध्यात्मसंज्ञितम्।
यत्त्वयोक्तं वचस्तेन मोहोऽयं विगतो मम ॥11.1॥

arjuna uvācha / mad-anugrahāya paramaṁ guhyam adhyātma-sanjñitam / yat tvayoktaṁ vachas tena moho ’yaṁ vigato mama

हिंदी अनुवाद: अर्जुन बोले — केवल मुझ पर कृपा करने के लिए आपने जो परम गोपनीय अध्यात्म-तत्त्व का वचन कहा, उससे मेरा यह मोह नष्ट हो गया है।

भावार्थ: दसवें अध्याय का उपदेश सुनकर अर्जुन कृतज्ञता से भरकर कहता है कि भगवान ने जो परम गुह्य — अर्थात् अत्यंत गोपनीय — अध्यात्म-ज्ञान केवल उसके हित के लिए दिया, उसने उसके मन का मोह मिटा दिया। 'मोह' का अर्थ है भ्रम या अज्ञान-जनित भटकाव। अर्जुन स्वीकार करता है कि यह ज्ञान उसके लिए विशेष अनुग्रह था।

आज के जीवन में: जब कोई हमें निःस्वार्थ भाव से सच्चा ज्ञान दे, तो वह हमारे भीतर के भ्रम को दूर कर देता है।


श्लोक 11.2

वक्ता: अर्जुन

भवाप्ययौ हि भूतानां श्रुतौ विस्तरशो मया।
त्वत्तः कमलपत्राक्ष माहात्म्यमपि चाव्ययम् ॥11.2॥

bhavāpyayau hi bhūtānāṁ śhrutau vistaraśho mayā / tvattaḥ kamala-patrākṣha māhātmyam api chāvyayam

हिंदी अनुवाद: हे कमलनयन! समस्त प्राणियों की उत्पत्ति और प्रलय मैंने विस्तार से आपसे सुनी है, और आपका अविनाशी माहात्म्य भी सुना है।

भावार्थ: अर्जुन भगवान को 'कमलपत्राक्ष' — कमल के पत्तों जैसे नेत्रों वाले — कहकर संबोधित करता है। वह कहता है कि सृष्टि की उत्पत्ति और उसके विनाश का विस्तृत वर्णन तथा भगवान का अव्यय — अर्थात् कभी न घटने वाला — महिमा-वर्णन उसने भली-भाँति सुन लिया है। यह श्लोक पिछले अध्यायों के उपदेश की स्वीकृति है।


श्लोक 11.3

वक्ता: अर्जुन

एवमेतद्यथात्थ त्वमात्मानं परमेश्वर।
द्रष्टुमिच्छामि ते रूपमैश्वरं पुरुषोत्तम ॥11.3॥

evam etad yathāttha tvam ātmānaṁ parameśhvara / draṣhṭum ichchhāmi te rūpam aiśhwaraṁ puruṣhottama

हिंदी अनुवाद: हे पुरुषोत्तम! आप अपने विषय में जैसा कहते हैं, वह सत्य ही है। हे परमेश्वर! मैं आपके ईश्वरीय रूप को प्रत्यक्ष देखना चाहता हूँ।

भावार्थ: अर्जुन भगवान की बात पर पूरा विश्वास व्यक्त करता है — 'जैसा आपने कहा, वैसा ही है' — फिर भी उसके मन में एक स्वाभाविक जिज्ञासा उठती है। वह 'ऐश्वरं रूपम्' — ईश्वर का वह दिव्य विराट स्वरूप — अपनी आँखों से देखना चाहता है। श्रद्धा और जिज्ञासा का यह सुंदर संगम अर्जुन की भक्ति को दर्शाता है।

आज के जीवन में: सच्ची श्रद्धा और जिज्ञासा साथ-साथ चल सकती हैं; किसी बात को मानना और उसे और गहराई से जानना चाहना — दोनों एक साथ हो सकते हैं।


श्लोक 11.4

वक्ता: अर्जुन

मन्यसे यदि तच्छक्यं मया द्रष्टुमिति प्रभो।
योगेश्वर ततो मे त्वं दर्शयाऽत्मानमव्ययम् ॥11.4॥

manyase yadi tach chhakyaṁ mayā draṣhṭum iti prabho / yogeśhvara tato me tvaṁ darśhayātmānam avyayam

हिंदी अनुवाद: हे प्रभो! यदि आप समझते हैं कि मैं आपका वह रूप देख सकता हूँ, तो हे योगेश्वर! अपना वह अविनाशी स्वरूप मुझे दिखाइए।

भावार्थ: अर्जुन विनम्रता से निवेदन करता है — वह यह निर्णय भगवान पर छोड़ता है कि क्या वह उस रूप को देखने में समर्थ है। 'योगेश्वर' — योग के स्वामी — और 'अव्ययम्' — अविनाशी — ये दो शब्द भगवान की असीम शक्ति और नित्यता की ओर संकेत करते हैं। अर्जुन की यह विनती में अहंकार नहीं, केवल शरणागति है।

आज के जीवन में: जब हम किसी महान अनुभव के लिए तैयार हों, तो विनम्रता से निवेदन करना और निर्णय उस पर छोड़ देना — यही सच्ची शरणागति है।


श्लोक 11.5

वक्ता: श्रीकृष्ण

पश्य मे पार्थ रूपाणि शतशोऽथ सहस्रशः।
नानाविधानि दिव्यानि नानावर्णाकृतीनि च ॥11.5॥

śhrī-bhagavān uvācha / paśhya me pārtha rūpāṇi śhataśho ’tha sahasraśhaḥ / nānā-vidhāni divyāni nānā-varṇākṛitīni cha

हिंदी अनुवाद: श्रीभगवान बोले — हे पृथानन्दन! अब मेरे सैकड़ों-हजारों अनेक प्रकार के, अनेक वर्णों और आकृतियों वाले दिव्य रूपों को देख।

भावार्थ: भगवान अर्जुन को 'पार्थ' — पृथा अर्थात् कुंती के पुत्र — कहकर संबोधित करते हैं और विश्वरूप-दर्शन का आमंत्रण देते हैं। 'शतशः सहस्रशः' — सैकड़ों-हजारों — यह संख्या उस रूप की अनंतता बताती है। 'नानाविधानि दिव्यानि' — अनेक प्रकार के दिव्य — रूप, जो रंग और आकार में भिन्न-भिन्न हैं, यह सृष्टि की विविधता में भगवान की उपस्थिति को दर्शाता है।

आज के जीवन में: इस सृष्टि की अनंत विविधता — रंग, रूप, आकार — सब उसी एक परम सत्ता की अभिव्यक्ति है।


श्लोक 11.6

वक्ता: श्रीकृष्ण

पश्यादित्यान्वसून्रुद्रानश्िवनौ मरुतस्तथा।
बहून्यदृष्टपूर्वाणि पश्याऽश्चर्याणि भारत ॥11.6॥

paśhyādityān vasūn rudrān aśhvinau marutas tathā / bahūny adṛiṣhṭa-pūrvāṇi paśhyāśhcharyāṇi bhārata

हिंदी अनुवाद: हे भरतवंशी अर्जुन! बारह आदित्यों, आठ वसुओं, ग्यारह रुद्रों, दो अश्विनीकुमारों और उनचास मरुद्गणों को देख; और जो पहले कभी नहीं देखे, ऐसे अनेक आश्चर्यजनक रूपों को भी देख।

भावार्थ: भगवान अर्जुन को बताते हैं कि उनके विश्वरूप में समस्त देवगण समाए हुए हैं — आदित्य, वसु, रुद्र, अश्विनीकुमार और मरुत्। ये सभी वैदिक देव-शक्तियाँ हैं जो सृष्टि के विभिन्न कार्यों का संचालन करती हैं। इसके साथ ही ऐसे अनेक रूप भी हैं जो अर्जुन ने पहले कभी नहीं देखे — यह विश्वरूप की अकल्पनीय विशालता की ओर संकेत है।


श्लोक 11.7

वक्ता: श्रीकृष्ण

इहैकस्थं जगत्कृत्स्नं पश्याद्य सचराचरम्।
मम देहे गुडाकेश यच्चान्यद्द्रष्टुमिच्छसि ॥11.7॥

ihaika-sthaṁ jagat kṛitsnaṁ paśhyādya sa-charācharam / mama dehe guḍākeśha yach chānyad draṣhṭum ichchhasi

हिंदी अनुवाद: हे गुडाकेश! मेरे इस एक शरीर में ही चराचर सहित समस्त जगत को अभी देख ले, और इसके अतिरिक्त जो भी देखना चाहता है, वह भी देख ले।

भावार्थ: भगवान अर्जुन को 'गुडाकेश' — निद्रा को जीतने वाले — कहकर संबोधित करते हैं। वे कहते हैं कि उनके एक ही शरीर में 'सचराचरम्' — चर और अचर, अर्थात् गतिशील और स्थिर — समस्त सृष्टि एक साथ दिखेगी। यह विश्वरूप का सबसे अद्भुत पक्ष है — अनंत ब्रह्मांड एक में समाया हुआ।

आज के जीवन में: जो परम सत्ता है, वह इस विशाल सृष्टि के हर कण में और पूरी सृष्टि में एक साथ विद्यमान है।


श्लोक 11.8

वक्ता: श्रीकृष्ण

न तु मां शक्यसे द्रष्टुमनेनैव स्वचक्षुषा।
दिव्यं ददामि ते चक्षुः पश्य मे योगमैश्वरम् ॥11.8॥

na tu māṁ śhakyase draṣhṭum anenaiva sva-chakṣhuṣhā / divyaṁ dadāmi te chakṣhuḥ paśhya me yogam aiśhwaram

हिंदी अनुवाद: परंतु तू अपनी इन साधारण आँखों से मुझे देख नहीं सकता; इसलिए मैं तुझे दिव्य दृष्टि देता हूँ — उससे मेरी ईश्वरीय सामर्थ्य को देख।

भावार्थ: भगवान स्पष्ट करते हैं कि विश्वरूप का दर्शन सामान्य नेत्रों से संभव नहीं है। 'स्वचक्षुषा' — अपनी आँखों से — देखना यहाँ असमर्थ है। इसलिए वे अर्जुन को 'दिव्यं चक्षुः' — दिव्य दृष्टि — प्रदान करते हैं। 'योगमैश्वरम्' — ईश्वरीय योग-सामर्थ्य — वह शक्ति है जिसके द्वारा भगवान यह सब धारण करते हैं। यह दिव्य दृष्टि भगवान का विशेष अनुग्रह है।

आज के जीवन में: परम सत्य को देखने के लिए साधारण दृष्टि नहीं, एक विशेष आंतरिक दृष्टि चाहिए जो ज्ञान और अनुग्रह से मिलती है।


श्लोक 11.9

वक्ता: संजय

एवमुक्त्वा ततो राजन्महायोगेश्वरो हरिः।
दर्शयामास पार्थाय परमं रूपमैश्वरम् ॥11.9॥

sañjaya uvācha / evam uktvā tato rājan mahā-yogeśhvaro hariḥ / darśhayām āsa pārthāya paramaṁ rūpam aiśhwaram

हिंदी अनुवाद: संजय बोले — हे राजन्! ऐसा कहकर महायोगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को अपना परम ऐश्वर्यमय रूप दिखाया।

भावार्थ: यहाँ वक्ता बदल जाता है — संजय धृतराष्ट्र को युद्धभूमि का वृत्तांत सुना रहे हैं। वे कहते हैं कि 'महायोगेश्वर हरिः' — महान योग के स्वामी श्रीकृष्ण — ने अर्जुन को वह 'परमं रूपमैश्वरम्' — परम ईश्वरीय रूप — दिखाया। यह श्लोक विश्वरूप-दर्शन के आरंभ की घोषणा है।


श्लोक 11.10

वक्ता: संजय

अनेकवक्त्रनयनमनेकाद्भुतदर्शनम्।
अनेकदिव्याभरणं दिव्यानेकोद्यतायुधम् ॥11.10॥

aneka-vaktra-nayanam anekādbhuta-darśhanam / aneka-divyābharaṇaṁ divyānekodyatāyudham

हिंदी अनुवाद: उस रूप में अनेक मुख और नेत्र थे, अनेक अद्भुत दृश्य थे, अनेक दिव्य आभूषण थे और हाथों में उठाए हुए अनेक दिव्य आयुध थे।

भावार्थ: संजय उस विराट रूप का वर्णन आरंभ करते हैं। 'अनेकवक्त्रनयनम्' — अनगिनत मुख और नेत्र, 'अनेकाद्भुतदर्शनम्' — अनगिनत अद्भुत दृश्य, 'दिव्याभरणम्' — दिव्य आभूषण और 'दिव्योद्यतायुधम्' — उठाए हुए दिव्य आयुध। यह वर्णन उस रूप की अनंतता और अलौकिकता को प्रकट करता है जिसे साधारण भाषा में पूरी तरह समेटना संभव नहीं।


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