भगवद्गीता

भगवद्गीता अध्याय 10, श्लोक 41–42 | विभूतियोग | अर्थ सहित

6 अक्तूबर 2026·2 मिनट में पढ़ें
भगवद्गीता अध्याय 10, श्लोक 41–42 | विभूतियोग | अर्थ सहित

अध्याय दस में श्रीकृष्ण ने अर्जुन को अपनी अनेक विभूतियों का विस्तार से वर्णन किया — देवताओं में, प्राणियों में, प्रकृति में। अब इस अध्याय के अंतिम दो श्लोकों में वे उस पूरे वर्णन का सार एक सूत्र में बाँधते हैं। पहले श्लोक में वे कहते हैं कि जो भी ऐश्वर्यशाली, सुंदर या बलशाली है, वह सब उनके तेज का अंश है; और दूसरे श्लोक में वे इस विस्तार को समेटते हुए कहते हैं कि वे अपने एक अंश से ही समस्त जगत को धारण किए हुए हैं।

श्लोक 10.41

वक्ता: श्रीकृष्ण

यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वं श्रीमदूर्जितमेव वा।
तत्तदेवावगच्छ त्वं मम तेजोंऽशसंभवम् ॥10.41॥

yad yad vibhūtimat sattvaṁ śhrīmad ūrjitam eva vā / tat tad evāvagachchha tvaṁ mama tejo ’nśha-sambhavam

हिंदी अनुवाद: जो भी प्राणी या वस्तु ऐश्वर्ययुक्त, शोभायुक्त अथवा बलयुक्त है, उस-उसको तुम मेरे तेज के एक अंश से उत्पन्न हुई समझो।

भावार्थ: श्रीकृष्ण ने इस अध्याय में अपनी अनेक विभूतियाँ गिनाई थीं। अब वे उन सबका एक सामान्य नियम बताते हैं। 'विभूतिमत्' अर्थात ऐश्वर्ययुक्त, 'श्रीमत्' अर्थात शोभायुक्त, और 'ऊर्जित' अर्थात बलशाली — इन तीन गुणों से युक्त जो भी कुछ इस संसार में दिखाई दे, वह सब उनके तेज का एक अंश है। इसका अर्थ यह है कि किसी में भी जो श्रेष्ठता, सौंदर्य या शक्ति दिखती है, वह उस परमसत्ता की ही झलक है। यह दृष्टि मनुष्य को हर श्रेष्ठ वस्तु में ईश्वर को देखना सिखाती है।

आज के जीवन में: जब भी किसी में असाधारण प्रतिभा, सौंदर्य या शक्ति दिखे, उसे उस परमसत्ता के तेज की झलक समझें — इससे मन में न ईर्ष्या उठेगी, न अहंकार।


श्लोक 10.42

वक्ता: श्रीकृष्ण

अथवा बहुनैतेन किं ज्ञातेन तवार्जुन।
विष्टभ्याहमिदं कृत्स्नमेकांशेन स्थितो जगत् ॥10.42॥

atha vā bahunaitena kiṁ jñātena tavārjuna / viṣhṭabhyāham idaṁ kṛitsnam ekānśhena sthito jagat

हिंदी अनुवाद: हे अर्जुन, इस प्रकार की अनेक बातें जानने से तुम्हें क्या प्रयोजन है? मैं अपने एक अंश से ही इस समस्त जगत को व्याप्त करके स्थित हूँ।

भावार्थ: श्रीकृष्ण यहाँ पूरे विभूति-वर्णन को एक महावाक्य में समेट देते हैं। वे कहते हैं कि इतनी विस्तृत सूची जानने की भी आवश्यकता नहीं, क्योंकि मूल तथ्य यह है — 'एकांशेन' अर्थात अपने एक अंश मात्र से वे इस 'कृत्स्नम् जगत्' अर्थात समस्त ब्रह्मांड को 'विष्टभ्य' — व्याप्त और धारण करके — स्थित हैं। यह वक्तव्य अत्यंत गहरा है: जो अनंत ब्रह्मांड हम देखते हैं, वह उस परमसत्ता का पूर्ण स्वरूप भी नहीं, केवल एक अंश की अभिव्यक्ति है। इससे उस सत्ता की अपरिमित विराटता का बोध होता है।

आज के जीवन में: यह समझ कि यह विशाल सृष्टि उस परमसत्ता के एक अंश की ही अभिव्यक्ति है, मनुष्य के मन में स्वाभाविक विनम्रता और श्रद्धा जगाती है।


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