भगवद्गीता

भगवद्गीता अध्याय 10, श्लोक 31–40 | विभूतियोग | अर्थ सहित

6 अक्तूबर 2026·8 मिनट में पढ़ें
भगवद्गीता अध्याय 10, श्लोक 31–40 | विभूतियोग | अर्थ सहित

अध्याय दस में श्रीकृष्ण अर्जुन को अपनी दिव्य विभूतियों का विस्तार से वर्णन कर रहे हैं। पिछले खंड में उन्होंने देवताओं, ऋषियों, ग्रहों और पर्वतों में अपनी उपस्थिति बताई थी। इस खंड में वे प्रकृति, भाषा, काल, गुण और ज्ञान में अपनी विभूति बताते हुए यह घोषणा करते हैं कि समस्त चराचर का बीज और आधार वे स्वयं हैं, और अंत में स्वीकार करते हैं कि यह सब तो केवल संक्षिप्त वर्णन है।

श्लोक 10.31

वक्ता: श्रीकृष्ण

पवनः पवतामस्मि रामः शस्त्रभृतामहम्।
झषाणां मकरश्चास्मि स्रोतसामस्मि जाह्नवी ॥10.31॥

pavanaḥ pavatām asmi rāmaḥ śhastra-bhṛitām aham / jhaṣhāṇāṁ makaraśh chāsmi srotasām asmi jāhnavī

हिंदी अनुवाद: पवित्र करने वालों में मैं वायु हूँ और शस्त्र धारण करने वालों में राम हूँ। जल-जंतुओं में मैं मगर हूँ और बहने वाले स्रोतों में गंगा मैं हूँ।

भावार्थ: श्रीकृष्ण विभिन्न श्रेणियों में अपनी श्रेष्ठ विभूति बता रहे हैं। 'पवन' अर्थात् वायु — जो सबको जीवन देती और शुद्ध करती है। शस्त्रधारियों में 'राम' — जो धर्म के आदर्श योद्धा हैं। 'मकर' अर्थात् मगर — जल-जंतुओं में सबसे बलशाली। 'जाह्नवी' अर्थात् गंगा — नदियों में सबसे पवित्र। इस प्रकार प्रत्येक वर्ग में जो सर्वश्रेष्ठ और सबसे प्रभावशाली है, वह परमात्मा की विभूति है।

आज के जीवन में: जो भी श्रेष्ठ, पवित्र और बलशाली है, उसमें परमात्मा की झलक देखना सीखें।


श्लोक 10.32

वक्ता: श्रीकृष्ण

सर्गाणामादिरन्तश्च मध्यं चैवाहमर्जुन।
अध्यात्मविद्या विद्यानां वादः प्रवदतामहम् ॥10.32॥

sargāṇām ādir antaśh cha madhyaṁ chaivāham arjuna / adhyātma-vidyā vidyānāṁ vādaḥ pravadatām aham

हिंदी अनुवाद: हे अर्जुन! सभी सृष्टियों का आदि, मध्य और अंत मैं ही हूँ। विद्याओं में अध्यात्मविद्या और तत्त्व-निर्णय के लिए किए जाने वाले शास्त्रार्थ में वाद मैं हूँ।

भावार्थ: श्रीकृष्ण यहाँ बताते हैं कि वे केवल किसी एक वस्तु में नहीं, बल्कि समस्त सृष्टि के आरंभ, बीच और समाप्ति में भी हैं। 'अध्यात्मविद्या' — आत्मा और परमात्मा के स्वरूप को जानने की विद्या — सभी विद्याओं में श्रेष्ठ है। 'वाद' — वह शास्त्रार्थ जो सत्य की खोज के लिए किया जाए — वह भी उनकी विभूति है। इस प्रकार ज्ञान और सत्य की खोज में भी परमात्मा ही प्रकट होते हैं।

आज के जीवन में: सत्य की जिज्ञासा और आत्मज्ञान की साधना — ये ईश्वर की ओर ले जाने वाले सबसे बड़े मार्ग हैं।


श्लोक 10.33

वक्ता: श्रीकृष्ण

अक्षराणामकारोऽस्मि द्वन्द्वः सामासिकस्य च।
अहमेवाक्षयः कालो धाताऽहं विश्वतोमुखः ॥10.33॥

अहमेवाक्षय: कालो धाताहं विश्वतोमुख: || 33|| / akṣharāṇām a-kāro ’smi dvandvaḥ sāmāsikasya cha / aham evākṣhayaḥ kālo dhātāhaṁ viśhvato-mukhaḥ

हिंदी अनुवाद: अक्षरों में 'अ' कार और समासों में द्वंद्व समास मैं हूँ। अक्षय काल अर्थात् काल का भी महाकाल मैं हूँ और सब दिशाओं में मुख वाला सबका पालन करने वाला धाता भी मैं हूँ।

भावार्थ: भाषा के मूल में 'अ' — देवनागरी और संस्कृत वर्णमाला का पहला अक्षर — परमात्मा की विभूति है। समासों में 'द्वंद्व' — जो दो समान पदों को जोड़ता है। 'अक्षयकाल' — वह काल जो स्वयं कभी नष्ट नहीं होता, जो सबको नष्ट करता है। 'धाता' — सब दिशाओं में दृष्टि रखते हुए समस्त प्राणियों के कर्मफल का विधान करने वाला। इस प्रकार भाषा, काल और विधान — सब में परमात्मा हैं।

आज के जीवन में: काल और भाषा — दोनों ही ईश्वर की शक्ति के रूप हैं; इनका सदुपयोग ही सच्ची उपासना है।


श्लोक 10.34

वक्ता: श्रीकृष्ण

मृत्युः सर्वहरश्चाहमुद्भवश्च भविष्यताम्।
कीर्तिः श्रीर्वाक्च नारीणां स्मृतिर्मेधा धृतिः क्षमा ॥10.34॥

mṛityuḥ sarva-haraśh chāham udbhavaśh cha bhaviṣhyatām / kīrtiḥ śhrīr vāk cha nārīṇāṁ smṛitir medhā dhṛitiḥ kṣhamā

हिंदी अनुवाद: सबका हरण करने वाली मृत्यु और आने वाले प्राणियों का उद्भव भी मैं हूँ। स्त्री-जाति के गुणों में कीर्ति, श्री, वाक्, स्मृति, मेधा, धृति और क्षमा — ये सब मैं हूँ।

भावार्थ: श्रीकृष्ण यहाँ बताते हैं कि मृत्यु और जन्म — दोनों ही उनकी विभूति हैं। 'सर्वहर' मृत्यु सबको अपने में समेट लेती है। साथ ही भविष्य में जन्म लेने वाले प्राणियों का उद्भव भी वे ही हैं। स्त्री-जाति के सात दिव्य गुण — कीर्ति (यश), श्री (समृद्धि), वाक् (वाणी), स्मृति (स्मरणशक्ति), मेधा (बुद्धि), धृति (धैर्य) और क्षमा (माफ करने की शक्ति) — ये सब परमात्मा की विभूतियाँ हैं।

आज के जीवन में: धैर्य, क्षमा और विवेक जैसे गुण ईश्वरीय हैं — इन्हें जीवन में अपनाना ही ईश्वर की उपासना है।


श्लोक 10.35

वक्ता: श्रीकृष्ण

बृहत्साम तथा साम्नां गायत्री छन्दसामहम्।
मासानां मार्गशीर्षोऽहमृतूनां कुसुमाकरः ॥10.35॥

bṛihat-sāma tathā sāmnāṁ gāyatrī chhandasām aham / māsānāṁ mārga-śhīrṣho ’ham ṛitūnāṁ kusumākaraḥ

हिंदी अनुवाद: सामवेद के गाए जाने वाले मंत्रों में बृहत्साम और वैदिक छंदों में गायत्री छंद मैं हूँ। बारह महीनों में मार्गशीर्ष और छह ऋतुओं में वसंत मैं हूँ।

भावार्थ: 'बृहत्साम' — सामवेद का एक विशेष और अत्यंत महत्त्वपूर्ण गान। 'गायत्री' — वेदों का सर्वश्रेष्ठ छंद, जिसमें सूर्य की उपासना की जाती है। 'मार्गशीर्ष' — अगहन मास, जो प्राचीन काल में वर्ष का प्रथम और श्रेष्ठ मास माना जाता था। 'कुसुमाकर' अर्थात् वसंत — फूलों से भरी, सबसे सुंदर ऋतु। इन सबमें जो श्रेष्ठता और सौंदर्य है, वह परमात्मा की विभूति है।


श्लोक 10.36

वक्ता: श्रीकृष्ण

द्यूतं छलयतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम्।
जयोऽस्मि व्यवसायोऽस्मि सत्त्वं सत्त्ववतामहम् ॥10.36॥

dyūtaṁ chhalayatām asmi tejas tejasvinām aham / jayo ’smi vyavasāyo ’smi sattvaṁ sattvavatām aham

हिंदी अनुवाद: छल करने वालों में जुआ और तेजस्वियों में तेज मैं हूँ। विजेताओं की विजय, निश्चय करने वालों का निश्चय और सात्त्विक मनुष्यों का सात्त्विक भाव मैं हूँ।

भावार्थ: यहाँ श्रीकृष्ण एक विशेष बात कहते हैं — 'द्यूत' अर्थात् जुआ, जो छल का सबसे प्रबल रूप है, वह भी उनकी विभूति है। इसका अर्थ यह नहीं कि जुआ उचित है, बल्कि यह कि जो भी अपनी श्रेणी में सर्वाधिक प्रभावशाली है, उसमें परमात्मा की शक्ति है। 'तेज', 'जय', 'व्यवसाय' (दृढ़ निश्चय) और 'सत्त्व' — ये सब उनकी विभूतियाँ हैं। श्रेष्ठता और दृढ़ता में परमात्मा प्रकट होते हैं।

आज के जीवन में: दृढ़ निश्चय और सात्त्विक भाव — ये ईश्वरीय गुण हैं; इन्हें जीवन में धारण करना ही उनकी विभूति को पहचानना है।


श्लोक 10.37

वक्ता: श्रीकृष्ण

वृष्णीनां वासुदेवोऽस्मि पाण्डवानां धनंजयः।
मुनीनामप्यहं व्यासः कवीनामुशना कविः ॥10.37॥

vṛiṣhṇīnāṁ vāsudevo ’smi pāṇḍavānāṁ dhanañjayaḥ / munīnām apyahaṁ vyāsaḥ kavīnām uśhanā kaviḥ

हिंदी अनुवाद: वृष्णिवंशियों में वासुदेव और पांडवों में धनंजय मैं हूँ। मुनियों में वेदव्यास और कवियों में कवि शुक्राचार्य भी मैं हूँ।

भावार्थ: श्रीकृष्ण यहाँ स्वयं को 'वासुदेव' कहकर अपनी विभूति बताते हैं — वृष्णिवंश में वे स्वयं श्रेष्ठ हैं। पांडवों में 'धनंजय' अर्थात् अर्जुन — जिनसे वे अभी बात कर रहे हैं। 'व्यास' — जिन्होंने वेदों का विभाजन किया और महाभारत की रचना की। 'उशना' अर्थात् शुक्राचार्य — देवताओं के विरोधी असुरों के गुरु, जो अपनी काव्य-प्रतिभा के लिए विख्यात थे। इस प्रकार प्रत्येक वंश और विद्या में जो श्रेष्ठ है, वह परमात्मा है।


श्लोक 10.38

वक्ता: श्रीकृष्ण

दण्डो दमयतामस्मि नीतिरस्मि जिगीषताम्।
मौनं चैवास्मि गुह्यानां ज्ञानं ज्ञानवतामहम् ॥10.38॥

daṇḍo damayatām asmi nītir asmi jigīṣhatām / maunaṁ chaivāsmi guhyānāṁ jñānaṁ jñānavatām aham

हिंदी अनुवाद: दमन करने वालों में दंडनीति और विजय चाहने वालों में नीति मैं हूँ। गोपनीय भावों में मौन और ज्ञानवानों में ज्ञान मैं हूँ।

भावार्थ: 'दंड' — अनुशासन और न्याय का वह साधन जो अधर्म को रोकता है। 'नीति' — विजय की इच्छा रखने वालों के लिए सही मार्ग और कुशल रणनीति। 'मौन' — जो बात कहने से अधिक गहरी होती है, जो गोपनीय भावों को सुरक्षित रखता है। 'ज्ञान' — ज्ञानवानों में जो सच्चा बोध है, वह परमात्मा की विभूति है। इस प्रकार अनुशासन, विवेक, मौन और ज्ञान — सब में परमात्मा की उपस्थिति है।

आज के जीवन में: सच्चा ज्ञान और उचित मौन — दोनों ईश्वरीय शक्तियाँ हैं; इन्हें साधना जीवन को गहरा बनाता है।


श्लोक 10.39

वक्ता: श्रीकृष्ण

यच्चापि सर्वभूतानां बीजं तदहमर्जुन।
न तदस्ति विना यत्स्यान्मया भूतं चराचरम् ॥10.39॥

yach chāpi sarva-bhūtānāṁ bījaṁ tad aham arjuna / na tad asti vinā yat syān mayā bhūtaṁ charācharam

हिंदी अनुवाद: हे अर्जुन! समस्त प्राणियों का जो बीज है, वह भी मैं ही हूँ; क्योंकि मेरे बिना कोई भी चर या अचर प्राणी नहीं है।

भावार्थ: यह श्लोक विभूति-वर्णन का सार है। 'बीज' — वह मूल तत्त्व जिससे सब कुछ उत्पन्न होता है। श्रीकृष्ण कहते हैं कि वे केवल कुछ श्रेष्ठ वस्तुओं में नहीं, बल्कि समस्त चराचर सृष्टि के मूल में हैं। 'चर' — जो चलते-फिरते हैं, और 'अचर' — जो स्थिर हैं, जैसे पर्वत और वृक्ष — इन सबका अस्तित्व परमात्मा के बिना संभव नहीं। यह परमात्मा की सर्वव्यापकता का सबसे स्पष्ट उद्घोष है।

आज के जीवन में: जब यह भाव दृढ़ हो जाए कि परमात्मा ही सबका मूल है, तो किसी भी प्राणी के प्रति द्वेष या तिरस्कार संभव नहीं रहता।


श्लोक 10.40

वक्ता: श्रीकृष्ण

नान्तोऽस्ति मम दिव्यानां विभूतीनां परंतप।
एष तूद्देशतः प्रोक्तो विभूतेर्विस्तरो मया ॥10.40॥

nānto ’sti mama divyānāṁ vibhūtīnāṁ parantapa / eṣha tūddeśhataḥ prokto vibhūter vistaro mayā

हिंदी अनुवाद: हे परंतप अर्जुन! मेरी दिव्य विभूतियों का कोई अंत नहीं है। मैंने जो विस्तार तुम्हारे सामने कहा है, वह तो केवल संक्षेप में कहा है।

भावार्थ: 'परंतप' — शत्रुओं को तपाने वाले, अर्जुन का एक विशेषण। श्रीकृष्ण यहाँ विनम्रतापूर्वक स्वीकार करते हैं कि उन्होंने जो विभूतियाँ गिनाई हैं, वे तो केवल उदाहरण हैं। परमात्मा की दिव्य शक्तियाँ अनंत हैं — उन्हें पूरी तरह वाणी में नहीं समेटा जा सकता। यह श्लोक पाठक को यह भी बताता है कि जो कुछ भी श्रेष्ठ, सुंदर और शक्तिशाली दिखे, उसमें परमात्मा को देखने की दृष्टि विकसित करें।

आज के जीवन में: परमात्मा की महिमा अनंत है — जितना जानें, उतना ही यह अनुभव गहरा होता है कि अभी और भी बहुत कुछ जानना शेष है।


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