भगवद्गीता

भगवद्गीता अध्याय 10, श्लोक 21–30 | विभूतियोग | अर्थ सहित

6 अक्तूबर 2026·7 मिनट में पढ़ें
भगवद्गीता अध्याय 10, श्लोक 21–30 | विभूतियोग | अर्थ सहित

अध्याय दस में श्रीकृष्ण अर्जुन को अपनी दिव्य विभूतियों का विस्तार से वर्णन कर रहे हैं। पिछले खंड में उन्होंने बताया कि वे ही सृष्टि के मूल स्रोत हैं और समस्त प्राणी उन्हीं से उत्पन्न हैं। इस खंड (श्लोक २१ से ३०) में वे देवताओं, ऋषियों, पर्वतों, पशुओं, पक्षियों और अनेक श्रेणियों में अपनी श्रेष्ठतम अभिव्यक्तियाँ गिनाते हैं।

श्लोक 10.21

वक्ता: श्रीकृष्ण

आदित्यानामहं विष्णुर्ज्योतिषां रविरंशुमान्।
मरीचिर्मरुतामस्मि नक्षत्राणामहं शशी ॥10.21॥

ādityānām ahaṁ viṣhṇur jyotiṣhāṁ ravir anśhumān / marīchir marutām asmi nakṣhatrāṇām ahaṁ śhaśhī

हिंदी अनुवाद: मैं बारह आदित्यों में विष्णु हूँ और प्रकाश देने वाली वस्तुओं में किरणों से युक्त सूर्य हूँ। मैं मरुतों में मरीचि हूँ और नक्षत्रों का स्वामी चन्द्रमा हूँ।

भावार्थ: श्रीकृष्ण अर्जुन को बताते हैं कि वे प्रत्येक वर्ग में सर्वश्रेष्ठ तत्त्व हैं। 'आदित्य' अदिति के बारह पुत्र हैं, जिनमें विष्णु प्रमुख माने जाते हैं। 'अंशुमान्' अर्थात् किरणों से युक्त सूर्य प्रकाश का सर्वोच्च स्रोत है। मरुत वायु-देवताओं का समूह है, जिनमें मरीचि श्रेष्ठ है। 'शशी' अर्थात् चन्द्रमा नक्षत्रों का अधिपति है। इस प्रकार श्रीकृष्ण यह स्पष्ट करते हैं कि जो भी सर्वोत्कृष्ट और तेजस्वी है, वह उनकी ही विभूति है।

आज के जीवन में: जब भी हम सूर्य या चन्द्रमा के प्रकाश को देखें, उसमें उस परम शक्ति का स्मरण करें जो समस्त तेज की मूल है।


श्लोक 10.22

वक्ता: श्रीकृष्ण

वेदानां सामवेदोऽस्मि देवानामस्मि वासवः।
इन्द्रियाणां मनश्चास्मि भूतानामस्मि चेतना ॥10.22॥

vedānāṁ sāma-vedo ’smi devānām asmi vāsavaḥ / indriyāṇāṁ manaśh chāsmi bhūtānām asmi chetanā

हिंदी अनुवाद: मैं वेदों में सामवेद हूँ, देवताओं में इन्द्र हूँ, इन्द्रियों में मन हूँ और प्राणियों में चेतना हूँ।

भावार्थ: चार वेदों में सामवेद को संगीत और गान की दृष्टि से सर्वोच्च माना जाता है। 'वासव' इन्द्र का नाम है, जो देवताओं के राजा हैं। इन्द्रियों में मन सबसे प्रधान है क्योंकि वही सभी इन्द्रियों को संचालित करता है। 'चेतना' वह जीवन-शक्ति है जो प्राणियों को जीवित और सक्रिय रखती है। श्रीकृष्ण यहाँ बताते हैं कि ज्ञान, शक्ति, संवेदन और जीवन — सभी में वे ही व्याप्त हैं।

आज के जीवन में: मन की शक्ति को पहचानें — वह ईश्वर की विभूति है; उसे सत्कार्यों में लगाना ही उसका सच्चा उपयोग है।


श्लोक 10.23

वक्ता: श्रीकृष्ण

रुद्राणां शङ्करश्चास्मि वित्तेशो यक्षरक्षसाम्।
वसूनां पावकश्चास्मि मेरुः शिखरिणामहम् ॥10.23॥

rudrāṇāṁ śhaṅkaraśh chāsmi vitteśho yakṣha-rakṣhasām / vasūnāṁ pāvakaśh chāsmi meruḥ śhikhariṇām aham

हिंदी अनुवाद: मैं ग्यारह रुद्रों में शंकर हूँ और यक्षों तथा राक्षसों में कुबेर हूँ। आठ वसुओं में अग्नि हूँ और शिखरवाले पर्वतों में सुमेरु हूँ।

भावार्थ: 'रुद्र' शिव के ग्यारह रूप हैं, जिनमें शंकर सर्वोच्च हैं। 'वित्तेश' अर्थात् धन के स्वामी कुबेर यक्षों और राक्षसों में श्रेष्ठ माने जाते हैं। 'पावक' अग्नि का नाम है, जो आठ वसुओं में प्रमुख है। 'मेरु' वह स्वर्णिम पर्वत है जिसे सृष्टि का केन्द्र माना जाता है। इस श्लोक में श्रीकृष्ण दर्शाते हैं कि संहार, सम्पदा, ऊर्जा और स्थिरता — सभी में उनकी ही सत्ता है।


श्लोक 10.24

वक्ता: श्रीकृष्ण

पुरोधसां च मुख्यं मां विद्धि पार्थ बृहस्पतिम्।
सेनानीनामहं स्कन्दः सरसामस्मि सागरः ॥10.24॥

purodhasāṁ cha mukhyaṁ māṁ viddhi pārtha bṛihaspatim / senānīnām ahaṁ skandaḥ sarasām asmi sāgaraḥ

हिंदी अनुवाद: हे पार्थ! पुरोहितों में मुख्य बृहस्पति को मेरा स्वरूप जानो। सेनापतियों में स्कन्द और जलाशयों में समुद्र मैं हूँ।

भावार्थ: श्रीकृष्ण अर्जुन को 'पार्थ' कहकर संबोधित करते हैं। 'पुरोधा' अर्थात् पुरोहित — राजाओं के गुरु और मार्गदर्शक। देवताओं के पुरोहित बृहस्पति सबसे श्रेष्ठ माने जाते हैं। 'स्कन्द' कार्तिकेय हैं, जो देवताओं के सेनापति हैं। समुद्र सभी जलाशयों में सबसे विशाल और गहरा है। इस प्रकार ज्ञान, नेतृत्व और विस्तार — तीनों में श्रीकृष्ण अपनी उपस्थिति बताते हैं।


श्लोक 10.25

वक्ता: श्रीकृष्ण

महर्षीणां भृगुरहं गिरामस्म्येकमक्षरम्।
यज्ञानां जपयज्ञोऽस्मि स्थावराणां हिमालयः ॥10.25॥

maharṣhīṇāṁ bhṛigur ahaṁ girām asmyekam akṣharam / yajñānāṁ japa-yajño ’smi sthāvarāṇāṁ himālayaḥ

हिंदी अनुवाद: महर्षियों में भृगु और वाणी में एकाक्षर प्रणव (ॐ) मैं हूँ। सम्पूर्ण यज्ञों में जपयज्ञ और स्थिर रहने वाली वस्तुओं में हिमालय मैं हूँ।

भावार्थ: भृगु महर्षियों में अत्यन्त तेजस्वी और श्रेष्ठ ऋषि हैं। 'एकमक्षर' अर्थात् एक अक्षर — यह प्रणव 'ॐ' है, जो समस्त वाणी और ज्ञान का मूल है। यज्ञों में जपयज्ञ — अर्थात् मन ही मन नाम का जप — सर्वश्रेष्ठ माना गया है क्योंकि यह भीतर से होता है। 'स्थावर' अर्थात् जो हिलते-डुलते नहीं, उनमें हिमालय सर्वोच्च और अडिग है। श्रीकृष्ण यहाँ ज्ञान, उपासना और स्थिरता में अपनी विभूति दर्शाते हैं।

आज के जीवन में: मन की एकाग्रता से किया गया नाम-स्मरण सबसे बड़ी साधना है — यह श्लोक यही सिखाता है।


श्लोक 10.26

वक्ता: श्रीकृष्ण

अश्वत्थः सर्ववृक्षाणां देवर्षीणां च नारदः।
गन्धर्वाणां चित्ररथः सिद्धानां कपिलो मुनिः ॥10.26॥

aśhvatthaḥ sarva-vṛikṣhāṇāṁ devarṣhīṇāṁ cha nāradaḥ / gandharvāṇāṁ chitrarathaḥ siddhānāṁ kapilo muniḥ

हिंदी अनुवाद: सम्पूर्ण वृक्षों में पीपल, देवर्षियों में नारद, गन्धर्वों में चित्ररथ और सिद्धों में कपिल मुनि मैं हूँ।

भावार्थ: 'अश्वत्थ' अर्थात् पीपल का वृक्ष — यह सभी वृक्षों में पवित्र और दीर्घजीवी माना जाता है। नारद देवर्षियों में सर्वश्रेष्ठ हैं, जो सदा भक्ति और ज्ञान का प्रसार करते हैं। चित्ररथ गन्धर्वों में प्रमुख हैं, जो दिव्य संगीत के जानकार हैं। कपिल मुनि सिद्धों में श्रेष्ठ माने जाते हैं। इस श्लोक में श्रीकृष्ण प्रकृति, भक्ति, कला और ज्ञान — सभी में अपनी विभूति प्रकट करते हैं।


श्लोक 10.27

वक्ता: श्रीकृष्ण

उच्चैःश्रवसमश्वानां विद्धि माममृतोद्भवम्।
ऐरावतं गजेन्द्राणां नराणां च नराधिपम् ॥10.27॥

uchchaiḥśhravasam aśhvānāṁ viddhi mām amṛitodbhavam / airāvataṁ gajendrāṇāṁ narāṇāṁ cha narādhipam

हिंदी अनुवाद: घोड़ों में अमृत के साथ समुद्र से प्रकट हुए उच्चैःश्रवा को, श्रेष्ठ हाथियों में ऐरावत को और मनुष्यों में राजा को मेरी विभूति जानो।

भावार्थ: 'उच्चैःश्रवा' समुद्र-मन्थन से निकला दिव्य अश्व है जो अमृत के साथ प्रकट हुआ, इसलिए 'अमृतोद्भव' कहलाता है। 'ऐरावत' इन्द्र का दिव्य हाथी है, जो गजराजों में सर्वश्रेष्ठ है। मनुष्यों में राजा सबसे अधिक शक्ति और उत्तरदायित्व वाला होता है। श्रीकृष्ण यहाँ बताते हैं कि श्रेष्ठता और दिव्यता जहाँ भी दिखे, वह उनकी ही विभूति है।


श्लोक 10.28

वक्ता: श्रीकृष्ण

आयुधानामहं वज्रं धेनूनामस्मि कामधुक्।
प्रजनश्चास्मि कन्दर्पः सर्पाणामस्मि वासुकिः ॥10.28॥

āyudhānām ahaṁ vajraṁ dhenūnām asmi kāmadhuk / prajanaśh chāsmi kandarpaḥ sarpāṇām asmi vāsukiḥ

हिंदी अनुवाद: आयुधों में वज्र और गायों में कामधेनु मैं हूँ। सन्तान-उत्पत्ति के कारण कामदेव मैं हूँ और सर्पों में वासुकि मैं हूँ।

भावार्थ: 'वज्र' इन्द्र का अमोघ अस्त्र है, जो सभी आयुधों में सर्वाधिक शक्तिशाली माना जाता है। 'कामधुक्' अर्थात् कामधेनु — वह दिव्य गाय जो सभी मनोकामनाएँ पूर्ण करती है। 'प्रजन' अर्थात् सृष्टि को आगे बढ़ाने का कारण — कामदेव इस सृजन-शक्ति के प्रतीक हैं। वासुकि नागों का राजा है। इस श्लोक में शक्ति, पोषण, सृजन और नेतृत्व — सभी में ईश्वर की उपस्थिति दर्शाई गई है।


श्लोक 10.29

वक्ता: श्रीकृष्ण

अनन्तश्चास्मि नागानां वरुणो यादसामहम्।
पितृ़णामर्यमा चास्मि यमः संयमतामहम् ॥10.29॥

anantaśh chāsmi nāgānāṁ varuṇo yādasām aham / pitṝīṇām aryamā chāsmi yamaḥ sanyamatām aham

हिंदी अनुवाद: नागों में अनन्त (शेषनाग) और जल-जन्तुओं के अधिपति वरुण मैं हूँ। पितरों में अर्यमा और शासन करने वालों में यमराज मैं हूँ।

भावार्थ: 'अनन्त' अर्थात् शेषनाग — जो अनन्त फणों से पृथ्वी को धारण करते हैं और नागों में सर्वश्रेष्ठ हैं। 'यादस' अर्थात् जल में रहने वाले जीव, उनके अधिपति वरुण देव हैं। 'अर्यमा' पितरों के प्रमुख देवता हैं। 'संयमतां' अर्थात् नियम और दण्ड से शासन करने वालों में यमराज सर्वोच्च हैं। इस श्लोक में धारण-शक्ति, जल, पितृ-लोक और न्याय — सभी में ईश्वर की विभूति बताई गई है।


श्लोक 10.30

वक्ता: श्रीकृष्ण

प्रह्लादश्चास्मि दैत्यानां कालः कलयतामहम्।
मृगाणां च मृगेन्द्रोऽहं वैनतेयश्च पक्षिणाम् ॥10.30॥

prahlādaśh chāsmi daityānāṁ kālaḥ kalayatām aham / mṛigāṇāṁ cha mṛigendro ’haṁ vainateyaśh cha pakṣhiṇām

हिंदी अनुवाद: दैत्यों में प्रह्लाद और गणना करने वालों में काल मैं हूँ। पशुओं में सिंह और पक्षियों में गरुड मैं हूँ।

भावार्थ: प्रह्लाद दैत्य-कुल में जन्मे होने पर भी परम भक्त थे — इसीलिए वे दैत्यों में श्रेष्ठ विभूति हैं। 'कलयतां' अर्थात् गणना करने वालों में काल — समय — सर्वोपरि है, क्योंकि वह सबको नापता है। 'मृगेन्द्र' अर्थात् पशुओं का राजा सिंह, जो बल और साहस का प्रतीक है। 'वैनतेय' अर्थात् विनता के पुत्र गरुड, जो पक्षियों में सर्वश्रेष्ठ और विष्णु के वाहन हैं। यहाँ भक्ति, समय, शौर्य और गति — सभी में ईश्वर की सत्ता दिखाई गई है।

आज के जीवन में: प्रह्लाद का उदाहरण बताता है कि कुल या परिस्थिति नहीं, भक्ति और सद्गुण ही मनुष्य को श्रेष्ठ बनाते हैं।


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