भगवद्गीता

भगवद्गीता अध्याय 10, श्लोक 11–20 | विभूतियोग | अर्थ सहित

6 अक्तूबर 2026·8 मिनट में पढ़ें
भगवद्गीता अध्याय 10, श्लोक 11–20 | विभूतियोग | अर्थ सहित

अध्याय दस के पहले भाग में श्रीकृष्ण ने अर्जुन को बताया कि वे ही समस्त प्राणियों की उत्पत्ति के मूल हैं और जो भक्त प्रेम से उनका भजन करते हैं, उन्हें वे स्वयं बुद्धि और ज्ञान प्रदान करते हैं। इस दूसरे खंड में पहले श्रीकृष्ण अपनी उस कृपा का वर्णन पूर्ण करते हैं, फिर अर्जुन श्रद्धापूर्वक उनकी महिमा स्वीकार करता है और उनसे उनकी दिव्य विभूतियों का विस्तार से वर्णन करने की प्रार्थना करता है, जिस पर श्रीकृष्ण संक्षेप में विभूतियाँ बताने का संकल्प लेकर सबसे पहले अपने आत्मस्वरूप की घोषणा करते हैं।

श्लोक 10.11

वक्ता: श्रीकृष्ण

तेषामेवानुकम्पार्थमहमज्ञानजं तमः।
नाशयाम्यात्मभावस्थो ज्ञानदीपेन भास्वता ॥10.11॥

teṣhām evānukampārtham aham ajñāna-jaṁ tamaḥ / nāśhayāmyātma-bhāva-stho jñāna-dīpena bhāsvatā

हिंदी अनुवाद: उन भक्तों पर कृपा करने के लिए ही मैं उनके अंतःकरण में स्थित रहकर, देदीप्यमान ज्ञान के दीपक से उनके अज्ञान से उत्पन्न अंधकार को पूरी तरह नष्ट कर देता हूँ।

भावार्थ: श्रीकृष्ण अपनी करुणा का चरम रूप बता रहे हैं। वे कहते हैं कि जो भक्त निरंतर उनका भजन करते हैं, उनके प्रति वे केवल बाहर से नहीं, बल्कि उनके 'आत्मभाव' अर्थात् अंतःकरण में स्थित होकर कृपा करते हैं। 'अज्ञानजं तमः' का अर्थ है — अज्ञान से जन्मा अंधकार। इस अंधकार को वे 'ज्ञानदीप' अर्थात् ज्ञान के प्रकाशमान दीपक से सर्वथा मिटा देते हैं। यह श्लोक भक्त और भगवान के संबंध की गहराई दर्शाता है — भगवान बाहर से नहीं, भीतर से प्रकाश देते हैं।

आज के जीवन में: जब हम सच्चे मन से ईश्वर की ओर मुड़ते हैं, तो भीतर से ही विवेक और स्पष्टता का उदय होता है।


श्लोक 10.12

वक्ता: अर्जुन

परं ब्रह्म परं धाम पवित्रं परमं भवान्।
पुरुषं शाश्वतं दिव्यमादिदेवमजं विभुम् ॥10.12॥

arjuna uvācha / paraṁ brahma paraṁ dhāma pavitraṁ paramaṁ bhavān / puruṣhaṁ śhāśhvataṁ divyam ādi-devam ajaṁ vibhum

हिंदी अनुवाद: अर्जुन बोले — आप ही परम ब्रह्म हैं, परम धाम हैं और सबसे बड़े पवित्र करने वाले हैं; आप शाश्वत, दिव्य पुरुष, आदिदेव, अजन्मा और सर्वव्यापी हैं।

भावार्थ: श्रीकृष्ण के उपदेश सुनकर अर्जुन के हृदय में श्रद्धा उमड़ती है और वह उनकी महिमा के विविध पक्षों को एक-एक करके स्वीकार करता है। 'परं ब्रह्म' अर्थात् सर्वोच्च सत्ता, 'परं धाम' अर्थात् सबका परम आश्रय, 'पवित्रं परमम्' अर्थात् सबसे बड़े पवित्र करने वाले। 'शाश्वत' का अर्थ है — जो सदा रहे, जिसका कभी नाश न हो। 'आदिदेव' अर्थात् सबसे पहले के देव। यह श्लोक अर्जुन की गहरी आस्था और कृष्ण के प्रति उसके समर्पण को व्यक्त करता है।

आज के जीवन में: जब ज्ञान हृदय में उतरता है, तो श्रद्धा स्वाभाविक रूप से प्रकट होती है।


श्लोक 10.13

वक्ता: अर्जुन

आहुस्त्वामृषयः सर्वे देवर्षिर्नारदस्तथा।
असितो देवलो व्यासः स्वयं चैव ब्रवीषि मे ॥10.13॥

āhus tvām ṛiṣhayaḥ sarve devarṣhir nāradas tathā / asito devalo vyāsaḥ svayaṁ chaiva bravīṣhi me

हिंदी अनुवाद: ऐसा सभी ऋषि कहते हैं, देवर्षि नारद भी, और असित, देवल तथा व्यास भी — और अब स्वयं आप भी मुझसे यही कह रहे हैं।

भावार्थ: अर्जुन अपनी श्रद्धा को और दृढ़ करते हुए कहता है कि श्रीकृष्ण की यह महिमा केवल उसकी अपनी अनुभूति नहीं है, बल्कि सभी ऋषियों ने भी यही कहा है। नारद, असित, देवल और व्यास — ये सभी महान ज्ञानी इसी सत्य की घोषणा करते आए हैं। और अब स्वयं श्रीकृष्ण भी उसे यही बता रहे हैं। इस प्रकार अर्जुन यह दर्शाता है कि उसका विश्वास शास्त्र-प्रमाण और प्रत्यक्ष अनुभव — दोनों पर टिका है।

आज के जीवन में: जब हमारी अपनी अनुभूति और ज्ञानियों के वचन एक ही दिशा में हों, तो विश्वास और भी गहरा हो जाता है।


श्लोक 10.14

वक्ता: अर्जुन

सर्वमेतदृतं मन्ये यन्मां वदसि केशव।
न हि ते भगवन् व्यक्ितं विदुर्देवा न दानवाः ॥10.14॥

sarvam etad ṛitaṁ manye yan māṁ vadasi keśhava / na hi te bhagavan vyaktiṁ vidur devā na dānavāḥ

हिंदी अनुवाद: हे केशव! आप मुझसे जो कुछ कह रहे हैं, उसे मैं पूर्णतः सत्य मानता हूँ। हे भगवन्! आपके प्रकट होने के रहस्य को न देवता जानते हैं और न दानव।

भावार्थ: अर्जुन पूर्ण श्रद्धा के साथ कहता है कि श्रीकृष्ण के सभी वचन उसे सत्य प्रतीत होते हैं। 'व्यक्तिम्' का अर्थ है — प्रकट होने का ढंग या उत्पत्ति का रहस्य। अर्जुन स्वीकार करता है कि श्रीकृष्ण का यह स्वरूप इतना गहन है कि देवता और दानव भी उसे पूरी तरह नहीं जान पाते। यह वाक्य श्रीकृष्ण की अगम्यता को रेखांकित करता है — वे सर्वज्ञ हैं, पर उन्हें पूरी तरह जानना किसी के लिए भी संभव नहीं।

आज के जीवन में: जो सत्य अनुभव में उतरे, उसे बिना संदेह के स्वीकार करना ही सच्ची श्रद्धा है।


श्लोक 10.15

वक्ता: अर्जुन

स्वयमेवात्मनाऽत्मानं वेत्थ त्वं पुरुषोत्तम।
भूतभावन भूतेश देवदेव जगत्पते ॥10.15॥

swayam evātmanātmānaṁ vettha tvaṁ puruṣhottama / bhūta-bhāvana bhūteśha deva-deva jagat-pate

हिंदी अनुवाद: हे भूतभावन! हे भूतेश! हे देवदेव! हे जगत्पते! हे पुरुषोत्तम! आप स्वयं ही अपने आप को अपने आप से जानते हैं।

भावार्थ: अर्जुन यहाँ श्रीकृष्ण को अनेक नामों से पुकारता है — 'भूतभावन' अर्थात् समस्त प्राणियों को उत्पन्न करने वाले, 'भूतेश' अर्थात् प्राणियों के स्वामी, 'देवदेव' अर्थात् देवों के भी देव, 'जगत्पते' अर्थात् जगत के पालक। फिर वह कहता है कि आपको केवल आप ही पूर्णतः जान सकते हैं — कोई बाहरी प्रमाण या बुद्धि आपको पूरी तरह नहीं जान सकती। यह विनम्र स्वीकृति है कि परमात्मा की सीमा मानवीय ज्ञान से परे है।

आज के जीवन में: परमात्मा की पूर्ण थाह पाना मनुष्य की बुद्धि के वश की बात नहीं; विनम्रता से उनकी शरण लेना ही उचित मार्ग है।


श्लोक 10.16

वक्ता: अर्जुन

वक्तुमर्हस्यशेषेण दिव्या ह्यात्मविभूतयः।
याभिर्विभूतिभिर्लोकानिमांस्त्वं व्याप्य तिष्ठसि ॥10.16॥

vaktum arhasyaśheṣheṇa divyā hyātma-vibhūtayaḥ / yābhir vibhūtibhir lokān imāṁs tvaṁ vyāpya tiṣhṭhasi

हिंदी अनुवाद: जिन विभूतियों से आप इन सम्पूर्ण लोकों में व्याप्त होकर स्थित हैं, उन अपनी सभी दिव्य विभूतियों का पूर्णतः वर्णन करने में केवल आप ही समर्थ हैं।

भावार्थ: अर्जुन श्रीकृष्ण से प्रार्थना करता है कि वे अपनी 'दिव्य विभूतियों' का विस्तार से वर्णन करें। 'विभूति' का अर्थ है — ईश्वर की वह शक्ति या प्रकटन जिसके द्वारा वे सृष्टि में व्याप्त हैं। अर्जुन कहता है कि यह वर्णन केवल श्रीकृष्ण ही कर सकते हैं, क्योंकि जो स्वयं सर्वव्यापी है, वही अपनी व्यापकता को पूरी तरह जानता है। यह श्लोक अगले विभूति-वर्णन का द्वार खोलता है।


श्लोक 10.17

वक्ता: अर्जुन

कथं विद्यामहं योगिंस्त्वां सदा परिचिन्तयन्।
केषु केषु च भावेषु चिन्त्योऽसि भगवन्मया ॥10.17॥

kathaṁ vidyām ahaṁ yogins tvāṁ sadā parichintayan / keṣhu keṣhu cha bhāveṣhu chintyo ’si bhagavan mayā

हिंदी अनुवाद: हे योगिन्! निरंतर चिंतन करते हुए मैं आपको कैसे जानूँ? और हे भगवन्! किन-किन भावों या रूपों में मैं आपका चिंतन करूँ?

भावार्थ: अर्जुन की जिज्ञासा यहाँ बहुत व्यावहारिक है। वह पूछता है कि ध्यान और चिंतन के समय मन को किस रूप में, किस भाव में श्रीकृष्ण की ओर लगाए? 'योगिन्' संबोधन यहाँ श्रीकृष्ण की योगशक्ति को इंगित करता है। 'भावेषु' का अर्थ है — भावों या प्रकटनों में। यह प्रश्न हर साधक के मन में उठता है — जो सर्वत्र है, उसे किस रूप में पकड़ें? इसी का उत्तर आगे के विभूति-वर्णन में मिलता है।

आज के जीवन में: ईश्वर को जानने की सच्ची इच्छा ही उनकी ओर बढ़ने का पहला कदम है।


श्लोक 10.18

वक्ता: अर्जुन

विस्तरेणात्मनो योगं विभूतिं च जनार्दन।
भूयः कथय तृप्तिर्हि श्रृण्वतो नास्ति मेऽमृतम् ॥10.18॥

vistareṇātmano yogaṁ vibhūtiṁ cha janārdana / bhūyaḥ kathaya tṛiptir hi śhṛiṇvato nāsti me ’mṛitam

हिंदी अनुवाद: हे जनार्दन! अपनी योगशक्ति और विभूतियों को आप फिर से विस्तार से बताइए, क्योंकि आपके अमृत के समान वचन सुनते-सुनते मेरी तृप्ति नहीं होती।

भावार्थ: अर्जुन 'भूयः' अर्थात् 'फिर से' कहकर श्रीकृष्ण से पुनः विस्तृत वर्णन की प्रार्थना करता है। वह श्रीकृष्ण के वचनों को 'अमृत' की संज्ञा देता है — जो सुनने में मधुर हों और जीवन देने वाले हों। 'जनार्दन' का अर्थ है — जो जनों की रक्षा करते हैं या जिनसे जन माँगते हैं। अर्जुन की यह तृप्तिहीनता दिखाती है कि सच्चे ज्ञान की भूख बढ़ती जाती है, घटती नहीं।

आज के जीवन में: सच्चे ज्ञान और सत्संग में ऐसा आनंद होता है कि मन बार-बार उसी ओर लौटना चाहता है।


श्लोक 10.19

वक्ता: श्रीकृष्ण

हन्त ते कथयिष्यामि दिव्या ह्यात्मविभूतयः।
प्राधान्यतः कुरुश्रेष्ठ नास्त्यन्तो विस्तरस्य मे ॥10.19॥

śhrī bhagavān uvācha / hanta te kathayiṣhyāmi divyā hyātma-vibhūtayaḥ / prādhānyataḥ kuru-śhreṣhṭha nāstyanto vistarasya me

हिंदी अनुवाद: श्रीभगवान् बोले — अच्छा, तो मैं तुम्हारे लिए अपनी दिव्य विभूतियों को प्रमुखता से संक्षेप में बताऊँगा; क्योंकि हे कुरुश्रेष्ठ! मेरी विभूतियों के विस्तार का कोई अंत नहीं है।

भावार्थ: श्रीकृष्ण 'हन्त' शब्द से उत्तर आरंभ करते हैं, जो एक सहज और आत्मीय स्वीकृति का भाव देता है — जैसे 'अच्छा, ठीक है।' वे कहते हैं कि विभूतियाँ अनंत हैं, इसलिए उनका पूर्ण विस्तार संभव नहीं; वे केवल प्रमुख विभूतियाँ बताएँगे। 'प्राधान्यतः' का अर्थ है — मुख्य रूप से, संक्षेप में। 'कुरुश्रेष्ठ' संबोधन अर्जुन को सम्मान देता है। यह श्लोक आगे के विभूति-वर्णन की भूमिका है।


श्लोक 10.20

वक्ता: श्रीकृष्ण

अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः।
अहमादिश्च मध्यं च भूतानामन्त एव च ॥10.20॥

aham ātmā guḍākeśha sarva-bhūtāśhaya-sthitaḥ / aham ādiśh cha madhyaṁ cha bhūtānām anta eva cha

हिंदी अनुवाद: हे गुडाकेश! मैं समस्त प्राणियों के अंतःकरण में आत्मा के रूप में स्थित हूँ और मैं ही सभी प्राणियों का आदि, मध्य और अंत हूँ।

भावार्थ: विभूतियों का वर्णन आरंभ करते हुए श्रीकृष्ण सबसे पहले अपनी सर्वव्यापकता की मूल घोषणा करते हैं। 'गुडाकेश' का अर्थ है — नींद को जीतने वाला, अर्थात् जागरूक अर्जुन। 'सर्वभूताशयस्थितः' का अर्थ है — समस्त प्राणियों के हृदय में स्थित। वे कहते हैं कि वे ही हर प्राणी के भीतर आत्मा हैं और वे ही सृष्टि का आरंभ, बीच और अंत हैं। यह श्लोक समस्त विभूतियों की नींव है — सब कुछ उन्हीं से है, उन्हीं में है और उन्हीं में लीन होता है।

आज के जीवन में: जो सबके भीतर है और सबका आधार है, उसे बाहर खोजने की आवश्यकता नहीं — वह हमारे अपने अंतर में ही विराजमान है।


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