भगवद्गीता अध्याय 10, श्लोक 1–10 | विभूतियोग | अर्थ सहित
नवें अध्याय में श्रीकृष्ण ने राजविद्या और राजगुह्य का उपदेश देते हुए अपनी सर्वव्यापकता और भक्ति की महिमा समझाई। अब दसवें अध्याय 'विभूतियोग' में वे अर्जुन के प्रति अपना विशेष स्नेह प्रकट करते हुए अपनी दिव्य विभूतियों और योगशक्ति का विस्तार से वर्णन आरंभ करते हैं। इस पहले खंड में श्रीकृष्ण बताते हैं कि उनका उद्गम देवता और महर्षि भी नहीं जानते, समस्त सृष्टि उन्हीं से उत्पन्न है, और जो भक्त इस सत्य को जानकर प्रेमपूर्वक उनका भजन करते हैं, उन्हें वे स्वयं बुद्धियोग प्रदान करते हैं।
श्लोक 10.1
वक्ता: श्रीकृष्ण
भूय एव महाबाहो श्रृणु मे परमं वचः।
यत्तेऽहं प्रीयमाणाय वक्ष्यामि हितकाम्यया ॥10.1॥
śhrī bhagavān uvācha / bhūya eva mahā-bāho śhṛiṇu me paramaṁ vachaḥ / yatte ’haṁ prīyamāṇāya vakṣhyāmi hita-kāmyayā
हिंदी अनुवाद: श्रीभगवान् बोले — हे महाबाहो अर्जुन! मेरे परम वचन को तुम फिर से सुनो, जो मैं तुम्हारे हित की कामना से कहूँगा, क्योंकि तुम मुझमें अत्यंत प्रेम रखते हो।
भावार्थ: नवें अध्याय का उपदेश समाप्त होने के बाद श्रीकृषष्ण पुनः अर्जुन को संबोधित करते हैं। 'महाबाहो' कहकर वे अर्जुन की वीरता का सम्मान करते हैं। 'परमं वचः' अर्थात् सबसे श्रेष्ठ वचन — यह संकेत है कि आगे जो कहा जाएगा वह अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। 'प्रीयमाणाय' का अर्थ है — जो मुझसे प्रेम करता है। श्रीकृष्ण स्पष्ट करते हैं कि यह उपदेश केवल अर्जुन के प्रति उनके स्नेह और उसके हित की भावना से दिया जा रहा है।
आज के जीवन में: जो सच्चे प्रेम और श्रद्धा से सुनने को तैयार हो, उसे ही ज्ञान का सबसे गहरा रूप मिलता है।
श्लोक 10.2
वक्ता: श्रीकृष्ण
न मे विदुः सुरगणाः प्रभवं न महर्षयः।
अहमादिर्हि देवानां महर्षीणां च सर्वशः ॥10.2॥
na me viduḥ sura-gaṇāḥ prabhavaṁ na maharṣhayaḥ / aham ādir hi devānāṁ maharṣhīṇāṁ cha sarvaśhaḥ
हिंदी अनुवाद: मेरे प्रकट होने को न देवता जानते हैं और न महर्षि, क्योंकि मैं सब प्रकार से देवताओं और महर्षियों का भी आदि हूँ।
भावार्थ: श्रीकृष्ण यहाँ अपनी अनादि और अपार सत्ता का परिचय देते हैं। 'प्रभवम्' अर्थात् उद्गम या प्रकट होने का रहस्य। देवता और महर्षि — जो ज्ञान और शक्ति में सबसे ऊँचे माने जाते हैं — वे भी श्रीकृष्ण के मूल को नहीं जान सकते, क्योंकि वे स्वयं उन्हीं से उत्पन्न हैं। जो स्वयं किसी के स्रोत से जन्मा हो, वह उस स्रोत की थाह कैसे पा सकता है? यह श्लोक ईश्वर की असीमता को रेखांकित करता है।
आज के जीवन में: जो सबका मूल है, उसे किसी सीमित बुद्धि या साधन से पूरी तरह नहीं जाना जा सकता।
श्लोक 10.3
वक्ता: श्रीकृष्ण
यो मामजमनादिं च वेत्ति लोकमहेश्वरम्।
असम्मूढः स मर्त्येषु सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥10.3॥
yo māmajam anādiṁ cha vetti loka-maheśhvaram / asammūḍhaḥ sa martyeṣhu sarva-pāpaiḥ pramuchyate
हिंदी अनुवाद: जो मनुष्य मुझे अजन्मा, अनादि और समस्त लोकों का महान् ईश्वर जानता है, वह मनुष्यों में असम्मूढ़ अर्थात् सच्चा जानकार है और समस्त पापों से मुक्त हो जाता है।
भावार्थ: 'अजम्' अर्थात् जिसका जन्म नहीं, 'अनादिम्' अर्थात् जिसका कोई आरंभ नहीं, और 'लोकमहेश्वरम्' अर्थात् सभी लोकों का परम स्वामी — इन तीन विशेषणों से श्रीकृष्ण अपने स्वरूप को स्पष्ट करते हैं। 'असम्मूढ़' का अर्थ है जो भ्रम से रहित हो। जो व्यक्ति इस सत्य को दृढ़ता से जानता और मानता है, वह मोह के बंधनों से मुक्त होकर पापों से भी छूट जाता है।
आज के जीवन में: ईश्वर के वास्तविक स्वरूप की सच्ची समझ ही मनुष्य को भ्रम और बंधन से मुक्त करती है।
श्लोक 10.4
वक्ता: श्रीकृष्ण
बुद्धिर्ज्ञानमसंमोहः क्षमा सत्यं दमः शमः।
सुखं दुःखं भवोऽभावो भयं चाभयमेव च ॥10.4॥
buddhir jñānam asammohaḥ kṣhamā satyaṁ damaḥ śhamaḥ / sukhaṁ duḥkhaṁ bhavo ’bhāvo bhayaṁ chābhayameva cha
हिंदी अनुवाद: बुद्धि, ज्ञान, असम्मोह, क्षमा, सत्य, इंद्रिय-संयम, मन की शांति, सुख, दुःख, जन्म, मृत्यु, भय और अभय — ये सब भाव प्राणियों में मुझसे ही उत्पन्न होते हैं।
भावार्थ: यह श्लोक उन बीस भावों की सूची का पूर्वार्ध है जो श्रीकृष्ण अगले श्लोक में पूरी करते हैं। 'दम' का अर्थ है बाहरी इंद्रियों का संयम और 'शम' का अर्थ है मन की शांति। 'भव' अर्थात् अस्तित्व या जन्म और 'अभाव' अर्थात् नाश या मृत्यु — ये विपरीत भाव भी श्रीकृष्ण से ही उत्पन्न हैं। इस प्रकार श्रीकृष्ण बताते हैं कि जीवन के समस्त अनुभव और गुण उन्हीं की शक्ति से प्रकट होते हैं।
आज के जीवन में: जीवन में जो भी गुण, अनुभव या परिस्थिति आती है, वह सब उस एक परम सत्ता की ही अभिव्यक्ति है।
श्लोक 10.5
वक्ता: श्रीकृष्ण
अहिंसा समता तुष्टिस्तपो दानं यशोऽयशः।
भवन्ति भावा भूतानां मत्त एव पृथग्विधाः ॥10.5॥
ahiṁsā samatā tuṣṭis tapo dānaṁ yaśo 'yaśaḥ bhavanti bhāvā bhūtānāṁ matta eva pṛthag-vidhāḥ
हिंदी अनुवाद: अहिंसा, समता, संतोष, तप, दान, यश और अपयश — प्राणियों के ये अनेक प्रकार के और अलग-अलग भाव मुझसे ही उत्पन्न होते हैं।
भावार्थ: यह श्लोक पिछले श्लोक में आरंभ हुई बीस भावों की सूची को पूरा करता है। 'तुष्टि' अर्थात् संतोष, 'तप' अर्थात् कठोर साधना, और 'यशः-अयशः' अर्थात् कीर्ति और अपकीर्ति — ये सब भी श्रीकृष्ण से ही उत्पन्न हैं। 'पृथग्विधाः' का अर्थ है अनेक प्रकार के। इस प्रकार श्रीकृष्ण यह स्थापित करते हैं कि प्राणियों के भीतर जो भी भाव, गुण या अवस्थाएँ हैं — चाहे वे श्रेष्ठ हों या साधारण — सबका मूल स्रोत वही हैं।
आज के जीवन में: संसार में दिखने वाले सभी भाव — चाहे यश हो या अपयश, संतोष हो या तप — सब उसी एक परम शक्ति की अभिव्यक्ति हैं।
श्लोक 10.6
वक्ता: श्रीकृष्ण
महर्षयः सप्त पूर्वे चत्वारो मनवस्तथा।
मद्भावा मानसा जाता येषां लोक इमाः प्रजाः ॥10.6॥
maharṣhayaḥ sapta pūrve chatvāro manavas tathā / mad-bhāvā mānasā jātā yeṣhāṁ loka imāḥ prajāḥ
हिंदी अनुवाद: सात महर्षि, उनसे भी पहले के चार सनकादि और चौदह मनु — ये सब मेरे मन से उत्पन्न हुए हैं और मुझमें भाव रखते हैं; इन्हीं से संसार में यह समस्त प्रजा उत्पन्न हुई है।
भावार्थ: 'मद्भावाः' अर्थात् जो मुझमें श्रद्धा और भक्ति रखते हैं। 'मानसा जाताः' अर्थात् मेरे मन से उत्पन्न। सात महर्षि, चार सनकादि और चौदह मनु — ये सृष्टि के आदि पुरुष माने जाते हैं जिनसे समस्त मानव-जाति और प्रजा का विस्तार हुआ। श्रीकृष्ण यहाँ बताते हैं कि सृष्टि की यह पूरी परंपरा उन्हीं से आरंभ हुई है। इस प्रकार वे अपनी विभूति का विस्तार समझाते हैं।
श्लोक 10.7
वक्ता: श्रीकृष्ण
एतां विभूतिं योगं च मम यो वेत्ति तत्त्वतः।
सोऽविकम्पेन योगेन युज्यते नात्र संशयः ॥10.7॥
etāṁ vibhūtiṁ yogaṁ cha mama yo vetti tattvataḥ / so ’vikampena yogena yujyate nātra sanśhayaḥ
हिंदी अनुवाद: जो मनुष्य मेरी इस विभूति और योगशक्ति को तत्त्व से जानता है, वह अविचल भक्तियोग से युक्त हो जाता है — इसमें कोई संशय नहीं।
भावार्थ: 'विभूतिम्' अर्थात् दिव्य ऐश्वर्य और 'योगम्' अर्थात् परमात्मा की अचिंत्य शक्ति। 'तत्त्वतः' का अर्थ है सच्चाई के साथ, दृढ़ता से। 'अविकम्पेन योगेन' अर्थात् जो डगमगाए नहीं, ऐसे अटल भक्तियोग से। श्रीकृष्ण कहते हैं कि उनकी विभूतियों और शक्ति का सच्चा ज्ञान मनुष्य को स्थिर और अविचल भक्ति की ओर ले जाता है। यह ज्ञान केवल बौद्धिक नहीं, बल्कि हृदय से अनुभव किया गया होना चाहिए।
आज के जीवन में: ईश्वर की शक्ति और महिमा को सच्चे मन से जानने वाला भक्त अपनी साधना में कभी डगमगाता नहीं।
श्लोक 10.8
वक्ता: श्रीकृष्ण
अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्वं प्रवर्तते।
इति मत्वा भजन्ते मां बुधा भावसमन्विताः ॥10.8॥
ahaṁ sarvasya prabhavo mattaḥ sarvaṁ pravartate / iti matvā bhajante māṁ budhā bhāva-samanvitāḥ
हिंदी अनुवाद: मैं समस्त सृष्टि का मूल कारण हूँ और मुझसे ही सब कुछ प्रवृत्त होता है — ऐसा जानकर श्रद्धा और प्रेम से युक्त बुद्धिमान भक्त मेरा ही भजन करते हैं।
भावार्थ: 'प्रभवः' अर्थात् उद्गम या मूल कारण। 'मत्तः सर्वं प्रवर्तते' — मुझसे ही सब कुछ चलता है। 'बुधाः' अर्थात् जो सच्चे ज्ञानी हैं। 'भावसमन्विताः' अर्थात् जो श्रद्धा और प्रेम से भरे हैं। श्रीकृष्ण यहाँ बताते हैं कि जो व्यक्ति इस सत्य को समझ लेता है कि सारी सृष्टि का स्रोत एक ही है, वह स्वाभाविक रूप से उस परम सत्ता की ओर मुड़ता है और प्रेमपूर्वक उसका भजन करता है।
आज के जीवन में: जब यह बोध हो जाए कि सब कुछ उसी एक से है, तो मन स्वयं उसी की ओर झुकने लगता है।
श्लोक 10.9
वक्ता: श्रीकृष्ण
मच्चित्ता मद्गतप्राणा बोधयन्तः परस्परम्।
कथयन्तश्च मां नित्यं तुष्यन्ति च रमन्ति च ॥10.9॥
mach-chittā mad-gata-prāṇā bodhayantaḥ parasparam / kathayantaśh cha māṁ nityaṁ tuṣhyanti cha ramanti cha
हिंदी अनुवाद: मुझमें चित्त लगाए और मुझे ही प्राण अर्पण करने वाले भक्त आपस में मेरे गुण और प्रभाव की चर्चा करते हुए सदा संतुष्ट रहते हैं और मुझमें ही आनंद पाते हैं।
भावार्थ: 'मच्चित्ताः' अर्थात् जिनका चित्त मुझमें लगा है, 'मद्गतप्राणाः' अर्थात् जिन्होंने अपने प्राण मुझे अर्पित कर दिए हैं। 'बोधयन्तः परस्परम्' — वे आपस में एक-दूसरे को जगाते हैं, ज्ञान बाँटते हैं। 'तुष्यन्ति च रमन्ति च' — वे संतुष्ट भी रहते हैं और आनंदित भी। यह श्लोक सच्चे भक्तों के जीवन का सुंदर चित्र प्रस्तुत करता है — उनका आपसी संवाद, उनकी तृप्ति और उनका प्रेम सब ईश्वर-केंद्रित होता है।
आज के जीवन में: जो लोग ईश्वर की चर्चा और स्मरण में एक-दूसरे का साथ देते हैं, उनके जीवन में एक गहरी संतुष्टि और आनंद बना रहता है।
श्लोक 10.10
वक्ता: श्रीकृष्ण
तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम्।
ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते ॥10.10॥
teṣhāṁ satata-yuktānāṁ bhajatāṁ prīti-pūrvakam / dadāmi buddhi-yogaṁ taṁ yena mām upayānti te
हिंदी अनुवाद: जो भक्त निरंतर मुझमें लगे रहते हैं और प्रेमपूर्वक मेरा भजन करते हैं, उन्हें मैं वह बुद्धियोग देता हूँ जिससे वे मुझे प्राप्त होते हैं।
भावार्थ: 'सततयुक्तानाम्' अर्थात् जो निरंतर मुझसे जुड़े हैं। 'प्रीतिपूर्वकम्' अर्थात् प्रेम के साथ। 'बुद्धियोगम्' — वह विवेक और समझ जो साधक को सीधे परमात्मा तक पहुँचाती है। यहाँ श्रीकृष्ण एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण बात कहते हैं — वे स्वयं अपने प्रेमी भक्तों को वह बुद्धि प्रदान करते हैं जिससे उन्हें परमात्मा की प्राप्ति होती है। यह ईश्वर की कृपा का सबसे सुंदर रूप है।
आज के जीवन में: जो प्रेम और निष्ठा से ईश्वर की ओर बढ़ता है, उसे मार्ग दिखाने की जिम्मेदारी स्वयं ईश्वर उठा लेते हैं।
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