भगवद्गीता

भगवद्गीता अध्याय 11, श्लोक 31–40 | विश्वरूपदर्शनयोग | अर्थ सहित

6 अक्तूबर 2026·8 मिनट में पढ़ें
भगवद्गीता अध्याय 11, श्लोक 31–40 | विश्वरूपदर्शनयोग | अर्थ सहित

अर्जुन ने भगवान का विश्वरूप देखा और उस भयंकर रूप को देखकर वे भयभीत हो गए। अब वे उस उग्र रूप का परिचय जानना चाहते हैं। इस खंड में भगवान स्वयं को 'काल' बताते हैं और अर्जुन को केवल निमित्त बनकर युद्ध करने की आज्ञा देते हैं; इसके बाद अर्जुन भय और भक्ति से भरकर भगवान की स्तुति करते हैं।

श्लोक 11.31

वक्ता: अर्जुन

आख्याहि मे को भवानुग्ररूपो नमोऽस्तु ते देववर प्रसीद।
विज्ञातुमिच्छामि भवन्तमाद्यं न हि प्रजानामि तव प्रवृत्तिम् ॥11.31॥

ākhyāhi me ko bhavān ugra-rūpo / namo ’stu te deva-vara prasīda / vijñātum ichchhāmi bhavantam ādyaṁ / na hi prajānāmi tava pravṛittim

हिंदी अनुवाद: अर्जुन बोले — हे देवताओं में श्रेष्ठ! आप मुझे बताइए कि यह उग्र रूप धारण किए हुए आप कौन हैं? आपको नमस्कार है, प्रसन्न होइए। मैं आपको — जो सबसे पहले हैं — तत्त्व से जानना चाहता हूँ, क्योंकि आपकी प्रवृत्ति को मैं नहीं जानता।

भावार्थ: विश्वरूप के भयंकर दर्शन से अर्जुन का मन व्याकुल हो गया है। वे हाथ जोड़कर, नम्रता से पूछते हैं — 'आप कौन हैं?' 'आद्यं' अर्थात् सबसे पहले विद्यमान, मूल सत्ता। 'प्रवृत्तिम्' अर्थात् आपका यह कार्य — यह संहार — किस उद्देश्य से हो रहा है, यह मैं नहीं समझ पा रहा। अर्जुन की यह जिज्ञासा भय और श्रद्धा दोनों से उत्पन्न है।

आज के जीवन में: जब जीवन में कोई बड़ी घटना समझ से परे हो, तो विनम्रता से जानने की इच्छा रखना ही बुद्धिमानी है।


श्लोक 11.32

वक्ता: श्रीकृष्ण

कालोऽस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धो लोकान्समाहर्तुमिह प्रवृत्तः।
ऋतेऽपि त्वां न भविष्यन्ति सर्वे येऽवस्थिताः प्रत्यनीकेषु योधाः ॥11.32॥

śhrī-bhagavān uvācha / kālo ’smi loka-kṣhaya-kṛit pravṛiddho / lokān samāhartum iha pravṛittaḥ / ṛite ’pi tvāṁ na bhaviṣhyanti sarve / ye ’vasthitāḥ pratyanīkeṣhu yodhāḥ

हिंदी अनुवाद: भगवान बोले — मैं संपूर्ण लोकों का नाश करने वाला प्रबल काल हूँ और इस समय इन सब लोगों का संहार करने के लिए यहाँ प्रवृत्त हुआ हूँ। तुम्हारे युद्ध किए बिना भी, सामने खड़े ये सभी योद्धा जीवित नहीं रहेंगे।

भावार्थ: भगवान अपना परिचय देते हैं — 'कालोऽस्मि' अर्थात् मैं काल हूँ। 'काल' यहाँ केवल समय नहीं, बल्कि वह शक्ति है जो सृष्टि का अंत करती है। वे स्पष्ट करते हैं कि यह संहार उनकी इच्छा से पहले से निश्चित है। अर्जुन के लड़ने या न लड़ने से इन योद्धाओं का भाग्य नहीं बदलेगा। यह वचन अर्जुन के मन से कर्तापन का भ्रम हटाने के लिए है।

आज के जीवन में: जो होना निश्चित है, उसमें अपने को एकमात्र कारण मानने का अहंकार छोड़ना ही सच्ची समझ है।


श्लोक 11.33

वक्ता: श्रीकृष्ण

तस्मात्त्वमुत्तिष्ठ यशो लभस्व जित्वा शत्रून् भुङ्क्ष्व राज्यं समृद्धम्।
मयैवैते निहताः पूर्वमेव निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन् ॥11.33॥

tasmāt tvam uttiṣhṭha yaśho labhasva / jitvā śhatrūn bhuṅkṣhva rājyaṁ samṛiddham / mayaivaite nihatāḥ pūrvam eva / nimitta-mātraṁ bhava savya-sāchin

हिंदी अनुवाद: इसलिए तुम उठो, यश प्राप्त करो, शत्रुओं को जीतकर समृद्ध राज्य का उपभोग करो। ये सब मेरे द्वारा पहले से ही मारे जा चुके हैं — हे सव्यसाचिन्! तुम केवल निमित्त बन जाओ।

भावार्थ: भगवान अर्जुन को कर्म की ओर प्रेरित करते हैं। 'सव्यसाचिन्' अर्थात् दोनों हाथों से बाण चलाने में निपुण — यह अर्जुन का विशेष नाम है। 'निमित्तमात्रम्' — केवल साधन। भगवान कहते हैं कि तुम्हारा कर्तव्य है युद्ध करना, परंतु फल और परिणाम मेरे हाथ में हैं। यह संदेश निष्काम कर्म का सार है।

आज के जीवन में: अपना कर्तव्य पूरी शक्ति से निभाओ, परंतु फल का अहंकार मत पालो — यही निमित्त भाव है।


श्लोक 11.34

वक्ता: श्रीकृष्ण

द्रोणं च भीष्मं च जयद्रथं च कर्णं तथाऽन्यानपि योधवीरान्।
मया हतांस्त्वं जहि मा व्यथिष्ठा युध्यस्व जेतासि रणे सपत्नान् ॥11.34॥

droṇaṁ cha bhīṣhmaṁ cha jayadrathaṁ cha / karṇaṁ tathānyān api yodha-vīrān / mayā hatāṁs tvaṁ jahi mā vyathiṣhṭhā / yudhyasva jetāsi raṇe sapatnān

हिंदी अनुवाद: द्रोण, भीष्म, जयद्रथ, कर्ण और अन्य शूरवीर योद्धा — ये सब मेरे द्वारा पहले से मारे जा चुके हैं; तुम इन्हें मारो। व्यथित मत होओ, युद्ध करो — रण में तुम निश्चय ही शत्रुओं को जीतोगे।

भावार्थ: भगवान अर्जुन के मन में जो संकोच है — कि मैं अपने गुरु और पितामह को कैसे मारूँ — उसे दूर करते हैं। वे कहते हैं कि ये योद्धा वास्तव में मेरे द्वारा पहले से ही समाप्त हो चुके हैं। 'मा व्यथिष्ठाः' — व्यथित मत हो। यह आश्वासन अर्जुन को कर्म की ओर दृढ़ता से खड़ा करने के लिए है।

आज के जीवन में: जब कर्तव्य स्पष्ट हो, तो भावनात्मक संकोच को परे रखकर दृढ़ता से आगे बढ़ना चाहिए।


श्लोक 11.35

वक्ता: संजय

एतच्छ्रुत्वा वचनं केशवस्य कृताञ्जलिर्वेपमानः किरीटी।
नमस्कृत्वा भूय एवाह कृष्णं सगद्गदं भीतभीतः प्रणम्य ॥11.35॥

sañjaya uvācha / etach chhrutvā vachanaṁ keśhavasya / kṛitāñjalir vepamānaḥ kirīṭī / namaskṛitvā bhūya evāha kṛiṣhṇaṁ / sa-gadgadaṁ bhīta-bhītaḥ praṇamya

हिंदी अनुवाद: संजय बोले — भगवान केशव का यह वचन सुनकर, भय से काँपते हुए अर्जुन ने हाथ जोड़कर नमस्कार किया और अत्यंत भयभीत होकर पुनः प्रणाम करके गद्गद वाणी से भगवान कृष्ण से बोले।

भावार्थ: यह श्लोक संजय का वर्णन है। 'किरीटी' अर्थात् मुकुटधारी — अर्जुन का एक नाम। 'गद्गदम्' अर्थात् भावावेश से रुकी हुई, काँपती वाणी। भगवान के काल-स्वरूप के वचन सुनकर अर्जुन इतने अभिभूत हो गए कि वे बार-बार प्रणाम करते हैं। यह दृश्य भक्त के हृदय की उस अवस्था को दर्शाता है जहाँ भय और श्रद्धा एक साथ उमड़ते हैं।


श्लोक 11.36

वक्ता: अर्जुन

स्थाने हृषीकेश तव प्रकीर्त्या जगत् प्रहृष्यत्यनुरज्यते च।
रक्षांसि भीतानि दिशो द्रवन्ति सर्वे नमस्यन्ति च सिद्धसङ्घाः ॥11.36॥

arjuna uvācha / sthāne hṛiṣhīkeśha tava prakīrtyā / jagat prahṛiṣhyaty anurajyate cha / rakṣhānsi bhītāni diśho dravanti / sarve namasyanti cha siddha-saṅghāḥ

हिंदी अनुवाद: अर्जुन बोले — हे हृषीकेश! आपके नाम और गुणों के कीर्तन से यह संपूर्ण जगत् हर्षित होता है और प्रेम को प्राप्त होता है। राक्षस भयभीत होकर दसों दिशाओं में भाग रहे हैं और समस्त सिद्धगण आपको नमस्कार कर रहे हैं — यह सब उचित ही है।

भावार्थ: अर्जुन की स्तुति आरंभ होती है। 'हृषीकेश' अर्थात् इंद्रियों के स्वामी। वे कहते हैं कि आपकी महिमा के गान से जगत् में आनंद और प्रेम उत्पन्न होता है, जबकि दुष्ट शक्तियाँ भयभीत होकर पलायन करती हैं। सिद्धगण — जो आत्म-साधना में पूर्ण हैं — वे भी आपको नमन करते हैं। यह स्वाभाविक ही है, क्योंकि आप सबके मूल हैं।

आज के जीवन में: जो सत्य और शुभ है, उसकी महिमा से संसार में आनंद फैलता है और अशुभ स्वयं पीछे हट जाता है।


श्लोक 11.37

वक्ता: अर्जुन

कस्माच्च ते न नमेरन्महात्मन् गरीयसे ब्रह्मणोऽप्यादिकर्त्रे।
अनन्त देवेश जगन्निवास त्वमक्षरं सदसत्तत्परं यत् ॥11.37॥

kasmāch cha te na nameran mahātman / garīyase brahmaṇo ’py ādi-kartre / ananta deveśha jagan-nivāsa / tvam akṣharaṁ sad-asat tat paraṁ yat

हिंदी अनुवाद: हे महात्मन्! ये सिद्धगण आपको नमस्कार क्यों न करें — आप गुरुओं के भी गुरु और ब्रह्मा के भी आदिकर्ता हैं। हे अनंत! हे देवेश! हे जगन्निवास! आप अक्षर हैं, सत् भी हैं, असत् भी हैं, और उन दोनों से परे जो कुछ है, वह भी आप ही हैं।

भावार्थ: 'गरीयसे' अर्थात् सबसे श्रेष्ठ। 'आदिकर्त्रे' — ब्रह्मा को भी जिसने रचा। 'अक्षरम्' — जो कभी नष्ट नहीं होता। 'सत्' — जो प्रकट है, 'असत्' — जो अप्रकट है, और उन दोनों से परे जो परम तत्त्व है — वह भी आप ही हैं। अर्जुन यहाँ भगवान की सर्वोच्चता और सर्वव्यापकता को शब्दों में व्यक्त करने का प्रयास कर रहे हैं।

आज के जीवन में: जो सत्ता सब कुछ में व्याप्त है और सबसे परे भी है, उसके प्रति श्रद्धा रखना ही सच्ची भक्ति है।


श्लोक 11.38

वक्ता: अर्जुन

त्वमादिदेवः पुरुषः पुराण स्त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम्।
वेत्तासि वेद्यं च परं च धाम त्वया ततं विश्वमनन्तरूप ॥11.38॥

tvam ādi-devaḥ puruṣhaḥ purāṇas / tvam asya viśhvasya paraṁ nidhānam / vettāsi vedyaṁ cha paraṁ cha dhāma / tvayā tataṁ viśhvam ananta-rūpa

हिंदी अनुवाद: आप ही आदिदेव और पुराणपुरुष हैं, आप ही इस संसार के परम आश्रय हैं। आप ही जाननेवाले, जानने योग्य और परमधाम हैं। हे अनंतरूप! आपसे ही यह सारा संसार व्याप्त है।

भावार्थ: 'आदिदेव' — सबसे पहले का देव। 'पुराणपुरुष' — अनादि काल से विद्यमान। 'परं निधानम्' — परम आश्रय, जहाँ सब कुछ टिका है। 'वेत्ता' — जाननेवाले, 'वेद्यम्' — जो जाना जाना चाहिए। अर्जुन कह रहे हैं कि ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेय — तीनों आप ही हैं। यह संपूर्ण सृष्टि आपसे व्याप्त है और आप ही इसके अंतिम आश्रय हैं।

आज के जीवन में: जो सत्ता सब कुछ को जानती है, सब कुछ में व्याप्त है और सबका आधार है, उसी में शरण लेना सबसे बड़ा सहारा है।


श्लोक 11.39

वक्ता: अर्जुन

वायुर्यमोऽग्निर्वरुणः शशाङ्कः प्रजापतिस्त्वं प्रपितामहश्च।
नमो नमस्तेऽस्तु सहस्रकृत्वः पुनश्च भूयोऽपि नमो नमस्ते ॥11.39॥

vāyur yamo ’gnir varuṇaḥ śhaśhāṅkaḥ / prajāpatis tvaṁ prapitāmahaśh cha / namo namas te ’stu sahasra-kṛitvaḥ / punaśh cha bhūyo ’pi namo namas te

हिंदी अनुवाद: आप ही वायु, यमराज, अग्नि, वरुण, चंद्रमा, प्रजापति और प्रपितामह हैं। आपको हजारों बार नमस्कार हो! नमस्कार हो! और फिर भी बार-बार आपको नमस्कार हो! नमस्कार हो!

भावार्थ: अर्जुन यहाँ विभिन्न देवताओं के नाम लेकर कह रहे हैं कि ये सब आप ही के रूप हैं। वायु, यम, अग्नि, वरुण, चंद्रमा — ये सभी प्रकृति की शक्तियाँ हैं। 'प्रपितामह' — ब्रह्मा के भी पिता। 'सहस्रकृत्वः' — हजारों बार। अर्जुन के शब्दों में बार-बार नमस्कार की पुनरावृत्ति उनके हृदय की गहरी श्रद्धा और विनम्रता को व्यक्त करती है।


श्लोक 11.40

वक्ता: अर्जुन

नमः पुरस्तादथ पृष्ठतस्ते नमोऽस्तु ते सर्वत एव सर्व।
अनन्तवीर्यामितविक्रमस्त्वं सर्वं समाप्नोषि ततोऽसि सर्वः ॥11.40॥

namaḥ purastād atha pṛiṣhṭhatas te / namo ’stu te sarvata eva sarva / ananta-vīryāmita-vikramas tvaṁ / sarvaṁ samāpnoṣhi tato ’si sarvaḥ

हिंदी अनुवाद: हे सर्व! आपको आगे से भी नमस्कार हो, पीछे से भी नमस्कार हो, और सब ओर से नमस्कार हो। हे अनंत वीर्यवान! हे अमित पराक्रमी! आपने सब कुछ को समावृत कर रखा है, इसलिए आप ही सब कुछ हैं।

भावार्थ: 'सर्व' — जो स्वयं ही सब कुछ है। 'अनंतवीर्य' — जिसकी शक्ति का कोई अंत नहीं। 'अमितविक्रम' — जिसका पराक्रम असीमित है। 'सर्वं समाप्नोषि' — आप सब कुछ को व्याप्त करते हैं। अर्जुन चारों दिशाओं से नमस्कार करके यह स्वीकार कर रहे हैं कि भगवान किसी एक दिशा में नहीं, सर्वत्र हैं। इसीलिए वे 'सर्वः' — सब कुछ — हैं।

आज के जीवन में: जो शक्ति सब दिशाओं में, सब रूपों में व्याप्त है, उसके प्रति सच्ची श्रद्धा दिशा और स्थान की सीमा नहीं मानती।


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