भगवद्गीता

भगवद्गीता अध्याय 11, श्लोक 41–50 | विश्वरूपदर्शनयोग | अर्थ सहित

6 अक्तूबर 2026·9 मिनट में पढ़ें
भगवद्गीता अध्याय 11, श्लोक 41–50 | विश्वरूपदर्शनयोग | अर्थ सहित

अर्जुन ने भगवान का विराट विश्वरूप देखा और उसकी भव्यता से अभिभूत हो गए। अब वे उस असीम रूप के सामने अपनी पुरानी सखा-भाव की बोलचाल के लिए क्षमा माँगते हैं, भगवान की महानता स्वीकार करते हैं और अंत में उनसे अपना परिचित सौम्य रूप धारण करने की विनती करते हैं। भगवान उनकी प्रार्थना सुनकर पुनः अपने द्विभुज रूप में आ जाते हैं और अर्जुन को आश्वस्त करते हैं।

श्लोक 11.41

वक्ता: अर्जुन

सखेति मत्वा प्रसभं यदुक्तं हे कृष्ण हे यादव हे सखेति।
अजानता महिमानं तवेदं मया प्रमादात्प्रणयेन वापि ॥11.41॥

sakheti matvā prasabhaṁ yad uktaṁ / he kṛiṣhṇa he yādava he sakheti / ajānatā mahimānaṁ tavedaṁ / mayā pramādāt praṇayena vāpi

हिंदी अनुवाद: आपकी महिमा को न जानते हुए, आपको केवल अपना मित्र समझकर, मैंने प्रमाद से अथवा प्रेम के आवेश में 'हे कृष्ण! हे यादव! हे सखे!' इस प्रकार जो कुछ बिना सोचे-समझे कहा है — वह सब मेरी भूल थी।

भावार्थ: विश्वरूप देखने के बाद अर्जुन को गहरा बोध होता है कि जिन्हें वे साधारण मित्र की भाँति पुकारते रहे, वे वास्तव में समस्त सृष्टि के स्वामी हैं। 'प्रमादात्' अर्थात् असावधानी से और 'प्रणयेन' अर्थात् प्रेम के कारण — दोनों भावों से उन्होंने जो अनौपचारिक संबोधन किए, उनके लिए वे अब विनम्रतापूर्वक क्षमा माँगते हैं। यह श्लोक भक्त के हृदय में उठने वाले उस पश्चाताप को दर्शाता है जो सत्य के साक्षात्कार के बाद स्वाभाविक रूप से आता है।

आज के जीवन में: जब किसी महान व्यक्ति या सिद्धांत की वास्तविक गहराई समझ में आए, तो पहले की अज्ञानता को विनम्रतापूर्वक स्वीकार करना ही सच्ची परिपक्वता है।


श्लोक 11.42

वक्ता: अर्जुन

यच्चावहासार्थमसत्कृतोऽसि विहारशय्यासनभोजनेषु।
एकोऽथवाप्यच्युत तत्समक्षं तत्क्षामये त्वामहमप्रमेयम् ॥11.42॥

yach chāvahāsārtham asat-kṛito ’si / vihāra-śhayyāsana-bhojaneṣhu / eko ’tha vāpy achyuta tat-samakṣhaṁ / tat kṣhāmaye tvām aham aprameyam

हिंदी अनुवाद: हे अच्युत! हँसी-मज़ाक में, चलते-फिरते, सोते-जागते, बैठते-उठते और खाते-पीते समय — अकेले में या अन्य सखाओं और परिजनों के सामने — आपका जो भी अपमान हुआ हो, उन सबके लिए मैं आपसे, जो अप्रमेय हैं, क्षमा माँगता हूँ।

भावार्थ: इस श्लोक में अर्जुन उन सभी अवसरों का स्मरण करते हैं जब दैनिक जीवन की सहजता में उन्होंने भगवान के साथ मित्रवत व्यवहार किया। 'अच्युत' अर्थात् जो कभी च्युत नहीं होते, और 'अप्रमेयम्' अर्थात् जिनकी महिमा को मापा न जा सके — ऐसे परमेश्वर से वे क्षमा की याचना करते हैं। यह क्षमा-याचना भक्त की उस विनम्रता का प्रतीक है जो परमसत्य के दर्शन के बाद उत्पन्न होती है।

आज के जीवन में: जिनसे हम निकट हैं, उनके प्रति भी सम्मान और संवेदनशीलता बनाए रखना आवश्यक है; निकटता कभी असम्मान का कारण नहीं बननी चाहिए।


श्लोक 11.43

वक्ता: अर्जुन

पितासि लोकस्य चराचरस्य त्वमस्य पूज्यश्च गुरुर्गरीयान्।
न त्वत्समोऽस्त्यभ्यधिकः कुतोऽन्यो लोकत्रयेऽप्यप्रतिमप्रभाव ॥11.43॥

pitāsi lokasya charācharasya / tvam asya pūjyaśh cha gurur garīyān / na tvat-samo ’sty abhyadhikaḥ kuto ’nyo / loka-traye ’py apratima-prabhāva

हिंदी अनुवाद: आप इस समस्त चराचर जगत के पिता हैं, पूजनीय हैं और सभी गुरुओं के भी महान गुरु हैं। हे अनन्त प्रभाव वाले भगवन्! तीनों लोकों में आपके समान भी कोई नहीं है, फिर आपसे बढ़कर कोई हो — यह तो संभव ही नहीं।

भावार्थ: अर्जुन यहाँ भगवान की तीन विशेषताएँ स्वीकार करते हैं — वे समस्त सृष्टि के पिता हैं, पूजनीय हैं और सर्वश्रेष्ठ गुरु हैं। 'गुरुर्गरीयान्' अर्थात् गुरुओं में भी जो सबसे बड़े हैं। 'अप्रतिमप्रभाव' अर्थात् जिनका प्रभाव अतुलनीय है। जब कोई समान ही नहीं, तो श्रेष्ठ होने का प्रश्न ही नहीं उठता — इस तर्क से अर्जुन भगवान की परम अद्वितीयता को स्वीकार करते हैं।

आज के जीवन में: जो वास्तव में महान है उसकी महानता को खुले हृदय से स्वीकार करना, अहंकार को छोड़ने की पहली सीढ़ी है।


श्लोक 11.44

वक्ता: अर्जुन

तस्मात्प्रणम्य प्रणिधाय कायं प्रसादये त्वामहमीशमीड्यम्।
पितेव पुत्रस्य सखेव सख्युः प्रियः प्रियायार्हसि देव सोढुम् ॥11.44॥

tasmāt praṇamya praṇidhāya kāyaṁ / prasādaye tvām aham īśham īḍyam / piteva putrasya sakheva sakhyuḥ / priyaḥ priyāyārhasi deva soḍhum

हिंदी अनुवाद: इसलिए मैं साष्टांग प्रणाम करके, स्तुति के योग्य आप ईश्वर को प्रसन्न करना चाहता हूँ। हे देव! जैसे पिता पुत्र की भूल सह लेता है, मित्र मित्र की और पति प्रिया की — वैसे ही आप मेरे अपराध को क्षमा करने में समर्थ हैं।

भावार्थ: अर्जुन यहाँ तीन सुंदर उपमाएँ देते हैं — पिता-पुत्र, मित्र-मित्र और पति-पत्नी का संबंध। इन तीनों में प्रेम के कारण अपराध क्षमा हो जाता है। अर्जुन कह रहे हैं कि उनका और भगवान का संबंध भी ऐसे ही प्रेम पर आधारित है। 'प्रणिधाय कायम्' अर्थात् शरीर को पूरी तरह झुकाकर — यह पूर्ण समर्पण का भाव है। क्षमा माँगने में जो विनम्रता है, वही भक्ति की आत्मा है।

आज के जीवन में: सच्चे प्रेम में क्षमा स्वाभाविक होती है; जहाँ निष्कपट संबंध हो, वहाँ भूल स्वीकार करना संबंध को और गहरा बनाता है।


श्लोक 11.45

वक्ता: अर्जुन

अदृष्टपूर्वं हृषितोऽस्मि दृष्ट्वा भयेन च प्रव्यथितं मनो मे।
तदेव मे दर्शय देव रूपं प्रसीद देवेश जगन्निवास ॥11.45॥

adṛiṣhṭa-pūrvaṁ hṛiṣhito ’smi dṛiṣhṭvā / bhayena cha pravyathitaṁ mano me / tad eva me darśhaya deva rūpaṁ / prasīda deveśha jagan-nivāsa

हिंदी अनुवाद: पहले कभी न देखा गया यह रूप देखकर मैं हर्षित भी हूँ और साथ ही भय से मेरा मन अत्यंत व्यथित भी है। इसलिए हे देवेश! हे जगन्निवास! आप प्रसन्न होइए और मुझे अपना वही परिचित सौम्य रूप दिखाइए।

भावार्थ: अर्जुन के मन में एक साथ दो भाव हैं — हर्ष और भय। विराट रूप का दर्शन अलौकिक आनंद देता है, किंतु उसकी भव्यता और घोरता मन को व्यथित भी करती है। 'देवेश' अर्थात् देवों के ईश्वर, 'जगन्निवास' अर्थात् जगत में निवास करने वाले — इन संबोधनों से अर्जुन भगवान की व्यापकता स्वीकार करते हुए उनसे अपने परिचित, मनोहर रूप में लौटने की प्रार्थना करते हैं।

आज के जीवन में: परमसत्य का साक्षात्कार मन को विस्मय और विनम्रता दोनों से भर देता है; ऐसे क्षण में भगवान से शरण माँगना स्वाभाविक है।


श्लोक 11.46

वक्ता: अर्जुन

किरीटिनं गदिनं चक्रहस्त मिच्छामि त्वां द्रष्टुमहं तथैव।
तेनैव रूपेण चतुर्भुजेन सहस्रबाहो भव विश्वमूर्ते ॥11.46॥

kirīṭinaṁ gadinaṁ chakra-hastam / ichchhāmi tvāṁ draṣhṭum ahaṁ tathaiva / tenaiva rūpeṇa chatur-bhujena / sahasra-bāho bhava viśhva-mūrte

हिंदी अनुवाद: मैं आपको वैसे ही किरीट धारण किए, गदा लिए और हाथ में चक्र लिए हुए देखना चाहता हूँ। हे सहस्रबाहो! हे विश्वमूर्ते! आप उसी चतुर्भुज रूप में हो जाइए।

भावार्थ: अर्जुन भगवान के उस परिचित चतुर्भुज रूप की याचना करते हैं जिसमें वे किरीट (मुकुट), गदा और चक्र धारण करते हैं। 'सहस्रबाहो' अर्थात् हज़ार भुजाओं वाले — यह विश्वरूप का संबोधन है, और 'विश्वमूर्ते' अर्थात् जिनका रूप ही विश्व है। इन्हीं संबोधनों के साथ वे विनती करते हैं कि अब उस असीम रूप को समेटकर अपने सुपरिचित, सौम्य चतुर्भुज रूप में आ जाएँ।


श्लोक 11.47

वक्ता: श्रीकृष्ण

मया प्रसन्नेन तवार्जुनेदं रूपं परं दर्शितमात्मयोगात्।
तेजोमयं विश्वमनन्तमाद्यं यन्मे त्वदन्येन न दृष्टपूर्वम् ॥11.47॥

śhrī-bhagavān uvācha / mayā prasannena tavārjunedaṁ / rūpaṁ paraṁ darśhitam ātma-yogāt / tejo-mayaṁ viśhvam anantam ādyaṁ / yan me tvad anyena na dṛiṣhṭa-pūrvam

हिंदी अनुवाद: श्रीभगवान बोले — हे अर्जुन! मैंने प्रसन्न होकर अपनी योगशक्ति से यह परम तेजोमय, अनादि और अनंत विश्वरूप तुम्हें दिखाया है, जिसे तुम्हारे अतिरिक्त पहले किसी ने नहीं देखा था।

भावार्थ: भगवान अब स्वयं स्पष्ट करते हैं कि यह विश्वरूप-दर्शन उनकी कृपा और 'आत्मयोग' — अर्थात् अपनी दिव्य योगशक्ति — का परिणाम था। यह रूप 'तेजोमयम्' अर्थात् प्रकाश से परिपूर्ण, 'आद्यम्' अर्थात् सबसे पहले का और 'अनन्तम्' अर्थात् जिसका कोई अंत नहीं — ऐसा है। भगवान यह भी बताते हैं कि यह दर्शन अर्जुन के लिए विशेष था, यह सामान्य रूप से उपलब्ध नहीं।

आज के जीवन में: परमसत्य का साक्षात्कार केवल बाहरी साधनों से नहीं, बल्कि ईश्वर की कृपा और प्रसन्नता से ही संभव होता है।


श्लोक 11.48

वक्ता: श्रीकृष्ण

न वेदयज्ञाध्ययनैर्न दानै र्न च क्रियाभिर्न तपोभिरुग्रैः।
एवंरूपः शक्य अहं नृलोके द्रष्टुं त्वदन्येन कुरुप्रवीर ॥11.48॥

na veda-yajñādhyayanair na dānair / na cha kriyābhir na tapobhir ugraiḥ / evaṁ-rūpaḥ śhakya ahaṁ nṛi-loke / draṣhṭuṁ tvad anyena kuru-pravīra

हिंदी अनुवाद: हे कुरुप्रवीर! इस मनुष्यलोक में वेदों के अध्ययन से, यज्ञों से, दान से, कठोर तपस्या से और न ही केवल कर्मकांड से — तुम्हारे अतिरिक्त किसी अन्य के द्वारा मुझे इस विश्वरूप में देखा जाना संभव नहीं है।

भावार्थ: भगवान यहाँ एक महत्त्वपूर्ण बात कहते हैं — वेद-पाठ, यज्ञ, दान और कठोर तप जैसे बाह्य साधन इस विश्वरूप के दर्शन के लिए पर्याप्त नहीं हैं। 'कुरुप्रवीर' अर्थात् कुरुवंश के श्रेष्ठ वीर। यह दर्शन अर्जुन को उनकी विशेष पात्रता और भगवान की कृपा के कारण मिला। इससे यह स्पष्ट होता है कि ईश्वर का साक्षात्कार केवल अनुष्ठानों से नहीं, बल्कि भक्ति और कृपा से होता है।

आज के जीवन में: ईश्वर की अनुभूति केवल बाहरी धार्मिक कर्मकांडों से नहीं, बल्कि हृदय की सच्ची भक्ति और समर्पण से होती है।


श्लोक 11.49

वक्ता: श्रीकृष्ण

मा ते व्यथा मा च विमूढभावो दृष्ट्वा रूपं घोरमीदृङ्ममेदम्।
व्यपेतभीः प्रीतमनाः पुनस्त्वं तदेव मे रूपमिदं प्रपश्य ॥11.49॥

mā te vyathā mā cha vimūḍha-bhāvo / dṛiṣhṭvā rūpaṁ ghoram īdṛiṅ mamedam / vyapeta-bhīḥ prīta-manāḥ punas tvaṁ / tad eva me rūpam idaṁ prapaśhya

हिंदी अनुवाद: मेरा यह घोर रूप देखकर तुम्हें न व्यथित होना चाहिए और न ही मोहग्रस्त। अब निर्भय और प्रसन्न मन से तुम फिर से मेरे उसी परिचित रूप को देखो।

भावार्थ: भगवान अर्जुन को सांत्वना देते हैं। 'व्यथा' अर्थात् मन की पीड़ा और 'विमूढभाव' अर्थात् मोह या भ्रम — इन दोनों से मुक्त होने को कहते हैं। 'व्यपेतभीः' अर्थात् जिसका भय दूर हो गया हो — ऐसे निर्भय मन से वे अर्जुन को अपना सौम्य रूप देखने के लिए आमंत्रित करते हैं। यह भगवान की करुणा है कि वे अपने भक्त की व्याकुलता को समझकर उसे आश्वस्त करते हैं।

आज के जीवन में: जब जीवन में कोई भारी अनुभव मन को भयभीत कर दे, तो ईश्वर की करुणा पर भरोसा रखने से मन को शांति और स्थिरता मिलती है।


श्लोक 11.50

वक्ता: संजय

इत्यर्जुनं वासुदेवस्तथोक्त्वा स्वकं रूपं दर्शयामास भूयः।
आश्वासयामास च भीतमेनं भूत्वा पुनः सौम्यवपुर्महात्मा ॥11.50॥

sañjaya uvācha / ity arjunaṁ vāsudevas tathoktvā / svakaṁ rūpaṁ darśhayām āsa bhūyaḥ / āśhvāsayām āsa cha bhītam enaṁ / bhūtvā punaḥ saumya-vapur mahātmā

हिंदी अनुवाद: संजय बोले — वासुदेव भगवान ने अर्जुन से ऐसा कहकर पुनः अपना वही परिचित रूप प्रकट किया। महात्मा श्रीकृष्ण ने अपना सौम्य द्विभुज रूप धारण करके भयभीत अर्जुन को आश्वस्त किया।

भावार्थ: संजय धृतराष्ट्र को बताते हैं कि भगवान ने अपनी बात पूरी करके विश्वरूप को समेट लिया और पुनः अपने सामान्य, सौम्य रूप में आ गए। 'सौम्यवपुः' अर्थात् शांत और मनोहर शरीर वाले। 'महात्मा' अर्थात् महान आत्मा। भगवान का यह कार्य उनकी करुणा को दर्शाता है — उन्होंने अर्जुन की भावना को समझा और उनके भय को दूर करने के लिए अपना परिचित रूप धारण किया।


आगे पढ़िए

← पिछला भाग: अध्याय 11, श्लोक 31–40

अगला भाग: अध्याय 11, श्लोक 51–55 →

पूरी भगवद्गीता, अध्याय-वार

भगवद्गीताअध्याय 11विश्वरूपदर्शनयोगश्लोक अर्थगीता हिंदी

मन में कुछ भारी लग रहा है?

अपनी बात कृष्ण से कहिए — बिना किसी फ़ैसले के, बस एक सच्ची बातचीत। शुरुआत मुफ़्त।

कृष्ण से बात करें →