भगवद्गीता

भगवद्गीता अध्याय 11, श्लोक 51–55 | विश्वरूपदर्शनयोग | अर्थ सहित

6 अक्तूबर 2026·4 मिनट में पढ़ें
भगवद्गीता अध्याय 11, श्लोक 51–55 | विश्वरूपदर्शनयोग | अर्थ सहित

अध्याय ११ में श्रीकृष्ण ने अर्जुन को अपना विराट विश्वरूप दिखाया, जिसे देखकर अर्जुन भयभीत हो गए और उन्होंने पुनः सौम्य मानव रूप के दर्शन की प्रार्थना की। श्रीकृष्ण ने अपना चतुर्भुज और फिर द्विभुज मनुष्य रूप प्रकट किया। इस अंतिम खंड में अर्जुन चित्त की शांति पाते हैं और श्रीकृष्ण भक्ति की सर्वोच्चता तथा भक्त के लक्षण बताते हुए अध्याय का समापन करते हैं।

श्लोक 11.51

वक्ता: अर्जुन

दृष्ट्वेदं मानुषं रूपं तवसौम्यं जनार्दन।
इदानीमस्मि संवृत्तः सचेताः प्रकृतिं गतः ॥11.51॥

arjuna uvācha / dṛiṣhṭvedaṁ mānuṣhaṁ rūpaṁ tava saumyaṁ janārdana / idānīm asmi saṁvṛittaḥ sa-chetāḥ prakṛitiṁ gataḥ

हिंदी अनुवाद: अर्जुन बोले — हे जनार्दन! आपके इस सौम्य मनुष्य रूप को देखकर अब मेरा चित्त स्थिर हो गया है और मैं अपनी स्वाभाविक अवस्था को प्राप्त हो गया हूँ।

भावार्थ: विराट विश्वरूप के भयावह दर्शन के बाद अर्जुन का मन अत्यंत व्याकुल हो गया था। जब श्रीकृष्ण ने पुनः अपना परिचित, शांत मानव रूप धारण किया, तब अर्जुन को राहत मिली। 'सौम्यम्' अर्थात् कोमल और शांत रूप को देखकर उनका चित्त ठहर गया। 'प्रकृतिं गतः' का अर्थ है — अपनी स्वाभाविक स्थिति में लौट आना। यह मानवीय स्वभाव का सहज चित्रण है कि असीम और अपार को देखकर मन विचलित हो जाता है और परिचित रूप में शांति मिलती है।

आज के जीवन में: जब जीवन में कोई अत्यंत विशाल या कठिन अनुभव मन को विचलित कर दे, तो प्रिय और परिचित आश्रय में लौटकर चित्त को स्थिर करना स्वाभाविक और उचित है।


श्लोक 11.52

वक्ता: श्रीकृष्ण

सुदुर्दर्शमिदं रूपं दृष्टवानसि यन्मम।
देवा अप्यस्य रूपस्य नित्यं दर्शनकाङ्क्षिणः ॥11.52॥

śhrī-bhagavān uvācha / su-durdarśham idaṁ rūpaṁ dṛiṣhṭavān asi yan mama / devā apy asya rūpasya nityaṁ darśhana-kāṅkṣhiṇaḥ

हिंदी अनुवाद: श्रीभगवान् बोले — मेरा यह रूप जो तुमने देखा है, इसके दर्शन अत्यंत दुर्लभ हैं; देवता भी इस रूप को देखने के लिए सदा लालायित रहते हैं।

भावार्थ: श्रीकृष्ण अर्जुन को यह बोध कराते हैं कि उन्हें जो दर्शन प्राप्त हुए, वे कितने असाधारण थे। 'सुदुर्दर्शम्' अर्थात् जिसे देख पाना अत्यंत कठिन है — ऐसा रूप अर्जुन ने देखा। यहाँ तक कि देवता भी इस दर्शन के लिए निरंतर तरसते रहते हैं। इस कथन से अर्जुन की विशेष पात्रता और उनके प्रति श्रीकृष्ण की कृपा का महत्त्व स्पष्ट होता है। यह श्लोक पाठक को भी यह अनुभव कराता है कि जो दर्शन हुए, वे सामान्य नहीं थे।


श्लोक 11.53

वक्ता: श्रीकृष्ण

नाहं वेदैर्न तपसा न दानेन न चेज्यया।
शक्य एवंविधो द्रष्टुं दृष्टवानसि मां यथा ॥11.53॥

nāhaṁ vedair na tapasā na dānena na chejyayā / śhakya evaṁ-vidho draṣhṭuṁ dṛiṣhṭavān asi māṁ yathā

हिंदी अनुवाद: जिस प्रकार तुमने मुझे देखा है, उस रूप में मैं न वेदों से, न तप से, न दान से और न यज्ञ से देखा जा सकता हूँ।

भावार्थ: श्रीकृष्ण स्पष्ट करते हैं कि बाह्य साधनों की अपनी सीमाएँ हैं। वेद-अध्ययन, कठोर तपस्या, उदार दान और विधिपूर्वक यज्ञ — ये सब मूल्यवान हैं, किंतु इनसे वह दर्शन संभव नहीं जो अर्जुन को प्राप्त हुआ। 'इज्यया' का अर्थ है यज्ञ या पूजा। यह श्लोक यह नहीं कहता कि ये साधन व्यर्थ हैं, बल्कि यह बताता है कि परमात्मा का साक्षात्कार किसी और ही मार्ग से होता है, जो अगले श्लोक में बताया जाएगा।

आज के जीवन में: केवल बाह्य धार्मिक क्रियाओं से परमात्मा की गहरी अनुभूति नहीं होती; उसके लिए कुछ और चाहिए।


श्लोक 11.54

वक्ता: श्रीकृष्ण

भक्त्या त्वनन्यया शक्यमहमेवंविधोऽर्जुन।
ज्ञातुं दृष्टुं च तत्त्वेन प्रवेष्टुं च परंतप ॥11.54॥

bhaktyā tv ananyayā śhakya aham evaṁ-vidho ’rjuna / jñātuṁ draṣhṭuṁ cha tattvena praveṣhṭuṁ cha parantapa

हिंदी अनुवाद: हे परंतप अर्जुन! केवल अनन्य भक्ति से ही मुझे इस रूप में तत्त्व से जाना जा सकता है, देखा जा सकता है और प्राप्त किया जा सकता है।

भावार्थ: पिछले श्लोक में जो द्वार बंद बताए गए, उनका विकल्प यहाँ दिया गया है — 'अनन्यया भक्त्या' अर्थात् ऐसी भक्ति जो केवल एक की ओर हो, जिसमें कोई और आश्रय न हो। इस अनन्य भक्ति से तीन बातें संभव होती हैं — तत्त्व से जानना, प्रत्यक्ष देखना और उनमें प्रवेश करना अर्थात् उनसे एकाकार होना। 'परंतप' का अर्थ है शत्रुओं को तपाने वाला — यह संबोधन अर्जुन की वीरता को स्वीकार करते हुए उन्हें भक्ति का यह गूढ़ रहस्य बताया जा रहा है।

आज के जीवन में: परमात्मा को जानने, अनुभव करने और उनसे जुड़ने का एकमात्र सच्चा मार्ग अनन्य भक्ति है — जिसमें मन पूरी तरह उन्हीं में लगा हो।


श्लोक 11.55

वक्ता: श्रीकृष्ण

मत्कर्मकृन्मत्परमो मद्भक्तः सङ्गवर्जितः।
निर्वैरः सर्वभूतेषु यः स मामेति पाण्डव ॥11.55॥

mat-karma-kṛin mat-paramo mad-bhaktaḥ saṅga-varjitaḥ / nirvairaḥ sarva-bhūteṣhu yaḥ sa mām eti pāṇḍava

हिंदी अनुवाद: हे पाण्डव! जो मेरे लिए ही कर्म करता है, मुझे ही सर्वोच्च मानता है, मेरा भक्त है, आसक्ति से रहित है और सभी प्राणियों से वैर नहीं रखता — वह भक्त मुझे प्राप्त होता है।

भावार्थ: यह श्लोक अध्याय ११ का समापन करते हुए भक्त के पाँच लक्षण बताता है — मेरे लिए कर्म करना, मुझे ही परम लक्ष्य मानना, भक्त होना, आसक्ति का त्याग और सभी जीवों से वैरभाव न रखना। 'निर्वैरः सर्वभूतेषु' — समस्त प्राणियों के प्रति वैर का अभाव — यह भक्ति की परिपक्वता का चिह्न है। ऐसा भक्त केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उसका पूरा जीवन और व्यवहार भक्ति का प्रतिबिंब बन जाता है।

आज के जीवन में: सच्ची भक्ति केवल उपासना में नहीं, बल्कि निःस्वार्थ कर्म, आसक्ति के त्याग और सभी प्राणियों के प्रति प्रेमपूर्ण व्यवहार में प्रकट होती है।


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