भगवद्गीता

भगवद्गीता अध्याय 12, श्लोक 1–10 | भक्तियोग | अर्थ सहित

6 अक्तूबर 2026·7 मिनट में पढ़ें
भगवद्गीता अध्याय 12, श्लोक 1–10 | भक्तियोग | अर्थ सहित

ग्यारहवें अध्याय में अर्जुन ने श्रीकृष्ण का विराट विश्वरूप देखा और उनकी स्तुति की। अब बारहवें अध्याय 'भक्तियोग' में अर्जुन के मन में एक स्वाभाविक जिज्ञासा उठती है — सगुण भगवान की भक्ति श्रेष्ठ है या निराकार-अव्यक्त की उपासना? इस खंड में श्रीकृष्ण इस प्रश्न का उत्तर देते हुए भक्ति के विभिन्न स्तरों का क्रमशः वर्णन करते हैं।

श्लोक 12.1

वक्ता: अर्जुन

एवं सततयुक्ता ये भक्तास्त्वां पर्युपासते।
येचाप्यक्षरमव्यक्तं तेषां के योगवित्तमाः ॥12.1॥

arjuna uvācha / evaṁ satata-yuktā ye bhaktās tvāṁ paryupāsate / ye chāpy akṣharam avyaktaṁ teṣhāṁ ke yoga-vittamāḥ

हिंदी अनुवाद: अर्जुन ने पूछा — जो भक्त निरन्तर आपमें मन लगाकर आपकी (सगुण रूप की) उपासना करते हैं, और जो अविनाशी निराकार की उपासना करते हैं — इन दोनों में उत्तम योगवेत्ता कौन हैं?

भावार्थ: विराट रूप के दर्शन के बाद अर्जुन के मन में एक गहरा प्रश्न उठता है। वे जानना चाहते हैं कि भक्ति के दो मार्गों में — एक जो साकार भगवान की उपासना करता है और दूसरा जो निराकार, अव्यक्त तत्त्व की उपासना करता है — कौन अधिक 'योगवित्तम' अर्थात योग को भली-भाँति जाननेवाला है। यह प्रश्न साधकों के लिए अत्यंत व्यावहारिक और महत्त्वपूर्ण है।

आज के जीवन में: जब साधना के दो मार्ग सामने हों, तो विवेकपूर्वक पूछना ही ज्ञान की पहली सीढ़ी है।


श्लोक 12.2

वक्ता: श्रीकृष्ण

मय्यावेश्य मनो ये मां नित्ययुक्ता उपासते।
श्रद्धया परयोपेतास्ते मे युक्ततमा मताः ॥12.2॥

śhrī-bhagavān uvācha / mayy āveśhya mano ye māṁ nitya-yuktā upāsate / śhraddhayā parayopetās te me yuktatamā matāḥ

हिंदी अनुवाद: श्रीकृष्ण ने कहा — जो भक्त अपना मन मुझमें लगाकर, नित्य-निरन्तर मुझसे जुड़े रहकर, परम श्रद्धा के साथ मेरी उपासना करते हैं, वे मेरे मत में सर्वश्रेष्ठ योगी हैं।

भावार्थ: श्रीकृष्ण अर्जुन के प्रश्न का सीधा उत्तर देते हैं। 'मय्यावेश्य मनः' अर्थात मन को पूरी तरह मुझमें डुबो देना, 'नित्ययुक्त' अर्थात सदा जुड़े रहना, और 'परया श्रद्धया' अर्थात परम श्रद्धा — ये तीन लक्षण जिस भक्त में हों, वह 'युक्ततम' अर्थात सबसे श्रेष्ठ योगी है। सगुण भक्ति को यहाँ सर्वोत्तम बताया गया है।

आज के जीवन में: श्रद्धा और निरन्तरता — ये दो गुण किसी भी साधना को सर्वश्रेष्ठ बनाते हैं।


श्लोक 12.3

वक्ता: श्रीकृष्ण

ये त्वक्षरमनिर्देश्यमव्यक्तं पर्युपासते।
सर्वत्रगमचिन्त्यं च कूटस्थमचलं ध्रुवम् ॥12.3॥

ye tv akṣharam anirdeśhyam avyaktaṁ paryupāsate / sarvatra-gam achintyañcha kūṭa-stham achalandhruvam / sanniyamyendriya-grāmaṁ sarvatra sama-buddhayaḥ / te prāpnuvanti mām eva sarva-bhūta-hite ratāḥ

हिंदी अनुवाद: जो लोग अविनाशी, अनिर्देश्य, अव्यक्त, सर्वव्यापी, अचिन्त्य, अचल, ध्रुव (नित्य) तत्त्व की उपासना करते हैं —

भावार्थ: यह श्लोक निराकार उपासना के स्वरूप का वर्णन करता है। 'अक्षर' अर्थात अविनाशी, 'अनिर्देश्य' अर्थात जिसे किसी भी शब्द या संकेत से पूरी तरह नहीं बताया जा सकता, 'अव्यक्त' अर्थात जो इन्द्रियों से प्रत्यक्ष नहीं होता, 'कूटस्थ' अर्थात सदा एकरस और निर्विकार — इन विशेषणों से उस परम तत्त्व को परिभाषित किया गया है जिसकी निराकार उपासक साधना करते हैं। यह श्लोक अगले श्लोक के साथ मिलकर पूर्ण होता है।


श्लोक 12.4

वक्ता: श्रीकृष्ण

संनियम्येन्द्रियग्रामं सर्वत्र समबुद्धयः।
ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्वभूतहिते रताः ॥12.4॥

sanniyamyendriya-grāmaṁ sarvatra sama-buddhayaḥ te prāpnuvanti mām eva sarva-bhūta-hite ratāḥ

हिंदी अनुवाद: जो अपनी सभी इन्द्रियों को वश में करके, सब जगह समान बुद्धि रखते हुए और समस्त प्राणियों के हित में लगे रहते हैं — वे भी मुझे ही प्राप्त होते हैं।

भावार्थ: 'संनियम्येन्द्रियग्राम' अर्थात इन्द्रियों के पूरे समूह को वश में करना — यह निराकार उपासना की एक अनिवार्य शर्त है। इसके साथ 'सर्वत्र समबुद्धि' अर्थात सुख-दुःख, मान-अपमान, सफलता-असफलता में एक-सा भाव, और 'सर्वभूतहित' अर्थात सब प्राणियों की भलाई में रत रहना — इन गुणों से युक्त निराकार उपासक भी अंततः श्रीकृष्ण को ही प्राप्त होते हैं।

आज के जीवन में: इन्द्रियों पर संयम और सबके प्रति समभाव — ये गुण किसी भी उपासना को सफल बनाते हैं।


श्लोक 12.5

वक्ता: श्रीकृष्ण

क्लेशोऽधिकतरस्तेषामव्यक्तासक्तचेतसाम्।
अव्यक्ता हि गतिर्दुःखं देहवद्भिरवाप्यते ॥12.5॥

kleśho ’dhikataras teṣhām avyaktāsakta-chetasām / avyaktā hi gatir duḥkhaṁ dehavadbhir avāpyate

हिंदी अनुवाद: किन्तु जिनका चित्त अव्यक्त (निराकार) में आसक्त है, उन साधकों को कष्ट अधिक होता है; क्योंकि शरीर से जुड़े हुए (देहाभिमानी) मनुष्यों के लिए अव्यक्त की गति कठिनाई से प्राप्त होती है।

भावार्थ: श्रीकृष्ण यहाँ स्पष्ट करते हैं कि निराकार उपासना का मार्ग कठिन क्यों है। 'देहवद्भिः' अर्थात जो अपने को शरीर मानते हैं, उनके लिए उस तत्त्व का ध्यान करना अत्यंत दुष्कर है जो न दिखता है, न सुना जा सकता है, न किसी रूप में है। 'क्लेश' अर्थात कष्ट अधिक होता है — यह कोई निंदा नहीं, बल्कि व्यावहारिक सत्य है। इसीलिए सगुण भक्ति को अधिक सुगम और श्रेष्ठ बताया गया।

आज के जीवन में: जो मार्ग अपनी स्वाभाविक स्थिति के अनुकूल हो, वही साधना के लिए सबसे उचित है।


श्लोक 12.6

वक्ता: श्रीकृष्ण

ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि संन्यस्य मत्पराः।
अनन्येनैव योगेन मां ध्यायन्त उपासते ॥12.6॥

ye tu sarvāṇi karmāṇi mayi sannyasya mat-paraḥ / ananyenaiva yogena māṁ dhyāyanta upāsate

हिंदी अनुवाद: परन्तु जो अपने सभी कर्मों को मुझे अर्पण करके, मुझे ही परम लक्ष्य मानकर, अनन्य योग से मेरा ध्यान करते हुए मेरी उपासना करते हैं —

भावार्थ: 'सर्वाणि कर्माणि मयि संन्यस्य' अर्थात सब कर्मों को मुझमें समर्पित कर देना — यह सगुण भक्त का स्वभाव है। 'मत्पर' अर्थात मुझे ही सर्वोच्च आश्रय मानना, और 'अनन्येन योगेन' अर्थात किसी और का सहारा न लेकर केवल मेरे ही ध्यान में लगे रहना — इन तीन विशेषताओं वाले भक्त का वर्णन यहाँ है। यह श्लोक अगले श्लोक के साथ मिलकर पूर्ण होता है।


श्लोक 12.7

वक्ता: श्रीकृष्ण

तेषामहं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात्।
भवामि नचिरात्पार्थ मय्यावेशितचेतसाम् ॥12.7॥

teṣhām ahaṁ samuddhartā mṛityu-saṁsāra-sāgarāt / bhavāmi na chirāt pārtha mayy āveśhita-chetasām

हिंदी अनुवाद: हे पार्थ! जिनका चित्त मुझमें लीन है, ऐसे उन भक्तों का मैं मृत्युरूपी संसार-सागर से शीघ्र ही उद्धार करनेवाला बन जाता हूँ।

भावार्थ: 'मृत्युसंसारसागर' — यह एक सुन्दर रूपक है। जन्म-मृत्यु का यह चक्र एक विशाल सागर के समान है जिसमें जीव डूबता रहता है। जो भक्त अपना चित्त पूरी तरह श्रीकृष्ण में लगा देते हैं, उनका उद्धार 'नचिरात्' अर्थात शीघ्र ही हो जाता है। यहाँ भगवान स्वयं उद्धारकर्ता बनने का वचन देते हैं — यह भक्तियोग की सबसे बड़ी विशेषता है।

आज के जीवन में: जो पूरे मन से ईश्वर की शरण लेता है, उसे पार उतरने के लिए अकेले संघर्ष नहीं करना पड़ता।


श्लोक 12.8

वक्ता: श्रीकृष्ण

मय्येव मन आधत्स्व मयि बुद्धिं निवेशय।
निवसिष्यसि मय्येव अत ऊर्ध्वं न संशयः ॥12.8॥

mayy eva mana ādhatsva mayi buddhiṁ niveśhaya / nivasiṣhyasi mayy eva ata ūrdhvaṁ na sanśhayaḥ

हिंदी अनुवाद: अपना मन मुझमें लगा और अपनी बुद्धि मुझमें ही स्थिर कर; इसके बाद तू निश्चित रूप से मुझमें ही निवास करेगा — इसमें कोई संशय नहीं।

भावार्थ: श्रीकृष्ण यहाँ भक्ति का पहला और सर्वोच्च सोपान बताते हैं — मन और बुद्धि दोनों को पूरी तरह ईश्वर में लगा देना। 'मन' भावनाओं और विचारों का केन्द्र है, 'बुद्धि' निर्णय और विवेक का। जब दोनों एक साथ भगवान में समर्पित हो जाएँ, तो साधक स्वयं भगवान में ही निवास करने लगता है। 'न संशयः' — यह दृढ़ आश्वासन है।

आज के जीवन में: जब मन और विवेक दोनों एक ही लक्ष्य पर केन्द्रित हों, तो सफलता निश्चित है।


श्लोक 12.9

वक्ता: श्रीकृष्ण

अथ चित्तं समाधातुं न शक्नोषि मयि स्थिरम्।
अभ्यासयोगेन ततो मामिच्छाप्तुं धनञ्जय ॥12.9॥

atha chittaṁ samādhātuṁ na śhaknoṣhi mayi sthiram / abhyāsa-yogena tato mām ichchhāptuṁ dhanañjaya

हिंदी अनुवाद: यदि तू मन को मुझमें अचल भाव से स्थिर करने में समर्थ नहीं है, तो हे धनञ्जय! अभ्यासयोग के द्वारा मुझे प्राप्त करने की इच्छा कर।

भावार्थ: श्रीकृष्ण जानते हैं कि सभी साधकों के लिए तत्काल पूर्ण समर्पण सम्भव नहीं होता। इसलिए वे दूसरा सोपान बताते हैं — 'अभ्यासयोग'। 'अभ्यास' का अर्थ है बार-बार प्रयास करना, मन को बार-बार भगवान की ओर लौटाना। जब मन भटके, उसे फिर लगाओ — यही अभ्यास है। 'धनञ्जय' — अर्जुन का यह नाम यहाँ प्रयुक्त है जिसका अर्थ है धन को जीतनेवाला।

आज के जीवन में: यदि एकाग्रता न बने, तो निराश न हों — बार-बार प्रयास करना ही अभ्यासयोग है।


श्लोक 12.10

वक्ता: श्रीकृष्ण

अभ्यासेऽप्यसमर्थोऽसि मत्कर्मपरमो भव।
मदर्थमपि कर्माणि कुर्वन् सिद्धिमवाप्स्यसि ॥12.10॥

abhyāse ’py asamartho ’si mat-karma-paramo bhava / mad-artham api karmāṇi kurvan siddhim avāpsyasi

हिंदी अनुवाद: यदि तू अभ्यासयोग में भी असमर्थ है, तो मेरे लिए कर्म करने में तत्पर हो जा; मेरे लिए कर्म करते हुए भी तू सिद्धि को प्राप्त हो जाएगा।

भावार्थ: यह तीसरा सोपान है। जो व्यक्ति न तो पूर्ण मानसिक समर्पण कर सकता है, न नियमित अभ्यास कर सकता है, उसके लिए श्रीकृष्ण एक और सरल मार्ग बताते हैं — 'मत्कर्मपरम' अर्थात मेरे लिए कर्म करने में लग जाओ। अपने सभी कार्य भगवान की सेवा के भाव से करो। इस प्रकार कर्म करते-करते भी साधक 'सिद्धि' अर्थात परम लक्ष्य को प्राप्त कर लेता है।

आज के जीवन में: जो कुछ भी करो, उसे ईश्वर की सेवा का भाव देकर करो — यही सबसे सरल भक्ति है।


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