भगवद्गीता

भगवद्गीता अध्याय 12, श्लोक 11–20 | भक्तियोग | अर्थ सहित

6 अक्तूबर 2026·8 मिनट में पढ़ें
भगवद्गीता अध्याय 12, श्लोक 11–20 | भक्तियोग | अर्थ सहित

बारहवें अध्याय के पूर्वार्ध में श्रीकृष्ण ने अर्जुन को साकार और निराकार उपासना का भेद समझाया और भक्ति के विभिन्न सोपान बताए। इस उत्तरार्ध में वे पहले साधना का क्रम पूरा करते हैं, फिर उस प्रिय भक्त के गुणों की विस्तृत सूची देते हैं जो उन्हें सबसे अधिक प्रिय है — और अंत में इस पूरे उपदेश को 'धर्ममय अमृत' कहकर समाप्त करते हैं।

श्लोक 12.11

वक्ता: श्रीकृष्ण

अथैतदप्यशक्तोऽसि कर्तुं मद्योगमाश्रितः।
सर्वकर्मफलत्यागं ततः कुरु यतात्मवान् ॥12.11॥

athaitad apy aśhakto ’si kartuṁ mad-yogam āśhritaḥ / sarva-karma-phala-tyāgaṁ tataḥ kuru yatātmavān

हिंदी अनुवाद: यदि तू मेरे योग का आश्रय लेकर भी पूर्व में कहे गए साधन को करने में असमर्थ है, तो मन और इंद्रियों को वश में करके सभी कर्मों के फल का त्याग कर।

भावार्थ: श्रीकृष्ण अर्जुन को साधना का सबसे सरल और अंतिम विकल्प बता रहे हैं। यदि ध्यान या अभ्यास संभव न हो, तो कम से कम 'यतात्मवान्' — अर्थात् मन और इंद्रियों को संयमित रखते हुए — कर्मफल का त्याग करो। यह त्याग भी भक्ति का एक मार्ग है। इस प्रकार श्रीकृष्ण हर स्तर के साधक के लिए द्वार खुला रखते हैं — कोई भी निराश न हो।

आज के जीवन में: जो बड़े साधन न कर सके, वह भी फल की आसक्ति छोड़कर अपना कर्तव्य करे — यही सबसे सुलभ साधना है।


श्लोक 12.12

वक्ता: श्रीकृष्ण

श्रेयो हि ज्ञानमभ्यासाज्ज्ञानाद्ध्यानं विशिष्यते।
ध्यानात्कर्मफलत्यागस्त्यागाच्छान्तिरनन्तरम् ॥12.12॥

śhreyo hi jñānam abhyāsāj jñānād dhyānaṁ viśhiṣhyate / dhyānāt karma-phala-tyāgas tyāgāch chhāntir anantaram

हिंदी अनुवाद: केवल अभ्यास से शास्त्रज्ञान श्रेष्ठ है, ज्ञान से ध्यान श्रेष्ठ है, और ध्यान से भी सब कर्मों के फल का त्याग श्रेष्ठ है — क्योंकि त्याग से तत्काल परम शांति मिलती है।

भावार्थ: यहाँ श्रीकृष्ण साधना का एक क्रम प्रस्तुत करते हैं — अभ्यास, ज्ञान, ध्यान और अंत में कर्मफल-त्याग। 'कर्मफलत्याग' का अर्थ है कि कर्म करते हुए उसके परिणाम की चाह न रखना। यह त्याग सबसे ऊँचा इसलिए है क्योंकि इससे 'शांति अनन्तरम्' — अर्थात् तुरंत शांति प्राप्त होती है। यह श्लोक गीता के कर्मयोग और भक्तियोग दोनों का सार है।

आज के जीवन में: फल की चिंता छोड़कर कर्म करना ही सबसे बड़ी साधना है, जो मन को तुरंत शांत करती है।


श्लोक 12.13

वक्ता: श्रीकृष्ण

अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च।
निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी ॥12.13॥

adveṣhṭā sarva-bhūtānāṁ maitraḥ karuṇa eva cha / nirmamo nirahankāraḥ sama-duḥkha-sukhaḥ kṣhamī

हिंदी अनुवाद: जो सभी प्राणियों से द्वेष नहीं रखता, सबका मित्र और दयालु है, ममता और अहंकार से रहित है, सुख-दुःख में सम रहता है और क्षमाशील है — वह भक्त मुझे प्रिय है।

भावार्थ: श्रीकृष्ण अब उस प्रिय भक्त के गुणों का वर्णन आरंभ करते हैं। 'अद्वेष्टा' — किसी से भी द्वेष न रखना, 'मैत्रः' — सबके प्रति मित्रभाव, 'करुण' — दूसरों के दुःख में संवेदना। 'निर्ममः' का अर्थ है 'यह मेरा है' — ऐसी ममता का अभाव, और 'निरहंकारः' का अर्थ है 'मैं हूँ' — ऐसे अहंकार का अभाव। ये गुण भक्त के स्वभाव में स्वाभाविक रूप से आते हैं।

आज के जीवन में: सच्ची भक्ति का पहला लक्षण यह है कि मन में किसी के प्रति द्वेष न हो और सबके प्रति करुणा का भाव हो।


श्लोक 12.14

वक्ता: श्रीकृष्ण

सन्तुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढनिश्चयः।
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्यो मद्भक्तः स मे प्रियः ॥12.14॥

santuṣhṭaḥ satataṁ yogī yatātmā dṛiḍha-niśhchayaḥ / mayy arpita-mano-buddhir yo mad-bhaktaḥ sa me priyaḥ

हिंदी अनुवाद: जो सदा संतुष्ट रहता है, योगी है, मन और इंद्रियों को वश में रखता है, दृढ़ निश्चयवाला है, और जिसका मन तथा बुद्धि मुझमें अर्पित है — वह मेरा भक्त मुझे प्रिय है।

भावार्थ: इस श्लोक में भक्त के आंतरिक गुणों पर बल है। 'सन्तुष्टः सततं' — सदा संतुष्ट रहना, अर्थात् परिस्थितियों के अनुसार मन न डोलना। 'यतात्मा' — मन और इंद्रियों पर संयम। 'दृढनिश्चयः' — लक्ष्य के प्रति अटल रहना। और सबसे महत्त्वपूर्ण — 'मय्यर्पितमनोबुद्धिः' — मन और बुद्धि दोनों को ईश्वर में समर्पित कर देना। यही भक्त की पहचान है।

आज के जीवन में: जो मन और बुद्धि को ईश्वर में समर्पित कर दृढ़ता से जीता है, उसकी संतुष्टि किसी बाहरी वस्तु पर निर्भर नहीं रहती।


श्लोक 12.15

वक्ता: श्रीकृष्ण

यस्मान्नोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते च यः।
हर्षामर्षभयोद्वेगैर्मुक्तो यः स च मे प्रियः ॥12.15॥

yasmān nodvijate loko lokān nodvijate cha yaḥ / harṣhāmarṣha-bhayodvegair mukto yaḥ sa cha me priyaḥ

हिंदी अनुवाद: जिससे किसी को उद्वेग नहीं होता और जिसे स्वयं भी किसी से उद्वेग नहीं होता, तथा जो हर्ष, ईर्ष्या, भय और व्याकुलता से मुक्त है — वह मुझे प्रिय है।

भावार्थ: यह श्लोक भक्त के सामाजिक स्वभाव को दर्शाता है। 'उद्विजते' का अर्थ है व्याकुल या आहत होना। प्रिय भक्त न तो दूसरों को कष्ट देता है, न स्वयं दूसरों के व्यवहार से विचलित होता है। 'हर्ष, अमर्ष, भय, उद्वेग' — ये चारों मन की चंचलता के रूप हैं। इनसे मुक्त व्यक्ति समाज में शांति का स्रोत बनता है और भीतर से भी स्थिर रहता है।

आज के जीवन में: जो व्यक्ति न किसी को कष्ट देता है, न दूसरों से कष्ट पाता है, वह समाज और अपने मन दोनों के लिए कल्याणकारी है।


श्लोक 12.16

वक्ता: श्रीकृष्ण

अनपेक्षः शुचिर्दक्ष उदासीनो गतव्यथः।
सर्वारम्भपरित्यागी यो मद्भक्तः स मे प्रियः ॥12.16॥

anapekṣhaḥ śhuchir dakṣha udāsīno gata-vyathaḥ / sarvārambha-parityāgī yo mad-bhaktaḥ sa me priyaḥ

हिंदी अनुवाद: जो आकांक्षा से रहित, बाहर-भीतर से पवित्र, दक्ष, उदासीन, व्यथा से मुक्त और सभी नए कर्मों के आरंभ का त्यागी है — वह मेरा भक्त मुझे प्रिय है।

भावार्थ: 'अनपेक्षः' — किसी फल या वस्तु की अपेक्षा न रखना। 'शुचिः' — भीतर और बाहर दोनों से शुद्ध। 'दक्षः' — अपने कर्तव्य में कुशल। 'उदासीनः' — सांसारिक लाभ-हानि के प्रति तटस्थ। 'सर्वारम्भपरित्यागी' — नए-नए कामों की लालसा से मुक्त। यह भक्त संसार में रहते हुए भी उससे बंधता नहीं — वह कर्म करता है, पर आसक्ति नहीं रखता।

आज के जीवन में: जो व्यक्ति बिना किसी अपेक्षा के, भीतर-बाहर से शुद्ध होकर कर्म करता है, वह सच्चे अर्थों में स्वतंत्र है।


श्लोक 12.17

वक्ता: श्रीकृष्ण

यो न हृष्यति न द्वेष्टि न शोचति न काङ्क्षति।
शुभाशुभपरित्यागी भक्ितमान्यः स मे प्रियः ॥12.17॥

yo na hṛiṣhyati na dveṣhṭi na śhochati na kāṅkṣhati / śhubhāśhubha-parityāgī bhaktimān yaḥ sa me priyaḥ

हिंदी अनुवाद: जो न कभी हर्षित होता है, न द्वेष करता है, न शोक करता है, न कामना करता है, और जो शुभ-अशुभ दोनों में राग-द्वेष का त्यागी है — वह भक्तिमान् मनुष्य मुझे प्रिय है।

भावार्थ: यह श्लोक मन की उस स्थिरता का वर्णन करता है जहाँ अच्छी घटना पर अत्यधिक हर्ष नहीं और बुरी घटना पर शोक नहीं। 'शुभाशुभपरित्यागी' — शुभ कर्म में राग नहीं और अशुभ में द्वेष नहीं। यह भाव तब आता है जब व्यक्ति यह समझ लेता है कि सब कुछ ईश्वर की इच्छा से होता है। ऐसा भक्त सदा समभाव में स्थित रहता है।

आज के जीवन में: सुख में न फूलना और दुःख में न टूटना — यह समभाव ही भक्ति की परिपक्वता का चिह्न है।


श्लोक 12.18

वक्ता: श्रीकृष्ण

समः शत्रौ च मित्रे च तथा मानापमानयोः।
शीतोष्णसुखदुःखेषु समः सङ्गविवर्जितः ॥12.18॥

samaḥ śhatrau cha mitre cha tathā mānāpamānayoḥ / śhītoṣhṇa-sukha-duḥkheṣhu samaḥ saṅga-vivarjitaḥ

हिंदी अनुवाद: जो शत्रु और मित्र में, मान और अपमान में, शीत और उष्ण में, सुख और दुःख में सम रहता है और आसक्ति से रहित है — वह भक्त मुझे प्रिय है।

भावार्थ: इस श्लोक में समभाव के विभिन्न आयाम दिखाए गए हैं। 'शत्रौ च मित्रे च समः' — शत्रु और मित्र दोनों के प्रति एक-सा व्यवहार। 'मानापमानयोः समः' — प्रशंसा मिले या अपमान, मन न डोले। 'शीतोष्णसुखदुःखेषु समः' — शारीरिक और मानसिक दोनों प्रकार की परिस्थितियों में स्थिरता। 'सङ्गविवर्जितः' — किसी भी वस्तु या व्यक्ति में आसक्ति नहीं।

आज के जीवन में: जो व्यक्ति प्रशंसा और निंदा, सुख और दुःख — सभी में समान रहता है, वह जीवन की हर परिस्थिति में शांत रह सकता है।


श्लोक 12.19

वक्ता: श्रीकृष्ण

तुल्यनिन्दास्तुतिर्मौनी सन्तुष्टो येनकेनचित्।
अनिकेतः स्थिरमतिर्भक्ितमान्मे प्रियो नरः ॥12.19॥

tulya-nindā-stutir maunī santuṣhṭo yena kenachit / aniketaḥ sthira-matir bhaktimān me priyo naraḥ

हिंदी अनुवाद: जो निंदा और स्तुति को समान समझता है, मननशील है, जो भी मिले उसमें संतुष्ट है, किसी स्थान या शरीर में ममता नहीं रखता और स्थिर बुद्धिवाला है — वह भक्तिमान् मनुष्य मुझे प्रिय है।

भावार्थ: 'तुल्यनिन्दास्तुतिः' — निंदा और प्रशंसा दोनों में समान। 'मौनी' — यहाँ मौन का अर्थ केवल चुप रहना नहीं, बल्कि मन की गहरी शांति और विचारशीलता है। 'येनकेनचित् सन्तुष्टः' — जो भी मिले, उसी में संतोष। 'अनिकेतः' — किसी स्थान विशेष से ममता नहीं। 'स्थिरमतिः' — बुद्धि किसी भी परिस्थिति में विचलित नहीं होती। ये सब गुण मिलकर एक परिपूर्ण भक्त का चित्र बनाते हैं।

आज के जीवन में: जो व्यक्ति किसी की प्रशंसा या निंदा से न उठे न गिरे, और जो भी मिले उसमें संतुष्ट रहे, वह सच्चे अर्थों में स्वतंत्र है।


श्लोक 12.20

वक्ता: श्रीकृष्ण

ये तु धर्म्यामृतमिदं यथोक्तं पर्युपासते।
श्रद्दधाना मत्परमा भक्तास्तेऽतीव मे प्रियाः ॥12.20॥

ye tu dharmyāmṛitam idaṁ yathoktaṁ paryupāsate / śhraddadhānā mat-paramā bhaktās te ’tīva me priyāḥ

हिंदी अनुवाद: जो श्रद्धावान भक्त मुझे ही परम लक्ष्य मानकर इस धर्ममय अमृत का भलीभाँति सेवन करते हैं, वे मुझे अत्यंत प्रिय हैं।

भावार्थ: यह भक्तियोग का समापन श्लोक है। 'धर्म्यामृतम्' — धर्म के रूप में अमृत, अर्थात् इस पूरे उपदेश को श्रीकृष्ण अमृत की संज्ञा देते हैं। 'श्रद्दधानाः' — श्रद्धा के साथ इसे अपनाने वाले। 'मत्परमाः' — जिनके लिए श्रीकृष्ण ही परम आश्रय हैं। ऐसे भक्त 'अतीव प्रियाः' — अत्यंत प्रिय हैं। श्रद्धा और समर्पण — यही भक्तियोग की आत्मा है।

आज के जीवन में: जो श्रद्धा और समर्पण के साथ इस उपदेश को जीवन में उतारता है, वह ईश्वर को सबसे अधिक प्रिय होता है।


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