भगवद्गीता

भगवद्गीता अध्याय 13, श्लोक 1–10 | क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग | अर्थ सहित

6 अक्तूबर 2026·7 मिनट में पढ़ें
भगवद्गीता अध्याय 13, श्लोक 1–10 | क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग | अर्थ सहित

बारहवें अध्याय में श्रीकृष्ण ने भक्तियोग का विस्तार से वर्णन किया और बताया कि सगुण तथा निर्गुण — दोनों उपासकों में से कौन श्रेष्ठ है। अब तेरहवें अध्याय में एक नया और गहरा विषय आरंभ होता है — शरीर और उसे जाननेवाले आत्मा का भेद, अर्थात् क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ का विवेचन। इस खंड में अर्जुन पहले प्रश्न पूछते हैं, फिर श्रीकृष्ण शरीर को 'क्षेत्र' और आत्मा को 'क्षेत्रज्ञ' कहकर सच्चे ज्ञान के लक्षण बताते हैं।

श्लोक 13.1

वक्ता: अर्जुन

प्रकृतिं पुरुषं चैव क्षेत्रं क्षेत्रज्ञमेव च।
एतद्वेदितुमिच्छामि ज्ञानं ज्ञेयं च केशव ॥13.1॥

arjuna uvācha / prakṛitiṁ puruṣhaṁ chaiva kṣhetraṁ kṣhetra-jñam eva cha / etad veditum ichchhāmi jñānaṁ jñeyaṁ cha keśhava

हिंदी अनुवाद: अर्जुन बोले — हे केशव! मैं प्रकृति और पुरुष, क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ, तथा ज्ञान और जानने योग्य वस्तु — इन सबके बारे में जानना चाहता हूँ।

भावार्थ: बारहवें अध्याय के अंत में भक्ति का उपदेश सुनने के बाद अर्जुन के मन में जिज्ञासा जागती है। वे श्रीकृष्ण से छह विषयों पर प्रश्न करते हैं — प्रकृति (जड़ सृष्टि), पुरुष (चेतन तत्त्व), क्षेत्र (शरीर), क्षेत्रज्ञ (जाननेवाला), ज्ञान (जानने की शक्ति) और ज्ञेय (जो जानने योग्य है)। 'केशव' श्रीकृष्ण का नाम है। यह प्रश्न पूरे तेरहवें अध्याय की नींव रखता है।

आज के जीवन में: जब मन में गहरे प्रश्न उठें, तो उन्हें दबाएँ नहीं — जिज्ञासा ही ज्ञान का द्वार है।


श्लोक 13.2

वक्ता: श्रीकृष्ण

इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते।
एतद्यो वेत्ति तं प्राहुः क्षेत्रज्ञ इति तद्विदः ॥13.2॥

śhrī-bhagavān uvācha / idaṁ śharīraṁ kaunteya kṣhetram ity abhidhīyate / etad yo vetti taṁ prāhuḥ kṣhetra-jña iti tad-vidaḥ

हिंदी अनुवाद: श्रीभगवान् बोले — हे कुन्तीपुत्र! इस शरीर को 'क्षेत्र' कहते हैं, और जो इसे जानता है, उसे ज्ञानीजन 'क्षेत्रज्ञ' कहते हैं।

भावार्थ: श्रीकृष्ण उत्तर देते हुए सबसे पहले मूल परिभाषा देते हैं। 'क्षेत्र' का अर्थ है — खेत, अर्थात् वह भूमि जिसमें कर्मों के फल उगते हैं; यहाँ इससे शरीर अभिप्रेत है। 'क्षेत्रज्ञ' वह है जो इस शरीर को जानता है — अर्थात् चेतन आत्मा। 'तद्विदः' का अर्थ है — इस विषय के जाननेवाले। यह भेद समझना ही आत्मज्ञान की पहली सीढ़ी है।

आज के जीवन में: हम शरीर नहीं हैं, बल्कि शरीर को जाननेवाले हैं — यह बोध जीवन को एक नई दृष्टि देता है।


श्लोक 13.3

वक्ता: श्रीकृष्ण

क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत।
क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोर्ज्ञानं यत्तज्ज्ञानं मतं मम ॥13.3॥

kṣhetra-jñaṁ chāpi māṁ viddhi sarva-kṣhetreṣhu bhārata / kṣhetra-kṣhetrajñayor jñānaṁ yat taj jñānaṁ mataṁ mama

हिंदी अनुवाद: हे भरतवंशी अर्जुन! सभी क्षेत्रों में क्षेत्रज्ञ मुझे ही जान। क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ दोनों का ज्ञान — यही मेरे मत में सच्चा ज्ञान है।

भावार्थ: श्रीकृष्ण यहाँ एक महत्त्वपूर्ण बात कहते हैं — प्रत्येक शरीर में जो जाननेवाला है, वह परमात्मा ही है। व्यक्तिगत आत्मा और परमात्मा दोनों 'क्षेत्रज्ञ' हैं, किंतु सर्वव्यापी क्षेत्रज्ञ श्रीकृष्ण स्वयं हैं। 'मतं मम' अर्थात् मेरा यही मत है — केवल शरीर को जानना पर्याप्त नहीं, शरीर और आत्मा दोनों के स्वरूप को जानना ही पूर्ण ज्ञान है।

आज के जीवन में: हर प्राणी में एक ही चेतना विद्यमान है — यह समझ आने पर दूसरों के प्रति आदर और करुणा स्वाभाविक हो जाती है।


श्लोक 13.4

वक्ता: श्रीकृष्ण

तत्क्षेत्रं यच्च यादृक् च यद्विकारि यतश्च यत्।
स च यो यत्प्रभावश्च तत्समासेन मे श्रृणु ॥13.4॥

tat kṣhetraṁ yach cha yādṛik cha yad-vikāri yataśh cha yat / sa cha yo yat-prabhāvaśh cha tat samāsena me śhṛiṇu

हिंदी अनुवाद: वह क्षेत्र क्या है, कैसा है, उसमें क्या-क्या विकार हैं, वह किससे उत्पन्न हुआ है, तथा क्षेत्रज्ञ कौन है और उसका क्या प्रभाव है — यह सब संक्षेप में मुझसे सुन।

भावार्थ: श्रीकृष्ण आगे विस्तार से बताने से पहले विषय की रूपरेखा प्रस्तुत करते हैं। वे पाँच प्रश्नों की सूचना देते हैं — क्षेत्र का स्वरूप, उसकी प्रकृति, उसके विकार, उसका उद्गम, और क्षेत्रज्ञ का स्वरूप तथा सामर्थ्य। 'समासेन' का अर्थ है संक्षेप में। यह श्लोक आगे आनेवाले विवेचन की भूमिका है।


श्लोक 13.5

वक्ता: श्रीकृष्ण

ऋषिभिर्बहुधा गीतं छन्दोभिर्विविधैः पृथक्।
ब्रह्मसूत्रपदैश्चैव हेतुमद्भिर्विनिश्िचतैः ॥13.5॥

ṛiṣhibhir bahudhā gītaṁ chhandobhir vividhaiḥ pṛithak / brahma-sūtra-padaiśh chaiva hetumadbhir viniśhchitaiḥ

हिंदी अनुवाद: इस क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ के तत्त्व को ऋषियों ने अनेक प्रकार से गाया है, वेदों की ऋचाओं में भिन्न-भिन्न रूपों से कहा गया है, और युक्तियुक्त तथा निश्चित ब्रह्मसूत्र के पदों द्वारा भी इसे स्पष्ट किया गया है।

भावार्थ: श्रीकृष्ण बताते हैं कि यह ज्ञान नया नहीं है — ऋषियों ने इसे अपने-अपने ढंग से गाया है, वेदों की ऋचाओं में यह विविध रूपों में मिलता है, और ब्रह्मसूत्र के सुनिश्चित पदों में भी इसे तर्कसहित प्रतिपादित किया गया है। 'हेतुमद्भिः' का अर्थ है — युक्तियुक्त। यह श्लोक इस ज्ञान की प्राचीनता और प्रामाणिकता को दर्शाता है।


श्लोक 13.6

वक्ता: श्रीकृष्ण

महाभूतान्यहङ्कारो बुद्धिरव्यक्तमेव च।
इन्द्रियाणि दशैकं च पञ्च चेन्द्रियगोचराः ॥13.6॥

mahā-bhūtāny ahankāro buddhir avyaktam eva cha / indriyāṇi daśhaikaṁ cha pañcha chendriya-gocharāḥ

हिंदी अनुवाद: पाँच महाभूत, अहंकार, बुद्धि, अव्यक्त प्रकृति, दस इन्द्रियाँ, एक मन और पाँचों इन्द्रियों के पाँच विषय — ये सब क्षेत्र के तत्त्व हैं।

भावार्थ: यहाँ श्रीकृष्ण क्षेत्र अर्थात् शरीर के चौबीस तत्त्वों की सूची देते हैं। पाँच महाभूत हैं — पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश। दस इन्द्रियाँ हैं — पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ और पाँच कर्मेन्द्रियाँ। मन ग्यारहवाँ तत्त्व है। पाँच विषय हैं — रूप, रस, गंध, स्पर्श, शब्द। 'अव्यक्त' मूल प्रकृति को कहते हैं। यह सब मिलकर 'क्षेत्र' बनता है।


श्लोक 13.7

वक्ता: श्रीकृष्ण

इच्छा द्वेषः सुखं दुःखं सङ्घातश्चेतनाधृतिः।
एतत्क्षेत्रं समासेन सविकारमुदाहृतम् ॥13.7॥

ichchhā dveṣhaḥ sukhaṁ duḥkhaṁ saṅghātaśh chetanā dhṛitiḥ / etat kṣhetraṁ samāsena sa-vikāram udāhṛitam

हिंदी अनुवाद: इच्छा, द्वेष, सुख, दुःख, शरीर का संघात, चेतना और धृति — इन विकारों सहित यह क्षेत्र संक्षेप में कहा गया है।

भावार्थ: पिछले श्लोक में भौतिक तत्त्व गिनाए गए, इस श्लोक में मानसिक विकारों की सूची दी गई है। 'संघात' का अर्थ है शरीर का समूह या ढाँचा। 'चेतना' यहाँ प्राणशक्ति के अर्थ में है। 'धृति' अर्थात् धैर्य या मन को थामे रखने की शक्ति। ये सभी क्षेत्र के अंग हैं — इनसे परे जो जाननेवाला है, वही क्षेत्रज्ञ है।

आज के जीवन में: इच्छा, द्वेष, सुख-दुःख — ये सब शरीर और मन के धर्म हैं, आत्मा के नहीं; यह जानने से इनसे एक स्वस्थ दूरी बनती है।


श्लोक 13.8

वक्ता: श्रीकृष्ण

अमानित्वमदम्भित्वमहिंसा क्षान्तिरार्जवम्।
आचार्योपासनं शौचं स्थैर्यमात्मविनिग्रहः ॥13.8॥

amānitvam adambhitvam ahinsā kṣhāntir ārjavam / āchāryopāsanaṁ śhauchaṁ sthairyam ātma-vinigrahaḥ

हिंदी अनुवाद: अपने में श्रेष्ठता का भाव न रखना, दिखावा न करना, अहिंसा, क्षमा, सरलता, गुरु की सेवा, बाहर-भीतर की शुद्धि, स्थिरता और मन को वश में रखना —

भावार्थ: श्लोक 8 से 12 तक श्रीकृष्ण सच्चे ज्ञान के लक्षण बताते हैं। यहाँ पहले नौ गुण गिनाए गए हैं। 'अमानित्व' का अर्थ है — अपने को दूसरों से बड़ा न मानना। 'अदम्भित्व' अर्थात् दिखावे के लिए धर्म न करना। 'आचार्योपासन' यानी गुरु की सेवा-भक्ति। 'शौच' अर्थात् शरीर और मन दोनों की पवित्रता। ये गुण ज्ञान की भूमि तैयार करते हैं।

आज के जीवन में: विनम्रता, सरलता और मन पर संयम — ये गुण ज्ञान के साथ-साथ जीवन में सुख और सम्मान भी लाते हैं।


श्लोक 13.9

वक्ता: श्रीकृष्ण

इन्द्रियार्थेषु वैराग्यमनहङ्कार एव च।
जन्ममृत्युजराव्याधिदुःखदोषानुदर्शनम् ॥13.9॥

indriyārtheṣhu vairāgyam anahankāra eva cha / janma-mṛityu-jarā-vyādhi-duḥkha-doṣhānudarśhanam

हिंदी अनुवाद: इन्द्रियों के विषयों में वैराग्य, अहंकार का न होना, और जन्म, मृत्यु, वृद्धावस्था तथा रोगों में दुःख के दोषों को बार-बार देखते रहना —

भावार्थ: इस श्लोक में तीन और लक्षण बताए गए हैं। 'वैराग्य' का अर्थ है — विषयों से मन का उचटना, उनसे घृणा नहीं। 'अनहंकार' अर्थात् 'मैं' और 'मेरा' के भाव का न होना। तीसरा लक्षण है — जन्म, मृत्यु, बुढ़ापे और बीमारी में जो दुःख है, उसे बार-बार स्मरण में रखना, ताकि संसार में अत्यधिक आसक्ति न हो।

आज के जीवन में: जीवन की अनिश्चितता को स्वीकार करने से मन में वैराग्य और शांति दोनों आते हैं।


श्लोक 13.10

वक्ता: श्रीकृष्ण

असक्ितरनभिष्वङ्गः पुत्रदारगृहादिषु।
नित्यं च समचित्तत्वमिष्टानिष्टोपपत्तिषु ॥13.10॥

asaktir anabhiṣhvaṅgaḥ putra-dāra-gṛihādiṣhu / nityaṁ cha sama-chittatvam iṣhṭāniṣhṭopapattiṣhu

हिंदी अनुवाद: आसक्ति न रखना, पुत्र, पत्नी, घर आदि में घनिष्ठ तादात्म्य न होना, और अनुकूल तथा प्रतिकूल परिस्थितियों में सदा मन का समभाव बनाए रखना —

भावार्थ: 'असक्ति' का अर्थ है — कर्म और संबंधों में रहते हुए भी उनसे चिपके न रहना। 'अनभिष्वङ्ग' का अर्थ है — पुत्र, पत्नी, घर आदि में इतना न डूब जाना कि उनके बिना अपना अस्तित्व ही न लगे। 'समचित्तत्व' अर्थात् सुख आए या दुःख, लाभ हो या हानि — मन की स्थिरता बनी रहे। यह समभाव ज्ञान का स्वाभाविक फल है।

आज के जीवन में: प्रियजनों से प्रेम करें, पर उनमें इतना न खो जाएँ कि स्वयं की स्थिरता ही चली जाए — यही समभाव का सार है।


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