भगवद्गीता

भगवद्गीता अध्याय 13, श्लोक 11–20 | क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग | अर्थ सहित

6 अक्तूबर 2026·9 मिनट में पढ़ें
भगवद्गीता अध्याय 13, श्लोक 11–20 | क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग | अर्थ सहित

अध्याय तेरह के पहले खंड में श्रीकृष्ण ने क्षेत्र (शरीर) और क्षेत्रज्ञ (आत्मा) का परिचय दिया, फिर ज्ञान के बीस लक्षण गिनाने आरंभ किए। इस खंड में वे उन लक्षणों को पूरा करते हैं, फिर जानने योग्य परम ब्रह्म का विस्तृत वर्णन करते हैं, और अंत में प्रकृति तथा पुरुष के अनादि स्वरूप की ओर मुड़ते हैं।

श्लोक 13.11

वक्ता: श्रीकृष्ण

मयि चानन्ययोगेन भक्ितरव्यभिचारिणी।
विविक्तदेशसेवित्वमरतिर्जनसंसदि ॥13.11॥

mayi chānanya-yogena bhaktir avyabhichāriṇī / vivikta-deśha-sevitvam aratir jana-sansadi

हिंदी अनुवाद: मेरे प्रति अनन्य योग के द्वारा अटल भक्ति का होना, एकान्त स्थान में रहने का स्वभाव होना, और जन-समुदाय में आसक्ति न होना — ये भी ज्ञान के लक्षण हैं।

भावार्थ: श्रीकृष्ण ज्ञान के लक्षणों की सूची में तीन और गुण जोड़ते हैं। 'अव्यभिचारिणी भक्ति' का अर्थ है — ऐसी भक्ति जो किसी भी परिस्थिति में डिगे नहीं, जो केवल परमात्मा की ओर लगी रहे। 'विविक्त देश सेवित्व' अर्थात् एकान्त स्थान का सेवन — यह मन को बाहरी विक्षेपों से बचाता है। 'जन-संसदि अरति' अर्थात् भीड़-भाड़ और व्यर्थ की सभाओं में रुचि न रखना — यह चित्त को भीतर की ओर मोड़ने में सहायक है। ये तीनों साधक को परमात्मा के निकट ले जाते हैं।

आज के जीवन में: जो व्यक्ति व्यर्थ की भीड़ से दूर रहकर, एकान्त में परमात्मा की भक्ति में लगा रहता है, वह भीतरी शान्ति को प्राप्त करता है।


श्लोक 13.12

वक्ता: श्रीकृष्ण

अध्यात्मज्ञाननित्यत्वं तत्त्वज्ञानार्थदर्शनम्।
एतज्ज्ञानमिति प्रोक्तमज्ञानं यदतोन्यथा ॥13.12॥

adhyātma-jñāna-nityatvaṁ tattva-jñānārtha-darśhanam / etaj jñānam iti proktam ajñānaṁ yad ato ’nyathā

हिंदी अनुवाद: अध्यात्म-ज्ञान में निरंतर स्थिर रहना और तत्त्वज्ञान के लक्ष्यरूप परमात्मा को सर्वत्र देखना — यह ज्ञान है; और जो इससे विपरीत है वह अज्ञान कहा गया है।

भावार्थ: इस श्लोक से श्रीकृष्ण ज्ञान के लक्षणों की सूची का समापन करते हैं। 'अध्यात्मज्ञाननित्यत्व' का अर्थ है — आत्मा और परमात्मा संबंधी ज्ञान में सदा लगे रहना, उससे कभी विचलित न होना। 'तत्त्वज्ञानार्थदर्शन' का अर्थ है — सच्चे ज्ञान का जो परम फल है, उस परमात्मा को हर जगह देखना। श्रीकृष्ण स्पष्ट करते हैं कि जो इन गुणों से विपरीत है — अहंकार, आसक्ति, अज्ञान — वह सब अज्ञान है। इस प्रकार ज्ञान और अज्ञान की सीमा-रेखा खींची गई है।

आज के जीवन में: जो व्यक्ति आत्म-ज्ञान में निरंतर लगा रहता है और सब में परमात्मा को देखता है, वही सच्चे अर्थ में ज्ञानी है।


श्लोक 13.13

वक्ता: श्रीकृष्ण

ज्ञेयं यत्तत्प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वाऽमृतमश्नुते।
अनादिमत्परं ब्रह्म न सत्तन्नासदुच्यते ॥13.13॥

jñeyaṁ yat tat pravakṣhyāmi yaj jñātvāmṛitam aśhnute / anādi mat-paraṁ brahma na sat tan nāsad uchyate

हिंदी अनुवाद: अब मैं उस ज्ञेय तत्त्व को भली-भाँति बताऊँगा, जिसे जानकर मनुष्य अमरता का अनुभव करता है। वह अनादि और परम ब्रह्म है — उसे न सत् कहा जा सकता है, न असत्।

भावार्थ: ज्ञान के लक्षण बताने के बाद श्रीकृष्ण अब 'ज्ञेय' — अर्थात् जिसे जानना है — उस परम ब्रह्म का वर्णन करते हैं। 'अनादि' का अर्थ है जिसका कोई आरंभ नहीं। 'न सत् न असत्' — यह कहकर वे बताते हैं कि ब्रह्म सामान्य वस्तुओं की तरह 'है' या 'नहीं है' की श्रेणी में नहीं आता; वह इन दोनों से परे है। जो उसे जान लेता है, वह जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त होकर अमरता को प्राप्त होता है। यह श्लोक ब्रह्म के वर्णन का द्वार खोलता है।

आज के जीवन में: परम सत्य को किसी एक परिभाषा में बाँधा नहीं जा सकता; उसे जानने की जिज्ञासा ही मनुष्य को भीतर की अमरता की ओर ले जाती है।


श्लोक 13.14

वक्ता: श्रीकृष्ण

सर्वतः पाणिपादं तत्सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम्।
सर्वतः श्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति ॥13.14॥

sarvataḥ pāṇi-pādaṁ tat sarvato ’kṣhi-śhiro-mukham / sarvataḥ śhrutimal loke sarvam āvṛitya tiṣhṭhati

हिंदी अनुवाद: वे परमात्मा सब दिशाओं में हाथ-पैरों वाले, सब ओर नेत्रों, सिरों और मुखों वाले, तथा सब ओर कानों वाले हैं — वे इस सारे संसार को व्याप्त करके स्थित हैं।

भावार्थ: यह श्लोक परमात्मा की सर्वव्यापकता को काव्यात्मक रूप में प्रकट करता है। इसका अर्थ यह नहीं कि परमात्मा के शाब्दिक रूप से असंख्य हाथ-पैर हैं, बल्कि यह है कि प्रत्येक प्राणी के हाथ, पैर, नेत्र, कान — सब में वही परमात्मा की शक्ति काम कर रही है। जो भी देखता है, सुनता है, चलता है — उन सबमें वही एक चेतना है। 'सर्वमावृत्य तिष्ठति' — वे सबको ढककर, सबमें समाकर स्थित हैं। यह सर्वव्यापकता का सबसे सुंदर वर्णन है।

आज के जीवन में: जब हम यह समझें कि हर प्राणी में वही एक परमात्मा की शक्ति काम कर रही है, तो दूसरों के प्रति आदर और करुणा स्वाभाविक हो जाती है।


श्लोक 13.15

वक्ता: श्रीकृष्ण

सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम्।
असक्तं सर्वभृच्चैव निर्गुणं गुणभोक्तृ च ॥13.15॥

sarvendriya-guṇābhāsaṁ sarvendriya-vivarjitam / asaktaṁ sarva-bhṛich chaiva nirguṇaṁ guṇa-bhoktṛi cha

हिंदी अनुवाद: वे परमात्मा समस्त इन्द्रियों से रहित हैं, फिर भी सब इन्द्रियों के विषयों को प्रकाशित करते हैं; आसक्ति से रहित हैं, फिर भी सबका भरण-पोषण करते हैं; गुणों से परे हैं, फिर भी सब गुणों के भोक्ता हैं।

भावार्थ: यह श्लोक परमात्मा के विरोधाभासी से दिखने वाले स्वरूप को समझाता है। उनके पास अपनी इन्द्रियाँ नहीं हैं, फिर भी सब इन्द्रियों की शक्ति उन्हीं से है। वे किसी से आसक्त नहीं, फिर भी सारी सृष्टि का पालन करते हैं। वे प्रकृति के तीन गुणों — सत्व, रज, तम — से बँधे नहीं, फिर भी सब गुणों की क्रिया उनकी उपस्थिति में होती है। यह विरोधाभास नहीं, बल्कि परमात्मा की अचिन्त्य प्रकृति का वर्णन है — वे सबमें हैं, पर सब से परे भी हैं।

आज के जीवन में: जो सबका पालन करे पर किसी से आसक्त न हो — यह आदर्श हमें निःस्वार्थ सेवा की प्रेरणा देता है।


श्लोक 13.16

वक्ता: श्रीकृष्ण

बहिरन्तश्च भूतानामचरं चरमेव च।
सूक्ष्मत्वात्तदविज्ञेयं दूरस्थं चान्तिके च तत् ॥13.16॥

bahir antaśh cha bhūtānām acharaṁ charam eva cha / sūkṣhmatvāt tad avijñeyaṁ dūra-sthaṁ chāntike cha tat

हिंदी अनुवाद: वे परमात्मा समस्त प्राणियों के बाहर और भीतर भी हैं, चर और अचर दोनों रूपों में भी वही हैं; वे अत्यन्त सूक्ष्म होने के कारण जाने नहीं जा सकते, और दूर से दूर तथा निकट से निकट भी वही हैं।

भावार्थ: इस श्लोक में परमात्मा की सर्वव्यापकता और सूक्ष्मता का वर्णन है। 'बाहर-भीतर' — वे न केवल प्राणियों के अंदर हैं, बल्कि उनके बाहर भी व्याप्त हैं। 'चर-अचर' — चलने वाले जीव और न चलने वाले वृक्ष-पर्वत आदि, सब में वही हैं। 'सूक्ष्मत्वात् अविज्ञेय' — वे इतने सूक्ष्म हैं कि साधारण बुद्धि और इन्द्रियों से पकड़ में नहीं आते। 'दूर और निकट' — जो उन्हें नहीं जानता उसके लिए वे बहुत दूर हैं, जो जानता है उसके लिए सबसे निकट।

आज के जीवन में: परमात्मा हमारे सबसे निकट हैं — हमारे भीतर ही — पर हम उन्हें बाहर खोजते रहते हैं; यह श्लोक भीतर की ओर मुड़ने की प्रेरणा देता है।


श्लोक 13.17

वक्ता: श्रीकृष्ण

अविभक्तं च भूतेषु विभक्तमिव च स्थितम्।
भूतभर्तृ च तज्ज्ञेयं ग्रसिष्णु प्रभविष्णु च ॥13.17॥

avibhaktaṁ cha bhūteṣhu vibhaktam iva cha sthitam / bhūta-bhartṛi cha taj jñeyaṁ grasiṣhṇu prabhaviṣhṇu cha

हिंदी अनुवाद: वे परमात्मा स्वयं अविभाजित हैं, फिर भी सब प्राणियों में विभक्त-से प्रतीत होते हैं। वे जानने योग्य परमात्मा ही सब प्राणियों को उत्पन्न करने वाले, उनका पालन करने वाले और उनका संहार करने वाले हैं।

भावार्थ: 'अविभक्त' — परमात्मा एक और अखंड हैं, उनमें कोई टुकड़ा नहीं होता। फिर भी करोड़ों प्राणियों में वे 'विभक्त-से' दिखते हैं — जैसे एक ही सूर्य अनेक जलाशयों में अलग-अलग दिखता है। 'भूतभर्तृ' — वे सब प्राणियों के पालक हैं। 'ग्रसिष्णु' — वे संहार करने वाले हैं। 'प्रभविष्णु' — वे सृष्टि करने वाले हैं। इस प्रकार सृष्टि, पालन और संहार — तीनों कार्य उसी एक परमात्मा में समाहित हैं।

आज के जीवन में: जब हम यह जानें कि सृष्टि, पालन और संहार — सब एक ही परम शक्ति के कार्य हैं, तो जीवन की हर घटना को स्वीकार करना सहज हो जाता है।


श्लोक 13.18

वक्ता: श्रीकृष्ण

ज्योतिषामपि तज्ज्योतिस्तमसः परमुच्यते।
ज्ञानं ज्ञेयं ज्ञानगम्यं हृदि सर्वस्य विष्ठितम् ॥13.18॥

jyotiṣhām api taj jyotis tamasaḥ param uchyate / jñānaṁ jñeyaṁ jñāna-gamyaṁ hṛidi sarvasya viṣhṭhitam

हिंदी अनुवाद: वे परमात्मा सब ज्योतियों की भी ज्योति हैं और अज्ञान से सर्वथा परे कहे गए हैं। वे ज्ञानस्वरूप हैं, जानने योग्य हैं, ज्ञान के साधनों से प्राप्त होने योग्य हैं, और सबके हृदय में विराजमान हैं।

भावार्थ: 'ज्योतिषामपि ज्योति' — सूर्य, चन्द्र, अग्नि आदि सब ज्योतियाँ जिस चेतना-प्रकाश से प्रकाशित होती हैं, वह परमात्मा उन सबका भी प्रकाश है। 'तमसः परम' — वे अज्ञान-रूपी अंधकार से सर्वथा परे हैं। 'ज्ञानं ज्ञेयं ज्ञानगम्यम्' — वे स्वयं ज्ञान हैं, वे ही जानने योग्य हैं, और ज्ञान के साधनों से ही उन तक पहुँचा जा सकता है। 'हृदि सर्वस्य विष्ठितम्' — वे बाहर कहीं नहीं, हर प्राणी के हृदय में ही बसे हैं।

आज के जीवन में: परमात्मा हमारे अपने हृदय में ही प्रकाशरूप में विद्यमान हैं; उन्हें बाहर नहीं, भीतर खोजना है।


श्लोक 13.19

वक्ता: श्रीकृष्ण

इति क्षेत्रं तथा ज्ञानं ज्ञेयं चोक्तं समासतः।
मद्भक्त एतद्विज्ञाय मद्भावायोपपद्यते ॥13.19॥

iti kṣhetraṁ tathā jñānaṁ jñeyaṁ choktaṁ samāsataḥ / mad-bhakta etad vijñāya mad-bhāvāyopapadyate

हिंदी अनुवाद: इस प्रकार क्षेत्र, ज्ञान और ज्ञेय — तीनों को संक्षेप में कहा गया। मेरा भक्त इसे तत्त्व से जानकर मेरे भाव को — मेरे स्वरूप को — प्राप्त हो जाता है।

भावार्थ: यह श्लोक एक महत्त्वपूर्ण पड़ाव है। श्रीकृष्ण यहाँ अब तक के उपदेश का सार बताते हैं — क्षेत्र (शरीर और उसके विकार), ज्ञान (उसके बीस लक्षण), और ज्ञेय (परम ब्रह्म का स्वरूप) — इन तीनों को संक्षेप में समझाया गया। 'मद्भक्त' — जो भक्त इसे केवल बौद्धिक रूप से नहीं, बल्कि 'तत्त्वसे' अर्थात् गहराई से अनुभव करके जानता है, वह 'मद्भाव' — परमात्मा के स्वरूप को — प्राप्त हो जाता है। ज्ञान और भक्ति का यह सुंदर संगम है।

आज के जीवन में: केवल पढ़ना नहीं, बल्कि तत्त्व से जानना और अनुभव करना ही मनुष्य को परमात्मा तक पहुँचाता है।


श्लोक 13.20

वक्ता: श्रीकृष्ण

प्रकृतिं पुरुषं चैव विद्ध्यनादी उभावपि।
विकारांश्च गुणांश्चैव विद्धि प्रकृतिसंभवान् ॥13.20॥

prakṛitiṁ puruṣhaṁ chaiva viddhy anādī ubhāv api / vikārānśh cha guṇānśh chaiva viddhi prakṛiti-sambhavān

हिंदी अनुवाद: प्रकृति और पुरुष — दोनों को ही अनादि समझो; और सब विकार तथा गुण प्रकृति से ही उत्पन्न होते हैं — यह भी जानो।

भावार्थ: यहाँ से श्रीकृष्ण एक नया विषय आरंभ करते हैं — प्रकृति और पुरुष का भेद। 'प्रकृति' वह मूल शक्ति है जिससे यह सारी सृष्टि, शरीर, इन्द्रियाँ और मन बने हैं। 'पुरुष' वह चेतन तत्त्व है जो इस सबका साक्षी है। दोनों 'अनादि' हैं — अर्थात् दोनों का कोई आरंभ नहीं। सत्व, रज, तम — ये तीन गुण और उनसे होने वाले सब विकार प्रकृति से ही उत्पन्न होते हैं। हिंदी अनुवाद में यह भी जोड़ा गया है कि कार्य-करण की क्रियाओं में प्रकृति हेतु है और सुख-दुःख के भोग में पुरुष हेतु है।

आज के जीवन में: जब हम समझें कि शरीर और मन प्रकृति के हैं और आत्मा उनसे परे है, तो सुख-दुःख में समभाव रखना सहज हो जाता है।


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