भगवद्गीता अध्याय 13, श्लोक 21–30 | क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग | अर्थ सहित
तेरहवें अध्याय में श्रीकृष्ण ने क्षेत्र (शरीर) और क्षेत्रज्ञ (आत्मा) का स्वरूप तथा ज्ञान के लक्षण समझाए। अब इस खंड में वे प्रकृति और पुरुष के कार्य-विभाजन को स्पष्ट करते हैं, परमात्मा के देह में स्थित होने का रहस्य बताते हैं, और अंत में यह दर्शाते हैं कि सब प्राणियों में एक ही परमेश्वर को समभाव से देखना ही सच्चा दर्शन है।
श्लोक 13.21
वक्ता: श्रीकृष्ण
कार्यकारणकर्तृत्वे हेतुः प्रकृतिरुच्यते।
पुरुषः सुखदुःखानां भोक्तृत्वे हेतुरुच्यते ॥13.21॥
kārya-kāraṇa-kartṛitve hetuḥ prakṛitir uchyate / puruṣhaḥ sukha-duḥkhānāṁ bhoktṛitve hetur uchyate
हिंदी अनुवाद: कार्य और करण के द्वारा होने वाली क्रियाओं को उत्पन्न करने में प्रकृति हेतु कही जाती है, और सुख-दुःखों के भोक्तापन में पुरुष हेतु कहा जाता है।
भावार्थ: श्रीकृष्ण अर्जुन को प्रकृति और पुरुष के अलग-अलग कार्यों का विभाजन समझा रहे हैं। 'कार्य' अर्थात शरीर और इंद्रियाँ, 'करण' अर्थात मन-बुद्धि — इन सबकी उत्पत्ति और क्रिया का मूल कारण प्रकृति है। परंतु जो सुख-दुःख का अनुभव होता है, उसका कारण पुरुष अर्थात आत्मा है। दोनों की भूमिका भिन्न है — प्रकृति करती है, पुरुष भोगता है। यह भेद समझना ज्ञान की नींव है।
आज के जीवन में: जीवन में जो घटनाएँ घटती हैं वे परिस्थितियों के कारण हैं, किंतु उनसे सुख या दुःख का अनुभव हमारी अपनी आंतरिक स्थिति पर निर्भर करता है।
श्लोक 13.22
वक्ता: श्रीकृष्ण
पुरुषः प्रकृतिस्थो हि भुङ्क्ते प्रकृतिजान्गुणान्।
कारणं गुणसङ्गोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु ॥13.22॥
puruṣhaḥ prakṛiti-stho hi bhuṅkte prakṛiti-jān guṇān / kāraṇaṁ guṇa-saṅgo ’sya sad-asad-yoni-janmasu
हिंदी अनुवाद: प्रकृति में स्थित पुरुष प्रकृति से उत्पन्न गुणों का भोक्ता बनता है, और इन गुणों का संग ही उसके ऊँच-नीच योनियों में जन्म लेने का कारण बनता है।
भावार्थ: जब आत्मा (पुरुष) प्रकृति के संपर्क में आती है, तो वह सत्त्व, रज और तम — इन तीन गुणों के प्रभाव में आकर उनका भोग करने लगती है। 'गुणसंग' अर्थात इन गुणों से लगाव — यही बंधन का मूल कारण है। जिस गुण से जितना अधिक लगाव, उसी के अनुसार अगला जन्म होता है। इस प्रकार गुणों की आसक्ति ही जन्म-मृत्यु के चक्र को चलाती है।
आज के जीवन में: हमारी आदतें और आसक्तियाँ ही हमारे स्वभाव को गढ़ती हैं; इसलिए गुणों के प्रति सजग रहना और उनसे अनासक्त रहना आवश्यक है।
श्लोक 13.23
वक्ता: श्रीकृष्ण
उपद्रष्टाऽनुमन्ता च भर्ता भोक्ता महेश्वरः।
परमात्मेति चाप्युक्तो देहेऽस्मिन्पुरुषः परः ॥13.23॥
upadraṣhṭānumantā cha bhartā bhoktā maheśhvaraḥ / paramātmeti chāpy ukto dehe ’smin puruṣhaḥ paraḥ
हिंदी अनुवाद: इस देह में स्थित परम पुरुष उपद्रष्टा, अनुमन्ता, भर्ता, भोक्ता, महेश्वर और परमात्मा कहा जाता है।
भावार्थ: श्रीकृष्ण देह में विराजमान परम पुरुष के छह नाम और उनके अर्थ बताते हैं। 'उपद्रष्टा' — जो साक्षी भाव से देखता है; 'अनुमन्ता' — जो सम्मति देता है; 'भर्ता' — जो पालन करता है; 'भोक्ता' — जो अनुभव करता है; 'महेश्वर' — जो स्वामी है; और 'परमात्मा' — जो स्वरूप से सर्वोच्च है। यह परम पुरुष देह में रहते हुए भी देह से परे और असंग है — यही उसकी महिमा है।
आज के जीवन में: भीतर बैठा साक्षी भाव — जो देखता है पर लिप्त नहीं होता — वही हमारा वास्तविक स्वरूप है; उसे पहचानना ही आत्मज्ञान है।
श्लोक 13.24
वक्ता: श्रीकृष्ण
य एवं वेत्ति पुरुषं प्रकृतिं च गुणैःसह।
सर्वथा वर्तमानोऽपि न स भूयोऽभिजायते ॥13.24॥
ya evaṁ vetti puruṣhaṁ prakṛitiṁ cha guṇaiḥ saha / sarvathā vartamāno ’pi na sa bhūyo ’bhijāyate
हिंदी अनुवाद: जो मनुष्य इस प्रकार पुरुष को और गुणों सहित प्रकृति को अलग-अलग जानता है, वह किसी भी अवस्था में रहते हुए भी पुनः जन्म नहीं लेता।
भावार्थ: श्रीकृष्ण यहाँ इस ज्ञान का फल बताते हैं। जो साधक प्रकृति और पुरुष के भेद को, तथा तीनों गुणों की भूमिका को भली-भाँति समझ लेता है, वह चाहे किसी भी परिस्थिति में हो — गृहस्थ हो या वैरागी — वह पुनर्जन्म के बंधन से मुक्त हो जाता है। यह ज्ञान ही मोक्ष का द्वार है।
आज के जीवन में: जो व्यक्ति अपने भीतर आत्मा और शरीर के भेद को समझ लेता है, वह जीवन की किसी भी परिस्थिति में विचलित नहीं होता।
श्लोक 13.25
वक्ता: श्रीकृष्ण
ध्यानेनात्मनि पश्यन्ति केचिदात्मानमात्मना।
अन्ये सांख्येन योगेन कर्मयोगेन चापरे ॥13.25॥
dhyānenātmani paśhyanti kechid ātmānam ātmanā / anye sānkhyena yogena karma-yogena chāpare
हिंदी अनुवाद: कुछ लोग ध्यानयोग से, कुछ सांख्ययोग से, और कुछ कर्मयोग से अपने भीतर परमात्मतत्त्व का अनुभव करते हैं।
भावार्थ: श्रीकृष्ण बताते हैं कि परमात्मा तक पहुँचने के मार्ग एक नहीं, अनेक हैं। 'ध्यान' — मन को एकाग्र कर भीतर देखना; 'सांख्ययोग' — विवेक और ज्ञान के द्वारा आत्मा-अनात्मा का भेद जानना; 'कर्मयोग' — फल की आसक्ति छोड़कर कर्म करना। तीनों मार्ग अलग-अलग स्वभाव के साधकों के लिए हैं, किंतु लक्ष्य एक ही है — आत्मदर्शन।
आज के जीवन में: परमात्मा को पाने का एक ही रास्ता नहीं है; अपनी प्रकृति और रुचि के अनुसार साधना चुनना उचित है।
श्लोक 13.26
वक्ता: श्रीकृष्ण
अन्ये त्वेवमजानन्तः श्रुत्वाऽन्येभ्य उपासते।
तेऽपि चातितरन्त्येव मृत्युं श्रुतिपरायणाः ॥13.26॥
anye tv evam ajānantaḥ śhrutvānyebhya upāsate / te ’pi chātitaranty eva mṛityuṁ śhruti-parāyaṇāḥ
हिंदी अनुवाद: जो इन साधनों को नहीं जानते, वे दूसरों से सुनकर उपासना करते हैं; ऐसे श्रवण-परायण मनुष्य भी मृत्यु को पार कर जाते हैं।
भावार्थ: श्रीकृष्ण यहाँ उन साधकों को आश्वासन देते हैं जो ध्यान, ज्ञान या कर्मयोग में पारंगत नहीं हैं। यदि कोई केवल श्रद्धापूर्वक सुनकर और उस पर आस्था रखकर उपासना करे, तो वह भी मृत्यु के बंधन से मुक्त हो सकता है। 'श्रुतिपरायण' अर्थात जो सुने हुए को ही अपना परम आश्रय मानता है — उसकी श्रद्धा ही उसका साधन बन जाती है।
आज के जीवन में: गहरी साधना न हो सके तो भी श्रद्धापूर्वक सत्संग और श्रवण का मार्ग भी मनुष्य को ऊपर उठाता है।
श्लोक 13.27
वक्ता: श्रीकृष्ण
यावत्सञ्जायते किञ्चित्सत्त्वं स्थावरजङ्गमम्।
क्षेत्रक्षेत्रज्ञसंयोगात्तद्विद्धि भरतर्षभ ॥13.27॥
yāvat sañjāyate kiñchit sattvaṁ sthāvara-jaṅgamam / kṣhetra-kṣhetrajña-sanyogāt tad viddhi bharatarṣhabha
हिंदी अनुवाद: हे भरतवंशियों में श्रेष्ठ अर्जुन! स्थावर और जंगम जितने भी प्राणी उत्पन्न होते हैं, उन सबको क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के संयोग से उत्पन्न हुआ समझो।
भावार्थ: श्रीकृष्ण अर्जुन को संपूर्ण सृष्टि का मूल सिद्धांत बताते हैं। 'स्थावर' अर्थात वृक्ष-पर्वत जैसे अचल प्राणी, और 'जंगम' अर्थात चलने-फिरने वाले प्राणी — सभी का जन्म क्षेत्र (शरीर-प्रकृति) और क्षेत्रज्ञ (आत्मा-चेतना) के मिलन से होता है। बिना इन दोनों के संयोग के कोई भी प्राणी अस्तित्व में नहीं आ सकता।
श्लोक 13.28
वक्ता: श्रीकृष्ण
समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम्।
विनश्यत्स्वविनश्यन्तं यः पश्यति स पश्यति ॥13.28॥
samaṁ sarveṣhu bhūteṣhu tiṣhṭhantaṁ parameśhvaram / vinaśhyatsv avinaśhyantaṁ yaḥ paśhyati sa paśhyati
हिंदी अनुवाद: जो नष्ट होते हुए सभी प्राणियों में परमेश्वर को अविनाशी और समरूप से स्थित देखता है, वही वास्तव में सही देखता है।
भावार्थ: श्रीकृष्ण यहाँ सच्चे दर्शन की परिभाषा देते हैं। शरीर नश्वर है, पर उसमें बसा परमेश्वर अविनाशी है। जो साधक इस भेद को समझकर हर प्राणी में — चाहे वह छोटा हो या बड़ा, मित्र हो या शत्रु — एक ही परमात्मा को समान रूप से देखता है, वही यथार्थ दृष्टि वाला है। यह समदर्शन ही ज्ञान की पराकाष्ठा है।
आज के जीवन में: जब हम हर मनुष्य में, हर प्राणी में एक ही चेतना को देखने लगते हैं, तब भेदभाव और द्वेष स्वयं ही समाप्त हो जाते हैं।
श्लोक 13.29
वक्ता: श्रीकृष्ण
समं पश्यन्हि सर्वत्र समवस्थितमीश्वरम्।
न हिनस्त्यात्मनाऽऽत्मानं ततो याति परां गतिम् ॥13.29॥
samaṁ paśhyan hi sarvatra samavasthitam īśhvaram / na hinasty ātmanātmānaṁ tato yāti parāṁ gatim
हिंदी अनुवाद: सब जगह समरूप से स्थित ईश्वर को समभाव से देखने वाला मनुष्य अपने-आप से अपनी हिंसा नहीं करता, और इसीलिए वह परम गति को प्राप्त होता है।
भावार्थ: जो व्यक्ति सर्वत्र ईश्वर को एकसमान देखता है, वह किसी को तुच्छ नहीं समझता, किसी से घृणा नहीं करता। 'आत्मना आत्मानं न हिनस्ति' — अर्थात वह अपने ही आत्मस्वरूप की हिंसा नहीं करता, क्योंकि दूसरे में भी वही आत्मा है। इस समदर्शन से अहंकार और विभाजन की भावना मिटती है, और साधक परम गति — मोक्ष — को प्राप्त करता है।
आज के जीवन में: दूसरों को कष्ट देना वास्तव में अपने ही आत्मस्वरूप को कष्ट देना है — यह भाव जिसमें जागता है, वह हिंसा और द्वेष से स्वयं दूर हो जाता है।
श्लोक 13.30
वक्ता: श्रीकृष्ण
प्रकृत्यैव च कर्माणि क्रियमाणानि सर्वशः।
यः पश्यति तथाऽऽत्मानमकर्तारं स पश्यति ॥13.30॥
prakṛityaiva cha karmāṇi kriyamāṇāni sarvaśhaḥ / yaḥ paśhyati tathātmānam akartāraṁ sa paśhyati
हिंदी अनुवाद: जो सभी क्रियाओं को सब प्रकार से प्रकृति के द्वारा ही होती हुई देखता है और अपने-आप को अकर्ता देखता है, वही यथार्थ देखता है।
भावार्थ: श्रीकृष्ण यहाँ कर्तृत्व के भ्रम को दूर करते हैं। समस्त क्रियाएँ — शरीर की, इंद्रियों की, मन की — सब प्रकृति के तीन गुणों द्वारा संपन्न होती हैं। आत्मा स्वयं कुछ नहीं करती, वह साक्षी मात्र है। जो साधक इस सत्य को जान लेता है और 'मैं कर्ता हूँ' — इस अहंकार से मुक्त हो जाता है, वही सच्चा ज्ञानी है और वही यथार्थ दर्शन करता है।
आज के जीवन में: जब हम यह समझ लेते हैं कि कर्म प्रकृति करती है और हम साक्षी मात्र हैं, तब अहंकार और फल की आसक्ति दोनों शिथिल पड़ जाते हैं।
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