भगवद्गीता अध्याय 13, श्लोक 31–35 | क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग | अर्थ सहित
अध्याय तेरह में श्रीकृष्ण ने क्षेत्र (शरीर और प्रकृति) तथा क्षेत्रज्ञ (आत्मा) का विस्तृत विवेचन किया है। अब इस अध्याय के अंतिम खंड में वे बताते हैं कि जब साधक सब प्राणियों की एकता को देखता है, जब वह आत्मा की निर्लिप्तता को समझता है, और जब वह ज्ञान की दृष्टि से क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ का भेद जान लेता है — तभी वह परमात्मा को प्राप्त होता है।
श्लोक 13.31
वक्ता: श्रीकृष्ण
यदा भूतपृथग्भावमेकस्थमनुपश्यति।
तत एव च विस्तारं ब्रह्म सम्पद्यते तदा ॥13.31॥
yadā bhūta-pṛithag-bhāvam eka-stham anupaśhyati / tata eva cha vistāraṁ brahma sampadyate tadā
हिंदी अनुवाद: जब साधक सभी प्राणियों के अलग-अलग भावों को एक ही मूल में स्थित देखता है और उसी एक से उन सबका विस्तार देखता है, तब वह ब्रह्म को प्राप्त हो जाता है।
भावार्थ: श्रीकृष्ण अर्जुन को बता रहे हैं कि ब्रह्म-प्राप्ति का क्षण कौन सा है। जब साधक की दृष्टि इतनी परिपक्व हो जाती है कि वह संसार के असंख्य प्राणियों और उनके भिन्न-भिन्न स्वभावों को एक ही मूल प्रकृति में स्थित देखता है — और यह भी देखता है कि उसी एक से सबका विस्तार हुआ है — तब उसे वास्तविक एकता का बोध होता है। 'भूतपृथग्भाव' अर्थात प्राणियों की पृथकता, और 'एकस्थम्' अर्थात एक में स्थित — इन दोनों को एक साथ देखना ही ब्रह्म-दर्शन है।
आज के जीवन में: जब हम संसार की विविधता में एक ही मूल सत्ता को देखने लगते हैं, तब भेदभाव और द्वेष स्वयं ही घटने लगते हैं।
श्लोक 13.32
वक्ता: श्रीकृष्ण
अनादित्वान्निर्गुणत्वात्परमात्मायमव्ययः।
शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते ॥13.32॥
anāditvān nirguṇatvāt paramātmāyam avyayaḥ / śharīra-stho ’pi kaunteya na karoti na lipyate
हिंदी अनुवाद: हे कुन्तीनन्दन! यह परमात्मा अनादि और गुणों से रहित होने के कारण अविनाशी है। शरीर में रहते हुए भी यह न कुछ करता है और न किसी कर्म से लिप्त होता है।
भावार्थ: श्रीकृष्ण यहाँ परमात्मा की तीन विशेषताएँ बताते हैं — 'अनादि' अर्थात जिसका कोई आरंभ नहीं, 'निर्गुण' अर्थात प्रकृति के तीन गुणों से परे, और 'अव्यय' अर्थात जिसका कभी क्षय नहीं होता। ऐसा परमात्मा शरीर में रहते हुए भी कर्ता नहीं बनता और न ही कर्मों के फल से बँधता है। जैसे दर्पण में प्रतिबिंब बनते हैं पर दर्पण स्वयं निर्लिप्त रहता है, वैसे ही परमात्मा देह में रहकर भी देह के कर्मों से अछूता रहता है।
आज के जीवन में: जो अपने भीतर की आत्मा को कर्ता नहीं मानता, वह कर्म करते हुए भी बंधन से मुक्त रहता है।
श्लोक 13.33
वक्ता: श्रीकृष्ण
यथा सर्वगतं सौक्ष्म्यादाकाशं नोपलिप्यते।
सर्वत्रावस्थितो देहे तथाऽऽत्मा नोपलिप्यते ॥13.33॥
yathā sarva-gataṁ saukṣhmyād ākāśhaṁ nopalipyate / sarvatrāvasthito dehe tathātmā nopalipyate
हिंदी अनुवाद: जैसे सर्वत्र व्याप्त आकाश अत्यंत सूक्ष्म होने के कारण कहीं भी लिप्त नहीं होता, वैसे ही सब देहों में परिपूर्ण आत्मा किसी भी देह से लिप्त नहीं होता।
भावार्थ: श्रीकृष्ण आत्मा की निर्लिप्तता को समझाने के लिए आकाश का सुंदर उदाहरण देते हैं। आकाश सब जगह है — मिट्टी में, जल में, अग्नि में — फिर भी किसी से मिलता नहीं, किसी का रंग या गंध ग्रहण नहीं करता। 'सौक्ष्म्यात्' अर्थात अत्यंत सूक्ष्म होने के कारण वह सबमें रहकर भी अलग रहता है। ठीक इसी प्रकार आत्मा हर देह में है, हर जीव में है, पर किसी के सुख-दुःख, जन्म-मृत्यु से वह स्वयं प्रभावित नहीं होता।
आज के जीवन में: आत्मा की सूक्ष्मता और निर्लिप्तता को जानकर मनुष्य परिस्थितियों में भी अपना स्थिरता का भाव बनाए रख सकता है।
श्लोक 13.34
वक्ता: श्रीकृष्ण
यथा प्रकाशयत्येकः कृत्स्नं लोकमिमं रविः।
क्षेत्रं क्षेत्री तथा कृत्स्नं प्रकाशयति भारत ॥13.34॥
yathā prakāśhayaty ekaḥ kṛitsnaṁ lokam imaṁ raviḥ / kṣhetraṁ kṣhetrī tathā kṛitsnaṁ prakāśhayati bhārata
हिंदी अनुवाद: हे भरतवंशी अर्जुन! जैसे एक ही सूर्य सम्पूर्ण संसार को प्रकाशित करता है, वैसे ही क्षेत्री अर्थात आत्मा सम्पूर्ण क्षेत्र को प्रकाशित करता है।
भावार्थ: श्रीकृष्ण यहाँ सूर्य का उदाहरण देते हैं। सूर्य एक है, पर उसका प्रकाश सारे संसार में फैला है — पर्वत, नदी, वन, नगर — सब उसी एक से प्रकाशित हैं। 'क्षेत्री' अर्थात क्षेत्र का स्वामी — आत्मा — भी ऐसा ही है। वह एक होकर भी सम्पूर्ण शरीर को, उसकी इंद्रियों को, मन को, बुद्धि को — सबको चेतना का प्रकाश देता है। बिना आत्मा के शरीर जड़ है, जैसे बिना सूर्य के संसार अंधकारमय होता।
आज के जीवन में: जैसे एक सूर्य सबको प्रकाश देता है, वैसे एक ही आत्मा-चेतना सब जीवों में है — यह जानना ही सच्चा ज्ञान है।
श्लोक 13.35
वक्ता: श्रीकृष्ण
क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोरेवमन्तरं ज्ञानचक्षुषा।
भूतप्रकृतिमोक्षं च ये विदुर्यान्ति ते परम् ॥13.35॥
kṣhetra-kṣhetrajñayor evam antaraṁ jñāna-chakṣhuṣhā / bhūta-prakṛiti-mokṣhaṁ cha ye vidur yānti te param
हिंदी अनुवाद: जो लोग ज्ञान रूपी नेत्र से क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के भेद को तथा प्रकृति के बंधन से मुक्ति के मार्ग को जान लेते हैं, वे परमात्मा को प्राप्त हो जाते हैं।
भावार्थ: यह अध्याय का समापन श्लोक है। श्रीकृष्ण कहते हैं कि इस पूरे अध्याय का सार एक ही है — 'ज्ञानचक्षु' अर्थात ज्ञान की आँख से देखना। जो साधक क्षेत्र (शरीर, मन, इंद्रियाँ, प्रकृति) और क्षेत्रज्ञ (आत्मा) के बीच का अंतर स्पष्ट रूप से जान लेता है, और यह भी समझ लेता है कि प्रकृति के बंधन से मुक्ति कैसे होती है — वह परम गति को प्राप्त होता है। यह ज्ञान ही इस अध्याय का मूल उपदेश है।
आज के जीवन में: शरीर और आत्मा के भेद को ज्ञान की दृष्टि से समझना ही मुक्ति का द्वार है।
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