भगवद्गीता अध्याय 14, श्लोक 1–10 | गुणत्रयविभागयोग | अर्थ सहित
तेरहवें अध्याय में श्रीकृष्ण ने क्षेत्र, क्षेत्रज्ञ और प्रकृति-पुरुष के भेद को समझाया था। अब चौदहवें अध्याय 'गुणत्रयविभागयोग' में वे उस ज्ञान को और गहरा करते हुए बताते हैं कि प्रकृति से उत्पन्न तीन गुण — सत्त्व, रज और तम — किस प्रकार जीव को बाँधते हैं। इस पहले खंड में श्रीकृष्ण सर्वश्रेष्ठ ज्ञान की महिमा, सृष्टि की उत्पत्ति का रहस्य और तीनों गुणों के स्वभाव तथा उनके परस्पर उठने-गिरने का वर्णन करते हैं।
श्लोक 14.1
वक्ता: श्रीकृष्ण
परं भूयः प्रवक्ष्यामि ज्ञानानां ज्ञानमुत्तमम्।
यज्ज्ञात्वा मुनयः सर्वे परां सिद्धिमितो गताः ॥14.1॥
śhrī-bhagavān uvācha / paraṁ bhūyaḥ pravakṣhyāmi jñānānāṁ jñānam uttamam / yaj jñātvā munayaḥ sarve parāṁ siddhim ito gatāḥ
हिंदी अनुवाद: श्रीभगवान् बोले — मैं फिर से सब ज्ञानों में सर्वश्रेष्ठ और परम ज्ञान को कहूँगा, जिसे जानकर सभी मुनिजन इस संसार से मुक्त होकर परम सिद्धि को प्राप्त हो गए हैं।
भावार्थ: श्रीकृष्ण अर्जुन से कह रहे हैं कि वे एक बार फिर उस ज्ञान को सुनाएँगे जो सभी ज्ञानों में उत्तम है। 'परां सिद्धिम्' का अर्थ है — परम सिद्धि अर्थात् मोक्ष। 'मुनयः' यानी जो मनन करते हैं, जिज्ञासु साधक। यह ज्ञान कोई नया नहीं, बल्कि वही शाश्वत सत्य है जिसे पाकर अनेक साधक संसार के बंधन से पार हो गए। इस प्रकार श्रीकृष्ण अर्जुन को इस अध्याय के लिए तैयार करते हैं।
आज के जीवन में: जो ज्ञान अनगिनत साधकों को मुक्ति दिला चुका है, उसे श्रद्धा और ध्यान से सुनने की तत्परता रखें।
श्लोक 14.2
वक्ता: श्रीकृष्ण
इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमागताः।
सर्गेऽपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथन्ति च ॥14.2॥
idaṁ jñānam upāśhritya mama sādharmyam āgatāḥ / sarge ’pi nopajāyante pralaye na vyathanti cha
हिंदी अनुवाद: इस ज्ञान का आश्रय लेकर जो मनुष्य मेरी समानता को प्राप्त हो गए हैं, वे महासर्ग में भी जन्म नहीं लेते और महाप्रलय में भी व्यथित नहीं होते।
भावार्थ: यहाँ 'साधर्म्यम्' का अर्थ है — ईश्वर के स्वभाव की समानता, अर्थात् उनसे एकता। जो इस परम ज्ञान को आत्मसात कर लेते हैं, वे जन्म-मृत्यु के चक्र से बाहर हो जाते हैं। 'महासर्ग' यानी ब्रह्मांड की नई सृष्टि के समय भी उनका पुनर्जन्म नहीं होता, और 'महाप्रलय' यानी समस्त सृष्टि के विनाश के समय भी वे विचलित नहीं होते। यह ज्ञान की सर्वोच्च उपलब्धि है।
आज के जीवन में: सच्चा ज्ञान मनुष्य को जीवन के उतार-चढ़ाव में भी अडिग और निर्भय बनाता है।
श्लोक 14.3
वक्ता: श्रीकृष्ण
मम योनिर्महद्ब्रह्म तस्मिन् गर्भं दधाम्यहम्।
संभवः सर्वभूतानां ततो भवति भारत ॥14.3॥
mama yonir mahad brahma tasmin garbhaṁ dadhāmy aham / sambhavaḥ sarva-bhūtānāṁ tato bhavati bhārata
हिंदी अनुवाद: हे भरतवंशी अर्जुन! मेरी मूल प्रकृति ही उत्पत्ति का स्थान है और मैं उसमें जीव-रूपी गर्भ को स्थापित करता हूँ; उसी से समस्त प्राणियों की उत्पत्ति होती है।
भावार्थ: 'महद्ब्रह्म' यहाँ मूल प्रकृति को कहा गया है जो समस्त सृष्टि की जननी है। श्रीकृष्ण कहते हैं कि वे उस प्रकृति में चेतन तत्त्व — जीव — का बीज स्थापित करते हैं। इस प्रकार सृष्टि में दो तत्त्व हैं — प्रकृति (जड़) और पुरुष (चेतन)। इन दोनों के संयोग से ही समस्त प्राणियों का जन्म होता है। यह श्लोक सृष्टि की उत्पत्ति के मूल रहस्य को सरल रूप में प्रस्तुत करता है।
श्लोक 14.4
वक्ता: श्रीकृष्ण
सर्वयोनिषु कौन्तेय मूर्तयः सम्भवन्ति याः।
तासां ब्रह्म महद्योनिरहं बीजप्रदः पिता ॥14.4॥
sarva-yoniṣhu kaunteya mūrtayaḥ sambhavanti yāḥ / tāsāṁ brahma mahad yonir ahaṁ bīja-pradaḥ pitā
हिंदी अनुवाद: हे कुन्तीनन्दन! सभी योनियों में जितने भी शरीर उत्पन्न होते हैं, उन सबकी माता मूल प्रकृति है और मैं बीज देने वाला पिता हूँ।
भावार्थ: पिछले श्लोक में जो बात कही गई, उसे यहाँ और स्पष्ट किया गया है। चाहे कोई भी योनि हो — मनुष्य, पशु, पक्षी या अन्य — सभी का जन्म प्रकृति और परमात्मा के संयोग से होता है। 'बीजप्रदः पिता' अर्थात् चेतना का बीज देने वाले पिता परमात्मा हैं। इस प्रकार श्रीकृष्ण यह स्थापित करते हैं कि समस्त सृष्टि में एक ही परम सत्ता का विस्तार है।
श्लोक 14.5
वक्ता: श्रीकृष्ण
सत्त्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृतिसंभवाः।
निबध्नन्ति महाबाहो देहे देहिनमव्ययम् ॥14.5॥
sattvaṁ rajas tama iti guṇāḥ prakṛiti-sambhavāḥ / nibadhnanti mahā-bāho dehe dehinam avyayam
हिंदी अनुवाद: हे महाबाहो! प्रकृति से उत्पन्न सत्त्व, रज और तम — ये तीनों गुण अविनाशी आत्मा को देह में बाँध देते हैं।
भावार्थ: 'गुण' का अर्थ यहाँ प्रकृति के तीन मूल धर्म हैं — सत्त्व (प्रकाश, शांति), रज (क्रिया, राग) और तम (जड़ता, अज्ञान)। 'देही' यानी आत्मा स्वयं 'अव्यय' — अविनाशी — है, फिर भी ये गुण उसे देह से जोड़कर बाँध देते हैं। यह बंधन आत्मा का नहीं, बल्कि गुणों के प्रभाव में आने का परिणाम है। इस श्लोक से तीन गुणों की विस्तृत चर्चा आरंभ होती है।
आज के जीवन में: हमारे स्वभाव और व्यवहार को प्रकृति के ये तीन गुण ही संचालित करते हैं; इन्हें पहचानना आत्म-ज्ञान की पहली सीढ़ी है।
श्लोक 14.6
वक्ता: श्रीकृष्ण
तत्र सत्त्वं निर्मलत्वात्प्रकाशकमनामयम्।
सुखसङ्गेन बध्नाति ज्ञानसङ्गेन चानघ ॥14.6॥
tatra sattvaṁ nirmalatvāt prakāśhakam anāmayam / sukha-saṅgena badhnāti jñāna-saṅgena chānagha
हिंदी अनुवाद: हे निष्पाप अर्जुन! उन गुणों में सत्त्वगुण निर्मल होने के कारण प्रकाश देने वाला और निर्विकार है; वह सुख और ज्ञान की आसक्ति से जीव को बाँधता है।
भावार्थ: सत्त्वगुण तीनों में श्रेष्ठ है — यह स्वच्छ, प्रकाशमान और रोगरहित है। किंतु यह भी बंधन का कारण बनता है, क्योंकि यह जीव को सुख और ज्ञान में आसक्त कर देता है। 'अनघ' अर्थात् पापरहित — श्रीकृष्ण अर्जुन को इस संबोधन से सम्मान देते हैं। सत्त्व का बंधन सूक्ष्म है — मनुष्य सोचता है कि वह अच्छा कर रहा है, पर आसक्ति बनी रहती है।
आज के जीवन में: सुख और ज्ञान में भी यदि आसक्ति हो, तो वह भी बंधन बन सकती है — इसलिए निरासक्त भाव से कर्म करना आवश्यक है।
श्लोक 14.7
वक्ता: श्रीकृष्ण
रजो रागात्मकं विद्धि तृष्णासङ्गसमुद्भवम्।
तन्निबध्नाति कौन्तेय कर्मसङ्गेन देहिनम् ॥14.7॥
rajo rāgātmakaṁ viddhi tṛiṣhṇā-saṅga-samudbhavam / tan nibadhnāti kaunteya karma-saṅgena dehinam
हिंदी अनुवाद: हे कुन्तीनन्दन! रजोगुण को राग-स्वरूप समझो; यह तृष्णा और आसक्ति को जन्म देता है और कर्मों की आसक्ति से देहधारी को बाँधता है।
भावार्थ: 'रागात्मकम्' — रजोगुण का मूल स्वभाव ही राग अर्थात् कामना है। 'तृष्णा' यानी भोगों की प्यास और 'सङ्ग' यानी आसक्ति — ये दोनों रजोगुण से उत्पन्न होते हैं। यह गुण मनुष्य को निरंतर कर्म में लगाए रखता है, किंतु वह कर्म फल की चाह से जुड़ा होता है। इसीलिए रजोगुण जीव को कर्म-बंधन में डालता है।
आज के जीवन में: जब भी मन में अत्यधिक कामना और बेचैनी हो, तो समझें कि रजोगुण प्रबल हो रहा है।
श्लोक 14.8
वक्ता: श्रीकृष्ण
तमस्त्वज्ञानजं विद्धि मोहनं सर्वदेहिनाम्।
प्रमादालस्यनिद्राभिस्तन्निबध्नाति भारत ॥14.8॥
tamas tv ajñāna-jaṁ viddhi mohanaṁ sarva-dehinām / pramādālasya-nidrābhis tan nibadhnāti bhārata
हिंदी अनुवाद: हे भरतवंशी! तमोगुण को अज्ञान से उत्पन्न और सभी देहधारियों को मोहित करने वाला जानो; वह प्रमाद, आलस्य और निद्रा के द्वारा जीव को बाँधता है।
भावार्थ: 'तमः' का अर्थ है अंधकार या जड़ता। यह गुण अज्ञान से जन्मता है और जीव को मोह में डुबो देता है। 'प्रमाद' यानी असावधानी, 'आलस्य' यानी कर्तव्य से विमुखता, और 'निद्रा' यानी चेतना का लोप — ये तीनों तमोगुण के हथियार हैं। यह गुण सबसे भारी बंधन है क्योंकि इसमें जीव को अपनी स्थिति का भान भी नहीं रहता।
आज के जीवन में: आलस्य और असावधानी को पहचानकर उनसे सचेत रहना ही तमोगुण से बाहर निकलने का मार्ग है।
श्लोक 14.9
वक्ता: श्रीकृष्ण
सत्त्वं सुखे सञ्जयति रजः कर्मणि भारत।
ज्ञानमावृत्य तु तमः प्रमादे सञ्जयत्युत ॥14.9॥
sattvaṁ sukhe sañjayati rajaḥ karmaṇi bhārata / jñānam āvṛitya tu tamaḥ pramāde sañjayaty uta
हिंदी अनुवाद: हे भरतवंशी! सत्त्वगुण सुख में लगाकर, रजोगुण कर्म में लगाकर जीव पर विजय पाता है; और तमोगुण ज्ञान को ढककर प्रमाद में लगाकर जीव पर विजय पाता है।
भावार्थ: यह श्लोक तीनों गुणों के प्रभाव को संक्षेप में बताता है। सत्त्व जीव को सुख की ओर खींचता है, रज उसे क्रिया और कामना में उलझाता है, और तम ज्ञान को ढककर उसे प्रमाद में डुबो देता है। 'सञ्जयति' का अर्थ है — जीत लेना, वश में कर लेना। तीनों गुण अपने-अपने तरीके से जीव को अपने अधीन कर लेते हैं।
आज के जीवन में: अपने मन की दशा देखकर पहचानें कि इस समय कौन-सा गुण प्रबल है — यही आत्म-निरीक्षण की शुरुआत है।
श्लोक 14.10
वक्ता: श्रीकृष्ण
रजस्तमश्चाभिभूय सत्त्वं भवति भारत।
रजः सत्त्वं तमश्चैव तमः सत्त्वं रजस्तथा ॥14.10॥
rajas tamaśh chābhibhūya sattvaṁ bhavati bhārata / rajaḥ sattvaṁ tamaśh chaiva tamaḥ sattvaṁ rajas tathā
हिंदी अनुवाद: हे भरतवंशी! रजोगुण और तमोगुण को दबाकर सत्त्वगुण बढ़ता है; सत्त्व और तम को दबाकर रजोगुण बढ़ता है; और सत्त्व और रज को दबाकर तमोगुण बढ़ता है।
भावार्थ: तीनों गुण सदा एक साथ विद्यमान रहते हैं, किंतु किसी एक समय में एक गुण प्रबल होता है और शेष दो दब जाते हैं। यह क्रम निरंतर बदलता रहता है। जब सत्त्व प्रबल होता है तो मन शांत और प्रकाशमान होता है; जब रज बढ़ता है तो बेचैनी और कामना उठती है; जब तम छाता है तो जड़ता और मोह घेर लेते हैं। यह गुणों का स्वाभाविक संघर्ष है।
आज के जीवन में: मन की अवस्था सदा एक-सी नहीं रहती — गुणों के इस स्वाभाविक उठान-गिरान को समझकर साधक सत्त्व को बढ़ाने का प्रयास कर सकता है।
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