भगवद्गीता अध्याय 14, श्लोक 11–20 | गुणत्रयविभागयोग | अर्थ सहित
अध्याय चौदह के पूर्व भाग में श्रीकृष्ण ने अर्जुन को बताया कि प्रकृति के तीन गुण — सत्त्व, रज और तम — किस प्रकार जीव को बाँधते हैं। अब इस खंड में वे तीनों गुणों के प्रकट लक्षण, उनके फल, मृत्यु के समय उनका प्रभाव और अंत में गुणातीत होने का मार्ग बताते हैं।
श्लोक 14.11
वक्ता: श्रीकृष्ण
सर्वद्वारेषु देहेऽस्मिन्प्रकाश उपजायते।
ज्ञानं यदा तदा विद्याद्विवृद्धं सत्त्वमित्युत ॥14.11॥
sarva-dvāreṣhu dehe ’smin prakāśha upajāyate / jñānaṁ yadā tadā vidyād vivṛiddhaṁ sattvam ity uta
हिंदी अनुवाद: जब इस शरीर की सभी इन्द्रियों और अन्तःकरण में प्रकाश तथा विवेक प्रकट हो जाए, तब समझना चाहिए कि सत्त्वगुण बढ़ा हुआ है।
भावार्थ: श्रीकृष्ण अर्जुन को सत्त्वगुण की प्रधानता का बाहरी चिह्न बता रहे हैं। 'सर्वद्वारेषु' अर्थात् आँख, कान, मन, बुद्धि आदि सभी द्वारों में — जब स्वच्छता और विवेक का प्रकाश फैल जाए, तो यह सत्त्व के उभार का संकेत है। इसका अर्थ है कि व्यक्ति की सोच निर्मल होती है, निर्णय सटीक होते हैं और भीतर एक शांत जागरूकता बनी रहती है।
आज के जीवन में: जब मन शांत हो, विचार स्पष्ट हों और हर काम में विवेक जागे — तो समझें कि भीतर सत्त्व का प्रकाश है।
श्लोक 14.12
वक्ता: श्रीकृष्ण
लोभः प्रवृत्तिरारम्भः कर्मणामशमः स्पृहा।
रजस्येतानि जायन्ते विवृद्धे भरतर्षभ ॥14.12॥
lobhaḥ pravṛittir ārambhaḥ karmaṇām aśhamaḥ spṛihā / rajasy etāni jāyante vivṛiddhe bharatarṣhabha
हिंदी अनुवाद: हे भरतवंश में श्रेष्ठ अर्जुन! रजोगुण के बढ़ने पर लोभ, अत्यधिक क्रियाशीलता, कर्मों का बार-बार आरंभ, अशांति और तीव्र कामना — ये वृत्तियाँ उत्पन्न होती हैं।
भावार्थ: रजोगुण की प्रधानता के लक्षण बताते हुए श्रीकृष्ण कहते हैं कि 'लोभ' यानी और पाने की चाह, 'प्रवृत्ति' यानी निरंतर कुछ न कुछ करते रहने की आदत, 'अशमः' यानी मन की बेचैनी और 'स्पृहा' यानी दूसरों की वस्तुओं के प्रति लालसा — ये सब रज के बढ़ने के संकेत हैं। ऐसा व्यक्ति बहुत काम करता है, पर भीतर से शांत नहीं रहता।
आज के जीवन में: जब मन में बेचैनी हो, बार-बार नई योजनाएँ बनें और लालसा न घटे — तो यह रजोगुण की अधिकता का संकेत है।
श्लोक 14.13
वक्ता: श्रीकृष्ण
अप्रकाशोऽप्रवृत्तिश्च प्रमादो मोह एव च।
तमस्येतानि जायन्ते विवृद्धे कुरुनन्दन ॥14.13॥
aprakāśho ’pravṛittiśh cha pramādo moha eva cha / tamasy etāni jāyante vivṛiddhe kuru-nandana
हिंदी अनुवाद: हे कुरुनन्दन! तमोगुण के बढ़ने पर अज्ञान का अंधकार, निष्क्रियता, असावधानी और मोह — ये वृत्तियाँ उत्पन्न होती हैं।
भावार्थ: तमोगुण के प्रकट लक्षण बताते हुए श्रीकृष्ण कहते हैं कि 'अप्रकाश' अर्थात् विवेक का अभाव, 'अप्रवृत्ति' अर्थात् कुछ भी न करने की सुस्ती, 'प्रमाद' अर्थात् लापरवाही और 'मोह' अर्थात् भ्रम — ये तम के बढ़ने पर उभरते हैं। ऐसे व्यक्ति को न सही-गलत का बोध रहता है, न कर्तव्य का; वह भ्रम और आलस्य में डूबा रहता है।
आज के जीवन में: जब मन में आलस्य, भ्रम और उदासीनता छा जाए — तो यह तमोगुण के बढ़ने का संकेत है।
श्लोक 14.14
वक्ता: श्रीकृष्ण
यदा सत्त्वे प्रवृद्धे तु प्रलयं याति देहभृत्।
तदोत्तमविदां लोकानमलान्प्रतिपद्यते ॥14.14॥
yadā sattve pravṛiddhe tu pralayaṁ yāti deha-bhṛit / tadottama-vidāṁ lokān amalān pratipadyate
हिंदी अनुवाद: जिस समय सत्त्वगुण बढ़ा हो, उस समय यदि देहधारी की मृत्यु हो, तो वह उत्तम तत्त्व को जाननेवालों के निर्मल लोकों को प्राप्त होता है।
भावार्थ: श्रीकृष्ण यहाँ मृत्यु के समय प्रधान गुण का फल बता रहे हैं। 'देहभृत्' अर्थात् शरीर धारण करनेवाला जीव यदि सत्त्व की अवस्था में शरीर छोड़े, तो वह 'उत्तमविदाम् लोकान्' — श्रेष्ठ ज्ञानियों के निर्मल लोकों में जाता है। यह श्लोक यह भी संकेत करता है कि जीवनभर का आंतरिक स्वभाव ही अंत में गति निर्धारित करता है।
आज के जीवन में: जीवन में सत्त्व की साधना ही अंत को भी उज्ज्वल बनाती है।
श्लोक 14.15
वक्ता: श्रीकृष्ण
रजसि प्रलयं गत्वा कर्मसङ्गिषु जायते।
तथा प्रलीनस्तमसि मूढयोनिषु जायते ॥14.15॥
rajasi pralayaṁ gatvā karma-saṅgiṣhu jāyate / tathā pralīnas tamasi mūḍha-yoniṣhu jāyate
हिंदी अनुवाद: रजोगुण की प्रधानता में मरनेवाला कर्मों में आसक्त मनुष्यों में जन्म लेता है, और तमोगुण की प्रधानता में मरनेवाला मूढ़ योनियों में जन्म लेता है।
भावार्थ: इस श्लोक में रज और तम में मृत्यु के फल बताए गए हैं। 'कर्मसङ्गिषु' अर्थात् जो लोग कर्मों में अत्यधिक आसक्त हैं, उनमें रजस् में मरनेवाला जन्म लेता है — यानी वह फिर उसी संसार के चक्र में आता है। 'मूढयोनिषु' अर्थात् तमस् में मरनेवाला उन योनियों में जाता है जहाँ विवेक और बोध और भी कम होता है।
श्लोक 14.16
वक्ता: श्रीकृष्ण
कर्मणः सुकृतस्याहुः सात्त्विकं निर्मलं फलम्।
रजसस्तु फलं दुःखमज्ञानं तमसः फलम् ॥14.16॥
karmaṇaḥ sukṛitasyāhuḥ sāttvikaṁ nirmalaṁ phalam / rajasas tu phalaṁ duḥkham ajñānaṁ tamasaḥ phalam
हिंदी अनुवाद: शुभ कर्म का फल सात्त्विक और निर्मल होता है; राजस कर्म का फल दुःख है और तामस कर्म का फल अज्ञान।
भावार्थ: श्रीकृष्ण यहाँ तीनों गुणों के अनुसार किए गए कर्मों के फल बता रहे हैं। सात्त्विक कर्म से 'निर्मल फल' मिलता है — जो शुद्ध और कल्याणकारी होता है। राजस कर्म से 'दुःख' मिलता है, क्योंकि वह कामना और आसक्ति से जन्मा होता है। तामस कर्म से 'अज्ञान' बढ़ता है, जो और अधिक भ्रम और पतन की ओर ले जाता है।
आज के जीवन में: जैसा गुण, वैसा कर्म; और जैसा कर्म, वैसा फल — यह प्रकृति का स्वाभाविक नियम है।
श्लोक 14.17
वक्ता: श्रीकृष्ण
सत्त्वात्सञ्जायते ज्ञानं रजसो लोभ एव च।
प्रमादमोहौ तमसो भवतोऽज्ञानमेव च ॥14.17॥
sattvāt sañjāyate jñānaṁ rajaso lobha eva cha / pramāda-mohau tamaso bhavato ’jñānam eva cha
हिंदी अनुवाद: सत्त्वगुण से ज्ञान उत्पन्न होता है, रजोगुण से लोभ; और तमोगुण से प्रमाद, मोह तथा अज्ञान उत्पन्न होते हैं।
भावार्थ: यह श्लोक तीनों गुणों से उत्पन्न होनेवाली मानसिक वृत्तियों का सार प्रस्तुत करता है। सत्त्व से 'ज्ञान' — अर्थात् सही-गलत का विवेक — जन्म लेता है। रज से 'लोभ' — अर्थात् और पाने की निरंतर भूख। तम से 'प्रमाद' यानी लापरवाही, 'मोह' यानी भ्रम और 'अज्ञान' यानी बोध का अभाव — ये तीनों उत्पन्न होते हैं। इस प्रकार गुण ही हमारी सोच और समझ को आकार देते हैं।
आज के जीवन में: अपने भीतर के गुण को पहचानें — क्योंकि वही तय करता है कि हमारे मन में ज्ञान उठेगा या लोभ या मोह।
श्लोक 14.18
वक्ता: श्रीकृष्ण
ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्त्वस्था मध्ये तिष्ठन्ति राजसाः।
जघन्यगुणवृत्तिस्था अधो गच्छन्ति तामसाः ॥14.18॥
ūrdhvaṁ gachchhanti sattva-sthā madhye tiṣhṭhanti rājasāḥ / jaghanya-guṇa-vṛitti-sthā adho gachchhanti tāmasāḥ
हिंदी अनुवाद: सत्त्वगुण में स्थित लोग ऊपर के लोकों में जाते हैं, रजोगुण में स्थित लोग मध्य में — अर्थात् मनुष्यलोक में — रहते हैं, और निन्दनीय तमोगुण की वृत्ति में रहनेवाले अधोगति को प्राप्त होते हैं।
भावार्थ: श्रीकृष्ण तीनों गुणों के अनुसार जीव की गति बता रहे हैं। 'ऊर्ध्वं गच्छन्ति' — सत्त्वस्थ लोग ऊपर उठते हैं। 'मध्ये तिष्ठन्ति राजसाः' — रजस् में रहनेवाले मनुष्यलोक में ही बने रहते हैं। 'जघन्यगुणवृत्तिस्थाः' अर्थात् सबसे निम्न गुण — तम — में रहनेवाले 'अधो गच्छन्ति' — नीचे की ओर जाते हैं। यह गुणों के अनुसार जीव की स्वाभाविक गति का वर्णन है।
श्लोक 14.19
वक्ता: श्रीकृष्ण
नान्यं गुणेभ्यः कर्तारं यदा द्रष्टानुपश्यति।
गुणेभ्यश्च परं वेत्ति मद्भावं सोऽधिगच्छति ॥14.19॥
nānyaṁ guṇebhyaḥ kartāraṁ yadā draṣhṭānupaśhyati / guṇebhyaśh cha paraṁ vetti mad-bhāvaṁ so ’dhigachchhati
हिंदी अनुवाद: जब विवेकशील मनुष्य तीनों गुणों के अतिरिक्त किसी अन्य को कर्ता नहीं देखता और गुणों से परे अपने स्वरूप को जानता है, तब वह मेरे स्वरूप को प्राप्त हो जाता है।
भावार्थ: यह श्लोक मुक्ति के मार्ग का सूत्र है। 'द्रष्टा' — जो देखनेवाला है, वह जब यह जान लेता है कि सभी कर्म गुण ही करते हैं, मैं नहीं — और साथ ही यह भी अनुभव करता है कि मेरा वास्तविक स्वरूप इन गुणों से परे है — तब वह 'मद्भावम्' अर्थात् श्रीकृष्ण के स्वरूप को प्राप्त होता है। यह ज्ञान ही गुणातीत होने का द्वार है।
आज के जीवन में: जब यह बोध हो कि कर्म गुणों द्वारा होते हैं और मेरा सच्चा स्वरूप उनसे परे है — तभी मुक्ति का मार्ग खुलता है।
श्लोक 14.20
वक्ता: श्रीकृष्ण
गुणानेतानतीत्य त्रीन्देही देहसमुद्भवान्।
जन्ममृत्युजरादुःखैर्विमुक्तोऽमृतमश्नुते ॥14.20॥
guṇān etān atītya trīn dehī deha-samudbhavān / janma-mṛityu-jarā-duḥkhair vimukto ’mṛitam aśhnute
हिंदी अनुवाद: देहधारी विवेकशील मनुष्य इन तीनों गुणों को — जो देह की उत्पत्ति के कारण हैं — पार करके जन्म, मृत्यु, वृद्धावस्था और दुःख से मुक्त हो जाता है और अमरता का अनुभव करता है।
भावार्थ: 'देहसमुद्भवान्' अर्थात् जो गुण इस शरीर को जन्म देते हैं — उन्हें 'अतीत्य' यानी पार करके जो जीव जाता है, वह 'जन्ममृत्युजरादुःखैः विमुक्तः' — जन्म, मृत्यु, बुढ़ापे और दुःख से मुक्त हो जाता है। 'अमृतम् अश्नुते' — वह अमरता का अनुभव करता है। यह इस खंड का समापन श्लोक है जो गुणातीत होने के परम फल को स्पष्ट करता है।
आज के जीवन में: तीनों गुणों की सीमा को पहचानकर उनसे परे जाना ही जीवन-मृत्यु के बंधन से मुक्ति का मार्ग है।
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