भगवद्गीता अध्याय 14, श्लोक 21–27 | गुणत्रयविभागयोग | अर्थ सहित
अध्याय चौदह में श्रीकृष्ण ने सत्त्व, रजस् और तमस् — इन तीनों गुणों का विस्तार से वर्णन किया। अब अर्जुन के मन में जिज्ञासा उठती है कि जो इन गुणों से परे हो जाता है, उसकी पहचान क्या है और वह ऐसी स्थिति तक पहुँचता कैसे है। इस अंतिम खंड में श्रीकृष्ण गुणातीत पुरुष के लक्षण, उसका आचरण और उस अवस्था को पाने का मार्ग बताते हैं।
श्लोक 14.21
वक्ता: अर्जुन
कैर्लिंगैस्त्रीन्गुणानेतानतीतो भवति प्रभो।
किमाचारः कथं चैतांस्त्रीन्गुणानतिवर्तते ॥14.21॥
arjuna uvācha / kair liṅgais trīn guṇān etān atīto bhavati prabho / kim āchāraḥ kathaṁ chaitāns trīn guṇān ativartate
हिंदी अनुवाद: अर्जुन ने पूछा — हे प्रभो! इन तीनों गुणों से अतीत हुए मनुष्य के क्या लक्षण होते हैं, उसका आचरण कैसा होता है, और वह इन तीनों गुणों का अतिक्रमण कैसे करता है?
भावार्थ: श्रीकृष्ण ने अभी तक सत्त्व, रजस् और तमस् के स्वभाव और परिणाम समझाए थे। अब अर्जुन तीन प्रश्न एक साथ पूछते हैं — पहला, गुणातीत की बाहरी पहचान क्या है; दूसरा, उसका दैनिक आचरण कैसा होता है; और तीसरा, इस अवस्था तक पहुँचने का उपाय क्या है। 'अतीत' का अर्थ है — जो इनसे ऊपर उठ गया हो। यह प्रश्न बहुत व्यावहारिक है क्योंकि केवल सिद्धांत जानना पर्याप्त नहीं, मार्ग भी जानना आवश्यक है।
आज के जीवन में: जब हम किसी आदर्श को समझ लें, तो अगला स्वाभाविक प्रश्न यही होता है — उस आदर्श तक पहुँचा कैसे जाए; यह जिज्ञासा ही साधना की शुरुआत है।
श्लोक 14.22
वक्ता: श्रीकृष्ण
प्रकाशं च प्रवृत्तिं च मोहमेव च पाण्डव।
न द्वेष्टि सम्प्रवृत्तानि न निवृत्तानि काङ्क्षति ॥14.22॥
śhrī-bhagavān uvācha / prakāśhaṁ cha pravṛittiṁ cha moham eva cha pāṇḍava / na dveṣhṭi sampravṛittāni na nivṛittāni kāṅkṣhati
हिंदी अनुवाद: श्रीकृष्ण बोले — हे पाण्डव! प्रकाश, प्रवृत्ति और मोह — ये तीनों जब उत्पन्न हों तो गुणातीत पुरुष उनसे द्वेष नहीं करता, और जब ये न रहें तो उनकी कामना भी नहीं करता।
भावार्थ: यहाँ 'प्रकाश' सत्त्व का, 'प्रवृत्ति' रजस् का और 'मोह' तमस् का प्रतीक है। गुणातीत पुरुष इन तीनों के प्रति न आसक्त होता है, न विरक्त। जब मन में स्पष्टता हो तो वह उसे पकड़ने की कोशिश नहीं करता, और जब मन में भ्रम हो तो उससे घबराता नहीं। यह समभाव ही उसकी पहचान है। द्वेष और कामना — दोनों बंधन हैं; गुणातीत इन दोनों से मुक्त रहता है।
आज के जीवन में: जो व्यक्ति अपनी मनःस्थिति के उतार-चढ़ाव से न प्रसन्न होता है, न विचलित — वह भीतर से स्थिर रहना सीख लेता है।
श्लोक 14.23
वक्ता: श्रीकृष्ण
उदासीनवदासीनो गुणैर्यो न विचाल्यते।
गुणा वर्तन्त इत्येव योऽवतिष्ठति नेङ्गते ॥14.23॥
udāsīna-vad āsīno guṇair yo na vichālyate / guṇā vartanta ity evaṁ yo ’vatiṣhṭhati neṅgate
हिंदी अनुवाद: जो उदासीन की तरह स्थित रहता है, गुणों के द्वारा विचलित नहीं होता, और यह जानते हुए कि गुण ही गुणों में बरत रहे हैं — अपने स्वरूप में टिका रहता है और स्वयं कोई चेष्टा नहीं करता।
भावार्थ: 'उदासीनवत्' का अर्थ है — जैसे कोई तटस्थ दर्शक हो। गुणातीत पुरुष यह भली-भाँति जानता है कि जो भी क्रिया हो रही है, वह प्रकृति के गुणों का खेल है; उसमें उसका 'मैं' नहीं है। इसलिए वह न किसी घटना से उत्तेजित होता है, न किसी परिणाम के लिए आतुर। 'नेङ्गते' अर्थात् वह स्वयं कोई हलचल नहीं करता — वह अपने भीतर के शांत केंद्र में स्थिर रहता है।
आज के जीवन में: जब हम यह समझ लें कि परिस्थितियाँ अपने नियम से चलती हैं और हमारा कर्तव्य केवल अपने भीतर स्थिर रहना है, तो व्यर्थ की उथल-पुथल कम हो जाती है।
श्लोक 14.24
वक्ता: श्रीकृष्ण
समदुःखसुखः स्वस्थः समलोष्टाश्मकाञ्चनः।
तुल्यप्रियाप्रियो धीरस्तुल्यनिन्दात्मसंस्तुतिः ॥14.24॥
sama-duḥkha-sukhaḥ sva-sthaḥ sama-loṣhṭāśhma-kāñchanaḥ / tulya-priyāpriyo dhīras tulya-nindātma-sanstutiḥ
हिंदी अनुवाद: जो सुख-दुःख में सम रहता है, अपने स्वरूप में स्थित है, मिट्टी के ढेले, पत्थर और सोने को एक-सा देखता है, जो प्रिय और अप्रिय में तथा अपनी निंदा और स्तुति में समान रहता है — वह धीर पुरुष है।
भावार्थ: यह श्लोक गुणातीत पुरुष के व्यावहारिक लक्षण गिनाता है। 'स्वस्थ' का अर्थ है — अपने स्वरूप में स्थित। 'धीर' का अर्थ है — जो बुद्धि से दृढ़ हो। मिट्टी, पत्थर और सोने में समान दृष्टि यह नहीं कहती कि उनमें व्यावहारिक भेद नहीं; यह कहती है कि उनके प्रति भीतर से राग या द्वेष नहीं। निंदा सुनकर दुःख न हो और स्तुति सुनकर फूल न जाए — यही समता है।
आज के जीवन में: जो व्यक्ति दूसरों की प्रशंसा या आलोचना से अपना मूल्यांकन नहीं करता, वह भीतर से सच्चा स्वतंत्र होता है।
श्लोक 14.25
वक्ता: श्रीकृष्ण
मानापमानयोस्तुल्यस्तुल्यो मित्रारिपक्षयोः।
सर्वारम्भपरित्यागी गुणातीतः स उच्यते ॥14.25॥
mānāpamānayos tulyas tulyo mitrāri-pakṣhayoḥ / sarvārambha-parityāgī guṇātītaḥ sa uchyate
हिंदी अनुवाद: जो मान और अपमान में समान रहता है, मित्र और शत्रु के पक्ष में समान रहता है, और जो सभी कर्मों के आरंभ का त्यागी है — वह गुणातीत कहा जाता है।
भावार्थ: श्लोक 14.24 और 14.25 मिलकर गुणातीत के लक्षणों की पूरी सूची देते हैं। इस श्लोक में दो विशेष बातें हैं — पहली, मित्र और शत्रु के प्रति समान भाव; दूसरी, 'सर्वारम्भपरित्यागी' अर्थात् जो अहंकार से प्रेरित होकर कोई कार्य आरंभ नहीं करता। यह कर्म का त्याग नहीं, बल्कि कर्ता-भाव का त्याग है। ऐसा व्यक्ति गुणों के बंधन से मुक्त होकर अपने शुद्ध स्वरूप में स्थित रहता है।
आज के जीवन में: जब हम किसी काम को 'मैं कर रहा हूँ' के अहंकार से नहीं, बल्कि शांत भाव से करते हैं, तो वह कार्य बंधन नहीं बनता।
श्लोक 14.26
वक्ता: श्रीकृष्ण
मां च योऽव्यभिचारेण भक्ितयोगेन सेवते।
स गुणान्समतीत्यैतान् ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥14.26॥
māṁ cha yo ’vyabhichāreṇa bhakti-yogena sevate / sa guṇān samatītyaitān brahma-bhūyāya kalpate
हिंदी अनुवाद: जो मनुष्य अव्यभिचारी भक्तियोग के द्वारा मेरी सेवा करता है, वह इन गुणों का अतिक्रमण करके ब्रह्मप्राप्ति का पात्र हो जाता है।
भावार्थ: अर्जुन के तीसरे प्रश्न का उत्तर यहाँ मिलता है — गुणों से परे कैसे जाएँ? श्रीकृष्ण कहते हैं कि 'अव्यभिचारी भक्ति' अर्थात् अटूट, एकनिष्ठ भक्ति ही वह मार्ग है। 'अव्यभिचारी' का अर्थ है — जो किसी और की ओर न भटके, जो केवल परमात्मा में लगी रहे। ऐसी भक्ति से साधक गुणों के प्रभाव से ऊपर उठ जाता है और ब्रह्म को पाने का अधिकारी बन जाता है।
आज के जीवन में: एकनिष्ठ और निरंतर भक्ति मनुष्य को भीतर की सभी उलझनों से ऊपर उठा देती है।
श्लोक 14.27
वक्ता: श्रीकृष्ण
ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाऽहममृतस्याव्ययस्य च।
शाश्वतस्य च धर्मस्य सुखस्यैकान्तिकस्य च ॥14.27॥
brahmaṇo hi pratiṣhṭhāham amṛitasyāvyayasya cha / śhāśhvatasya cha dharmasya sukhasyaikāntikasya cha
हिंदी अनुवाद: क्योंकि ब्रह्म का, अविनाशी अमृत का, शाश्वत धर्म का और एकांतिक सुख का आश्रय मैं ही हूँ।
भावार्थ: अध्याय का समापन इस महत्त्वपूर्ण उद्घोषणा से होता है। श्रीकृष्ण कहते हैं कि ब्रह्म की भी प्रतिष्ठा — अर्थात् आधार — वे स्वयं हैं। 'अमृत' अर्थात् जो कभी नष्ट नहीं होता, 'अव्यय' अर्थात् जिसमें कोई क्षय नहीं, 'शाश्वत धर्म' और 'एकांतिक सुख' — इन सबका मूल स्रोत परमात्मा ही है। इस प्रकार भक्ति का मार्ग सीधे उस परम सत्ता तक पहुँचाता है जो सबका आधार है।
आज के जीवन में: जो परम सत्य, स्थायी शांति और वास्तविक आनंद की खोज में है, उसका अंतिम आश्रय परमात्मा ही है।
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