भगवद्गीता अध्याय 15, श्लोक 1–10 | पुरुषोत्तमयोग | अर्थ सहित
चौदहवें अध्याय में श्रीकृष्ण ने तीनों गुणों — सत्त्व, रज और तम — का विस्तार से वर्णन किया और बताया कि इन गुणों से ऊपर उठा हुआ मनुष्य ही मुक्ति पाता है। अब पंद्रहवें अध्याय 'पुरुषोत्तमयोग' में वे संसार को एक विचित्र वृक्ष के रूप में समझाते हैं और फिर जीवात्मा, परमात्मा तथा उनके परस्पर संबंध को स्पष्ट करते हैं। इस खंड के पहले दस श्लोकों में श्रीकृष्ण संसार-वृक्ष का स्वरूप, उससे मुक्ति का मार्ग, परमधाम का वर्णन और जीवात्मा की यात्रा का रहस्य प्रकट करते हैं।
श्लोक 15.1
वक्ता: श्रीकृष्ण
ऊर्ध्वमूलमधःशाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम्।
छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित् ॥15.1॥
śhrī-bhagavān uvācha / ūrdhva-mūlam adhaḥ-śhākham aśhvatthaṁ prāhur avyayam / chhandānsi yasya parṇāni yas taṁ veda sa veda-vit
हिंदी अनुवाद: श्रीभगवान् बोले — जिस संसार-रूपी अश्वत्थ वृक्ष की जड़ें ऊपर की ओर और शाखाएँ नीचे की ओर हैं, जिसे अव्यय (अविनाशी) कहा जाता है, और जिसके पत्ते वेद-मंत्र हैं — उस वृक्ष को जो जानता है, वही सच्चे अर्थ में वेदों का ज्ञाता है।
भावार्थ: श्रीकृष्ण अर्जुन को संसार का एक अनूठा चित्र देते हैं। वे कहते हैं कि यह संसार एक पीपल के वृक्ष जैसा है, जिसकी जड़ें ऊपर — अर्थात् परमात्मा में — हैं और शाखाएँ नीचे — अर्थात् समस्त सृष्टि में — फैली हैं। 'अश्वत्थ' का अर्थ है जो कल भी वैसा न रहे — अर्थात् प्रतिक्षण बदलने वाला। 'अव्यय' का अर्थ है जो समाप्त न हो। वेद-मंत्र इसके पत्ते हैं जो इसे पोषण और आधार देते हैं। जो इस संसार के वास्तविक स्वरूप को समझ लेता है, वह वेदों के सार को भी जान लेता है।
आज के जीवन में: संसार की क्षणभंगुरता को समझना ही सच्चे ज्ञान की पहली सीढ़ी है।
श्लोक 15.2
वक्ता: श्रीकृष्ण
अधश्चोर्ध्वं प्रसृतास्तस्य शाखा गुणप्रवृद्धा विषयप्रवालाः।
अधश्च मूलान्यनुसन्ततानि कर्मानुबन्धीनि मनुष्यलोके ॥15.2॥
adhaśh chordhvaṁ prasṛitās tasya śhākhā / guṇa-pravṛiddhā viṣhaya-pravālāḥ / adhaśh cha mūlāny anusantatāni / karmānubandhīni manuṣhya-loke
हिंदी अनुवाद: उस संसार-वृक्ष की शाखाएँ तीनों गुणों — सत्त्व, रज और तम — से पोषित होकर नीचे, मध्य और ऊपर सभी दिशाओं में फैली हैं, और विषय-भोग उसकी कोंपलें हैं। मनुष्य-लोक में कर्मों के अनुसार बाँधने वाली जड़ें भी सभी लोकों में व्याप्त हैं।
भावार्थ: इस श्लोक में संसार-वृक्ष का विस्तार समझाया गया है। तीनों गुण — सत्त्व, रज और तम — इस वृक्ष को पोषण देते हैं और इसकी शाखाएँ देवलोक से लेकर पाताल तक सब जगह फैली हैं। 'विषयप्रवाल' अर्थात् इंद्रिय-विषय इसकी कोमल कोंपलें हैं जो जीव को आकर्षित करती हैं। मनुष्य-लोक में किए गए कर्म इस वृक्ष की जड़ों को और गहरा करते हैं, जिससे जीव बार-बार जन्म-मृत्यु के चक्र में बँधता रहता है।
आज के जीवन में: गुणों और विषयों की ओर बढ़ती आसक्ति ही संसार-बंधन की जड़ है।
श्लोक 15.3
वक्ता: श्रीकृष्ण
न रूपमस्येह तथोपलभ्यते नान्तो न चादिर्न च संप्रतिष्ठा।
अश्वत्थमेनं सुविरूढमूल मसङ्गशस्त्रेण दृढेन छित्त्वा ॥15.3॥
na rūpam asyeha tathopalabhyate / nānto na chādir na cha sampratiṣhṭhā / aśhvattham enaṁ su-virūḍha-mūlam / asaṅga-śhastreṇa dṛiḍhena chhittvā
हिंदी अनुवाद: इस संसार-वृक्ष का वास्तविक स्वरूप यहाँ विचार करने पर वैसा नहीं मिलता जैसा दिखता है; क्योंकि इसका न आदि है, न अंत है और न कोई स्थायी आधार ही है। इसलिए इस दृढ़ जड़ों वाले संसार-रूपी अश्वत्थ वृक्ष को दृढ़ असंग-रूपी शस्त्र से काटकर —
भावार्थ: यह श्लोक अगले श्लोक से जुड़ा हुआ है। श्रीकृष्ण कहते हैं कि संसार का जो रूप हमें दिखता है, वह वास्तविक नहीं है — यह न तो कहाँ से शुरू हुआ, न कहाँ समाप्त होगा, न इसका कोई स्थायी आधार है। यह सब माया का विस्तार है। 'असंग' का अर्थ है आसक्ति-रहितता। जैसे कुल्हाड़ी से वृक्ष काटा जाता है, वैसे ही वैराग्य और असंग के दृढ़ शस्त्र से इस संसार-बंधन को काटना होगा।
आज के जीवन में: संसार की असलियत को पहचानकर उससे वैराग्य धारण करना ही मुक्ति का मार्ग है।
श्लोक 15.4
वक्ता: श्रीकृष्ण
ततः पदं तत्परिमार्गितव्य यस्मिन्गता न निवर्तन्ति भूयः।
तमेव चाद्यं पुरुषं प्रपद्ये यतः प्रवृत्तिः प्रसृता पुराणी ॥15.4॥
tataḥ padaṁ tat parimārgitavyaṁ / yasmin gatā na nivartanti bhūyaḥ / tam eva chādyaṁ puruṣhaṁ prapadye / yataḥ pravṛittiḥ prasṛitā purāṇī
हिंदी अनुवाद: उसके बाद उस परमपद की खोज करनी चाहिए, जिसे पाने के बाद मनुष्य फिर कभी संसार में नहीं लौटता। जिस आदिपुरुष परमात्मा से यह अनादि सृष्टि विस्तार को प्राप्त हुई है, मैं उसी की शरण हूँ — ऐसा भाव रखकर।
भावार्थ: श्लोक 15.3 से आगे बढ़ते हुए श्रीकृष्ण बताते हैं कि संसार-वृक्ष को काटने के बाद क्या करना है। 'तत्पदम्' अर्थात् वह परमपद — परमात्मा का वह स्थान — जहाँ से कोई लौटता नहीं। 'आद्यं पुरुषम्' अर्थात् वह आदिपुरुष जिससे यह सारी सृष्टि प्रवाहित हुई है। श्रीकृष्ण स्वयं कहते हैं — 'मैं उसी की शरण हूँ' — इससे शरणागति का महत्त्व स्पष्ट होता है। यह श्लोक साधना का चरम लक्ष्य बताता है।
आज के जीवन में: संसार की आसक्ति छोड़कर परमात्मा की शरण लेना ही जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य है।
श्लोक 15.5
वक्ता: श्रीकृष्ण
निर्मानमोहा जितसङ्गदोषा अध्यात्मनित्या विनिवृत्तकामाः।
द्वन्द्वैर्विमुक्ताः सुखदुःखसंज्ञै र्गच्छन्त्यमूढाः पदमव्ययं तत् ॥15.5॥
nirmāna-mohā jita-saṅga-doṣhā / adhyātma-nityā vinivṛitta-kāmāḥ / dvandvair vimuktāḥ sukha-duḥkha-sanjñair / gachchhanty amūḍhāḥ padam avyayaṁ tat
हिंदी अनुवाद: जो मान और मोह से रहित हो गए हैं, जिन्होंने आसक्ति के दोषों को जीत लिया है, जो सदा परमात्मा में लगे रहते हैं, जो कामनाओं से मुक्त हो गए हैं और सुख-दुःख के द्वंद्वों से ऊपर उठ गए हैं — ऐसे मोहरहित साधक उस अविनाशी परमपद को प्राप्त होते हैं।
भावार्थ: इस श्लोक में श्रीकृष्ण उन साधकों के लक्षण बताते हैं जो परमपद को प्राप्त करते हैं। 'निर्मानमोह' — मान और मोह से रहित; 'जितसंगदोष' — आसक्ति के दोषों पर विजय; 'अध्यात्मनित्य' — सदा परमात्मा में स्थित; 'विनिवृत्तकाम' — कामनाओं से पूर्णतः मुक्त; और 'द्वंद्वविमुक्त' — सुख-दुःख से ऊपर। ये पाँच गुण मिलकर उस साधक का चित्र बनाते हैं जो इस संसार-वृक्ष को काटकर परमपद की ओर बढ़ता है।
आज के जीवन में: अहंकार, मोह और कामना को छोड़कर समभाव से जीना ही परमपद की ओर ले जाता है।
श्लोक 15.6
वक्ता: श्रीकृष्ण
न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः।
यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम ॥15.6॥
na tad bhāsayate sūryo na śhaśhāṅko na pāvakaḥ / yad gatvā na nivartante tad dhāma paramaṁ mama
हिंदी अनुवाद: उस परमधाम को न सूर्य प्रकाशित कर सकता है, न चंद्रमा और न अग्नि ही। जहाँ पहुँचकर जीव फिर संसार में नहीं लौटता — वही मेरा परमधाम है।
भावार्थ: श्रीकृष्ण अपने परमधाम का वर्णन करते हैं। यह धाम इतना स्वयंप्रकाश है कि सूर्य, चंद्रमा और अग्नि — जो इस संसार को प्रकाशित करते हैं — वहाँ किसी काम के नहीं। वह धाम किसी बाहरी प्रकाश का मोहताज नहीं, वह स्वयं ही प्रकाश का स्रोत है। 'न निवर्तन्ते' — वहाँ से कोई लौटता नहीं, अर्थात् वह मुक्ति का अंतिम पड़ाव है। यह श्लोक परमात्मा के उस स्वरूप की ओर संकेत करता है जो सभी प्राकृतिक शक्तियों से परे है।
आज के जीवन में: परमात्मा का धाम किसी बाहरी प्रकाश का मोहताज नहीं — वह स्वयं ही सबका प्रकाश-स्रोत है।
श्लोक 15.7
वक्ता: श्रीकृष्ण
ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः।
मनःषष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति ॥15.7॥
mamaivānśho jīva-loke jīva-bhūtaḥ sanātanaḥ / manaḥ-ṣhaṣhṭhānīndriyāṇi prakṛiti-sthāni karṣhati
हिंदी अनुवाद: इस संसार में जीव बना हुआ आत्मा मेरा ही सनातन अंश है; परंतु वह प्रकृति में स्थित मन और पाँचों इंद्रियों को अपना मान लेता है और उन्हें अपनी ओर खींचता है।
भावार्थ: यह श्लोक जीवात्मा और परमात्मा के संबंध को स्पष्ट करता है। श्रीकृष्ण कहते हैं कि प्रत्येक जीव उनका 'सनातन अंश' है — अर्थात् शाश्वत और अविनाशी। 'मनःषष्ठानि इंद्रियाणि' — मन सहित छह इंद्रियाँ। जीवात्मा इन्हें प्रकृति से ग्रहण करता है और इन्हें अपना समझ बैठता है। यही भ्रम बंधन का कारण है। जीव परमात्मा का अंश होते हुए भी प्रकृति के साथ तादात्म्य कर लेता है और अपने मूल स्वरूप को भूल जाता है।
आज के जीवन में: प्रत्येक जीव परमात्मा का अंश है — यह स्मरण ही आत्म-ज्ञान की नींव है।
श्लोक 15.8
वक्ता: श्रीकृष्ण
शरीरं यदवाप्नोति यच्चाप्युत्क्रामतीश्वरः।
गृहीत्वैतानि संयाति वायुर्गन्धानिवाशयात् ॥15.8॥
śharīraṁ yad avāpnoti yach chāpy utkrāmatīśhvaraḥ / gṛihītvaitāni sanyāti vāyur gandhān ivāśhayāt
हिंदी अनुवाद: जैसे वायु फूलों के स्थान से सुगंध को ग्रहण करके ले जाती है, वैसे ही शरीर का स्वामी बना जीवात्मा जिस शरीर को छोड़ता है, वहाँ से मन सहित इंद्रियों को लेकर नए शरीर में चला जाता है।
भावार्थ: इस श्लोक में जीवात्मा की एक शरीर से दूसरे शरीर में यात्रा का सुंदर उदाहरण दिया गया है। जैसे वायु फूल से गंध को उठाकर ले जाती है और गंध अदृश्य रहती है, वैसे ही जीवात्मा शरीर छोड़ते समय मन और पाँचों इंद्रियों को अपने साथ ले जाता है। यह यात्रा आँखों से नहीं दिखती। 'ईश्वर' यहाँ जीवात्मा के लिए प्रयुक्त है — अर्थात् वह जो शरीर का अधिपति है। यह श्लोक पुनर्जन्म के सिद्धांत को सरल रूप में समझाता है।
आज के जीवन में: आत्मा शरीर बदलती है पर अपने संस्कार और मन को साथ लेकर चलती है।
श्लोक 15.9
वक्ता: श्रीकृष्ण
श्रोत्रं चक्षुः स्पर्शनं च रसनं घ्राणमेव च।
अधिष्ठाय मनश्चायं विषयानुपसेवते ॥15.9॥
śhrotraṁ chakṣhuḥ sparśhanaṁ cha rasanaṁ ghrāṇam eva cha / adhiṣhṭhāya manaśh chāyaṁ viṣhayān upasevate
हिंदी अनुवाद: यह जीवात्मा मन का आश्रय लेकर कान, आँख, त्वचा, जीभ और नाक — इन पाँचों इंद्रियों के माध्यम से विषयों का अनुभव करता है।
भावार्थ: पिछले श्लोक में बताया गया कि जीवात्मा मन और इंद्रियों को साथ लेकर चलता है। इस श्लोक में बताया गया है कि नए शरीर में आकर वह इन्हीं इंद्रियों के द्वारा संसार का अनुभव करता है। 'श्रोत्र' — कान, 'चक्षु' — आँख, 'स्पर्शन' — त्वचा, 'रसना' — जीभ, 'घ्राण' — नाक। मन इन सबका केंद्र है। जीवात्मा इन्हीं के माध्यम से शब्द, रूप, स्पर्श, रस और गंध का अनुभव करता है और उनमें आसक्त होता रहता है।
श्लोक 15.10
वक्ता: श्रीकृष्ण
उत्क्रामन्तं स्थितं वापि भुञ्जानं वा गुणान्वितम्।
विमूढा नानुपश्यन्ति पश्यन्ति ज्ञानचक्षुषः ॥15.10॥
utkrāmantaṁ sthitaṁ vāpi bhuñjānaṁ vā guṇānvitam / vimūḍhā nānupaśhyanti paśhyanti jñāna-chakṣhuṣhaḥ
हिंदी अनुवाद: शरीर छोड़ते हुए, नए शरीर में स्थित होते हुए या विषयों को भोगते हुए — गुणों से युक्त इस जीवात्मा को मूढ़ मनुष्य नहीं देख पाते; केवल ज्ञान-रूपी नेत्रों वाले ज्ञानी ही इसे देख पाते हैं।
भावार्थ: इस श्लोक में ज्ञानी और अज्ञानी की दृष्टि का अंतर स्पष्ट किया गया है। जीवात्मा जब शरीर छोड़ता है, नया शरीर धारण करता है या इंद्रियों से विषयों का भोग करता है — ये सब क्रियाएँ होती रहती हैं, पर अज्ञानी इन्हें नहीं समझ पाते। 'विमूढ़' — जो भ्रम में हैं। 'ज्ञानचक्षु' — ज्ञान की आँखें, अर्थात् विवेक और आत्म-दृष्टि। जिनके पास यह आंतरिक दृष्टि है, वे ही जीवात्मा के वास्तविक स्वरूप को पहचान पाते हैं।
आज के जीवन में: आत्मा को केवल ज्ञान की आँखों से देखा जा सकता है, बाहरी इंद्रियों से नहीं।
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