भगवद्गीता अध्याय 15, श्लोक 11–20 | पुरुषोत्तमयोग | अर्थ सहित
अध्याय पंद्रह के पूर्वार्ध में श्रीकृष्ण ने संसार को उलटे वृक्ष के रूप में समझाया और जीवात्मा के देह-से-देह भटकने का वर्णन किया। अब इस उत्तरार्ध में वे बताते हैं कि परमात्मा को कौन जान पाता है और कौन नहीं, फिर सूर्य-चन्द्र-अग्नि से लेकर प्राणियों के हृदय तक अपनी व्यापकता का वर्णन करते हैं। अंत में वे क्षर, अक्षर और पुरुषोत्तम — इन तीन तत्त्वों का भेद स्पष्ट कर इस अध्याय का समापन करते हैं।
श्लोक 15.11
वक्ता: श्रीकृष्ण
यतन्तो योगिनश्चैनं पश्यन्त्यात्मन्यवस्थितम्।
यतन्तोऽप्यकृतात्मानो नैनं पश्यन्त्यचेतसः ॥15.11॥
yatanto yoginaśh chainaṁ paśhyanty ātmany avasthitam / yatanto ‘py akṛitātmāno nainaṁ paśhyanty achetasaḥ
हिंदी अनुवाद: यत्न करने वाले योगी अपने भीतर स्थित इस परमात्मतत्त्व का अनुभव कर लेते हैं। किन्तु जिनका अन्तःकरण शुद्ध नहीं हुआ, ऐसे अविवेकी लोग यत्न करने पर भी इसे नहीं देख पाते।
भावार्थ: श्रीकृष्ण अर्जुन को बता रहे हैं कि परमात्मा का अनुभव केवल बाहरी प्रयास से नहीं, बल्कि भीतर की शुद्धि से होता है। 'यतन्तः' अर्थात् सच्चे प्रयास करने वाले योगी अपने ही आत्मा में उस तत्त्व को पहचान लेते हैं। 'अकृतात्मानः' का अर्थ है जिन्होंने अपने अन्तःकरण को साधा नहीं — ऐसे लोग चाहे कितना भी बाहरी परिश्रम करें, परमात्मा उनसे ओझल ही रहता है। भीतर की पात्रता ही दर्शन की कुंजी है।
आज के जीवन में: कोई भी लक्ष्य केवल बाहरी परिश्रम से नहीं, बल्कि मन और बुद्धि को परिष्कृत करने से प्राप्त होता है।
श्लोक 15.12
वक्ता: श्रीकृष्ण
यदादित्यगतं तेजो जगद्भासयतेऽखिलम्।
यच्चन्द्रमसि यच्चाग्नौ तत्तेजो विद्धि मामकम् ॥15.12॥
yad āditya-gataṁ tejo jagad bhāsayate ’khilam / yach chandramasi yach chāgnau tat tejo viddhi māmakam
हिंदी अनुवाद: सूर्य में जो तेज है और जो सारे जगत को प्रकाशित करता है, चन्द्रमा में जो प्रकाश है और अग्नि में जो ज्योति है — उस सबको मेरा ही तेज जानो।
भावार्थ: श्रीकृष्ण अपनी विभूति का वर्णन करते हुए कहते हैं कि जो भी प्रकाश इस सृष्टि में दिखता है — चाहे वह सूर्य का हो, चन्द्रमा का हो या अग्नि का — वह सब उन्हीं की शक्ति का प्रकटीकरण है। 'तेजः' शब्द यहाँ केवल भौतिक प्रकाश नहीं, बल्कि उस दिव्य चेतना-शक्ति का संकेत है जो समस्त जगत को आलोकित करती है। परमात्मा इन माध्यमों से ही सृष्टि को जीवन और दृष्टि देते हैं।
आज के जीवन में: जो भी सुन्दर, प्रकाशमान और जीवनदायी है, उसमें उस परम शक्ति की झलक देखना ही सच्ची आस्था है।
श्लोक 15.13
वक्ता: श्रीकृष्ण
गामाविश्य च भूतानि धारयाम्यहमोजसा।
पुष्णामि चौषधीः सर्वाः सोमो भूत्वा रसात्मकः ॥15.13॥
gām āviśhya cha bhūtāni dhārayāmy aham ojasā / puṣhṇāmi chauṣhadhīḥ sarvāḥ somo bhūtvā rasātmakaḥ
हिंदी अनुवाद: मैं ही पृथ्वी में प्रविष्ट होकर अपनी शक्ति से समस्त प्राणियों को धारण करता हूँ, और रसमय चन्द्रमा बनकर समस्त वनस्पतियों को पुष्ट करता हूँ।
भावार्थ: श्रीकृष्ण बताते हैं कि पृथ्वी की धारण-शक्ति और वनस्पतियों का पोषण — दोनों उन्हीं की अभिव्यक्ति हैं। 'ओजसा' अर्थात् अपनी दिव्य शक्ति से वे समस्त जीवों को थामे हुए हैं। 'सोमो भूत्वा रसात्मकः' — रसमय चन्द्रमा के रूप में वे औषधियों और वनस्पतियों में जीवन-रस भरते हैं। यह श्लोक यह समझाता है कि प्रकृति की हर पोषण-क्रिया में परमात्मा की उपस्थिति है।
आज के जीवन में: प्रकृति की हर पोषण-शक्ति में उस परम सत्ता का अनुग्रह देखें, तो कृतज्ञता स्वाभाविक हो जाती है।
श्लोक 15.14
वक्ता: श्रीकृष्ण
अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रितः।
प्राणापानसमायुक्तः पचाम्यन्नं चतुर्विधम् ॥15.14॥
ahaṁ vaiśhvānaro bhūtvā prāṇināṁ deham āśhritaḥ / prāṇāpāna-samāyuktaḥ pachāmy annaṁ chatur-vidham
हिंदी अनुवाद: मैं ही प्राणियों के शरीर में वैश्वानर अग्नि बनकर रहता हूँ और प्राण तथा अपान के साथ मिलकर चारों प्रकार के अन्न को पचाता हूँ।
भावार्थ: यहाँ श्रीकृष्ण बताते हैं कि शरीर में पाचन की जो अग्नि है, वह भी उन्हीं का रूप है। 'वैश्वानर' वह जठराग्नि है जो भोजन को पचाती है। 'प्राण-अपान' दो प्रमुख वायु हैं जो श्वास और पाचन में सहायक हैं। 'चतुर्विध अन्न' अर्थात् चबाकर, पीकर, चाटकर और निगलकर खाया जाने वाला भोजन — इन सबको पचाने वाली शक्ति परमात्मा की ही है। जीवन की हर क्रिया में वे विद्यमान हैं।
आज के जीवन में: शरीर में होने वाली हर जीवन-क्रिया उस परम शक्ति की देन है — यह स्मरण विनम्रता जगाता है।
श्लोक 15.15
वक्ता: श्रीकृष्ण
सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टो मत्तः स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च।
वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यो वेदान्तकृद्वेदविदेव चाहम् ॥15.15॥
sarvasya chāhaṁ hṛidi sanniviṣhṭo / mattaḥ smṛitir jñānam apohanaṁ cha / vedaiśh cha sarvair aham eva vedyo / vedānta-kṛid veda-vid eva chāham
हिंदी अनुवाद: मैं समस्त प्राणियों के हृदय में स्थित हूँ। मुझसे ही स्मृति, ज्ञान और उनका अपोहन होता है। सभी वेदों द्वारा मैं ही जानने योग्य हूँ; वेदान्त का निर्माण करने वाला और वेदों को जानने वाला भी मैं ही हूँ।
भावार्थ: श्रीकृष्ण की व्यापकता का यह सबसे गहरा वर्णन है। वे केवल बाहर नहीं, प्रत्येक प्राणी के हृदय में विराजमान हैं। 'स्मृति' अर्थात् याद रखने की शक्ति, 'ज्ञान' अर्थात् समझ, और 'अपोहन' अर्थात् संशय व भ्रम का नाश — ये सब उन्हीं से आते हैं। वेद जिसे खोजते हैं, वह परमात्मा स्वयं श्रीकृष्ण हैं। वे ही वेदों के रचयिता और उनके ज्ञाता भी हैं — यह उनकी सर्वोच्चता का उद्घोष है।
आज के जीवन में: जो ज्ञान और विवेक हमें सही-गलत का बोध कराता है, वह भीतर बैठी उस चेतना का ही प्रकाश है।
श्लोक 15.16
वक्ता: श्रीकृष्ण
द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च।
क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते ॥15.16॥
dvāv imau puruṣhau loke kṣharaśh chākṣhara eva cha / kṣharaḥ sarvāṇi bhūtāni kūṭa-stho ’kṣhara uchyate
हिंदी अनुवाद: इस संसार में दो प्रकार के पुरुष हैं — क्षर अर्थात् नाशवान, और अक्षर अर्थात् अविनाशी। समस्त प्राणियों के शरीर नाशवान हैं, और कूटस्थ जीवात्मा अविनाशी कहलाती है।
भावार्थ: श्रीकृष्ण यहाँ सृष्टि के दो मूलभूत तत्त्वों का परिचय देते हैं। 'क्षर' वह है जो बदलता और नष्ट होता है — अर्थात् सभी प्राणियों के शरीर। 'अक्षर' वह है जो अपरिवर्तनीय है — अर्थात् 'कूटस्थ' जीवात्मा, जो देह-परिवर्तन के बावजूद स्वयं अविकारी रहती है। यह भेद समझना आत्मज्ञान की पहली सीढ़ी है। अगले श्लोक में इन दोनों से परे एक तीसरे तत्त्व का वर्णन होगा।
आज के जीवन में: शरीर नश्वर है और आत्मा अविनाशी — यह समझ जीवन में स्थिरता और निर्भयता देती है।
श्लोक 15.17
वक्ता: श्रीकृष्ण
उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः।
यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वरः ॥15.17॥
uttamaḥ puruṣhas tv anyaḥ paramātmety udāhṛitaḥ / yo loka-trayam āviśhya bibharty avyaya īśhvaraḥ
हिंदी अनुवाद: किन्तु इन दोनों से परे एक उत्तम पुरुष है, जिसे परमात्मा कहा जाता है। वही अविनाशी ईश्वर तीनों लोकों में प्रविष्ट होकर सबका भरण-पोषण करता है।
भावार्थ: क्षर और अक्षर — दोनों से ऊपर एक तीसरा तत्त्व है जिसे 'उत्तम पुरुष' या 'परमात्मा' कहते हैं। 'लोकत्रयम्' अर्थात् तीनों लोकों में व्याप्त होकर वह सबका पालन करता है। जीवात्मा अक्षर होते हुए भी व्यक्तिगत है, किन्तु परमात्मा सर्वव्यापी और सर्वपालक है। यह श्लोक स्पष्ट करता है कि परमात्मा जीवात्मा से भी श्रेष्ठ और भिन्न है — वह समस्त सृष्टि का आधार है।
आज के जीवन में: जो सबको धारण करता है और सबमें व्याप्त है, उस परम सत्ता की ओर मन लगाना ही सच्ची उपासना है।
श्लोक 15.18
वक्ता: श्रीकृष्ण
यस्मात्क्षरमतीतोऽहमक्षरादपि चोत्तमः।
अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तमः ॥15.18॥
yasmāt kṣharam atīto ’ham akṣharād api chottamaḥ / ato ’smi loke vede cha prathitaḥ puruṣhottamaḥ
हिंदी अनुवाद: मैं नाशवान से परे हूँ और अविनाशी से भी उत्तम हूँ, इसलिये लोक में और वेद में मैं पुरुषोत्तम नाम से प्रसिद्ध हूँ।
भावार्थ: श्रीकृष्ण यहाँ स्वयं अपनी सर्वोच्च स्थिति का उद्घोष करते हैं। वे क्षर से तो परे हैं ही, अक्षर जीवात्मा से भी उत्तम हैं। इसीलिये वे 'पुरुषोत्तम' कहलाते हैं — जो सर्वश्रेष्ठ पुरुष है। यह नाम केवल लोक-व्यवहार में नहीं, वेदों में भी प्रतिष्ठित है। इस अध्याय का नाम 'पुरुषोत्तमयोग' इसी श्लोक की केन्द्रीय भावना पर आधारित है।
आज के जीवन में: जो तत्त्व सब सीमाओं से परे है, उसे जानना ही ज्ञान की परम सिद्धि है।
श्लोक 15.19
वक्ता: श्रीकृष्ण
यो मामेवमसम्मूढो जानाति पुरुषोत्तमम्।
स सर्वविद्भजति मां सर्वभावेन भारत ॥15.19॥
yo mām evam asammūḍho jānāti puruṣhottamam / sa sarva-vid bhajati māṁ sarva-bhāvena bhārata
हिंदी अनुवाद: हे भरतवंशी अर्जुन! जो मोहरहित मनुष्य मुझे इस प्रकार पुरुषोत्तम जानता है, वह सर्वज्ञ होकर सब प्रकार से मेरा ही भजन करता है।
भावार्थ: श्रीकृष्ण कहते हैं कि पुरुषोत्तम का यह ज्ञान मोह से मुक्त करता है। 'असम्मूढः' अर्थात् जो भ्रम और मोह से रहित है — वही इस तत्त्व को ठीक से जान सकता है। ऐसा जानने वाला 'सर्वविद्' — सब कुछ जानने वाला — हो जाता है, क्योंकि जो सबका मूल जान लिया, उसे और क्या जानना शेष रहा? और वह 'सर्वभावेन' — पूरे हृदय से — भजन करता है।
आज के जीवन में: जो परम सत्य को जान लेता है, उसका जीवन स्वाभाविक रूप से उसी की ओर उन्मुख हो जाता है।
श्लोक 15.20
वक्ता: श्रीकृष्ण
इति गुह्यतमं शास्त्रमिदमुक्तं मयाऽनघ।
एतद्बुद्ध्वा बुद्धिमान्स्यात्कृतकृत्यश्च भारत ॥15.20॥
iti guhyatamaṁ śhāstram idam uktaṁ mayānagha / etad buddhvā buddhimān syāt kṛita-kṛityaśh cha bhārata
हिंदी अनुवाद: हे निष्पाप अर्जुन! इस प्रकार यह अत्यन्त गोपनीय शास्त्र मेरे द्वारा कहा गया। हे भरतवंशी! इसे जानकर मनुष्य ज्ञानवान और कृतकृत्य हो जाता है।
भावार्थ: श्रीकृष्ण इस अध्याय का समापन करते हुए कहते हैं कि यह ज्ञान 'गुह्यतमम्' — सबसे अधिक गोपनीय — है। 'अनघ' अर्थात् निष्पाप — यह सम्बोधन बताता है कि इस ज्ञान का अधिकारी वही है जो निर्मल है। 'कृतकृत्यः' का अर्थ है जिसने सब करने योग्य कर लिया — अर्थात् जीवन का परम प्रयोजन सिद्ध हो गया। पुरुषोत्तम का यह ज्ञान ही मनुष्य की सबसे बड़ी उपलब्धि है।
आज के जीवन में: जो परम तत्त्व को जान लेता है, उसके जीवन का कोई भी कर्तव्य अधूरा नहीं रहता।
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