भगवद्गीता अध्याय 16, श्लोक 1–10 | दैवासुरसम्पद्विभागयोग | अर्थ सहित
पंद्रहवें अध्याय में श्रीकृष्ण ने संसार-वृक्ष का वर्णन करते हुए परमात्मा की महिमा समझाई थी। सोलहवें अध्याय में वे मनुष्यों के दो मूल स्वभावों — दैवी और आसुरी — का विस्तार से वर्णन करते हैं। इस पहले खंड में श्रीकृष्ण दैवी सम्पदा के गुणों की सूची देते हैं, फिर आसुरी स्वभाव के लक्षण और उसके दुष्परिणाम बताते हैं।
श्लोक 16.1
वक्ता: श्रीकृष्ण
अभयं सत्त्वसंशुद्धिः ज्ञानयोगव्यवस्थितिः।
दानं दमश्च यज्ञश्च स्वाध्यायस्तप आर्जवम् ॥16.1॥
śhrī-bhagavān uvācha / abhayaṁ sattva-sanśhuddhir jñāna-yoga-vyavasthitiḥ / dānaṁ damaśh cha yajñaśh cha svādhyāyas tapa ārjavam
हिंदी अनुवाद: श्रीभगवान् बोले — भय का सर्वथा अभाव, अन्तःकरण की शुद्धि, ज्ञान-योग में दृढ़ स्थिति, सात्त्विक दान, इन्द्रियों का दमन, यज्ञ, स्वाध्याय, कर्तव्य के लिए कष्ट सहना और शरीर-मन-वाणी की सरलता।
भावार्थ: यह अध्याय श्रीकृष्ण के उपदेश का नया चरण है जिसमें वे दैवी सम्पदा के गुणों की गणना आरम्भ करते हैं। 'अभयम्' अर्थात् किसी भी परिस्थिति में भीतर से न डरना; 'सत्त्वसंशुद्धि' अर्थात् मन की निर्मलता। 'ज्ञानयोगव्यवस्थिति' का अर्थ है — ज्ञान और साधना में स्थिर रहना। दान, इन्द्रिय-दमन, यज्ञ, शास्त्र-पाठ, तप और सरलता — ये सभी उस मनुष्य के स्वाभाविक गुण हैं जो दैवी प्रकृति से जन्मा है।
आज के जीवन में: जो व्यक्ति भीतर से निर्भय, सरल और संयमी है, वह अपने जीवन में स्वाभाविक रूप से श्रेष्ठ आचरण करता है।
श्लोक 16.2
वक्ता: श्रीकृष्ण
अहिंसा सत्यमक्रोधस्त्यागः शान्तिरपैशुनम्।
दया भूतेष्वलोलुप्त्वं मार्दवं ह्रीरचापलम् ॥16.2॥
ahinsā satyam akrodhas tyāgaḥ śhāntir apaiśhunam / dayā bhūteṣhv aloluptvaṁ mārdavaṁ hrīr achāpalam
हिंदी अनुवाद: अहिंसा, सत्यभाषण, क्रोध न करना, संसार की कामनाओं का त्याग, मन की शान्ति, चुगली न करना, प्राणियों पर दया, विषयों में न ललचाना, अन्तःकरण की कोमलता, अकर्तव्य में लज्जा और चपलता का अभाव।
भावार्थ: दैवी सम्पदा के गुणों की सूची आगे बढ़ती है। 'अपैशुनम्' का अर्थ है — किसी की चुगली या निन्दा न करना। 'अलोलुप्त्वम्' अर्थात् सांसारिक भोगों के प्रति लालच न रखना। 'ह्री' का अर्थ है — गलत काम करने में स्वाभाविक लज्जा अनुभव करना। 'अचापलम्' अर्थात् बिना सोचे-समझे हाथ-पाँव या वाणी का व्यर्थ चलना नहीं। ये सभी गुण मिलकर एक सात्त्विक, संतुलित और करुणामय व्यक्तित्व का निर्माण करते हैं।
आज के जीवन में: सत्य, दया, शान्ति और संयम — ये गुण किसी भी मनुष्य के जीवन को सुन्दर और समाज के लिए उपयोगी बनाते हैं।
श्लोक 16.3
वक्ता: श्रीकृष्ण
तेजः क्षमा धृतिः शौचमद्रोहो नातिमानिता।
भवन्ति सम्पदं दैवीमभिजातस्य भारत ॥16.3॥
tejaḥ kṣhamā dhṛitiḥ śhaucham adroho nāti-mānitā / bhavanti sampadaṁ daivīm abhijātasya bhārata
हिंदी अनुवाद: तेज, क्षमा, धैर्य, शरीर की शुद्धि, वैरभाव का अभाव और अभिमान न चाहना — हे भरतवंशी अर्जुन! ये सब दैवी सम्पदा को प्राप्त मनुष्य के लक्षण हैं।
भावार्थ: तीन श्लोकों में फैली दैवी सम्पदा की सूची यहाँ पूर्ण होती है। 'तेजः' का अर्थ है — आत्मिक प्रभाव और साहस। 'क्षमा' अर्थात् अपकार करने वाले को भी क्षमा कर देना। 'धृति' यानी विपरीत परिस्थितियों में भी मन को स्थिर रखना। 'अद्रोहः' अर्थात् किसी के प्रति भी शत्रुता न रखना। 'नातिमानिता' अर्थात् अपनी प्रतिष्ठा की अत्यधिक चाह न रखना। श्रीकृष्ण इन्हें 'दैवी सम्पद' — ईश्वरीय सम्पत्ति — कहते हैं।
आज के जीवन में: क्षमा, धैर्य और विनम्रता — ये दुर्बलता के नहीं, आत्मिक बल के लक्षण हैं।
श्लोक 16.4
वक्ता: श्रीकृष्ण
दम्भो दर्पोऽभिमानश्च क्रोधः पारुष्यमेव च।
अज्ञानं चाभिजातस्य पार्थ सम्पदमासुरीम् ॥16.4॥
dambho darpo ’bhimānaśh cha krodhaḥ pāruṣhyam eva cha / ajñānaṁ chābhijātasya pārtha sampadam āsurīm
हिंदी अनुवाद: हे पृथानन्दन! दम्भ, घमण्ड, अभिमान, क्रोध, कठोरता और अविवेक — ये सब आसुरी सम्पदा को प्राप्त मनुष्य के लक्षण हैं।
भावार्थ: अब श्रीकृष्ण आसुरी स्वभाव के गुणों की ओर आते हैं। 'दम्भ' अर्थात् जो है नहीं उसका दिखावा करना; 'दर्प' अर्थात् अपनी शक्ति या सम्पत्ति पर घमण्ड; 'अभिमान' अर्थात् अपने को श्रेष्ठ और दूसरों को तुच्छ समझना। 'पारुष्य' अर्थात् वाणी और व्यवहार में कठोरता। 'अज्ञान' यहाँ केवल पुस्तकीय अज्ञान नहीं, बल्कि उचित-अनुचित का विवेक न होना है। ये गुण मनुष्य को अधोगति की ओर ले जाते हैं।
आज के जीवन में: दम्भ, क्रोध और अविवेक — ये तीनों मिलकर मनुष्य के सम्बन्धों और चरित्र दोनों को नष्ट करते हैं।
श्लोक 16.5
वक्ता: श्रीकृष्ण
दैवी सम्पद्विमोक्षाय निबन्धायासुरी मता।
मा शुचः सम्पदं दैवीमभिजातोऽसि पाण्डव ॥16.5॥
daivī sampad vimokṣhāya nibandhāyāsurī matā / mā śhuchaḥ sampadaṁ daivīm abhijāto ’si pāṇḍava
हिंदी अनुवाद: दैवी सम्पत्ति मुक्ति के लिए है और आसुरी सम्पत्ति बन्धन के लिए। हे पाण्डव! तुम दैवी सम्पत्ति को प्राप्त हुए हो, इसलिए तुम्हें शोक नहीं करना चाहिए।
भावार्थ: श्रीकृष्ण दोनों सम्पदाओं का फल स्पष्ट करते हैं — दैवी गुण मनुष्य को बन्धनों से मुक्त करते हैं और आसुरी गुण उसे और अधिक बाँधते हैं। 'विमोक्षाय' अर्थात् मुक्ति के लिए; 'निबन्धाय' अर्थात् बन्धन के लिए। फिर वे अर्जुन को सीधे आश्वस्त करते हैं — तुम दैवी सम्पदा से युक्त हो, इसलिए चिन्ता मत करो। यह वाक्य अर्जुन के मन में जो संशय और शोक था, उसे दूर करने के लिए कहा गया है।
आज के जीवन में: जो व्यक्ति अपने भीतर के सद्गुणों को पहचान ले, उसे अपनी क्षमता पर संदेह नहीं करना चाहिए।
श्लोक 16.6
वक्ता: श्रीकृष्ण
द्वौ भूतसर्गौ लोकेऽस्मिन् दैव आसुर एव च।
दैवो विस्तरशः प्रोक्त आसुरं पार्थ मे श्रृणु ॥16.6॥
dvau bhūta-sargau loke ’smin daiva āsura eva cha / daivo vistaraśhaḥ prokta āsuraṁ pārtha me śhṛiṇu
हिंदी अनुवाद: इस संसार में प्राणियों की दो प्रकार की सृष्टि है — दैवी और आसुरी। दैवी का तो मैंने विस्तार से वर्णन कर दिया; अब हे पार्थ! आसुरी का विस्तार मुझसे सुनो।
भावार्थ: श्रीकृष्ण यहाँ स्पष्ट करते हैं कि यह विभाजन जन्म से नहीं, स्वभाव और गुणों से है। 'भूतसर्गौ' अर्थात् प्राणियों के दो वर्ग। दैवी सम्पदा का वर्णन पूर्ण हो चुका है, अब वे आसुरी स्वभाव को विस्तार से समझाने की भूमिका बाँधते हैं। यह श्लोक एक संक्रमण-बिन्दु है जो पाठक को आगे के गहरे विवेचन के लिए तैयार करता है।
श्लोक 16.7
वक्ता: श्रीकृष्ण
प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च जना न विदुरासुराः।
न शौचं नापि चाचारो न सत्यं तेषु विद्यते ॥16.7॥
pravṛittiṁ cha nivṛittiṁ cha janā na vidur āsurāḥ / na śhauchaṁ nāpi chāchāro na satyaṁ teṣhu vidyate
हिंदी अनुवाद: आसुरी प्रकृति वाले मनुष्य यह नहीं जानते कि क्या करना उचित है और क्या नहीं; उनमें न बाहरी शुद्धि होती है, न श्रेष्ठ आचरण और न सत्य का पालन।
भावार्थ: 'प्रवृत्ति' अर्थात् जो कार्य करने योग्य हैं, और 'निवृत्ति' अर्थात् जिनसे बचना चाहिए — आसुरी स्वभाव वाले इस विवेक से वंचित होते हैं। 'शौचम्' अर्थात् शुद्धि — न शरीर की, न मन की। 'आचारः' अर्थात् समाज और धर्म के अनुसार उचित व्यवहार। 'सत्यम्' अर्थात् वाणी और आचरण में सच्चाई। इन तीनों के अभाव में मनुष्य का जीवन दिशाहीन हो जाता है।
आज के जीवन में: जिस मनुष्य में उचित-अनुचित का विवेक नहीं, वह अपने लिए और दूसरों के लिए भी कठिनाई उत्पन्न करता है।
श्लोक 16.8
वक्ता: श्रीकृष्ण
असत्यमप्रतिष्ठं ते जगदाहुरनीश्वरम्।
अपरस्परसम्भूतं किमन्यत्कामहैतुकम् ॥16.8॥
asatyam apratiṣhṭhaṁ te jagad āhur anīśhvaram / aparaspara-sambhūtaṁ kim anyat kāma-haitukam
हिंदी अनुवाद: वे कहते हैं कि यह संसार असत्य है, इसका कोई आधार नहीं, इसमें कोई ईश्वर नहीं; यह केवल स्त्री-पुरुष के संयोग से उत्पन्न हुआ है और इसका एकमात्र कारण काम-वासना है।
भावार्थ: आसुरी स्वभाव वाले लोगों की विचारधारा का वर्णन है। 'असत्यम्' अर्थात् इस जगत् का कोई नैतिक या आध्यात्मिक सत्य नहीं; 'अप्रतिष्ठम्' अर्थात् इसका कोई स्थायी आधार नहीं; 'अनीश्वरम्' अर्थात् कोई नियन्ता या परमात्मा नहीं। 'कामहैतुकम्' अर्थात् केवल वासना ही इस सृष्टि का कारण है। ऐसी सोच मनुष्य को नैतिकता और उत्तरदायित्व से मुक्त समझने की ओर ले जाती है।
आज के जीवन में: जब मनुष्य जीवन में किसी उच्च उद्देश्य या नैतिक आधार को नहीं मानता, तो उसके आचरण में स्वार्थ और उच्छृंखलता आ जाती है।
श्लोक 16.9
वक्ता: श्रीकृष्ण
एतां दृष्टिमवष्टभ्य नष्टात्मानोऽल्पबुद्धयः।
प्रभवन्त्युग्रकर्माणः क्षयाय जगतोऽहिताः ॥16.9॥
etāṁ dṛiṣhṭim avaṣhṭabhya naṣhṭātmāno ’lpa-buddhayaḥ / prabhavanty ugra-karmāṇaḥ kṣhayāya jagato ’hitāḥ
हिंदी अनुवाद: इस नष्टकारी दृष्टि का सहारा लेकर जो मनुष्य अपने वास्तविक स्वरूप को नहीं पहचानते, जिनकी बुद्धि तुच्छ है और जो उग्र कर्म करते हैं, वे संसार के शत्रु बनकर उसके नाश के लिए ही उठ खड़े होते हैं।
भावार्थ: 'नष्टात्मानः' अर्थात् जिन्होंने अपने भीतर के वास्तविक स्वरूप को खो दिया है। 'अल्पबुद्धयः' अर्थात् जिनकी समझ संकुचित है। 'उग्रकर्माणः' अर्थात् जो क्रूर और हिंसक कार्य करते हैं। 'क्षयाय जगतः' अर्थात् संसार के विनाश के लिए। श्रीकृष्ण यहाँ बताते हैं कि गलत विचारधारा केवल व्यक्ति को नहीं, समाज और संसार को भी हानि पहुँचाती है।
आज के जीवन में: भ्रामक विचारधारा को दृढ़ता से पकड़ने वाले लोग अपना ही नहीं, समाज का भी अहित करते हैं।
श्लोक 16.10
वक्ता: श्रीकृष्ण
काममाश्रित्य दुष्पूरं दम्भमानमदान्विताः।
मोहाद्गृहीत्वासद्ग्राहान्प्रवर्तन्तेऽशुचिव्रताः ॥16.10॥
kāmam āśhritya duṣhpūraṁ dambha-māna-madānvitāḥ / mohād gṛihītvāsad-grāhān pravartante ’śhuchi-vratāḥ
हिंदी अनुवाद: कभी न तृप्त होने वाली कामनाओं का सहारा लेकर, दम्भ-अभिमान और मद में डूबे हुए, मोह के कारण गलत धारणाएँ पकड़कर और अपवित्र व्रत धारण करके ये लोग संसार में विचरते रहते हैं।
भावार्थ: 'दुष्पूरम्' अर्थात् जो कभी पूरी न हो — ऐसी कामनाएँ। 'दम्भमानमदान्विताः' अर्थात् दिखावे, अहंकार और मद से भरे हुए। 'मोहाद्गृहीत्वासद्ग्राहान्' अर्थात् मोह के कारण जो धारणाएँ सत्य नहीं हैं उन्हें सत्य मानकर चलना। 'अशुचिव्रताः' अर्थात् जिनके संकल्प और व्रत अपवित्र हैं। ऐसे लोग अपनी इच्छाओं की दौड़ में जीवन बिता देते हैं, कभी सन्तोष या शान्ति नहीं पाते।
आज के जीवन में: अतृप्त कामनाएँ और अहंकार मिलकर मनुष्य को भटकाते रहते हैं; सन्तोष और विवेक ही उसे स्थिरता दे सकते हैं।
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