भगवद्गीता अध्याय 16, श्लोक 11–20 | दैवासुरसम्पद्विभागयोग | अर्थ सहित
अध्याय सोलह के पूर्वार्ध में श्रीकृष्ण ने दैवी और आसुरी स्वभाव के लक्षण बताए। इस खंड में वे आसुरी स्वभाव के मनुष्यों की मानसिकता का और गहरा चित्र खींचते हैं — उनकी असीमित चिंताएँ, अहंकारपूर्ण सोच, अन्यायपूर्ण संग्रह और ईश्वर से द्वेष। अंत में वे बताते हैं कि ऐसे मनुष्य जन्म-जन्मांतर में अधोगति को प्राप्त होते हैं।
श्लोक 16.11
वक्ता: श्रीकृष्ण
चिन्तामपरिमेयां च प्रलयान्तामुपाश्रिताः।
कामोपभोगपरमा एतावदिति निश्िचताः ॥16.11॥
chintām aparimeyāṁ cha pralayāntām upāśhritāḥ / kāmopabhoga-paramā etāvad iti niśhchitāḥ
हिंदी अनुवाद: ऐसे मनुष्य मृत्युपर्यंत बनी रहने वाली अनगिनत चिंताओं के सहारे जीते हैं, भोग-सामग्री को ही सर्वोच्च लक्ष्य मानते हैं और यह निश्चित मान लेते हैं कि 'बस, इतना ही सब कुछ है।'
भावार्थ: श्रीकृष्ण अर्जुन को आसुरी स्वभाव के मनुष्यों की मनोदशा समझा रहे हैं। 'प्रलयान्ताम्' का अर्थ है — मृत्यु तक चलने वाली। ऐसे लोगों की चिंताओं का कोई अंत नहीं होता क्योंकि वे केवल भोग-संग्रह में लगे रहते हैं। 'कामोपभोगपरमाः' — जिनके लिए इंद्रिय-सुख ही परम उद्देश्य है। वे यह मान बैठते हैं कि इस जगत में जो दिखता है, वही सब कुछ है — इससे परे कोई सत्य नहीं। यह दृष्टि उन्हें आत्मा और परमात्मा दोनों से दूर रखती है।
आज के जीवन में: जो व्यक्ति केवल भौतिक संग्रह और भोग को ही जीवन का अंतिम लक्ष्य मान लेता है, वह कभी भी सच्ची शांति नहीं पा सकता।
श्लोक 16.12
वक्ता: श्रीकृष्ण
आशापाशशतैर्बद्धाः कामक्रोधपरायणाः।
ईहन्ते कामभोगार्थमन्यायेनार्थसञ्चयान् ॥16.12॥
āśhā-pāśha-śhatair baddhāḥ kāma-krodha-parāyaṇāḥ / īhante kāma-bhogārtham anyāyenārtha-sañchayān
हिंदी अनुवाद: आशा की सैकड़ों फाँसियों में बँधे, काम और क्रोध के वशीभूत ये मनुष्य भोग-विलास के लिए अन्यायपूर्ण तरीकों से धन इकट्ठा करने में लगे रहते हैं।
भावार्थ: श्रीकृष्ण यहाँ आसुरी मनुष्य की बंधन-दशा का वर्णन करते हैं। 'आशापाशशतैः' — आशा की सैकड़ों रस्सियाँ, जो मनुष्य को भीतर से जकड़ लेती हैं। 'कामक्रोधपरायणाः' — जो काम और क्रोध के ही अधीन हैं। इच्छाएँ पूरी न हों तो क्रोध, और क्रोध से और अधिक अन्याय — यह दुष्चक्र चलता रहता है। ऐसे लोग अपनी भोग-लालसा पूरी करने के लिए उचित-अनुचित का विचार नहीं करते और अन्यायपूर्वक धन-संचय करते हैं।
आज के जीवन में: असीमित इच्छाएँ मनुष्य को भीतर से बाँध लेती हैं और उसे अनुचित मार्ग पर ले जाती हैं।
श्लोक 16.13
वक्ता: श्रीकृष्ण
इदमद्य मया लब्धमिमं प्राप्स्ये मनोरथम्।
इदमस्तीदमपि मे भविष्यति पुनर्धनम् ॥16.13॥
idam adya mayā labdham imaṁ prāpsye manoratham / idam astīdam api me bhaviṣhyati punar dhanam
हिंदी अनुवाद: वे मन ही मन सोचते रहते हैं — 'आज यह मिल गया, अब यह इच्छा भी पूरी होगी; इतना धन तो है ही, आगे और भी हो जाएगा।'
भावार्थ: इस श्लोक में श्रीकृष्ण आसुरी मनुष्य के मन की भीतरी बातें जैसे सुनाते हैं। 'इदम् अद्य मया लब्धम्' — आज यह पा लिया। 'इमं प्राप्स्ये मनोरथम्' — यह मनोरथ भी पूरा करूँगा। उसका मन कभी संतुष्ट नहीं होता — जो मिला उससे और की चाह, जो नहीं मिला उसकी योजना। यह निरंतर भविष्य की कल्पना में जीना उसे वर्तमान की वास्तविकता से और आत्मज्ञान से दूर रखता है।
आज के जीवन में: जो मन हमेशा 'और चाहिए' की दौड़ में लगा रहता है, वह न वर्तमान का आनंद ले पाता है, न भीतर की शांति पा सकता है।
श्लोक 16.14
वक्ता: श्रीकृष्ण
असौ मया हतः शत्रुर्हनिष्ये चापरानपि।
ईश्वरोऽहमहं भोगी सिद्धोऽहं बलवान्सुखी ॥16.14॥
asau mayā hataḥ śhatrur haniṣhye chāparān api / īśhvaro ’ham ahaṁ bhogī siddho ’haṁ balavān sukhī
हिंदी अनुवाद: वे सोचते हैं — 'वह शत्रु हमने मार दिया, बाकी को भी मार डालेंगे; हम सर्वशक्तिमान हैं, भोगी हैं, सिद्ध हैं, बलवान हैं और सुखी हैं।'
भावार्थ: यह श्लोक आसुरी मनुष्य के अहंकार की पराकाष्ठा दिखाता है। 'ईश्वरोऽहम्' — मैं ही ईश्वर हूँ, 'भोगी' — मैं ही भोक्ता हूँ, 'सिद्धः' — मैं ही सिद्ध हूँ। वह स्वयं को ही सब कुछ मान लेता है। शत्रुओं पर विजय का घमंड, शक्ति का नशा और सुख का अभिमान — ये सब मिलकर उसे इस भ्रम में रखते हैं कि वह स्वयं ही परम है। इस 'अहम्' की दीवार उसे सत्य से पूरी तरह काट देती है।
आज के जीवन में: अहंकार जब 'मैं ही सब कुछ हूँ' तक पहुँच जाए, तो वह मनुष्य को सत्य और विनम्रता दोनों से वंचित कर देता है।
श्लोक 16.15
वक्ता: श्रीकृष्ण
आढ्योऽभिजनवानस्मि कोऽन्योऽस्ति सदृशो मया।
यक्ष्ये दास्यामि मोदिष्य इत्यज्ञानविमोहिताः ॥16.15॥
āḍhyo ’bhijanavān asmi ko ’nyo ’sti sadṛiśho mayā / yakṣhye dāsyāmi modiṣhya ity ajñāna-vimohitāḥ / aneka-chitta-vibhrāntā moha-jāla-samāvṛitāḥ / prasaktāḥ kāma-bhogeṣhu patanti narake ’śhuchau
हिंदी अनुवाद: वे सोचते हैं — 'हम धनवान हैं, हमारे साथ बहुत लोग हैं, हमारे समान कौन है? हम यज्ञ करेंगे, दान देंगे, आनंद मनाएँगे' — इस प्रकार वे अज्ञान से मोहित रहते हैं।
भावार्थ: श्रीकृष्ण यहाँ बताते हैं कि आसुरी मनुष्य बाहरी धर्म-कर्म भी करता है, पर वह भी अहंकार से प्रेरित होता है। 'आढ्यः' — धनवान, 'अभिजनवान्' — कुलीन। वह यज्ञ और दान को भी अपनी श्रेष्ठता दिखाने का साधन बनाता है, न कि समर्पण का। 'अज्ञानविमोहिताः' — अज्ञान से मोहित। यह मोह इतना गहरा है कि वह धर्म के कार्य करते हुए भी उनका वास्तविक अर्थ नहीं समझता।
आज के जीवन में: जब दान और यज्ञ जैसे शुभ कार्य भी अहंकार और दिखावे से किए जाएँ, तो वे आत्मशुद्धि का साधन नहीं बनते।
श्लोक 16.16
वक्ता: श्रीकृष्ण
अनेकचित्तविभ्रान्ता मोहजालसमावृताः।
प्रसक्ताः कामभोगेषु पतन्ति नरकेऽशुचौ ॥16.16॥
aneka-citta-vibhrāntā moha-jāla-samāvṛtāḥ prasaktāḥ kāma-bhogeṣu patanti narake 'śucau
हिंदी अनुवाद: अनेक प्रकार की कामनाओं से भटके हुए, मोह के जाल में पूरी तरह फँसे और भोग-विलास में आसक्त ऐसे मनुष्य अपवित्र नरक में गिरते हैं।
भावार्थ: श्रीकृष्ण यहाँ आसुरी मनुष्य की दशा का परिणाम बताते हैं। 'अनेकचित्तविभ्रान्ताः' — जिनका चित्त अनेक दिशाओं में भटकता रहता है। 'मोहजालसमावृताः' — मोह के जाल में पूरी तरह ढके हुए। जब मन अनेक इच्छाओं में बिखरा हो और मोह उसे घेरे हो, तो विवेक नष्ट हो जाता है। 'अशुचि नरक' — अपवित्र अधोगति। यह श्लोक आसुरी जीवन-शैली के स्वाभाविक परिणाम की ओर संकेत करता है।
आज के जीवन में: जब मन अनेक इच्छाओं में बिखर जाए और मोह उसे घेर ले, तो मनुष्य का पतन निश्चित है।
श्लोक 16.17
वक्ता: श्रीकृष्ण
आत्मसम्भाविताः स्तब्धा धनमानमदान्विताः।
यजन्ते नामयज्ञैस्ते दम्भेनाविधिपूर्वकम् ॥16.17॥
ātma-sambhāvitāḥ stabdhā dhana-māna-madānvitāḥ / yajante nāma-yajñais te dambhenāvidhi-pūrvakam
हिंदी अनुवाद: स्वयं को सबसे पूजनीय मानने वाले, अकड़ से भरे, धन और मान के मद में चूर ये लोग दिखावे के लिए शास्त्र-विधि के विरुद्ध केवल नाममात्र के यज्ञ करते हैं।
भावार्थ: श्रीकृष्ण यहाँ आसुरी मनुष्य के धार्मिक आचरण की खोखली प्रकृति उजागर करते हैं। 'आत्मसम्भाविताः' — जो स्वयं को ही सर्वश्रेष्ठ मानते हैं। 'स्तब्धाः' — अकड़े हुए, झुकने को तैयार नहीं। 'दम्भेन' — दिखावे से, पाखंड से। 'अविधिपूर्वकम्' — शास्त्र की विधि के विरुद्ध। ऐसे लोग यज्ञ भी करते हैं, पर उसमें न श्रद्धा है, न विधि — केवल समाज में प्रतिष्ठा पाने की चाह।
आज के जीवन में: जो धार्मिक कार्य श्रद्धा और विधि के बिना केवल दिखावे के लिए किए जाएँ, वे न ईश्वर को प्रिय हैं, न आत्मा को शुद्ध करते हैं।
श्लोक 16.18
वक्ता: श्रीकृष्ण
अहङ्कारं बलं दर्पं कामं क्रोधं च संश्रिताः।
मामात्मपरदेहेषु प्रद्विषन्तोऽभ्यसूयकाः ॥16.18॥
ahankāraṁ balaṁ darpaṁ kāmaṁ krodhaṁ cha sanśhritāḥ / mām ātma-para-deheṣhu pradviṣhanto ’bhyasūyakāḥ
हिंदी अनुवाद: अहंकार, हठ, घमंड, कामना और क्रोध के आश्रय में रहने वाले ये मनुष्य अपने और दूसरों के शरीर में विद्यमान मुझ अंतर्यामी से द्वेष करते हैं और दोष-दृष्टि रखते हैं।
भावार्थ: यह श्लोक आसुरी स्वभाव की जड़ को स्पर्श करता है। 'अहंकारं बलं दर्पं कामं क्रोधं' — ये पाँचों मिलकर मनुष्य को अंधा कर देते हैं। 'मामात्मपरदेहेषु प्रद्विषन्तः' — वे स्वयं में और दूसरों में बसे परमात्मा से द्वेष करते हैं। 'अभ्यसूयकाः' — दोष-दृष्टि रखने वाले। जो व्यक्ति सब में ईश्वर को नहीं देख पाता, वह दूसरों में केवल कमियाँ देखता है। यह ईश्वर-द्वेष ही आसुरी स्वभाव की चरम अवस्था है।
आज के जीवन में: जो मनुष्य अहंकार और क्रोध में डूबा हो, वह दूसरों में ईश्वर का अंश नहीं देख पाता और इसी से उसका पतन होता है।
श्लोक 16.19
वक्ता: श्रीकृष्ण
तानहं द्विषतः क्रूरान्संसारेषु नराधमान्।
क्षिपाम्यजस्रमशुभानासुरीष्वेव योनिषु ॥16.19॥
tān ahaṁ dviṣhataḥ krūrān sansāreṣhu narādhamān / kṣhipāmy ajasram aśhubhān āsurīṣhv eva yoniṣhu
हिंदी अनुवाद: उन द्वेष करने वाले, क्रूर स्वभाव वाले, संसार के महान नीच और अपवित्र मनुष्यों को मैं बार-बार आसुरी योनियों में ही डालता रहता हूँ।
भावार्थ: श्रीकृष्ण यहाँ स्वयं बताते हैं कि आसुरी मनुष्यों का क्या होता है। 'द्विषतः' — द्वेष करने वाले, 'क्रूरान्' — क्रूर स्वभाव वाले, 'नराधमान्' — मनुष्यों में अधम। 'क्षिपामि' — मैं डालता हूँ, 'अजस्रम्' — निरंतर। 'आसुरीषु योनिषु' — आसुरी योनियों में। यह कर्म के नियम का ही स्वरूप है — जो जैसा बोता है, वैसा ही पाता है। आसुरी कर्मों का परिणाम आसुरी जन्म है।
श्लोक 16.20
वक्ता: श्रीकृष्ण
असुरीं योनिमापन्ना मूढा जन्मनि जन्मनि।
मामप्राप्यैव कौन्तेय ततो यान्त्यधमां गतिम् ॥16.20॥
āsurīṁ yonim āpannā mūḍhā janmani janmani / mām aprāpyaiva kaunteya tato yānty adhamāṁ gatim
हिंदी अनुवाद: हे कुंतीनंदन! वे मूढ़ मनुष्य जन्म-जन्मांतर में आसुरी योनि पाते रहते हैं, मुझे प्राप्त नहीं कर पाते और फिर उससे भी अधम गति को प्राप्त होते हैं।
भावार्थ: यह श्लोक इस खंड का समापन करता है। 'मूढाः' — जो विवेकशून्य हैं। 'जन्मनि जन्मनि' — जन्म-जन्मांतर में। 'मामप्राप्य' — मुझे प्राप्त किए बिना। 'अधमां गतिम्' — और भी नीची अवस्था को। श्रीकृष्ण बताते हैं कि आसुरी स्वभाव का यह दुष्चक्र एक जन्म में नहीं टूटता — जन्म-जन्मांतर तक चलता है। परमात्मा से दूरी ही सबसे बड़ी अधोगति है। 'कौन्तेय' संबोधन से वे अर्जुन को सचेत करते हैं।
आज के जीवन में: आसुरी स्वभाव से मुक्ति न मिले तो मनुष्य जन्म-जन्मांतर उसी दुष्चक्र में फँसा रहता है — इसीलिए स्वभाव की शुद्धि सबसे आवश्यक है।
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