भगवद्गीता अध्याय 16, श्लोक 21–24 | दैवासुरसम्पद्विभागयोग | अर्थ सहित
सोलहवें अध्याय में श्रीकृष्ण ने पहले दैवी और आसुरी स्वभाव का विस्तार से वर्णन किया। अब इस अंतिम खंड में वे आसुरी मार्ग के तीन मूल द्वारों — काम, क्रोध और लोभ — को पहचानकर त्यागने की शिक्षा देते हैं और अंत में शास्त्र को जीवन का प्रमाण मानकर चलने का निर्देश देते हैं।
श्लोक 16.21
वक्ता: श्रीकृष्ण
त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः।
कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत् ॥16.21॥
tri-vidhaṁ narakasyedaṁ dvāraṁ nāśhanam ātmanaḥ / kāmaḥ krodhas tathā lobhas tasmād etat trayaṁ tyajet
हिंदी अनुवाद: काम, क्रोध और लोभ — ये तीन नरक के द्वार हैं जो जीवात्मा का नाश करते हैं। इसलिए इन तीनों का त्याग कर देना चाहिए।
भावार्थ: श्रीकृष्ण अर्जुन को बताते हैं कि आसुरी स्वभाव की जड़ में तीन विकार हैं — काम (अनियंत्रित इच्छा), क्रोध और लोभ। इन्हें 'नरकस्य द्वारम्' अर्थात् नरक के द्वार कहा गया है, क्योंकि ये तीनों मिलकर मनुष्य को अधोगति की ओर ले जाते हैं। 'नाशनम् आत्मनः' का अर्थ है — ये आत्मा का पतन करने वाले हैं। जहाँ काम है, वहाँ क्रोध और लोभ स्वाभाविक रूप से पनपते हैं; इसीलिए तीनों को एक साथ त्यागने का निर्देश दिया गया है।
आज के जीवन में: जब भी मन में अत्यधिक इच्छा, क्रोध या लालच उठे, उसे पहचानें — ये तीनों भीतर से हमें कमज़ोर और पतन की ओर ले जाते हैं।
श्लोक 16.22
वक्ता: श्रीकृष्ण
एतैर्विमुक्तः कौन्तेय तमोद्वारैस्त्रिभिर्नरः।
आचरत्यात्मनः श्रेयस्ततो याति परां गतिम् ॥16.22॥
etair vimuktaḥ kaunteya tamo-dvārais tribhir naraḥ / ācharaty ātmanaḥ śhreyas tato yāti parāṁ gatim
हिंदी अनुवाद: हे कुन्तीनन्दन! जो मनुष्य इन तीनों अंधकार के द्वारों से मुक्त होकर अपने कल्याण का आचरण करता है, वह परम गति को प्राप्त होता है।
भावार्थ: पिछले श्लोक में काम, क्रोध और लोभ को 'तमोद्वार' — अंधकार के द्वार — कहा गया। यहाँ श्रीकृष्ण कहते हैं कि जो इन तीनों से मुक्त हो जाता है, वह 'आत्मनः श्रेयः' अर्थात् अपने सच्चे कल्याण का आचरण कर सकता है। इन विकारों के हटते ही मनुष्य का विवेक जागता है और वह सही दिशा में चल पाता है। ऐसे आचरण का फल है 'परा गति' — वह सर्वोच्च अवस्था जो जीवन का परम लक्ष्य है।
आज के जीवन में: काम, क्रोध और लोभ से मुक्ति केवल बंधन से छुटकारा नहीं, बल्कि जीवन में सच्चे कल्याण और उन्नति का द्वार खुलना है।
श्लोक 16.23
वक्ता: श्रीकृष्ण
यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः।
न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम् ॥16.23॥
yaḥ śhāstra-vidhim utsṛijya vartate kāma-kārataḥ / na sa siddhim avāpnoti na sukhaṁ na parāṁ gatim
हिंदी अनुवाद: जो मनुष्य शास्त्र की विधि को छोड़कर अपनी मनमानी इच्छा से आचरण करता है, वह न अंतःकरण की शुद्धि पाता है, न सुख और न परम गति।
भावार्थ: श्रीकृष्ण यहाँ स्पष्ट करते हैं कि 'कामकारतः' — अर्थात् केवल अपनी इच्छाओं के वशीभूत होकर — जो व्यक्ति 'शास्त्रविधि' को त्याग देता है, वह तीन वस्तुओं से वंचित रह जाता है: सिद्धि (अंतःकरण की शुद्धि), सुख और परम गति। शास्त्र यहाँ मनमानेपन के विरुद्ध एक अनुशासित मार्गदर्शन का प्रतीक है। बिना किसी मानक के केवल इच्छा के पीछे चलना मनुष्य को न भीतर से शांत करता है, न बाहर से सुखी।
आज के जीवन में: जब हम केवल अपनी इच्छाओं को ही कसौटी मानकर चलते हैं और किसी सिद्धांत या मर्यादा को नहीं, तो न सच्चा सुख मिलता है, न भीतरी शांति।
श्लोक 16.24
वक्ता: श्रीकृष्ण
तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ।
ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि ॥16.24॥
tasmāch chhāstraṁ pramāṇaṁ te kāryākārya-vyavasthitau / jñātvā śhāstra-vidhānoktaṁ karma kartum ihārhasi
हिंदी अनुवाद: इसलिए तेरे लिए क्या करना चाहिए और क्या नहीं — इसकी व्यवस्था में शास्त्र ही प्रमाण है। यह जानकर तू शास्त्र-विधि के अनुसार नियत कर्म करने योग्य है।
भावार्थ: यह अध्याय का समापन श्लोक है। श्रीकृष्ण अर्जुन को — और उसके माध्यम से सभी साधकों को — यह निर्देश देते हैं कि 'कार्याकार्यव्यवस्थितौ' अर्थात् क्या उचित है और क्या अनुचित, इसका निर्णय शास्त्र के आधार पर होना चाहिए। 'प्रमाणम्' का अर्थ है — जो निर्णय का आधार हो। जब मन विकारों से भरा हो, तब शास्त्र का अनुशासन एक विश्वसनीय मार्गदर्शक बनता है। इसीलिए शास्त्र को जानकर उसके अनुसार कर्म करना ही श्रेयस्कर है।
आज के जीवन में: जीवन में जब यह निर्णय कठिन हो कि क्या उचित है और क्या नहीं, तब सुविचारित सिद्धांतों और मर्यादाओं को कसौटी बनाना ही बुद्धिमानी है।
आगे पढ़िए
← पिछला भाग: अध्याय 16, श्लोक 11–20
अगला भाग: अध्याय 17, श्लोक 1–10 →
मन में कुछ भारी लग रहा है?
अपनी बात कृष्ण से कहिए — बिना किसी फ़ैसले के, बस एक सच्ची बातचीत। शुरुआत मुफ़्त।
कृष्ण से बात करें →