भगवद्गीता अध्याय 17, श्लोक 1–10 | श्रद्धात्रयविभागयोग | अर्थ सहित
सोलहवें अध्याय में श्रीकृष्ण ने दैवी और आसुरी सम्पदा का विस्तार से वर्णन किया था। अब सत्रहवें अध्याय में अर्जुन के एक स्वाभाविक प्रश्न से नई चर्चा आरम्भ होती है — जो लोग शास्त्र की विधि को छोड़कर भी श्रद्धा से पूजन करते हैं, उनकी स्थिति क्या है? इसी प्रश्न के उत्तर में श्रीकृष्ण श्रद्धा के तीन भेद — सात्त्विक, राजसिक और तामसिक — समझाते हैं और बताते हैं कि यह भेद आहार, यज्ञ, तप और दान सभी में प्रकट होता है।
श्लोक 17.1
वक्ता: अर्जुन
ये शास्त्रविधिमुत्सृज्य यजन्ते श्रद्धयाऽन्विताः।
तेषां निष्ठा तु का कृष्ण सत्त्वमाहो रजस्तमः ॥17.1॥
arjuna uvācha / ye śhāstra-vidhim utsṛijya yajante śhraddhayānvitāḥ / teṣhāṁ niṣhṭhā tu kā kṛiṣhṇa sattvam āho rajas tamaḥ
हिंदी अनुवाद: अर्जुन ने पूछा — हे कृष्ण! जो मनुष्य शास्त्र की विधि को छोड़कर भी श्रद्धापूर्वक देवताओं आदि का पूजन करते हैं, उनकी निष्ठा कौन-सी है — सात्त्विकी है, राजसी है, या तामसी?
भावार्थ: सोलहवें अध्याय में शास्त्र के अनुसार चलने का महत्त्व बताया गया था। उसी प्रसंग में अर्जुन के मन में यह जिज्ञासा उठती है कि जो लोग शास्त्र की विधि का पालन नहीं करते, फिर भी उनके हृदय में श्रद्धा है — तो उनकी वह श्रद्धा किस गुण की है? 'निष्ठा' का अर्थ है — स्थिति या आधार। अर्जुन जानना चाहते हैं कि बिना शास्त्रीय आधार के भी श्रद्धा का कोई वर्गीकरण होता है या नहीं।
आज के जीवन में: जब हम किसी की आस्था को परखना चाहें, तो यह प्रश्न स्वाभाविक है कि उसकी श्रद्धा का स्वभाव और दिशा क्या है।
श्लोक 17.2
वक्ता: श्रीकृष्ण
त्रिविधा भवति श्रद्धा देहिनां सा स्वभावजा।
सात्त्विकी राजसी चैव तामसी चेति तां श्रृणु ॥17.2॥
śhrī-bhagavān uvācha / tri-vidhā bhavati śhraddhā dehināṁ sā svabhāva-jā / sāttvikī rājasī chaiva tāmasī cheti tāṁ śhṛiṇu
हिंदी अनुवाद: श्रीभगवान् बोले — मनुष्यों की वह श्रद्धा, जो उनके स्वभाव से उत्पन्न होती है, तीन प्रकार की होती है — सात्त्विकी, राजसी और तामसी। इसे तुम मुझसे सुनो।
भावार्थ: श्रीकृष्ण अर्जुन के प्रश्न का उत्तर देते हुए स्पष्ट करते हैं कि श्रद्धा कोई एकरूप वस्तु नहीं है। 'स्वभावजा' अर्थात् जो स्वभाव से उत्पन्न हो — यह बताता है कि श्रद्धा व्यक्ति के भीतर के गुणों के अनुसार ढलती है। जिसके अन्तःकरण में जो गुण प्रधान है — सत्त्व, रज या तम — उसी के अनुसार उसकी श्रद्धा का रूप बनता है। यह वर्गीकरण ही इस पूरे अध्याय का आधार है।
आज के जीवन में: हमारी आस्था और विश्वास हमारे भीतर के स्वभाव का दर्पण होते हैं — इसलिए स्वभाव को शुद्ध करना ही श्रद्धा को ऊँचा उठाने का मार्ग है।
श्लोक 17.3
वक्ता: श्रीकृष्ण
सत्त्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत।
श्रद्धामयोऽयं पुरुषो यो यच्छ्रद्धः स एव सः ॥17.3॥
sattvānurūpā sarvasya śhraddhā bhavati bhārata / śhraddhā-mayo ‘yaṁ puruṣho yo yach-chhraddhaḥ sa eva saḥ
हिंदी अनुवाद: हे भारत! सभी मनुष्यों की श्रद्धा उनके अन्तःकरण के अनुरूप होती है। यह मनुष्य श्रद्धामय है — जिसकी जैसी श्रद्धा है, वही उसका स्वरूप है।
भावार्थ: यह श्लोक एक गहरी बात कहता है — मनुष्य वही है जो वह मानता है, जिस पर उसकी श्रद्धा है। 'सत्त्वानुरूपा' अर्थात् अन्तःकरण के अनुरूप — यहाँ 'सत्त्व' का अर्थ गुण नहीं, बल्कि अन्तःकरण की प्रकृति है। 'श्रद्धामयोऽयं पुरुषः' — यह पुरुष श्रद्धा से बना है। जो जिसे सत्य मानता है, जिस पर भरोसा करता है, उसी के अनुसार उसका जीवन, उसके निर्णय और उसका व्यक्तित्व बनता है।
आज के जीवन में: हम जिस पर श्रद्धा रखते हैं, वही हमारा वास्तविक स्वरूप बन जाता है — इसलिए अपनी श्रद्धा की दिशा पर ध्यान देना आवश्यक है।
श्लोक 17.4
वक्ता: श्रीकृष्ण
यजन्ते सात्त्विका देवान्यक्षरक्षांसि राजसाः।
प्रेतान्भूतगणांश्चान्ये यजन्ते तामसा जनाः ॥17.4॥
yajante sāttvikā devān yakṣha-rakṣhānsi rājasāḥ / pretān bhūta-gaṇānśh chānye yajante tāmasā janāḥ
हिंदी अनुवाद: सात्त्विक मनुष्य देवताओं का पूजन करते हैं, राजसिक मनुष्य यक्षों और राक्षसों का, और जो तामसिक मनुष्य हैं वे प्रेतों और भूतगणों का पूजन करते हैं।
भावार्थ: श्रद्धा के तीन भेदों को श्रीकृष्ण यहाँ उपासना के रूप में दर्शाते हैं। जिसका अन्तःकरण सात्त्विक है, वह उज्ज्वल और दिव्य शक्तियों की ओर आकर्षित होता है। राजसिक प्रकृति वाला व्यक्ति यक्षों और राक्षसों जैसी शक्तियों की उपासना करता है जो भोग और ऐश्वर्य से जुड़ी हैं। तामसिक व्यक्ति प्रेत और भूत-गणों की पूजा में रुचि रखता है। इस प्रकार उपासना का स्वरूप मनुष्य के भीतरी गुणों को प्रकट करता है।
आज के जीवन में: हम किसकी उपासना करते हैं, यह हमारे भीतर के गुणों का परिचय देता है।
श्लोक 17.5
वक्ता: श्रीकृष्ण
अशास्त्रविहितं घोरं तप्यन्ते ये तपो जनाः।
दम्भाहङ्कारसंयुक्ताः कामरागबलान्विताः ॥17.5॥
aśhāstra-vihitaṁ ghoraṁ tapyante ye tapo janāḥ / dambhāhankāra-sanyuktāḥ kāma-rāga-balānvitāḥ
हिंदी अनुवाद: जो मनुष्य शास्त्र की विधि से रहित घोर तप करते हैं और जो दम्भ तथा अहंकार से भरे हुए हैं, जो कामना, आसक्ति और हठ से प्रेरित हैं —
भावार्थ: यह श्लोक एक विशेष प्रकार के साधक का वर्णन करता है जो बाहर से कठोर तप करता दिखता है, किन्तु उसका आधार शास्त्रसम्मत नहीं है। 'दम्भ' अर्थात् दिखावा और 'अहंकार' अर्थात् मैं-पन — ये दोनों उसके तप को दूषित करते हैं। 'कामरागबल' — कामना, आसक्ति और हठ — ये तीन उसकी प्रेरणा हैं। ऐसा तप न तो आत्मशुद्धि के लिए है, न ईश्वर के लिए — बल्कि अहंकार की तृप्ति के लिए है। यह श्लोक अगले श्लोक के साथ मिलकर पूरा भाव देता है।
आज के जीवन में: जो साधना दिखावे और अहंकार से की जाए, वह कितनी भी कठोर हो, उसका फल कल्याणकारी नहीं होता।
श्लोक 17.6
वक्ता: श्रीकृष्ण
कर्षयन्तः शरीरस्थं भूतग्राममचेतसः।
मां चैवान्तःशरीरस्थं तान्विद्ध्यासुरनिश्चयान् ॥17.6॥
karṣhayantaḥ śharīra-sthaṁ bhūta-grāmam achetasaḥ / māṁ chaivāntaḥ śharīra-sthaṁ tān viddhy āsura-niśhchayān
हिंदी अनुवाद: जो अज्ञानी शरीर में स्थित पाँच भूतों को अर्थात् शरीर को और अन्तःकरण में स्थित मुझ परमात्मा को भी कृश करते हैं — उन्हें तू आसुरी निश्चय वाला समझ।
भावार्थ: पिछले श्लोक में वर्णित ऐसे व्यक्तियों का परिणाम यहाँ बताया गया है। 'अचेतसः' अर्थात् जो विवेकहीन हैं — वे अपने शरीर को तो कष्ट देते ही हैं, साथ ही अन्तःकरण में विराजमान परमात्मा को भी पीड़ित करते हैं। 'आसुरनिश्चयान्' — उनका संकल्प और दृष्टि आसुरी है। यह श्लोक स्पष्ट करता है कि शरीर को अनावश्यक पीड़ा देना न तो तप है, न साधना — यह अज्ञान का प्रकार है।
आज के जीवन में: शरीर को अनावश्यक कष्ट देना साधना नहीं है; भीतर बसे परमात्मा का सम्मान करना ही सच्ची साधना है।
श्लोक 17.7
वक्ता: श्रीकृष्ण
आहारस्त्वपि सर्वस्य त्रिविधो भवति प्रियः।
यज्ञस्तपस्तथा दानं तेषां भेदमिमं श्रृणु ॥17.7॥
āhāras tv api sarvasya tri-vidho bhavati priyaḥ / yajñas tapas tathā dānaṁ teṣhāṁ bhedam imaṁ śhṛiṇu
हिंदी अनुवाद: आहार भी सभी को तीन प्रकार का प्रिय होता है, और उसी प्रकार यज्ञ, तप और दान भी तीन-तीन प्रकार के होते हैं — उनके इस भेद को तुम सुनो।
भावार्थ: श्रीकृष्ण अब श्रद्धा के तीन भेदों को व्यावहारिक जीवन में उतारते हैं। वे बताते हैं कि केवल उपासना ही नहीं, बल्कि आहार, यज्ञ, तप और दान — ये सभी कर्म भी तीन गुणों के अनुसार तीन प्रकार के होते हैं। यह श्लोक एक भूमिका है जो आगे के विस्तृत वर्णन की ओर संकेत करती है। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि जीवन का हर पहलू — खान-पान से लेकर दान तक — गुणों से प्रभावित होता है।
आज के जीवन में: हमारे दैनिक जीवन के छोटे-छोटे कार्य भी हमारे भीतर के गुणों को प्रकट करते हैं।
श्लोक 17.8
वक्ता: श्रीकृष्ण
आयुःसत्त्वबलारोग्यसुखप्रीतिविवर्धनाः।
रस्याः स्निग्धाः स्थिरा हृद्या आहाराः सात्त्विकप्रियाः ॥17.8॥
āyuḥ-sattva-balārogya-sukha-prīti-vivardhanāḥ / rasyāḥ snigdhāḥ sthirā hṛidyā āhārāḥ sāttvika-priyāḥ
हिंदी अनुवाद: जो आहार आयु, सत्त्व, बल, आरोग्य, सुख और प्रसन्नता को बढ़ाने वाले हैं, जो रसयुक्त, चिकने, स्थायी और हृदय को प्रिय लगने वाले हैं — वे सात्त्विक मनुष्य को प्रिय होते हैं।
भावार्थ: सात्त्विक आहार के छह लाभ यहाँ गिनाए गए हैं — आयु, सत्त्व (मन की शुद्धि), बल, आरोग्य, सुख और प्रसन्नता। 'रस्याः' अर्थात् रसयुक्त, 'स्निग्धाः' अर्थात् चिकने या स्नेहयुक्त, 'स्थिराः' अर्थात् जो शरीर को स्थिरता दें, और 'हृद्याः' अर्थात् हृदय को प्रिय। ऐसा भोजन न केवल शरीर को पोषण देता है, बल्कि मन को भी स्वस्थ और प्रसन्न रखता है। यह भोजन सात्त्विक प्रकृति के व्यक्ति को स्वाभाविक रूप से रुचिकर लगता है।
आज के जीवन में: जो भोजन शरीर को शक्ति और मन को प्रसन्नता दे, वही सात्त्विक और हितकारी है।
श्लोक 17.9
वक्ता: श्रीकृष्ण
कट्वम्ललवणात्युष्णतीक्ष्णरूक्षविदाहिनः।
आहारा राजसस्येष्टा दुःखशोकामयप्रदाः ॥17.9॥
kaṭv-amla-lavaṇāty-uṣhṇa- tīkṣhṇa-rūkṣha-vidāhinaḥ / āhārā rājasasyeṣhṭā duḥkha-śhokāmaya-pradāḥ
हिंदी अनुवाद: जो आहार अत्यधिक कड़वे, खट्टे, नमकीन, गरम, तीखे, रूखे और दाहकारक हैं — वे राजसिक मनुष्य को प्रिय होते हैं और दुःख, शोक तथा रोग उत्पन्न करते हैं।
भावार्थ: राजसिक आहार की पहचान उसकी अति-तीव्रता में है — अति कड़वा, अति खट्टा, अति नमकीन, अति गरम, अति तीखा, अति रूखा और अति दाहकारक। 'विदाहिनः' अर्थात् जलन उत्पन्न करने वाले। ऐसे भोजन से शरीर में उत्तेजना बढ़ती है और परिणाम में दुःख, शोक और रोग आते हैं। राजसिक प्रकृति के व्यक्ति को ऐसा तीव्र स्वाद स्वाभाविक रूप से आकर्षित करता है, जो उसकी चंचल और उत्तेजित प्रकृति का ही प्रतिबिम्ब है।
आज के जीवन में: अत्यधिक तीखा, तीव्र और उत्तेजक भोजन मन और शरीर दोनों को अशान्त करता है।
श्लोक 17.10
वक्ता: श्रीकृष्ण
यातयामं गतरसं पूति पर्युषितं च यत्।
उच्छिष्टमपि चामेध्यं भोजनं तामसप्रियम् ॥17.10॥
yāta-yāmaṁ gata-rasaṁ pūti paryuṣhitaṁ cha yat / uchchhiṣhṭam api chāmedhyaṁ bhojanaṁ tāmasa-priyam
हिंदी अनुवाद: जो भोजन अधपका, रसरहित, दुर्गन्धित, बासी और जूठा है, तथा जो महान् अपवित्र भी है — वह तामसिक मनुष्य को प्रिय होता है।
भावार्थ: तामसिक आहार के पाँच लक्षण यहाँ बताए गए हैं — 'यातयामम्' अर्थात् जो बहुत देर पहले पका हो और ताज़गी खो चुका हो, 'गतरसम्' अर्थात् रसरहित, 'पूति' अर्थात् दुर्गन्धित, 'पर्युषितम्' अर्थात् बासी, और 'उच्छिष्टम्' अर्थात् जूठा। ऐसा भोजन न शरीर को पोषण देता है, न मन को। तामसिक प्रकृति का व्यक्ति भोजन के प्रति सजगता नहीं रखता और ऐसे अपवित्र आहार की ओर उसका झुकाव होता है, जो उसकी जड़ता और अचेतनता को और बढ़ाता है।
आज के जीवन में: बासी, अपवित्र और रसहीन भोजन मन में जड़ता और अचेतनता बढ़ाता है।
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