भगवद्गीता

भगवद्गीता अध्याय 17, श्लोक 11–20 | श्रद्धात्रयविभागयोग | अर्थ सहित

6 अक्तूबर 2026·8 मिनट में पढ़ें
भगवद्गीता अध्याय 17, श्लोक 11–20 | श्रद्धात्रयविभागयोग | अर्थ सहित

अध्याय 17 के पहले भाग में श्रीकृष्ण ने श्रद्धा के तीन भेद — सात्त्विक, राजस और तामस — बताए और यह भी स्पष्ट किया कि मनुष्य जैसी श्रद्धा रखता है, वैसा ही बन जाता है। अब इस दूसरे भाग में वे यज्ञ, तप और दान — इन तीनों कर्मों को भी उसी त्रिगुण की कसौटी पर परखते हैं और अर्जुन को समझाते हैं कि कौन-सा यज्ञ, कौन-सा तप और कौन-सा दान किस गुण का फल देता है।

श्लोक 17.11

वक्ता: श्रीकृष्ण

अफलाकाङ्क्षिभिर्यज्ञो विधिदृष्टो य इज्यते।
यष्टव्यमेवेति मनः समाधाय स सात्त्विकः ॥17.11॥

aphalākāṅkṣhibhir yajño vidhi-driṣhṭo ya ijyate / yaṣhṭavyam eveti manaḥ samādhāya sa sāttvikaḥ

हिंदी अनुवाद: जो यज्ञ शास्त्र की विधि के अनुसार, फल की किसी भी इच्छा के बिना, केवल 'यज्ञ करना मेरा कर्तव्य है' — इस दृढ़ भावना से किया जाता है, वह सात्त्विक यज्ञ है।

भावार्थ: श्रीकृष्ण यज्ञ के पहले भेद का वर्णन करते हैं। 'अफलाकाङ्क्षिभिः' अर्थात् फल की आकांक्षा न रखने वाले, और 'विधिदृष्टः' अर्थात् शास्त्र द्वारा निर्धारित विधि से किया गया यज्ञ — सात्त्विक कहलाता है। यहाँ मन की दशा निर्णायक है: यज्ञ इसलिए नहीं कि कुछ मिले, बल्कि इसलिए कि यह उचित और कर्तव्य है। ऐसा यज्ञ मन को शुद्ध करता है और आत्मा को ऊपर उठाता है।

आज के जीवन में: जो काम केवल कर्तव्य-भाव से, बिना किसी बदले की आशा के किया जाए, वही सच्चा और श्रेष्ठ कर्म है।


श्लोक 17.12

वक्ता: श्रीकृष्ण

अभिसंधाय तु फलं दम्भार्थमपि चैव यत्।
इज्यते भरतश्रेष्ठ तं यज्ञं विद्धि राजसम् ॥17.12॥

abhisandhāya tu phalaṁ dambhārtham api chaiva yat / ijyate bharata-śhreṣhṭha taṁ yajñaṁ viddhi rājasam

हिंदी अनुवाद: हे भरतश्रेष्ठ अर्जुन! जो यज्ञ फल की इच्छा रखकर अथवा दिखावे के लिए किया जाता है, उसे राजस यज्ञ जानो।

भावार्थ: श्रीकृष्ण दूसरे भेद — राजस यज्ञ — को परिभाषित करते हैं। 'दम्भार्थम्' अर्थात् दिखावे के लिए और 'फलं अभिसंधाय' अर्थात् फल की कामना लेकर किया गया यज्ञ राजस है। ऐसे यज्ञ में बाहरी क्रिया तो होती है, किंतु भीतर का भाव अशुद्ध रहता है — या तो लाभ की चाह है या समाज में प्रतिष्ठा पाने की। इसीलिए यह यज्ञ श्रेष्ठ नहीं माना जाता।

आज के जीवन में: जब कोई भला काम प्रशंसा पाने या लाभ उठाने के लिए किया जाए, तो उसकी आंतरिक शुद्धता नष्ट हो जाती है।


श्लोक 17.13

वक्ता: श्रीकृष्ण

विधिहीनमसृष्टान्नं मन्त्रहीनमदक्षिणम्।
श्रद्धाविरहितं यज्ञं तामसं परिचक्षते ॥17.13॥

vidhi-hīnam asṛiṣhṭānnaṁ mantra-hīnam adakṣhiṇam / śhraddhā-virahitaṁ yajñaṁ tāmasaṁ parichakṣhate

हिंदी अनुवाद: जो यज्ञ शास्त्र की विधि के विरुद्ध हो, जिसमें अन्न-दान न हो, मंत्र न हों, दक्षिणा न हो और श्रद्धा भी न हो — उसे तामस यज्ञ कहते हैं।

भावार्थ: तीसरे भेद में श्रीकृष्ण तामस यज्ञ के लक्षण गिनाते हैं। 'विधिहीनम्' — शास्त्र-विधि का अभाव, 'असृष्टान्नम्' — प्रसाद या अन्न का वितरण न होना, 'मन्त्रहीनम्' — मंत्रों का न होना, 'अदक्षिणम्' — दक्षिणा का अभाव, और 'श्रद्धाविरहितम्' — श्रद्धा का सर्वथा न होना। इन सब कमियों से युक्त यज्ञ तामस है, क्योंकि उसमें न भाव है, न विधि, न उद्देश्य।

आज के जीवन में: बिना श्रद्धा और विधि के किया गया कोई भी धार्मिक कार्य केवल औपचारिकता बनकर रह जाता है।


श्लोक 17.14

वक्ता: श्रीकृष्ण

देवद्विजगुरुप्राज्ञपूजनं शौचमार्जवम्।
ब्रह्मचर्यमहिंसा च शारीरं तप उच्यते ॥17.14॥

deva-dwija-guru-prājña- pūjanaṁ śhaucham ārjavam / brahmacharyam ahinsā cha śhārīraṁ tapa uchyate

हिंदी अनुवाद: देवताओं, ब्राह्मणों, गुरुजनों और ज्ञानीजनों का पूजन करना, शुद्धता, सरलता, ब्रह्मचर्य का पालन और किसी को भी पीड़ा न देना — यह शरीर का तप कहलाता है।

भावार्थ: अब श्रीकृष्ण तप के तीन स्तरों — शरीर, वाणी और मन — का वर्णन आरंभ करते हैं। इस श्लोक में शरीर से किए जाने वाले तप के पाँच रूप बताए गए हैं: श्रेष्ठ जनों का सम्मान, 'शौचम्' अर्थात् बाहर-भीतर की शुद्धि, 'आर्जवम्' अर्थात् व्यवहार में सरलता, ब्रह्मचर्य अर्थात् इंद्रियों का संयम, और 'अहिंसा' अर्थात् किसी प्राणी को कष्ट न देना। ये सब शरीर के स्तर पर किए जाने वाले तप हैं।

आज के जीवन में: बड़ों का आदर, स्वच्छता, सरल स्वभाव, संयम और अहिंसा — ये गुण शरीर के सच्चे तप हैं।


श्लोक 17.15

वक्ता: श्रीकृष्ण

अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत्।
स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते ॥17.15॥

anudvega-karaṁ vākyaṁ satyaṁ priya-hitaṁ cha yat / svādhyāyābhyasanaṁ chaiva vāṅ-mayaṁ tapa uchyate

हिंदी अनुवाद: जो वाणी किसी को व्याकुल न करे, जो सत्य हो, प्रिय हो और हितकारी हो — तथा स्वाध्याय और उसका अभ्यास करना — यह वाणी का तप कहलाता है।

भावार्थ: वाणी के तप के चार गुण यहाँ बताए गए हैं। 'अनुद्वेगकरम्' — ऐसा वचन जो सुनने वाले के मन में उद्वेग या घबराहट न जगाए; 'सत्यम्' — जो सच हो; 'प्रियम्' — जो मधुर हो; और 'हितम्' — जो सुनने वाले के भले के लिए हो। इसके साथ 'स्वाध्याय' अर्थात् शास्त्रों का नियमित पठन और उसका अभ्यास भी वाणी के तप में आता है। वाणी का संयम और सदुपयोग ही उसका तप है।

आज के जीवन में: सच बोलना, मधुर बोलना और दूसरों के भले की बात बोलना — यही वाणी की सच्ची साधना है।


श्लोक 17.16

वक्ता: श्रीकृष्ण

मनःप्रसादः सौम्यत्वं मौनमात्मविनिग्रहः।
भावसंशुद्धिरित्येतत्तपो मानसमुच्यते ॥17.16॥

manaḥ-prasādaḥ saumyatvaṁ maunam ātma-vinigrahaḥ / bhāva-sanśhuddhir ity etat tapo mānasam uchyate

हिंदी अनुवाद: मन की प्रसन्नता, सौम्य भाव, मननशीलता, मन का निग्रह और भावों की शुद्धि — यह मन का तप कहलाता है।

भावार्थ: तप के तीसरे स्तर — मानसिक तप — का वर्णन इस श्लोक में है। 'मनःप्रसादः' अर्थात् मन की स्थिर प्रसन्नता, 'सौम्यत्वम्' अर्थात् सबके प्रति कोमल और शांत भाव, 'मौनम्' अर्थात् व्यर्थ विचारों से मन को रोककर मनन में लगाना, 'आत्मविनिग्रहः' अर्थात् मन पर अपना नियंत्रण, और 'भावसंशुद्धिः' अर्थात् भीतर के भावों की पवित्रता — ये सब मिलकर मानसिक तप बनते हैं।

आज के जीवन में: मन को शांत, सौम्य और पवित्र रखना ही सबसे गहरी और सच्ची साधना है।


श्लोक 17.17

वक्ता: श्रीकृष्ण

श्रद्धया परया तप्तं तपस्तत्ित्रविधं नरैः।
अफलाकाङ्क्षिभिर्युक्तैः सात्त्विकं परिचक्षते ॥17.17॥

śhraddhayā parayā taptaṁ tapas tat tri-vidhaṁ naraiḥ / aphalākāṅkṣhibhir yuktaiḥ sāttvikaṁ parichakṣhate

हिंदी अनुवाद: जो मनुष्य फल की इच्छा न रखते हुए, परम श्रद्धा के साथ, इस तीन प्रकार के तप — शरीर, वाणी और मन — का अभ्यास करते हैं, उस तप को सात्त्विक कहते हैं।

भावार्थ: श्रीकृष्ण अब तप के तीनों स्तरों को एक साथ लेकर उनका सात्त्विक रूप परिभाषित करते हैं। 'श्रद्धया परया' — अत्यंत गहरी श्रद्धा के साथ, 'अफलाकाङ्क्षिभिः' — फल की किसी भी कामना के बिना, और 'युक्तैः' — साधना में स्थिर मनुष्यों द्वारा जो तप किया जाए — वह सात्त्विक है। यहाँ श्रद्धा और निःस्वार्थता — ये दो तत्त्व तप को सात्त्विक बनाते हैं।

आज के जीवन में: जो साधना बिना किसी फल की चाह के, केवल श्रद्धा और लगन से की जाए, वही सच्चे अर्थ में सात्त्विक है।


श्लोक 17.18

वक्ता: श्रीकृष्ण

सत्कारमानपूजार्थं तपो दम्भेन चैव यत्।
क्रियते तदिह प्रोक्तं राजसं चलमध्रुवम् ॥17.18॥

satkāra-māna-pūjārthaṁ tapo dambhena chaiva yat / kriyate tad iha proktaṁ rājasaṁ chalam adhruvam

हिंदी अनुवाद: जो तप सत्कार, मान और पूजा पाने के लिए अथवा दिखावे के भाव से किया जाता है, वह राजस तप कहलाता है — और इस लोक में उसका फल अनिश्चित और नाशवान होता है।

भावार्थ: 'सत्कारमानपूजार्थम्' — आदर, प्रतिष्ठा और पूजा पाने की चाह से, तथा 'दम्भेन' — दिखावे के भाव से किया गया तप राजस है। ऐसे तप का फल 'चलम् अध्रुवम्' — अस्थिर और क्षणिक होता है। बाहर से तप दिखता है, किंतु भीतर का उद्देश्य अहंकार या लोक-प्रशंसा है। इसीलिए यह तप न तो आत्मा को शुद्ध करता है, न स्थायी फल देता है।

आज के जीवन में: यदि साधना या सेवा का उद्देश्य प्रशंसा पाना हो, तो वह भीतर से खोखली होती है और उसका फल भी टिकाऊ नहीं होता।


श्लोक 17.19

वक्ता: श्रीकृष्ण

मूढग्राहेणात्मनो यत्पीडया क्रियते तपः।
परस्योत्सादनार्थं वा तत्तामसमुदाहृतम् ॥17.19॥

mūḍha-grāheṇātmano yat pīḍayā kriyate tapaḥ / parasyotsādanārthaṁ vā tat tāmasam udāhṛitam

हिंदी अनुवाद: जो तप मूढ़तापूर्वक हठ से अपने आप को पीड़ा देकर, अथवा किसी दूसरे को कष्ट देने के उद्देश्य से किया जाता है — वह तामस तप कहा गया है।

भावार्थ: 'मूढग्राहेण' — मूर्खतापूर्ण हठ के साथ, 'आत्मनः पीडया' — स्वयं को कष्ट देकर, और 'परस्य उत्सादनार्थम्' — दूसरे को हानि पहुँचाने के लिए किया गया तप तामस है। ऐसे तप में न विवेक है, न शुभ भाव। यह न साधक का भला करता है, न किसी और का। यह केवल अज्ञान और दुराग्रह से उत्पन्न होता है, इसीलिए तामस कहलाता है।

आज के जीवन में: जो साधना स्वयं को या दूसरों को कष्ट देने पर आधारित हो, वह साधना नहीं, अज्ञान है।


श्लोक 17.20

वक्ता: श्रीकृष्ण

दातव्यमिति यद्दानं दीयतेऽनुपकारिणे।
देशे काले च पात्रे च तद्दानं सात्त्विकं स्मृतम् ॥17.20॥

dātavyam iti yad dānaṁ dīyate ‘nupakāriṇe / deśhe kāle cha pātre cha tad dānaṁ sāttvikaṁ smṛitam

हिंदी अनुवाद: जो दान उचित देश, काल और पात्र को देखकर, केवल 'देना कर्तव्य है' — इस भाव से, बिना किसी प्रतिदान की आशा के दिया जाता है, वह दान सात्त्विक कहा गया है।

भावार्थ: श्रीकृष्ण अब दान के भेदों का वर्णन आरंभ करते हैं। 'दातव्यमिति' — देना ही चाहिए, यह कर्तव्य है — इस भाव से दिया गया दान सात्त्विक है। 'अनुपकारिणे' — जो बदले में कुछ न दे सके, ऐसे पात्र को दान देना; 'देशे काले च पात्रे च' — उचित स्थान पर, उचित समय पर और योग्य पात्र को दिया गया दान — ये तीनों मिलकर दान को सात्त्विक बनाते हैं।

आज के जीवन में: जो दान बिना किसी बदले की आशा के, सही समय पर, सही व्यक्ति को, केवल कर्तव्य-भाव से दिया जाए — वही सच्चा दान है।


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