भगवद्गीता अध्याय 17, श्लोक 21–28 | श्रद्धात्रयविभागयोग | अर्थ सहित
अध्याय सत्रह में श्रीकृष्ण ने श्रद्धा के तीन भेदों — सात्त्विक, राजस और तामस — के आधार पर आहार, यज्ञ, तप और दान की विशेषताएँ समझाई हैं। इस अंतिम खंड में वे दान के राजस और तामस स्वरूप को स्पष्ट करने के बाद 'ॐ तत् सत्' — परमात्मा के तीन पवित्र नामों का महत्त्व और उनका कर्म में उपयोग बताते हैं, और अंत में यह निष्कर्ष देते हैं कि श्रद्धाहीन कर्म न इस लोक में फल देता है, न परलोक में।
श्लोक 17.21
वक्ता: श्रीकृष्ण
यत्तु प्रत्युपकारार्थं फलमुद्दिश्य वा पुनः।
दीयते च परिक्लिष्टं तद्दानं राजसं स्मृतम् ॥17.21॥
yat tu pratyupakārārthaṁ phalam uddiśhya vā punaḥ / dīyate cha parikliṣhṭaṁ tad dānaṁ rājasaṁ smṛitam
हिंदी अनुवाद: जो दान प्रत्युपकार की आशा से, या किसी फल की इच्छा रखकर, अथवा मन में क्लेश और अनिच्छा के साथ दिया जाता है — वह दान राजस कहलाता है।
भावार्थ: श्रीकृष्ण अर्जुन को बता रहे हैं कि दान की भावना उसे सात्त्विक या राजस बनाती है। 'प्रत्युपकारार्थम्' का अर्थ है — बदले में कुछ पाने की चाह; 'परिक्लिष्टम्' का अर्थ है — कष्ट या अनिच्छा के साथ। जब कोई इसलिए देता है कि सामने वाला भी उसके काम आए, या किसी पुण्य-फल की गणना करके देता है, या देते समय मन में खिन्नता हो — तो वह दान राजस गुण से युक्त माना जाता है। ऐसा दान सर्वथा निष्फल नहीं, पर उसमें निःस्वार्थता का अभाव होता है।
आज के जीवन में: जब हम किसी की सहायता केवल इसलिए करें कि वह भविष्य में हमारे काम आए, तो वह सहायता नहीं, एक सौदा है।
श्लोक 17.22
वक्ता: श्रीकृष्ण
अदेशकाले यद्दानमपात्रेभ्यश्च दीयते।
असत्कृतमवज्ञातं तत्तामसमुदाहृतम् ॥17.22॥
adeśha-kāle yad dānam apātrebhyaśh cha dīyate / asat-kṛitam avajñātaṁ tat tāmasam udāhṛitam
हिंदी अनुवाद: जो दान अनुचित स्थान पर, अनुचित समय पर, अयोग्य व्यक्ति को, बिना किसी सम्मान के या अपमानपूर्वक दिया जाए — वह दान तामस कहा गया है।
भावार्थ: श्रीकृष्ण यहाँ तामस दान के चार लक्षण गिनाते हैं — 'अदेश' अर्थात् अनुचित स्थान, 'अकाल' अर्थात् अनुचित समय, 'अपात्र' अर्थात् अयोग्य व्यक्ति, और 'असत्कृत-अवज्ञात' अर्थात् बिना आदर के या तिरस्कार के साथ। जब दान में न देने वाले की भावना शुद्ध हो, न लेने वाले का कोई सम्मान हो, और न ही देने का समय-स्थान उचित हो — तो वह दान तमोगुण से उत्पन्न होता है और किसी का भला नहीं करता।
आज के जीवन में: दान केवल वस्तु देना नहीं है — उसमें सम्मान, उचित समय और सुपात्र का विवेक भी आवश्यक है।
श्लोक 17.23
वक्ता: श्रीकृष्ण
तत्सदिति निर्देशो ब्रह्मणस्त्रिविधः स्मृतः।
ब्राह्मणास्तेन वेदाश्च यज्ञाश्च विहिताः पुरा ॥17.23॥
oṁ tat sad iti nirdeśho brahmaṇas tri-vidhaḥ smṛitaḥ / brāhmaṇās tena vedāśh cha yajñāśh cha vihitāḥ purā
हिंदी अनुवाद: 'ॐ', 'तत्' और 'सत्' — ये तीन नाम परमात्मा के निर्देश के लिए कहे गए हैं। सृष्टि के आरंभ में उसी परमात्मा ने वेदों, ज्ञानियों और यज्ञों की रचना की।
भावार्थ: श्रीकृष्ण अब एक नया और गहरा विषय आरंभ करते हैं। 'ॐ तत् सत्' — ये तीन शब्द परमात्मा के तीन भिन्न संकेत हैं। 'ॐ' उसकी सर्वव्यापी सत्ता का प्रतीक है; 'तत्' का अर्थ है 'वह' — जो अनिर्वचनीय और अनंत है; 'सत्' का अर्थ है 'जो सत्य और शुभ है'। यह तीनों मिलकर परमात्मा की पूर्णता को इंगित करते हैं। सृष्टि के आदि में इसी परमात्मा ने वेद, यज्ञ और ज्ञान की परंपरा स्थापित की — इसलिए ये तीनों नाम पवित्र और प्रामाणिक हैं।
श्लोक 17.24
वक्ता: श्रीकृष्ण
तस्मादोमित्युदाहृत्य यज्ञदानतपःक्रियाः।
प्रवर्तन्ते विधानोक्ताः सततं ब्रह्मवादिनाम् ॥17.24॥
tasmād oṁ ity udāhṛitya yajña-dāna-tapaḥ-kriyāḥ / pravartante vidhānoktāḥ satataṁ brahma-vādinām
हिंदी अनुवाद: इसीलिए वेद के मार्ग पर चलने वाले लोगों की शास्त्र-विधि से नियत यज्ञ, दान और तप की क्रियाएँ सदा 'ॐ' का उच्चारण करके ही आरंभ होती हैं।
भावार्थ: श्रीकृष्ण बताते हैं कि 'ॐ' केवल एक ध्वनि नहीं, वह परमात्मा का प्रत्यक्ष संकेत है। 'ब्रह्मवादिनाम्' अर्थात् जो परमात्मा के सिद्धांत को मानते हैं, वे अपने प्रत्येक शुभ कार्य — यज्ञ, दान, तप — का आरंभ 'ॐ' से करते हैं। इस प्रकार वे अपने कर्म को परमात्मा से जोड़ते हैं और उसे केवल सांसारिक क्रिया नहीं रहने देते। 'ॐ' से आरंभ करना यह स्मरण दिलाता है कि यह कर्म उस परम सत्ता को समर्पित है।
आज के जीवन में: किसी भी शुभ कार्य को परमात्मा के स्मरण के साथ आरंभ करने से उसमें एक पवित्र उद्देश्य जुड़ जाता है।
श्लोक 17.25
वक्ता: श्रीकृष्ण
तदित्यनभिसन्धाय फलं यज्ञतपःक्रियाः।
दानक्रियाश्च विविधाः क्रियन्ते मोक्षकाङ्क्षि ॥17.25॥
tad ity anabhisandhāya phalaṁ yajña-tapaḥ-kriyāḥ / dāna-kriyāśh cha vividhāḥ kriyante mokṣha-kāṅkṣhibhiḥ
हिंदी अनुवाद: 'तत्' — अर्थात् 'वह परमात्मा ही सब कुछ है' — ऐसा मानकर, फल की इच्छा से रहित होकर, मुक्ति के अभिलाषी मनुष्य अनेक प्रकार के यज्ञ, तप और दान की क्रियाएँ करते हैं।
भावार्थ: 'तत्' शब्द उस परमात्मा की ओर संकेत करता है जो अनंत और अनिर्वचनीय है। 'मोक्षकाङ्क्षिभिः' अर्थात् जो मुक्ति चाहते हैं — वे अपने यज्ञ, तप और दान को 'तत्' के नाम पर करते हैं, अर्थात् यह सब उस परमात्मा के लिए है, मेरे किसी फल के लिए नहीं। जब कर्म में फल की आसक्ति नहीं होती और वह परमात्मा को समर्पित होता है, तो वह कर्म बंधन नहीं बनता — यही मुक्ति का मार्ग है।
आज के जीवन में: जो कर्म फल की चाह छोड़कर, परमात्मा को अर्पण करके किया जाए, वही सच्चे अर्थ में मुक्तिदायी होता है।
श्लोक 17.26
वक्ता: श्रीकृष्ण
सद्भावे साधुभावे च सदित्येतत्प्रयुज्यते।
प्रशस्ते कर्मणि तथा सच्छब्दः पार्थ युज्यते ॥17.26॥
sad-bhāve sādhu-bhāve cha sad ity etat prayujyate / praśhaste karmaṇi tathā sach-chhabdaḥ pārtha yujyate
हिंदी अनुवाद: हे पार्थ! 'सत्' शब्द का प्रयोग सत्ता और श्रेष्ठ भाव के अर्थ में होता है, और प्रशंसनीय कर्म के साथ भी 'सत्' शब्द जोड़ा जाता है।
भावार्थ: श्रीकृष्ण 'सत्' शब्द के तीन प्रयोग बताते हैं। पहला — 'सद्भावे' अर्थात् जो वास्तव में है, जो सत्य और अस्तित्वशील है, उसके लिए। दूसरा — 'साधुभावे' अर्थात् जो श्रेष्ठ, भला और सज्जन है, उसके लिए। तीसरा — 'प्रशस्ते कर्मणि' अर्थात् जो कर्म सराहनीय और शुभ हो, उसके साथ। इस प्रकार 'सत्' शब्द सत्य, शुभता और श्रेष्ठ कर्म — तीनों को एक साथ समेटता है। यह परमात्मा का वह नाम है जो जीवन में सत्य और भलाई की स्थापना करता है।
आज के जीवन में: जो सत्य है, जो भला है, और जो शुभ कर्म है — तीनों में परमात्मा का 'सत्' स्वरूप झलकता है।
श्लोक 17.27
वक्ता: श्रीकृष्ण
यज्ञे तपसि दाने च स्थितिः सदिति चोच्यते।
कर्म चैव तदर्थीयं सदित्येवाभिधीयते ॥17.27॥
yajñe tapasi dāne cha sthitiḥ sad iti chochyate / karma chaiva tad-arthīyaṁ sad ity evābhidhīyate
हिंदी अनुवाद: यज्ञ, तप और दान में जो दृढ़ निष्ठा है, वह भी 'सत्' कही जाती है; और उस परमात्मा के निमित्त किया जाने वाला कर्म भी 'सत्' ही कहलाता है।
भावार्थ: 'स्थितिः' अर्थात् निष्ठा या दृढ़ता — जब कोई यज्ञ, तप और दान में बिना डगमगाए टिका रहता है, तो वह स्थिरता भी 'सत्' है। इसके साथ ही, जो कर्म उस परमात्मा के लिए किया जाए — 'तदर्थीयम्' — वह भी 'सत्' कहलाता है। अर्थात् 'सत्' केवल एक शब्द नहीं, वह जीवन की उस पूरी दिशा का नाम है जिसमें कर्म, निष्ठा और समर्पण — सब परमात्मा की ओर हों। ऐसा जीवन ही सत्य और सार्थक है।
आज के जीवन में: शुभ कर्मों में टिके रहने की दृढ़ता और उन्हें परमात्मा को अर्पित करने की भावना — यही 'सत्' का जीवन में अर्थ है।
श्लोक 17.28
वक्ता: श्रीकृष्ण
अश्रद्धया हुतं दत्तं तपस्तप्तं कृतं च यत्।
असदित्युच्यते पार्थ न च तत्प्रेत्य नो इह ॥17.28॥
aśhraddhayā hutaṁ dattaṁ tapas taptaṁ kṛitaṁ cha yat / asad ity uchyate pārtha na cha tat pretya no iha
हिंदी अनुवाद: हे पार्थ! जो हवन, दान, तप और अन्य कोई भी कर्म श्रद्धा के बिना किया जाए, वह 'असत्' कहलाता है — उसका फल न इस लोक में मिलता है, न मृत्यु के बाद।
भावार्थ: यह अध्याय का समापन श्लोक है और उसका सार भी। 'अश्रद्धया' — श्रद्धा के बिना किया गया कोई भी कर्म, चाहे वह यज्ञ हो, दान हो या तप — 'असत्' है, अर्थात् वह न सत्य है, न शुभ, न फलदायी। 'न प्रेत्य' अर्थात् मरने के बाद भी नहीं, 'नो इह' अर्थात् इस जीवन में भी नहीं — ऐसे कर्म का कहीं कोई सार्थक फल नहीं होता। इस प्रकार श्रीकृष्ण यह स्थापित करते हैं कि श्रद्धा ही समस्त कर्म की आत्मा है।
आज के जीवन में: श्रद्धा के बिना किया गया कोई भी कार्य — चाहे बाहर से कितना भी भव्य दिखे — न इस जीवन में सार्थक होता है, न आगे।
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