भगवद्गीता

भगवद्गीता अध्याय 18, श्लोक 1–10 | मोक्षसंन्यासयोग | अर्थ सहित

6 अक्तूबर 2026·8 मिनट में पढ़ें
भगवद्गीता अध्याय 18, श्लोक 1–10 | मोक्षसंन्यासयोग | अर्थ सहित

सत्रहवें अध्याय में श्रद्धा के तीन भेदों और यज्ञ, दान, तप तथा आहार के सात्त्विक, राजसिक एवं तामसिक स्वरूप का विस्तार से वर्णन हो चुका है। अब अठारहवें और अंतिम अध्याय में अर्जुन एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न पूछता है — संन्यास और त्याग में क्या अंतर है? इसी प्रश्न के उत्तर में श्रीकृष्ण त्याग के तीन प्रकारों का विवेचन करते हुए सात्त्विक त्याग को श्रेष्ठ बताते हैं।

श्लोक 18.1

वक्ता: अर्जुन

संन्यासस्य महाबाहो तत्त्वमिच्छामि वेदितुम्।
त्यागस्य च हृषीकेश पृथक्केशिनिषूदन ॥18.1॥

arjuna uvācha / sannyāsasya mahā-bāho tattvam ichchhāmi veditum / tyāgasya cha hṛiṣhīkeśha pṛithak keśhi-niṣhūdana

हिंदी अनुवाद: अर्जुन बोले — हे महाबाहो! हे हृषीकेश! हे केशिनिषूदन! मैं संन्यास और त्याग का तत्त्व अलग-अलग जानना चाहता हूँ।

भावार्थ: गीता के अंतिम अध्याय का आरंभ अर्जुन के एक गहरे जिज्ञासापूर्ण प्रश्न से होता है। वह श्रीकृष्ण को तीन नामों से पुकारता है — 'महाबाहो' अर्थात् बलशाली भुजाओं वाले, 'हृषीकेश' अर्थात् इंद्रियों के स्वामी, और 'केशिनिषूदन' अर्थात् केशी नामक असुर का वध करने वाले। अर्जुन जानना चाहता है कि 'संन्यास' और 'त्याग' — ये दोनों शब्द एक हैं या इनमें कोई भेद है। यह प्रश्न पूरे अध्याय की नींव रखता है।

आज के जीवन में: जब भी मन में दो समान दिखने वाली बातों में भ्रम हो, तो उन्हें अलग-अलग समझने की जिज्ञासा रखना ही सच्ची बुद्धिमानी है।


श्लोक 18.2

वक्ता: श्रीकृष्ण

काम्यानां कर्मणां न्यासं संन्यासं कवयो विदुः।
सर्वकर्मफलत्यागं प्राहुस्त्यागं विचक्षणाः ॥18.2॥

śhrī-bhagavān uvācha / kāmyānāṁ karmaṇāṁ nyāsaṁ sannyāsaṁ kavayo viduḥ / sarva-karma-phala-tyāgaṁ prāhus tyāgaṁ vichakṣhaṇāḥ

हिंदी अनुवाद: श्रीभगवान् बोले — विद्वान् लोग कामना से किए जाने वाले कर्मों के त्याग को संन्यास कहते हैं, और बुद्धिमान् लोग समस्त कर्मों के फल के त्याग को त्याग कहते हैं।

भावार्थ: श्रीकृष्ण पहले दोनों शब्दों की सामान्य परिभाषा देते हैं। 'संन्यास' का अर्थ है — काम्य कर्मों का, अर्थात् किसी फल या इच्छा को सामने रखकर किए जाने वाले कर्मों का, सर्वथा त्याग। 'त्याग' का अर्थ है — सभी कर्म करते हुए भी उनके फल की आसक्ति छोड़ देना। 'कवयः' अर्थात् ज्ञानी जन और 'विचक्षणाः' अर्थात् विवेकशील बुद्धिमान् — दोनों अपने-अपने दृष्टिकोण से इन्हें परिभाषित करते हैं।

आज के जीवन में: कर्म करना बंद करना संन्यास नहीं; फल की चाह छोड़कर कर्म करते रहना ही सच्चा त्याग है।


श्लोक 18.3

वक्ता: श्रीकृष्ण

त्याज्यं दोषवदित्येके कर्म प्राहुर्मनीषिणः।
यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यमिति चापरे ॥18.3॥

tyājyaṁ doṣha-vad ity eke karma prāhur manīṣhiṇaḥ / yajña-dāna-tapaḥ-karma na tyājyam iti chāpare

हिंदी अनुवाद: कुछ विद्वान् कहते हैं कि कर्मों को दोष की भाँति सर्वथा छोड़ देना चाहिए, और कुछ अन्य विद्वान् कहते हैं कि यज्ञ, दान और तप के कर्मों का त्याग नहीं करना चाहिए।

भावार्थ: यहाँ श्रीकृष्ण दो परस्पर भिन्न मतों को सामने रखते हैं। एक वर्ग के 'मनीषिणः' अर्थात् विचारशील विद्वान् मानते हैं कि सभी कर्म किसी न किसी रूप में दोषयुक्त होते हैं, इसलिए उन्हें छोड़ देना ही उचित है। दूसरा वर्ग कहता है कि यज्ञ, दान और तप जैसे पवित्र कर्म कभी नहीं छोड़ने चाहिए। इन दोनों मतों को प्रस्तुत कर श्रीकृष्ण अगले श्लोकों में अपना निश्चित मत देने की भूमिका बनाते हैं।


श्लोक 18.4

वक्ता: श्रीकृष्ण

निश्चयं श्रृणु मे तत्र त्यागे भरतसत्तम।
त्यागो हि पुरुषव्याघ्र त्रिविधः संप्रकीर्तितः ॥18.4॥

niśhchayaṁ śhṛiṇu me tatra tyāge bharata-sattama / tyāgo hi puruṣha-vyāghra tri-vidhaḥ samprakīrtitaḥ

हिंदी अनुवाद: हे भरतवंशियों में श्रेष्ठ! त्याग के विषय में तू मेरा निश्चित मत सुन; हे पुरुषश्रेष्ठ! त्याग तीन प्रकार का कहा गया है।

भावार्थ: श्रीकृष्ण अर्जुन को 'भरतसत्तम' अर्थात् भरत वंश में सर्वश्रेष्ठ और 'पुरुषव्याघ्र' अर्थात् पुरुषों में सिंह के समान कहकर संबोधित करते हैं। वे कहते हैं कि ऊपर जो दो मत बताए, उनमें से किसे मानें — यह भ्रम दूर करने के लिए अब वे अपना निश्चित निर्णय सुनाएँगे। इसके लिए वे पहले यह स्पष्ट करते हैं कि त्याग के तीन प्रकार हैं — तामस, राजस और सात्त्विक — जिनका विवरण आगे के श्लोकों में आता है।

आज के जीवन में: किसी भी विषय में परस्पर विरोधी मत सुनकर भ्रमित होने की बजाय, तत्त्वज्ञ के निश्चित मत को ध्यान से सुनना चाहिए।


श्लोक 18.5

वक्ता: श्रीकृष्ण

यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत्।
यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम् ॥18.5॥

yajña-dāna-tapaḥ-karma na tyājyaṁ kāryam eva tat / yajño dānaṁ tapaśh chaiva pāvanāni manīṣhiṇām

हिंदी अनुवाद: यज्ञ, दान और तप रूप कर्मों का त्याग नहीं करना चाहिए, बल्कि उन्हें करना ही चाहिए; क्योंकि यज्ञ, दान और तप — ये तीनों ही बुद्धिमान् लोगों को पवित्र करने वाले हैं।

भावार्थ: श्रीकृष्ण यहाँ स्पष्ट करते हैं कि जो लोग सभी कर्मों को दोषयुक्त मानकर छोड़ देने की बात करते हैं, वे पूर्णतः सही नहीं हैं। यज्ञ अर्थात् समर्पण भाव से किया गया कार्य, दान अर्थात् निःस्वार्थ देना, और तप अर्थात् अनुशासन और संयम — ये तीनों 'पावनानि' अर्थात् मन, बुद्धि और आत्मा को शुद्ध करने वाले हैं। इसलिए इन्हें कभी नहीं छोड़ना चाहिए।

आज के जीवन में: समाज के लिए समर्पण, सहायता और आत्मसंयम — ये तीनों कर्म मनुष्य को भीतर से शुद्ध और उन्नत बनाते हैं, इन्हें कभी नहीं छोड़ना चाहिए।


श्लोक 18.6

वक्ता: श्रीकृष्ण

एतान्यपि तु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा फलानि च।
कर्तव्यानीति मे पार्थ निश्िचतं मतमुत्तमम् ॥18.6॥

etāny api tu karmāṇi saṅgaṁ tyaktvā phalāni cha / kartavyānīti me pārtha niśhchitaṁ matam uttamam

हिंदी अनुवाद: हे पार्थ! इन यज्ञ, दान और तप रूप कर्मों को तथा अन्य सभी कर्मों को भी आसक्ति और फल की कामना छोड़कर करना चाहिए — यह मेरा निश्चित और उत्तम मत है।

भावार्थ: श्रीकृष्ण यहाँ अपना सर्वोच्च निर्णय देते हैं। केवल यज्ञ, दान और तप ही नहीं, बल्कि जीवन के सभी कर्तव्य-कर्म 'सङ्गं त्यक्त्वा' अर्थात् आसक्ति छोड़कर और 'फलानि च' अर्थात् फल की चाह भी छोड़कर करने चाहिए। यह 'उत्तमम् मत' अर्थात् सर्वश्रेष्ठ सिद्धांत है। कर्म का त्याग नहीं, बल्कि कर्म के प्रति आसक्ति और फल की लालसा का त्याग — यही गीता का मूल संदेश है।

आज के जीवन में: अपना हर कर्तव्य पूरी लगन से करें, पर उसके फल पर अपना अधिकार न जताएँ — यही जीवन में सच्चा त्याग है।


श्लोक 18.7

वक्ता: श्रीकृष्ण

नियतस्य तु संन्यासः कर्मणो नोपपद्यते।
मोहात्तस्य परित्यागस्तामसः परिकीर्तितः ॥18.7॥

niyatasya tu sannyāsaḥ karmaṇo nopapadyate / mohāt tasya parityāgas tāmasaḥ parikīrtitaḥ

हिंदी अनुवाद: नियत कर्म का त्याग करना उचित नहीं है; उसे मोह के कारण छोड़ देना तामस त्याग कहलाता है।

भावार्थ: 'नियत कर्म' अर्थात् वे कर्म जो अपने स्वभाव, स्थिति और कर्तव्य के अनुसार करने आवश्यक हैं — उन्हें छोड़ना उचित नहीं। जो व्यक्ति 'मोहात्' अर्थात् भ्रम, अज्ञान या आलस्य के कारण अपने अनिवार्य कर्तव्यों को छोड़ देता है, उसका यह त्याग 'तामस' कहलाता है। यह त्याग नहीं, बल्कि कर्तव्य से पलायन है। तमोगुण से उत्पन्न यह वृत्ति मनुष्य को अधोगति की ओर ले जाती है।

आज के जीवन में: भ्रम या आलस्य के कारण अपने कर्तव्यों से मुँह मोड़ लेना त्याग नहीं, बल्कि कायरता है।


श्लोक 18.8

वक्ता: श्रीकृष्ण

दुःखमित्येव यत्कर्म कायक्लेशभयात्त्यजेत्।
स कृत्वा राजसं त्यागं नैव त्यागफलं लभेत् ॥18.8॥

duḥkham ity eva yat karma kāya-kleśha-bhayāt tyajet / sa kṛitvā rājasaṁ tyāgaṁ naiva tyāga-phalaṁ labhet

हिंदी अनुवाद: जो यह सोचकर कि सभी कर्म दुःखदायी हैं, शरीर को कष्ट होगा — इस भय से कर्म छोड़ देता है, वह राजस त्याग करता है और उसे त्याग का फल नहीं मिलता।

भावार्थ: 'कायक्लेशभयात्' अर्थात् शरीर को परिश्रम या कष्ट होगा — इस भय से जो व्यक्ति अपने कर्म छोड़ देता है, उसका त्याग 'राजस' है। वह मन ही मन यह तर्क देता है कि कर्म तो दुःखरूप ही हैं, इसलिए इन्हें क्यों करूँ। यह सोच रजोगुण से उत्पन्न होती है — जहाँ कर्म से बचने का कारण आत्मज्ञान नहीं, बल्कि सुविधा और स्वार्थ है। ऐसे त्याग से न मुक्ति मिलती है, न त्याग का पुण्य।

आज के जीवन में: कठिन लगने पर या परिश्रम से बचने के लिए कर्तव्य छोड़ देना सच्चा त्याग नहीं है।


श्लोक 18.9

वक्ता: श्रीकृष्ण

कार्यमित्येव यत्कर्म नियतं क्रियतेऽर्जुन।
सङ्गं त्यक्त्वा फलं चैव स त्यागः सात्त्विको मतः ॥18.9॥

kāryam ity eva yat karma niyataṁ kriyate ‘rjuna / saṅgaṁ tyaktvā phalaṁ chaiva sa tyāgaḥ sāttviko mataḥ

हिंदी अनुवाद: हे अर्जुन! जो नियत कर्म केवल इसलिए किया जाता है कि यह करना कर्तव्य है — आसक्ति और फल की कामना छोड़कर — वह सात्त्विक त्याग माना गया है।

भावार्थ: 'कार्यम् इति एव' अर्थात् केवल इसलिए कि यह करना चाहिए — इस भावना से जो कर्म किया जाता है, वह सात्त्विक त्याग है। इसमें न फल की आशा है, न कर्म के प्रति आसक्ति। 'सङ्गं त्यक्त्वा फलं च एव' — आसक्ति और फल दोनों को छोड़कर, केवल कर्तव्यबोध से किया गया कर्म ही सर्वोच्च और शुद्ध त्याग है। यही गीता का आदर्श कर्मयोग है — कर्म करो, पर उसके स्वामी मत बनो।

आज के जीवन में: जो काम केवल इसलिए करें कि वह करना उचित है — बिना किसी प्रतिफल की आशा के — वही सच्चा और श्रेष्ठ त्याग है।


श्लोक 18.10

वक्ता: श्रीकृष्ण

न द्वेष्ट्यकुशलं कर्म कुशले नानुषज्जते।
त्यागी सत्त्वसमाविष्टो मेधावी छिन्नसंशयः ॥18.10॥

na dveṣhṭy akuśhalaṁ karma kuśhale nānuṣhajjate / tyāgī sattva-samāviṣhṭo medhāvī chhinna-sanśhayaḥ

हिंदी अनुवाद: जो अप्रिय कर्म से घृणा नहीं करता और प्रिय कर्म में आसक्त नहीं होता, वह त्यागी, बुद्धिमान्, संशयरहित और सत्त्वगुण में स्थित है।

भावार्थ: सात्त्विक त्यागी की पहचान यहाँ दी गई है। 'अकुशल कर्म' अर्थात् कठिन, अरुचिकर या अशुभ लगने वाले कर्म से वह 'न द्वेष्टि' — द्वेष नहीं करता। और 'कुशल कर्म' अर्थात् सुखद या अनुकूल कर्म में 'न अनुषज्जते' — आसक्त नहीं होता। 'सत्त्वसमाविष्टः' अर्थात् सत्त्वगुण में रमा हुआ, 'मेधावी' अर्थात् विवेकशील और 'छिन्नसंशयः' अर्थात् जिसके सभी संशय कट चुके हैं — ऐसा व्यक्ति ही सच्चा त्यागी है।

आज के जीवन में: जो न कठिन काम से जी चुराए, न सुखद काम में डूब जाए — वही संतुलित, विवेकशील और सच्चा त्यागी है।


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