भगवद्गीता

भगवद्गीता अध्याय 18, श्लोक 11–20 | मोक्षसंन्यासयोग | अर्थ सहित

6 अक्तूबर 2026·8 मिनट में पढ़ें
भगवद्गीता अध्याय 18, श्लोक 11–20 | मोक्षसंन्यासयोग | अर्थ सहित

अध्याय 18 में श्रीकृष्ण अर्जुन को संन्यास और त्याग का भेद समझा चुके हैं। अब वे बताते हैं कि देहधारी के लिए कर्मों का पूर्ण त्याग असंभव है, इसलिए कर्मफल का त्याग ही सच्चा त्याग है। इस खंड में वे कर्म के पाँच कारण, कर्म की त्रिविध प्रेरणा और गुणों के आधार पर ज्ञान के भेद समझाते हैं।

श्लोक 18.11

वक्ता: श्रीकृष्ण

न हि देहभृता शक्यं त्यक्तुं कर्माण्यशेषतः।
यस्तु कर्मफलत्यागी स त्यागीत्यभिधीयते ॥18.11॥

na hi deha-bhṛitā śhakyaṁ tyaktuṁ karmāṇy aśheṣhataḥ / yas tu karma-phala-tyāgī sa tyāgīty abhidhīyate

हिंदी अनुवाद: शरीरधारी मनुष्य के लिए सभी कर्मों को पूरी तरह छोड़ देना संभव नहीं है। इसलिए जो कर्मफल का त्याग करता है, उसी को त्यागी कहा जाता है।

भावार्थ: श्रीकृष्ण अर्जुन को समझाते हैं कि जब तक शरीर है, कर्म होते ही रहेंगे — श्वास लेना, खाना, बोलना, सब कर्म हैं। इसलिए 'सब कर्म छोड़ दूँगा' यह विचार व्यावहारिक नहीं है। असली त्याग यह है कि कर्म करते हुए उसके फल की चाह न रखी जाए। 'अशेषतः' अर्थात् बिना किसी शेष के — यह पूर्ण त्याग देहधारी के लिए अशक्य है। 'कर्मफलत्यागी' — फल की आसक्ति छोड़ने वाला — ही सच्चा त्यागी है।

आज के जीवन में: कर्म से भागना नहीं, बल्कि फल की लालसा छोड़कर कर्म करना — यही जीवन में सच्चा वैराग्य है।


श्लोक 18.12

वक्ता: श्रीकृष्ण

अनिष्टमिष्टं मिश्रं च त्रिविधं कर्मणः फलम्।
भवत्यत्यागिनां प्रेत्य न तु संन्यासिनां क्वचित् ॥18.12॥

aniṣhṭam iṣhṭaṁ miśhraṁ cha tri-vidhaṁ karmaṇaḥ phalam / bhavaty atyāgināṁ pretya na tu sannyāsināṁ kvachit

हिंदी अनुवाद: जो लोग कर्मफल का त्याग नहीं करते, उन्हें मृत्यु के बाद भी कर्मों का तीन प्रकार का फल — अच्छा, बुरा और मिला-जुला — मिलता है। परंतु जो कर्मफल का त्याग करते हैं, उन्हें कहीं भी ऐसा फल नहीं मिलता।

भावार्थ: श्रीकृष्ण यहाँ फल-आसक्ति के परिणाम बताते हैं। जो व्यक्ति फल की चाह रखकर कर्म करता है, उसके कर्म तीन प्रकार के फल उत्पन्न करते हैं — 'इष्ट' अर्थात् प्रिय, 'अनिष्ट' अर्थात् अप्रिय, और 'मिश्र' अर्थात् दोनों का संयोग। यह फल मृत्यु के पश्चात भी उसका पीछा करता है। किंतु जो 'संन्यासी' — अर्थात् फल-त्यागी — है, उसे न इस लोक में न किसी और लोक में ऐसा बंधन होता है।

आज के जीवन में: फल की चाह छोड़कर किया गया कर्म मनुष्य को किसी भी बंधन में नहीं डालता।


श्लोक 18.13

वक्ता: श्रीकृष्ण

पञ्चैतानि महाबाहो कारणानि निबोध मे।
सांख्ये कृतान्ते प्रोक्तानि सिद्धये सर्वकर्मणाम् ॥18.13॥

pañchaitāni mahā-bāho kāraṇāni nibodha me / sānkhye kṛitānte proktāni siddhaye sarva-karmaṇām

हिंदी अनुवाद: हे महाबाहो! सांख्य सिद्धांत में सभी कर्मों की सिद्धि के लिए जो पाँच कारण बताए गए हैं, उन्हें तुम मुझसे समझो।

भावार्थ: श्रीकृष्ण अर्जुन को 'महाबाहो' — महान भुजाओं वाले — कहकर संबोधित करते हैं और एक नई बात आरंभ करते हैं। वे कहते हैं कि 'सांख्यकृतान्त' — सांख्य दर्शन के निष्कर्ष — में यह बताया गया है कि प्रत्येक कर्म की सिद्धि के पीछे पाँच कारण होते हैं। इन पाँच कारणों को जानना आवश्यक है, क्योंकि इनसे यह स्पष्ट होता है कि कर्म का कर्ता केवल अकेला व्यक्ति नहीं है।

आज के जीवन में: किसी भी कार्य की सफलता या विफलता के पीछे केवल एक कारण नहीं होता — यह समझ अहंकार को कम करती है।


श्लोक 18.14

वक्ता: श्रीकृष्ण

अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथग्विधम्।
विविधाश्च पृथक्चेष्टा दैवं चैवात्र पञ्चमम् ॥18.14॥

adhiṣhṭhānaṁ tathā kartā karaṇaṁ cha pṛithag-vidham / vividhāśh cha pṛithak cheṣhṭā daivaṁ chaivātra pañchamam

हिंदी अनुवाद: कर्मों की सिद्धि में — अधिष्ठान (शरीर), कर्ता, अनेक प्रकार के करण (इंद्रियाँ), विविध प्रकार की अलग-अलग चेष्टाएँ, और पाँचवाँ दैव (संस्कार) — ये पाँच कारण हैं।

भावार्थ: श्रीकृष्ण पाँच कारण गिनाते हैं। 'अधिष्ठान' अर्थात् वह आधार जिस पर कर्म होता है — शरीर। 'कर्ता' अर्थात् करने वाला जीव। 'करण' अर्थात् इंद्रियाँ और मन जो कर्म के साधन हैं। 'चेष्टाएँ' अर्थात् शरीर और इंद्रियों की विभिन्न क्रियाएँ। और 'दैव' — पाँचवाँ कारण — जो पूर्वजन्म के संस्कार या अदृश्य शक्ति को दर्शाता है। इन पाँचों के मिलने से ही कोई कर्म संपन्न होता है।

आज के जीवन में: कोई भी कार्य केवल हमारे प्रयास से नहीं होता; उसमें अनेक कारण मिलकर काम करते हैं — यह जानकर अहंकार स्वाभाविक रूप से घटता है।


श्लोक 18.15

वक्ता: श्रीकृष्ण

शरीरवाङ्मनोभिर्यत्कर्म प्रारभते नरः।
न्याय्यं वा विपरीतं वा पञ्चैते तस्य हेतवः ॥18.15॥

śharīra-vāṅ-manobhir yat karma prārabhate naraḥ / nyāyyaṁ vā viparītaṁ vā pañchaite tasya hetavaḥ

हिंदी अनुवाद: मनुष्य शरीर, वाणी और मन से जो भी कर्म आरंभ करता है — चाहे वह उचित हो या अनुचित — उन सबके ये पाँचों ही कारण होते हैं।

भावार्थ: श्रीकृष्ण स्पष्ट करते हैं कि पूर्वोक्त पाँच कारण केवल किसी विशेष कर्म के लिए नहीं, बल्कि शरीर, वाणी और मन — इन तीनों माध्यमों से किए जाने वाले प्रत्येक कर्म के लिए लागू होते हैं। 'न्याय्यं' अर्थात् शास्त्रसम्मत और 'विपरीतं' अर्थात् शास्त्रविरुद्ध — दोनों प्रकार के कर्मों में ये पाँच कारण समान रूप से काम करते हैं। इससे यह सिद्ध होता है कि कोई भी कर्म केवल एक कारण का परिणाम नहीं है।

आज के जीवन में: हर कर्म — चाहे अच्छा हो या बुरा — अनेक कारणों का मिला-जुला परिणाम है; यह समझ जिम्मेदारी के साथ विनम्रता भी सिखाती है।


श्लोक 18.16

वक्ता: श्रीकृष्ण

तत्रैवं सति कर्तारमात्मानं केवलं तु यः।
पश्यत्यकृतबुद्धित्वान्न स पश्यति दुर्मतिः ॥18.16॥

tatraivaṁ sati kartāram ātmānaṁ kevalaṁ tu yaḥ / paśhyaty akṛita-buddhitvān na sa paśhyati durmatiḥ

हिंदी अनुवाद: परंतु जब ये पाँच कारण विद्यमान हैं, तब भी जो व्यक्ति केवल शुद्ध आत्मा को ही कर्ता मानता है, वह दुर्मति सही नहीं देखता — क्योंकि उसकी बुद्धि परिपक्व नहीं है।

भावार्थ: श्रीकृष्ण यहाँ एक भ्रांति को दूर करते हैं। कुछ लोग सोचते हैं कि 'मेरी आत्मा ही सब कुछ करती है।' किंतु जब कर्म के पाँच कारण हैं, तो केवल आत्मा को एकमात्र कर्ता मानना अज्ञान है। 'अकृतबुद्धित्व' अर्थात् अपरिपक्व बुद्धि — ऐसी बुद्धि जो वास्तविकता को ठीक से नहीं देख पाती। 'दुर्मति' — कुबुद्धि वाला — ऐसा व्यक्ति सत्य को नहीं समझता और इसीलिए भटकता है।

आज के जीवन में: जो व्यक्ति अपने अकेले को ही सब कुछ का कर्ता समझता है, वह वास्तविकता से दूर रहता है।


श्लोक 18.17

वक्ता: श्रीकृष्ण

यस्य नाहंकृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते।
हत्वापि स इमाँल्लोकान्न हन्ति न निबध्यते ॥18.17॥

yasya nāhankṛito bhāvo buddhir yasya na lipyate / hatvā ‘pi sa imāl lokān na hanti na nibadhyate

हिंदी अनुवाद: जिसमें अहंकार का भाव नहीं है और जिसकी बुद्धि किसी से लिप्त नहीं होती, वह इन सभी प्राणियों को मारकर भी न तो मारता है और न ही किसी बंधन में बँधता है।

भावार्थ: यह श्लोक गीता के केंद्रीय संदेश को दोहराता है। 'अहंकृतभाव' — 'मैं कर रहा हूँ' यह अभिमान — जिसमें नहीं है, और जिसकी बुद्धि शुभ-अशुभ में लिप्त नहीं होती, वह कर्म करते हुए भी कर्म के बंधन से मुक्त रहता है। यहाँ युद्ध का उदाहरण इसलिए दिया गया है क्योंकि अर्जुन युद्धभूमि में है। भाव यह है कि अहंकाररहित और फलासक्तिरहित कर्म बंधन नहीं बनाता।

आज के जीवन में: जब कर्म अहंकार और फल की चाह से मुक्त होकर किया जाए, तो वह मनुष्य को बाँधता नहीं।


श्लोक 18.18

वक्ता: श्रीकृष्ण

ज्ञानं ज्ञेयं परिज्ञाता त्रिविधा कर्मचोदना।
करणं कर्म कर्तेति त्रिविधः कर्मसंग्रहः ॥18.18॥

jñānaṁ jñeyaṁ parijñātā tri-vidhā karma-chodanā / karaṇaṁ karma karteti tri-vidhaḥ karma-saṅgrahaḥ

हिंदी अनुवाद: ज्ञान, ज्ञेय और ज्ञाता — ये तीन कर्म की प्रेरणा हैं; और करण, कर्म तथा कर्ता — ये तीन कर्म के संग्रह हैं।

भावार्थ: श्रीकृष्ण यहाँ कर्म के दो पक्ष बताते हैं। पहला — कर्म की प्रेरणा: 'ज्ञान' अर्थात् जानने की शक्ति, 'ज्ञेय' अर्थात् जो जाना जाना है, और 'परिज्ञाता' अर्थात् जानने वाला — इन तीनों से कर्म करने की इच्छा उत्पन्न होती है। दूसरा — कर्म का संग्रह: 'करण' अर्थात् साधन, 'कर्म' अर्थात् क्रिया, और 'कर्ता' अर्थात् करने वाला — ये तीन मिलकर कर्म को पूर्ण करते हैं। इस प्रकार कर्म की पूरी संरचना छह तत्त्वों में समाई है।

आज के जीवन में: किसी भी कार्य को समझने के लिए उसकी प्रेरणा और उसके साधन — दोनों को जानना आवश्यक है।


श्लोक 18.19

वक्ता: श्रीकृष्ण

ज्ञानं कर्म च कर्ता च त्रिधैव गुणभेदतः।
प्रोच्यते गुणसंख्याने यथावच्छृणु तान्यपि ॥18.19॥

jñānaṁ karma cha kartā cha tridhaiva guṇa-bhedataḥ / prochyate guṇa-saṅkhyāne yathāvach chhṛiṇu tāny api

हिंदी अनुवाद: गुणों के विश्लेषण करने वाले शास्त्र में गुणों के भेद से ज्ञान, कर्म और कर्ता — तीनों तीन-तीन प्रकार के कहे गए हैं। उन्हें भी तुम यथार्थ रूप से सुनो।

भावार्थ: श्रीकृष्ण अब एक नई विवेचना की भूमिका बाँधते हैं। 'गुणसंख्यान' अर्थात् वह शास्त्र जो सत्त्व, रज और तम — इन तीन गुणों के आधार पर प्रत्येक वस्तु का वर्गीकरण करता है। इस दृष्टि से ज्ञान, कर्म और कर्ता — तीनों के तीन-तीन भेद होते हैं। यह वर्गीकरण मनुष्य को यह समझने में सहायता करता है कि उसका ज्ञान, उसका कर्म और वह स्वयं किस गुण से प्रभावित है।

आज के जीवन में: अपने ज्ञान, कर्म और स्वभाव की प्रकृति को पहचानना आत्म-सुधार का पहला कदम है।


श्लोक 18.20

वक्ता: श्रीकृष्ण

सर्वभूतेषु येनैकं भावमव्ययमीक्षते।
अविभक्तं विभक्तेषु तज्ज्ञानं विद्धि सात्त्विकम् ॥18.20॥

sarva-bhūteṣhu yenaikaṁ bhāvam avyayam īkṣhate / avibhaktaṁ vibhakteṣhu taj jñānaṁ viddhi sāttvikam

हिंदी अनुवाद: जिस ज्ञान के द्वारा साधक सभी विभक्त प्राणियों में एक अविनाशी, अविभाजित सत्ता को देखता है — उस ज्ञान को सात्त्विक जानो।

भावार्थ: श्रीकृष्ण सात्त्विक ज्ञान की परिभाषा देते हैं। 'विभक्तेषु' अर्थात् जो प्राणी बाहर से अलग-अलग दिखते हैं, उन सबमें 'अविभक्तं' — अविभाजित — एक ही 'अव्यय भाव' — अविनाशी सत्ता — को देखना सात्त्विक ज्ञान है। यह ज्ञान भेद नहीं देखता, एकता देखता है। यह अनुभव करना कि सभी जीवों में एक ही चेतना है — यही सर्वोच्च ज्ञान है। यह ज्ञान मनुष्य को संकीर्णता से मुक्त करता है।

आज के जीवन में: जो व्यक्ति सभी प्राणियों में एक ही सत्ता को देखता है, उसके मन में द्वेष और भेदभाव के लिए स्थान नहीं रहता।


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