भगवद्गीता

भगवद्गीता अध्याय 18, श्लोक 21–30 | मोक्षसंन्यासयोग | अर्थ सहित

6 अक्तूबर 2026·7 मिनट में पढ़ें
भगवद्गीता अध्याय 18, श्लोक 21–30 | मोक्षसंन्यासयोग | अर्थ सहित

अठारहवें अध्याय में श्रीकृष्ण त्याग और संन्यास के भेद समझाने के बाद तीन गुणों — सत्त्व, रज और तम — के आधार पर ज्ञान और कर्म का वर्गीकरण कर रहे हैं। इस खंड में वे ज्ञान, कर्म और कर्ता के तीनों गुणों के भेद पूरे करके अब बुद्धि और धृति के त्रिविध भेद की ओर बढ़ते हैं।

श्लोक 18.21

वक्ता: श्रीकृष्ण

पृथक्त्वेन तु यज्ज्ञानं नानाभावान्पृथग्विधान्।
वेत्ति सर्वेषु भूतेषु तज्ज्ञानं विद्धि राजसम् ॥18.21॥

pṛithaktvena tu yaj jñānaṁ nānā-bhāvān pṛithag-vidhān / vetti sarveṣhu bhūteṣhu taj jñānaṁ viddhi rājasam

हिंदी अनुवाद: जो ज्ञान सम्पूर्ण प्राणियों में अनेक प्रकार के भावों को अलग-अलग रूप में देखता है, उस ज्ञान को राजस जानो।

भावार्थ: श्रीकृष्ण अर्जुन को राजस ज्ञान का लक्षण बता रहे हैं। सात्त्विक ज्ञान जहाँ सब प्राणियों में एक ही अविभाज्य सत्ता देखता है, वहीं राजस ज्ञान प्रत्येक प्राणी को सर्वथा भिन्न और स्वतंत्र मानता है। 'पृथक्त्वेन' का अर्थ है पृथकता के भाव से — अर्थात् यह ज्ञान विविधता को तो देखता है, किन्तु उसके पीछे की एकता को नहीं पहचान पाता। यह ज्ञान आंशिक सत्य है, इसलिए राजस कहा गया।

आज के जीवन में: जो दृष्टि केवल भेद देखे और एकता न देख सके, वह पूर्ण ज्ञान नहीं है।


श्लोक 18.22

वक्ता: श्रीकृष्ण

यत्तु कृत्स्नवदेकस्मिन्कार्ये सक्तमहैतुकम्।
अतत्त्वार्थवदल्पं च तत्तामसमुदाहृतम् ॥18.22॥

yat tu kṛitsna-vad ekasmin kārye saktam ahaitukam / atattvārtha-vad alpaṁ cha tat tāmasam udāhṛitam

हिंदी अनुवाद: जो ज्ञान एक कार्यरूप शरीर को ही सब कुछ मानकर उसमें आसक्त रहता है, जो तर्करहित, सत्य से दूर और तुच्छ है — वह तामस कहा गया है।

भावार्थ: तामस ज्ञान का स्वरूप यहाँ स्पष्ट किया गया है। 'कृत्स्नवत्' अर्थात् सम्पूर्ण के समान — जो व्यक्ति केवल इस दृश्य शरीर या एक सीमित वस्तु को ही सब कुछ समझ लेता है, उसका ज्ञान न तो किसी युक्ति पर टिका है, न वास्तविकता पर। ऐसा ज्ञान 'अहैतुकम्' — बिना कारण के — और 'अतत्त्वार्थवत्' — सत्य के अर्थ से रहित — होता है। यह सबसे निम्न कोटि का ज्ञान है।

आज के जीवन में: जो समझ न तर्क पर टिकी हो, न सत्य पर — वह अज्ञान ही है, ज्ञान नहीं।


श्लोक 18.23

वक्ता: श्रीकृष्ण

नियतं सङ्गरहितमरागद्वेषतः कृतम्।
अफलप्रेप्सुना कर्म यत्तत्सात्त्विकमुच्यते ॥18.23॥

niyataṁ saṅga-rahitam arāga-dveṣhataḥ kṛitam / aphala-prepsunā karma yat tat sāttvikam uchyate

हिंदी अनुवाद: जो कर्म शास्त्र के अनुसार नियत हो, कर्तापन के अभिमान से रहित हो, और फल की इच्छा के बिना राग-द्वेष छोड़कर किया जाए — वह सात्त्विक कहलाता है।

भावार्थ: श्रीकृष्ण अब कर्म के तीन गुणों का वर्गीकरण आरम्भ करते हैं। सात्त्विक कर्म की तीन विशेषताएँ हैं — 'नियतम्' अर्थात् कर्तव्य के रूप में निश्चित, 'सङ्गरहितम्' अर्थात् आसक्ति से मुक्त, और 'अफलप्रेप्सुना' अर्थात् फल की कामना न रखने वाले द्वारा किया गया। इसके साथ राग और द्वेष का अभाव भी आवश्यक है। ऐसा कर्म निष्काम और निर्मल होता है।

आज के जीवन में: कर्तव्य को बिना फल की चाह और बिना राग-द्वेष के करना ही सच्चा सात्त्विक कर्म है।


श्लोक 18.24

वक्ता: श्रीकृष्ण

यत्तु कामेप्सुना कर्म साहङ्कारेण वा पुनः।
क्रियते बहुलायासं तद्राजसमुदाहृतम् ॥18.24॥

yat tu kāmepsunā karma sāhankāreṇa vā punaḥ / kriyate bahulāyāsaṁ tad rājasam udāhṛitam

हिंदी अनुवाद: जो कर्म भोग की इच्छा रखने वाले मनुष्य द्वारा अहंकार के साथ और बड़े परिश्रम से किया जाता है, वह राजस कहा गया है।

भावार्थ: राजस कर्म की पहचान यहाँ तीन बातों में है — 'कामेप्सुना' अर्थात् भोग और फल की लालसा, 'साहंकारेण' अर्थात् 'मैं कर रहा हूँ' का अभिमान, और 'बहुलायासम्' अर्थात् अत्यधिक परिश्रम या तनाव के साथ किया जाना। ऐसा कर्म बाहर से भले ही बड़ा दिखे, किन्तु उसके पीछे स्वार्थ और अहंकार होने से वह राजस की श्रेणी में आता है।

आज के जीवन में: जब कर्म के पीछे केवल अपना लाभ और अहंकार हो, तो वह कर्म राजस बन जाता है।


श्लोक 18.25

वक्ता: श्रीकृष्ण

अनुबन्धं क्षयं हिंसामनपेक्ष्य च पौरुषम्।
मोहादारभ्यते कर्म यत्तत्तामसमुच्यते ॥18.25॥

anubandhaṁ kṣhayaṁ hinsām anapekṣhya cha pauruṣham / mohād ārabhyate karma yat tat tāmasam uchyate

हिंदी अनुवाद: जो कर्म परिणाम, हानि, हिंसा और अपनी सामर्थ्य की परवाह किए बिना मोह में पड़कर आरम्भ किया जाता है, वह तामस कहा जाता है।

भावार्थ: तामस कर्म का मूल कारण 'मोह' है — अज्ञान और भ्रम। ऐसा व्यक्ति न तो कर्म के परिणाम ('अनुबन्ध') पर विचार करता है, न होने वाली हानि ('क्षय') पर, न दूसरों को पहुँचने वाली पीड़ा ('हिंसा') पर, और न अपनी क्षमता ('पौरुष') पर। बिना सोचे-समझे, केवल मोहवश किया गया कर्म सबसे निम्न कोटि का होता है।

आज के जीवन में: बिना सोचे-समझे, परिणाम और क्षमता की अनदेखी करके किया गया कार्य तामस होता है।


श्लोक 18.26

वक्ता: श्रीकृष्ण

मुक्तसङ्गोऽनहंवादी धृत्युत्साहसमन्वितः।
सिद्ध्यसिद्ध्योर्निर्विकारः कर्ता सात्त्विक उच्यते ॥18.26॥

mukta-saṅgo ‘nahaṁ-vādī dhṛity-utsāha-samanvitaḥ / siddhy-asiddhyor nirvikāraḥ kartā sāttvika uchyate

हिंदी अनुवाद: जो कर्ता आसक्ति से मुक्त है, अहंकार से रहित है, धैर्य और उत्साह से युक्त है, और सफलता-असफलता में समभाव रखता है — वह सात्त्विक कर्ता कहलाता है।

भावार्थ: श्रीकृष्ण अब कर्ता के गुणों का वर्गीकरण करते हैं। सात्त्विक कर्ता की चार विशेषताएँ हैं — 'मुक्तसङ्ग' अर्थात् राग से मुक्त, 'अनहंवादी' अर्थात् 'मैं ही कर्ता हूँ' ऐसा न कहने वाला, 'धृत्युत्साहसमन्वित' अर्थात् दृढ़ता और उमंग से भरा, तथा 'निर्विकार' अर्थात् सिद्धि और असिद्धि दोनों में समान। ऐसा कर्ता कर्म को साधन मानता है, साध्य नहीं।

आज के जीवन में: जो व्यक्ति अहंकार छोड़कर, धैर्य के साथ, सफलता-विफलता में समान रहकर काम करे — वही सच्चा सात्त्विक कर्मयोगी है।


श्लोक 18.27

वक्ता: श्रीकृष्ण

रागी कर्मफलप्रेप्सुर्लुब्धो हिंसात्मकोऽशुचिः।
हर्षशोकान्वितः कर्ता राजसः परिकीर्तितः ॥18.27॥

rāgī karma-phala-prepsur lubdho hinsātmako ‘śhuchiḥ / harṣha-śhokānvitaḥ kartā rājasaḥ parikīrtitaḥ

हिंदी अनुवाद: जो कर्ता रागी है, कर्म के फल का इच्छुक है, लोभी है, हिंसक स्वभाव का है, अशुद्ध है, और हर्ष तथा शोक में डूबता-उतराता रहता है — वह राजस कर्ता कहा गया है।

भावार्थ: राजस कर्ता के लक्षण यहाँ विस्तार से गिनाए गए हैं। 'रागी' — आसक्ति से भरा, 'कर्मफलप्रेप्सु' — फल का लोभी, 'लुब्ध' — अत्यधिक लालची, 'हिंसात्मक' — दूसरों को कष्ट देने की प्रवृत्ति वाला, 'अशुचि' — भीतर-बाहर से अशुद्ध, और 'हर्षशोकान्वित' — सफलता पर अत्यधिक प्रसन्न और विफलता पर अत्यधिक दुखी। ये सब राजस गुण के चिह्न हैं।

आज के जीवन में: जो व्यक्ति फल की लालसा, लोभ और हर्ष-शोक के बीच झूलता रहे, वह राजस स्वभाव में है।


श्लोक 18.28

वक्ता: श्रीकृष्ण

अयुक्तः प्राकृतः स्तब्धः शठो नैष्कृतिकोऽलसः।
विषादी दीर्घसूत्री च कर्ता तामस उच्यते ॥18.28॥

ayuktaḥ prākṛitaḥ stabdhaḥ śhaṭho naiṣhkṛitiko ‘lasaḥ / viṣhādī dīrgha-sūtrī cha kartā tāmasa uchyate

हिंदी अनुवाद: जो कर्ता असावधान है, अशिक्षित और अकड़ वाला है, धोखेबाज़ है, उपकारी का अपकार करने वाला है, आलसी है, विषाद में डूबा रहता है और काम को टालता रहता है — वह तामस कर्ता कहा जाता है।

भावार्थ: तामस कर्ता के आठ लक्षण यहाँ दिए गए हैं — 'अयुक्त' अर्थात् असावधान या अनुशासनहीन, 'प्राकृत' अर्थात् अशिक्षित या अविवेकी, 'स्तब्ध' अर्थात् अकड़ू और हठी, 'शठ' अर्थात् छल करने वाला, 'नैष्कृतिक' अर्थात् उपकार का बदला अपकार से देने वाला, 'आलस' अर्थात् काम से जी चुराने वाला, 'विषादी' अर्थात् निराश रहने वाला, और 'दीर्घसूत्री' अर्थात् काम को बार-बार टालने वाला।

आज के जीवन में: आलस, हठ, छल और निराशा — ये तामस कर्ता के चिह्न हैं जिनसे सावधान रहना चाहिए।


श्लोक 18.29

वक्ता: श्रीकृष्ण

बुद्धेर्भेदं धृतेश्चैव गुणतस्त्रिविधं श्रृणु।
प्रोच्यमानमशेषेण पृथक्त्वेन धनञ्जय ॥18.29॥

buddher bhedaṁ dhṛiteśh chaiva guṇatas tri-vidhaṁ śhṛiṇu / prochyamānam aśheṣheṇa pṛithaktvena dhanañjaya

हिंदी अनुवाद: हे धनञ्जय! अब तुम गुणों के अनुसार बुद्धि और धृति के तीन-तीन भेद अलग-अलग सुनो, जो मैं तुम्हें पूर्णरूप से बताने जा रहा हूँ।

भावार्थ: यह श्लोक एक संक्रमण-श्लोक है जिसमें श्रीकृष्ण अगले विषय की भूमिका बाँध रहे हैं। ज्ञान, कर्म और कर्ता के त्रिविध भेद समझाने के बाद अब वे 'बुद्धि' और 'धृति' के भी तीन-तीन भेद बताने की घोषणा करते हैं। 'धनञ्जय' — अर्जुन का यह नाम धन जीतने वाले के अर्थ में है। 'अशेषेण' का अर्थ है बिना कुछ छोड़े, पूर्णरूप से।


श्लोक 18.30

वक्ता: श्रीकृष्ण

प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च कार्याकार्ये भयाभये।
बन्धं मोक्षं च या वेत्ति बुद्धिः सा पार्थ सात्त्विकी ॥18.30॥

pravṛittiṁ cha nivṛittiṁ cha kāryākārye bhayābhaye / bandhaṁ mokṣhaṁ cha yā vetti buddhiḥ sā pārtha sāttvikī

हिंदी अनुवाद: हे पार्थ! जो बुद्धि प्रवृत्ति और निवृत्ति को, करने योग्य और न करने योग्य को, भय और अभय को, तथा बंधन और मोक्ष को ठीक-ठीक जानती है — वह बुद्धि सात्त्विक है।

भावार्थ: सात्त्विक बुद्धि की परिभाषा यहाँ दी गई है। यह बुद्धि तीन युगलों को स्पष्ट पहचानती है — 'प्रवृत्ति-निवृत्ति' अर्थात् कब कर्म में उतरना है और कब उससे विरत होना है; 'कार्य-अकार्य' अर्थात् क्या करना उचित है और क्या नहीं; तथा 'बंध-मोक्ष' अर्थात् क्या आत्मा को बाँधता है और क्या मुक्त करता है। ऐसी विवेकशील बुद्धि ही सात्त्विक कहलाती है।

आज के जीवन में: जो बुद्धि उचित-अनुचित, बंधन-मुक्ति का सही विवेक रखे — वही जीवन में सच्चा मार्गदर्शन कर सकती है।


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