भगवद्गीता अध्याय 18, श्लोक 31–40 | मोक्षसंन्यासयोग | अर्थ सहित
अध्याय अठारह में श्रीकृष्ण ज्ञान, कर्म और कर्ता के तीन-तीन भेद बताने के बाद अब बुद्धि और धृति (दृढ़ता) के तीन-तीन भेद समझा चुके हैं। इस खंड में वे राजसी और तामसी बुद्धि तथा धृति का वर्णन पूरा करके सुख के तीन प्रकार — सात्त्विक, राजसी और तामसी — समझाते हैं, और अंत में यह स्थापित करते हैं कि प्रकृति के तीनों गुणों से कोई भी प्राणी या देवता सर्वथा मुक्त नहीं है।
श्लोक 18.31
वक्ता: श्रीकृष्ण
यया धर्ममधर्मं च कार्यं चाकार्यमेव च।
अयथावत्प्रजानाति बुद्धिः सा पार्थ राजसी ॥18.31॥
yayā dharmam adharmaṁ cha kāryaṁ chākāryam eva cha / ayathāvat prajānāti buddhiḥ sā pārtha rājasī
हिंदी अनुवाद: हे पार्थ! जिस बुद्धि के द्वारा मनुष्य धर्म और अधर्म को, तथा करने योग्य और न करने योग्य कार्य को ठीक प्रकार से नहीं जान पाता, वह बुद्धि राजसी है।
भावार्थ: श्रीकृष्ण अर्जुन को बुद्धि के दूसरे भेद का परिचय दे रहे हैं। राजसी बुद्धि पूरी तरह गलत नहीं होती, किंतु वह धर्म और अधर्म का, कर्तव्य और अकर्तव्य का सही-सही निर्णय नहीं कर पाती — उसमें भ्रम और अनिश्चय बना रहता है। 'अयथावत्' का अर्थ है 'यथार्थ रूप से नहीं' — अर्थात् यह बुद्धि वस्तुओं को उनके वास्तविक स्वरूप में नहीं देख पाती। रजोगुण की अधिकता के कारण इच्छाएँ और आसक्ति विवेक को धुंधला कर देती हैं।
आज के जीवन में: जब हम स्वार्थ या आसक्ति के कारण सही-गलत का निर्णय नहीं कर पाते, तो समझें कि हमारी बुद्धि रजोगुण से प्रभावित है — ऐसे में रुककर शांत मन से विचार करना आवश्यक है।
श्लोक 18.32
वक्ता: श्रीकृष्ण
अधर्मं धर्ममिति या मन्यते तमसाऽऽवृता।
सर्वार्थान्विपरीतांश्च बुद्धिः सा पार्थ तामसी ॥18.32॥
adharmaṁ dharmam iti yā manyate tamasāvṛitā / sarvārthān viparītānśh cha buddhiḥ sā pārtha tāmasī
हिंदी अनुवाद: हे पार्थ! तमोगुण से ढकी हुई जो बुद्धि अधर्म को धर्म मान लेती है और सभी बातों को उलटा देखती है, वह तामसी बुद्धि है।
भावार्थ: तामसी बुद्धि का वर्णन करते हुए श्रीकृष्ण कहते हैं कि यह बुद्धि केवल भ्रमित नहीं होती, बल्कि सब कुछ विपरीत देखती है — जो अधर्म है उसे धर्म समझती है, जो हानिकारक है उसे लाभकारी मानती है। 'तमसाऽऽवृता' अर्थात् तमोगुण से पूरी तरह आवृत्त। यह अज्ञान की चरम अवस्था है जहाँ विवेक लगभग लुप्त हो जाता है। ऐसी बुद्धि मनुष्य को सर्वथा भटका देती है क्योंकि वह गलत को ही सही मानकर चलती है।
आज के जीवन में: जब कोई व्यक्ति बुरे कार्य को उचित ठहराने लगे और अच्छाई को व्यर्थ समझे, तो यह तमोगुण की पकड़ का संकेत है — ऐसे में सत्संग और सद्विचार ही बुद्धि को जगा सकते हैं।
श्लोक 18.33
वक्ता: श्रीकृष्ण
धृत्या यया धारयते मनःप्राणेन्द्रियक्रियाः।
योगेनाव्यभिचारिण्या धृतिः सा पार्थ सात्त्विकी ॥18.33॥
dhṛityā yayā dhārayate manaḥ-prāṇendriya-kriyāḥ / yogenāvyabhichāriṇyā dhṛitiḥ sā pārtha sāttvikī
हिंदी अनुवाद: हे पार्थ! जिस अडिग और अव्यभिचारिणी धृति के द्वारा योग से मन, प्राण और इंद्रियों की क्रियाओं को साधा जाता है, वह धृति सात्त्विकी है।
भावार्थ: श्रीकृष्ण अब धृति — अर्थात् मन की दृढ़ता या स्थिरता — के तीन भेद बताना आरंभ करते हैं। सात्त्विकी धृति वह है जो 'अव्यभिचारिणी' है — अर्थात् जो कभी डगमगाती नहीं, जो एकनिष्ठ है। इस दृढ़ता के द्वारा साधक अपने मन, प्राण (जीवनशक्ति) और इंद्रियों को योग में — अर्थात् परमात्मा से जोड़ने वाले अभ्यास में — स्थिर रखता है। यह धृति भीतर से उत्पन्न होती है और बाहरी परिस्थितियों से विचलित नहीं होती।
आज के जीवन में: मन, इंद्रियों और श्वास को साधने की जो अटल लगन बिना किसी लालच के बनी रहे, वही सच्ची सात्त्विक दृढ़ता है।
श्लोक 18.34
वक्ता: श्रीकृष्ण
यया तु धर्मकामार्थान् धृत्या धारयतेऽर्जुन।
प्रसङ्गेन फलाकाङ्क्षी धृतिः सा पार्थ राजसी ॥18.34॥
yayā tu dharma-kāmārthān dhṛityā dhārayate ‘rjuna / prasaṅgena phalākāṅkṣhī dhṛitiḥ sā pārtha rājasī
हिंदी अनुवाद: हे अर्जुन! फल की इच्छा रखने वाला मनुष्य जिस धृति के द्वारा धर्म, भोग और अर्थ को अत्यंत आसक्ति के साथ थामे रहता है, वह धृति राजसी है।
भावार्थ: राजसी धृति में दृढ़ता तो होती है, किंतु उसका आधार फल की कामना और आसक्ति है। मनुष्य धर्म का पालन करता है तो यश के लिए, अर्थ कमाता है तो भोग के लिए, और भोग में भी आसक्त रहता है। 'प्रसङ्गेन' का अर्थ है 'आसक्ति के कारण'। यह धृति बुरी नहीं है, किंतु यह मनुष्य को संसार के चक्र में बाँधे रखती है क्योंकि इसका केंद्र परमात्मा नहीं, बल्कि फल और भोग है।
आज के जीवन में: यदि हम कर्तव्य निभाते हैं, पर मन में हमेशा बदले या पुरस्कार की अपेक्षा रहती है, तो हमारी दृढ़ता राजसी है — उसे निष्काम बनाने का प्रयास करना चाहिए।
श्लोक 18.35
वक्ता: श्रीकृष्ण
यया स्वप्नं भयं शोकं विषादं मदमेव च।
न विमुञ्चति दुर्मेधा धृतिः सा पार्थ तामसी ॥18.35॥
yayā svapnaṁ bhayaṁ śhokaṁ viṣhādaṁ madam eva cha / na vimuñchati durmedhā dhṛitiḥ sā pārtha tāmasī
हिंदी अनुवाद: हे पार्थ! दुर्बल बुद्धि वाला मनुष्य जिस धृति के द्वारा नींद, भय, चिंता, दुःख और घमंड को नहीं छोड़ता, वह धृति तामसी है।
भावार्थ: तामसी धृति वास्तव में दृढ़ता नहीं, बल्कि जड़ता है। 'दुर्मेधा' अर्थात् जिसकी बुद्धि मंद या दूषित है। ऐसा व्यक्ति निद्रा, आलस्य, भय, विषाद और अहंकार को पकड़े रहता है — इन्हें छोड़ने की न इच्छा होती है, न सामर्थ्य। यह जड़ता ही उसकी 'धृति' बन जाती है। यह तीनों प्रकार की धृतियों में सबसे हानिकारक है क्योंकि यह मनुष्य को पतन की ओर ले जाती है।
आज के जीवन में: जो व्यक्ति अपनी बुरी आदतों, व्यर्थ के भय और अहंकार को छोड़ने की कोशिश ही न करे, वह तामसी जड़ता में फँसा है — उससे बाहर निकलने के लिए सचेत प्रयास आवश्यक है।
श्लोक 18.36
वक्ता: श्रीकृष्ण
सुखं त्विदानीं त्रिविधं श्रृणु मे भरतर्षभ।
अभ्यासाद्रमते यत्र दुःखान्तं च निगच्छति ॥18.36॥
sukhaṁ tv idānīṁ tri-vidhaṁ śhṛiṇu me bharatarṣhabha / abhyāsād ramate yatra duḥkhāntaṁ cha nigachchhati / yat tad agre viṣham iva pariṇāme ‘mṛitopamam / tat sukhaṁ sāttvikaṁ proktam ātma-buddhi-prasāda-jam
हिंदी अनुवाद: हे भरतवंशियों में श्रेष्ठ अर्जुन! अब तीन प्रकार के सुख को भी मुझसे सुनो — जिसमें अभ्यास से आनंद आता है और जो दुःखों का अंत कर देता है।
भावार्थ: श्रीकृष्ण अब सुख के तीन भेदों का वर्णन आरंभ करते हैं। यह श्लोक एक भूमिका है जिसमें वे कहते हैं कि सुख भी गुणों के अनुसार तीन प्रकार का होता है। यहाँ वे सात्त्विक सुख की विशेषता संक्षेप में बताते हैं — वह सुख जो अभ्यास से प्राप्त होता है और जो अंततः दुःखों का नाश कर देता है। 'अभ्यासात्' अर्थात् निरंतर साधना से — यह सुख तत्काल नहीं मिलता, इसके लिए धैर्यपूर्वक अभ्यास चाहिए।
श्लोक 18.37
वक्ता: श्रीकृष्ण
यत्तदग्रे विषमिव परिणामेऽमृतोपमम्।
तत्सुखं सात्त्विकं प्रोक्तमात्मबुद्धिप्रसादजम् ॥18.37॥
yat tad agre viṣam iva pariṇāme 'mṛtopamam tat sukhaṁ sāttvikaṁ proktam ātma-buddhi-prasāda-jam
हिंदी अनुवाद: जो सुख आरंभ में विष के समान लगता है किंतु परिणाम में अमृत के समान होता है, और जो आत्मज्ञान से प्रसन्न बुद्धि से उत्पन्न होता है — वह सुख सात्त्विक कहा गया है।
भावार्थ: सात्त्विक सुख का स्वभाव यह है कि इसकी शुरुआत कठिन लगती है — ध्यान, संयम, आत्मचिंतन — ये आरंभ में विष जैसे कठिन प्रतीत होते हैं। किंतु 'आत्मबुद्धिप्रसादजम्' — अर्थात् आत्मा के बोध से प्रसन्न हुई बुद्धि से उत्पन्न यह सुख — अंत में अमृत के समान शांतिदायक और मुक्तिदायक होता है। यह सुख बाहरी वस्तुओं पर निर्भर नहीं, भीतर से जागता है।
आज के जीवन में: साधना, अनुशासन और आत्मचिंतन पहले कठिन लगते हैं, पर जो इनमें टिका रहे उसे जो शांति मिलती है वह स्थायी और गहरी होती है।
श्लोक 18.38
वक्ता: श्रीकृष्ण
विषयेन्द्रियसंयोगाद्यत्तदग्रेऽमृतोपमम्।
परिणामे विषमिव तत्सुखं राजसं स्मृतम् ॥18.38॥
viṣhayendriya-sanyogād yat tad agre ’mṛitopamam / pariṇāme viṣham iva tat sukhaṁ rājasaṁ smṛitam
हिंदी अनुवाद: इंद्रियों और विषयों के संयोग से जो सुख आरंभ में अमृत जैसा लगता है किंतु परिणाम में विष जैसा हो जाता है, वह सुख राजसी कहा गया है।
भावार्थ: राजसी सुख सात्त्विक सुख का ठीक उलटा है। 'विषयेन्द्रियसंयोगात्' — इंद्रियों का विषयों से मिलन — यही राजसी सुख का स्रोत है। यह सुख तत्काल आकर्षक और मधुर लगता है, जैसे अमृत। किंतु इसका परिणाम दुःख, आसक्ति, और बंधन है — जो विष के समान है। भोग की तृष्णा कभी शांत नहीं होती, इसलिए यह सुख अंततः पीड़ा में बदल जाता है।
आज के जीवन में: जो सुख इंद्रियों की तृप्ति से मिलता है वह क्षणिक है — उसके पीछे भागते रहने से तृष्णा बढ़ती है, शांति नहीं।
श्लोक 18.39
वक्ता: श्रीकृष्ण
यदग्रे चानुबन्धे च सुखं मोहनमात्मनः।
निद्रालस्यप्रमादोत्थं तत्तामसमुदाहृतम् ॥18.39॥
yad agre chānubandhe cha sukhaṁ mohanam ātmanaḥ / nidrālasya-pramādotthaṁ tat tāmasam udāhṛitam
हिंदी अनुवाद: निद्रा, आलस्य और प्रमाद से उत्पन्न होने वाला जो सुख आरंभ में और परिणाम में भी अपने आप को मोहित करता रहता है, वह सुख तामसी कहा गया है।
भावार्थ: तामसी सुख न आरंभ में अच्छा है, न अंत में। 'निद्रालस्यप्रमादोत्थम्' — नींद, सुस्ती और असावधानी से जन्मा यह सुख आत्मा को मोह में डुबोए रखता है। यह सुख वास्तव में सुख नहीं, बल्कि जड़ता और अज्ञान का आनंद है। इसमें न विकास है, न जागृति — केवल मोह और भ्रम। यह सुख मनुष्य को भीतर और बाहर दोनों से अंधकार में रखता है।
आज के जीवन में: आलस्य और असावधानी में जो सुकून मिलता है वह वास्तव में मोह है — वह हमें जागने और बढ़ने से रोकता है।
श्लोक 18.40
वक्ता: श्रीकृष्ण
न तदस्ति पृथिव्यां वा दिवि देवेषु वा पुनः।
सत्त्वं प्रकृतिजैर्मुक्तं यदेभिः स्यात्ित्रभिर्गुणैः ॥18.40॥
na tad asti pṛithivyāṁ vā divi deveṣhu vā punaḥ / sattvaṁ prakṛiti-jair muktaṁ yad ebhiḥ syāt tribhir guṇaiḥ
हिंदी अनुवाद: पृथ्वी पर, स्वर्ग में, देवताओं में — कहीं भी ऐसा कोई प्राणी नहीं है जो प्रकृति से उत्पन्न इन तीनों गुणों से सर्वथा मुक्त हो।
भावार्थ: श्रीकृष्ण एक महत्त्वपूर्ण सत्य स्थापित करते हैं — सत्त्व, रज और तम ये तीनों गुण प्रकृति के हैं और जो भी प्रकृति के भीतर है — चाहे मनुष्य हो, पशु हो, या देवता — वह इनसे बँधा है। 'प्रकृतिजैः' अर्थात् प्रकृति से उत्पन्न। यह श्लोक यह भी संकेत देता है कि इन गुणों से परे जाना ही मोक्ष है, और वह केवल परमात्मा की शरण से संभव है।
आज के जीवन में: यह जानकर कि तीनों गुण सबको प्रभावित करते हैं, हम दूसरों की कमज़ोरियों पर दोष लगाने की जगह स्वयं सत्त्व बढ़ाने का प्रयास करें।
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