भगवद्गीता

भगवद्गीता अध्याय 2, श्लोक 41–50 | सांख्ययोग | अर्थ सहित

6 अक्तूबर 2026·8 मिनट में पढ़ें
भगवद्गीता अध्याय 2, श्लोक 41–50 | सांख्ययोग | अर्थ सहित

अर्जुन के मोह को दूर करने के लिए श्रीकृष्ण ने आत्मा की अमरता और क्षत्रिय-धर्म का उपदेश दिया। अब वे 'समबुद्धि' अर्थात् स्थिर और निश्चयात्मक बुद्धि का महत्त्व समझाते हुए बताते हैं कि सकाम कर्म और भोग-लालसा मनुष्य को किस प्रकार भटकाती है। इस खंड में श्रीकृष्ण कर्म, बुद्धि और समत्व का वह मूल सूत्र देते हैं जो गीता की आत्मा मानी जाती है।

श्लोक 2.41

वक्ता: श्रीकृष्ण

व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह कुरुनन्दन।
बहुशाखा ह्यनन्ताश्च बुद्धयोऽव्यवसायिनाम् ॥2.41॥

vyavasāyātmikā buddhir ekeha kuru-nandana / bahu-śhākhā hyanantāśh cha buddhayo ’vyavasāyinām

हिंदी अनुवाद: हे कुरुनन्दन! इस समबुद्धि को पाने के विषय में निश्चयात्मक बुद्धि एक ही होती है। जो लोग अनिश्चित मन के होते हैं, उनकी बुद्धियाँ अनगिनत शाखाओं में बँटी और अंतहीन होती हैं।

भावार्थ: श्रीकृष्ण अर्जुन को समझाते हैं कि जो मनुष्य दृढ़ निश्चय के साथ परमात्मा या कर्तव्य की ओर चलता है, उसकी बुद्धि एकाग्र और स्थिर होती है। 'व्यवसायात्मिका बुद्धि' का अर्थ है — दृढ़ संकल्पवाली, एकनिष्ठ बुद्धि। इसके विपरीत, जो अव्यवसायी — अर्थात् अनिश्चित — होते हैं, उनके मन में अनेक इच्छाएँ, अनेक विकल्प और अनेक संशय उठते रहते हैं। ऐसी बिखरी हुई बुद्धि मनुष्य को कहीं का नहीं छोड़ती।

आज के जीवन में: जो व्यक्ति एक लक्ष्य पर दृढ़ रहता है, वही सफल होता है — बिखरे विचार और अनगिनत इच्छाएँ मनुष्य को भटकाती हैं।


श्लोक 2.42

वक्ता: श्रीकृष्ण

यामिमां पुष्पितां वाचं प्रवदन्त्यविपश्चितः।
वेदवादरताः पार्थ नान्यदस्तीति वादिनः ॥2.42॥

yāmimāṁ puṣhpitāṁ vāchaṁ pravadanty-avipaśhchitaḥ / veda-vāda-ratāḥ pārtha nānyad astīti vādinaḥ / kāmātmānaḥ swarga-parā janma-karma-phala-pradām / kriyā-viśheṣha-bahulāṁ bhogaiśhwarya-gatiṁ prati

हिंदी अनुवाद: हे पार्थ! जो अविवेकी मनुष्य वेदों की सकाम व्याख्याओं में ही रुचि रखते हैं और कहते हैं कि 'इससे बढ़कर और कुछ नहीं', वे इस प्रकार की चमकीली, दिखावटी वाणी बोलते हैं।

भावार्थ: यहाँ श्रीकृष्ण उन लोगों की बात करते हैं जो वेदों में वर्णित यज्ञ, अनुष्ठान और कर्मकांड को ही सब कुछ मान लेते हैं। 'अविपश्चितः' का अर्थ है — जिनमें विवेक नहीं। 'पुष्पितां वाचम्' अर्थात् फूलों जैसी सुंदर दिखने वाली, पर सार-रहित वाणी। ऐसे लोग स्वर्ग और भोग को ही जीवन का चरम लक्ष्य मानते हैं और कहते हैं कि इससे परे कुछ है ही नहीं। यह दृष्टि सीमित और भ्रामक है।

आज के जीवन में: केवल बाहरी कर्मकांड या दिखावे की धर्म-चर्चा से आत्मिक उन्नति नहीं होती — विवेक और गहरी समझ आवश्यक है।


श्लोक 2.43

वक्ता: श्रीकृष्ण

कामात्मानः स्वर्गपरा जन्मकर्मफलप्रदाम्।
क्रियाविशेषबहुलां भोगैश्वर्यगतिं प्रति ॥2.43॥

kāmātmānaḥ svarga-parā / janma-karma-phala-pradām / kriyā-viśeṣa-bahulāṁ / bhogaiśvarya-gatiṁ prati

हिंदी अनुवाद: वे कामनाओं में डूबे हुए, स्वर्ग को ही सर्वोच्च मानने वाले लोग ऐसी वाणी बोलते हैं जो नए जन्मों का कारण बनती है और भोग तथा ऐश्वर्य की प्राप्ति के लिए अनेक विशेष क्रियाओं का वर्णन करती है।

भावार्थ: इस श्लोक में उन लोगों की प्रवृत्ति का वर्णन है जो केवल सांसारिक सुख, वैभव और स्वर्ग-प्राप्ति के लिए अनेक कर्मकांड करते हैं। 'कामात्मानः' अर्थात् जिनकी आत्मा कामनाओं से भरी है। 'जन्मकर्मफलप्रदाम्' — ऐसे कर्म जो बार-बार जन्म का कारण बनते हैं। 'क्रियाविशेषबहुलाम्' — अनेक विशेष अनुष्ठानों से भरी। ऐसी वाणी और ऐसे कर्म मनुष्य को संसार-चक्र में ही बाँधे रखते हैं।

आज के जीवन में: जब कर्म का उद्देश्य केवल भोग और संग्रह हो, तो वह मनुष्य को बंधन से मुक्त नहीं करता।


श्लोक 2.44

वक्ता: श्रीकृष्ण

भोगैश्वर्यप्रसक्तानां तयापहृतचेतसाम्।
व्यवसायात्मिका बुद्धिः समाधौ न विधीयते ॥2.44॥

bhogaiśwvarya-prasaktānāṁ tayāpahṛita-chetasām / vyavasāyātmikā buddhiḥ samādhau na vidhīyate

हिंदी अनुवाद: जो लोग भोग और ऐश्वर्य में अत्यधिक आसक्त हैं और जिनका मन उस चमकीली वाणी से हर लिया गया है, उनकी बुद्धि परमात्मा में स्थिर नहीं हो पाती।

भावार्थ: श्रीकृष्ण स्पष्ट करते हैं कि भोग और वैभव की लालसा मनुष्य की बुद्धि को खींच लेती है। 'अपहृतचेतसाम्' — जिनका चित्त हर लिया गया हो। 'समाधौ' का अर्थ है — परमात्मा में एकाग्र स्थिति। जब मन भोग की ओर दौड़ता रहता है, तो वह परमात्मा की ओर टिक ही नहीं सकता। 'व्यवसायात्मिका बुद्धि' — दृढ़ निश्चयात्मक बुद्धि — ऐसे लोगों में उत्पन्न नहीं होती। यह श्लोक पिछले दो श्लोकों का निष्कर्ष है।

आज के जीवन में: जब मन सांसारिक सुख-सुविधाओं में उलझा रहता है, तब भीतर की शांति और स्थिरता नहीं मिलती।


श्लोक 2.45

वक्ता: श्रीकृष्ण

त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन।
निर्द्वन्द्वो नित्यसत्त्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान् ॥2.45॥

trai-guṇya-viṣhayā vedā nistrai-guṇyo bhavārjuna / nirdvandvo nitya-sattva-stho niryoga-kṣhema ātmavān

हिंदी अनुवाद: वेद तीनों गुणों — सत्त्व, रज और तम — के विषयों का वर्णन करते हैं। हे अर्जुन! तू इन तीनों गुणों से ऊपर उठ, द्वन्द्वों से मुक्त हो, सदा परमात्मा में स्थित रह, योग-क्षेम की चिंता छोड़ और आत्मपरायण हो जा।

भावार्थ: श्रीकृष्ण यहाँ वेदों की सीमा बताते हुए अर्जुन को उससे ऊपर उठने की प्रेरणा देते हैं। 'त्रैगुण्य' — सत्त्व, रज और तम — ये तीन गुण प्रकृति के हैं। 'निर्द्वन्द्व' — सुख-दुःख, लाभ-हानि जैसे जोड़ों से परे। 'नित्यसत्त्वस्थ' — सदा शुद्ध सत्त्व में स्थित। 'निर्योगक्षेम' — जो मिला नहीं उसे पाने और जो मिला उसे बचाने की चिंता से मुक्त। 'आत्मवान्' — आत्मा में स्थित। यह उच्चतम साधना की दिशा है।

आज के जीवन में: सुख-दुःख, लाभ-हानि के द्वन्द्वों से ऊपर उठकर, भीतर की आत्मा में टिके रहना — यही सच्ची स्वतंत्रता है।


श्लोक 2.46

वक्ता: श्रीकृष्ण

यावानर्थ उदपाने सर्वतः संप्लुतोदके।
तावान्सर्वेषु वेदेषु ब्राह्मणस्य विजानतः ॥2.46॥

yāvān artha udapāne sarvataḥ samplutodake / tāvānsarveṣhu vedeṣhu brāhmaṇasya vijānataḥ

हिंदी अनुवाद: जैसे चारों ओर बाढ़ का विशाल जल भर जाने पर छोटे कुएँ या गड्ढे का कोई प्रयोजन नहीं रहता, वैसे ही जो ब्राह्मण परमात्मा को तत्त्व से जान लेता है, उसके लिए सम्पूर्ण वेदों का उतना ही प्रयोजन रहता है।

भावार्थ: यह श्लोक एक सुंदर उपमा द्वारा ज्ञान की पूर्णता को समझाता है। 'उदपान' — छोटा जलाशय या कुआँ। जब विशाल बाढ़ का जल चारों ओर भर जाए, तो उस छोटे कुएँ की आवश्यकता नहीं रहती। उसी प्रकार जो 'विजानतः' — तत्त्व को जानने वाला — ब्रह्मज्ञानी है, उसके लिए वेदों के विभिन्न विधि-विधान और अनुष्ठान अपना विशेष प्रयोजन खो देते हैं, क्योंकि उसे वह पूर्ण ज्ञान प्राप्त हो चुका है जिसकी ओर वेद संकेत करते हैं।

आज के जीवन में: जब भीतर का ज्ञान पूर्ण हो जाता है, तो बाहरी साधनों की निर्भरता स्वयं कम हो जाती है।


श्लोक 2.47

वक्ता: श्रीकृष्ण

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि ॥2.47॥

karmaṇy-evādhikāras te mā phaleṣhu kadāchana / mā karma-phala-hetur bhūr mā te saṅgo ’stvakarmaṇi

हिंदी अनुवाद: कर्तव्य-कर्म करने में ही तेरा अधिकार है, उसके फल में कभी नहीं। इसलिए तू कर्मफल का कारण मत बन और अकर्मण्यता में भी आसक्त मत हो।

भावार्थ: यह गीता का सर्वाधिक प्रसिद्ध श्लोक है। श्रीकृष्ण तीन बातें एक साथ कहते हैं — पहली, कर्म करना तेरे हाथ में है; दूसरी, फल तेरे हाथ में नहीं, इसलिए फल की चाह मत रख; तीसरी, फल नहीं मिलेगा यह सोचकर कर्म करना बंद भी मत कर। 'अधिकार' का अर्थ है — केवल कर्म करने का अधिकार। 'मा कर्मफलहेतुः' — फल की इच्छा से प्रेरित होकर कर्म मत कर। यह निष्काम कर्म का मूल सिद्धांत है।

आज के जीवन में: अपना काम पूरी निष्ठा से करो, पर फल की चिंता छोड़ो — यही मन की शांति और कर्म की श्रेष्ठता का मार्ग है।


श्लोक 2.48

वक्ता: श्रीकृष्ण

योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय।
सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते ॥2.48॥

yoga-sthaḥ kuru karmāṇi saṅgaṁ tyaktvā dhanañjaya / siddhy-asiddhyoḥ samo bhūtvā samatvaṁ yoga uchyate

हिंदी अनुवाद: हे धनञ्जय! आसक्ति को छोड़कर, सफलता और असफलता में समान भाव रखते हुए, योग में स्थित होकर कर्म कर; क्योंकि यह समत्व ही योग कहलाता है।

भावार्थ: श्रीकृष्ण यहाँ योग की परिभाषा देते हैं। 'योगस्थः' — योग में स्थित होकर। 'सङ्गं त्यक्त्वा' — आसक्ति छोड़कर। 'सिद्ध्यसिद्ध्योः समः' — सफलता और असफलता दोनों में समान। 'समत्वं योग उच्यते' — यह समभाव ही योग है। जब मनुष्य परिणाम से निर्लिप्त होकर कर्म करता है, तब उसका मन न सफलता में उत्तेजित होता है, न असफलता में टूटता है। यही मानसिक संतुलन योग की असली पहचान है।

आज के जीवन में: सफलता में न फूलो, असफलता में न टूटो — यह समभाव ही जीवन में योग है।


श्लोक 2.49

वक्ता: श्रीकृष्ण

दूरेण ह्यवरं कर्म बुद्धियोगाद्धनञ्जय।
बुद्धौ शरणमन्विच्छ कृपणाः फलहेतवः ॥2.49॥

dūreṇa hy-avaraṁ karma buddhi-yogād dhanañjaya / buddhau śharaṇam anvichchha kṛipaṇāḥ phala-hetavaḥ

हिंदी अनुवाद: हे धनञ्जय! बुद्धियोग — समता — की तुलना में सकाम कर्म अत्यंत निकृष्ट है। इसलिए तू समबुद्धि का आश्रय ले; जो फल के लिए कर्म करते हैं, वे अत्यंत दीन हैं।

भावार्थ: श्रीकृष्ण यहाँ सकाम कर्म और बुद्धियोग की तुलना करते हैं। 'बुद्धियोग' — समता और विवेकपूर्ण बुद्धि से युक्त कर्म। 'अवरं कर्म' — निकृष्ट कर्म, अर्थात् फल की इच्छा से किया गया कर्म। 'कृपणाः' — दीन, दयनीय। जो व्यक्ति हर कर्म में केवल फल देखता है, वह वास्तव में दरिद्र है — क्योंकि उसका मन सदा माँगता रहता है और कभी तृप्त नहीं होता। बुद्धि की शरण लेना ही श्रेष्ठ मार्ग है।

आज के जीवन में: फल की लालसा से किया गया कर्म मनुष्य को दीन बनाता है; समबुद्धि से किया गया कर्म उसे ऊँचा उठाता है।


श्लोक 2.50

वक्ता: श्रीकृष्ण

बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते।
तस्माद्योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम् ॥2.50॥

buddhi-yukto jahātīha ubhe sukṛita-duṣhkṛite / tasmād yogāya yujyasva yogaḥ karmasu kauśhalam

हिंदी अनुवाद: समबुद्धि से युक्त मनुष्य इसी जीवन में पुण्य और पाप दोनों को छोड़ देता है। इसलिए तू योग में लग जा, क्योंकि योग ही कर्मों में कुशलता है।

भावार्थ: श्रीकृष्ण इस खंड का समापन एक महत्त्वपूर्ण निष्कर्ष से करते हैं। 'बुद्धियुक्त' — समबुद्धि से युक्त व्यक्ति। 'सुकृत-दुष्कृते' — पुण्य और पाप दोनों। जब कर्म फल की इच्छा से नहीं, बल्कि समत्व से किया जाता है, तो वह न पुण्य का बंधन बनाता है, न पाप का। 'योगः कर्मसु कौशलम्' — योग ही कर्मों में कुशलता है। अर्थात् कर्म को कुशलतापूर्वक करने की कला यही है कि उसे समभाव और निष्काम भाव से किया जाए।

आज के जीवन में: समभाव से किया गया कर्म न बंधन बनाता है, न भार — यही कर्म की सच्ची कुशलता है।


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