भगवद्गीता अध्याय 2, श्लोक 61–70 | सांख्ययोग | अर्थ सहित
श्रीकृष्ण अर्जुन को स्थितप्रज्ञ पुरुष के लक्षण बता रहे हैं। पिछले श्लोकों में उन्होंने समझाया कि इन्द्रियों को विषयों से हटाना कछुए के अंगों को समेटने जैसा है। अब इस खंड में वे बताते हैं कि इन्द्रिय-संयम क्यों आवश्यक है, विषयों में मन लगाने से पतन की कैसी शृंखला बनती है, और जिसकी बुद्धि स्थिर है वह संसार में रहते हुए भी किस प्रकार शान्त और सुखी रहता है।
श्लोक 2.61
वक्ता: श्रीकृष्ण
तानि सर्वाणि संयम्य युक्त आसीत मत्परः।
वशे हि यस्येन्द्रियाणि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥2.61॥
tāni sarvāṇi sanyamya yukta āsīta mat-paraḥ / vaśhe hi yasyendriyāṇi tasya prajñā pratiṣhṭhitā
हिंदी अनुवाद: साधक उन सम्पूर्ण इन्द्रियों को वश में करके मेरे परायण होकर स्थिर बैठे; क्योंकि जिसकी इन्द्रियाँ वश में हैं, उसी की बुद्धि प्रतिष्ठित होती है।
भावार्थ: श्रीकृष्ण अर्जुन को बता रहे हैं कि इन्द्रियों को केवल दबाना पर्याप्त नहीं, साथ में मन को परमात्मा में लगाना भी आवश्यक है। 'मत्परः' का अर्थ है 'मुझे ही परम आश्रय मानने वाला'। जब इन्द्रियाँ वश में हों और मन ईश्वर में टिका हो, तभी बुद्धि 'प्रतिष्ठित' — अर्थात् दृढ़ और स्थिर — होती है। यह संयम और समर्पण दोनों का समन्वय है।
आज के जीवन में: केवल बाहरी संयम नहीं, मन को किसी श्रेष्ठ लक्ष्य में लगाना भी उतना ही आवश्यक है।
श्लोक 2.62
वक्ता: श्रीकृष्ण
ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते।
सङ्गात् संजायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते ॥2.62॥
dhyāyato viṣhayān puṁsaḥ saṅgas teṣhūpajāyate / saṅgāt sañjāyate kāmaḥ kāmāt krodho ’bhijāyate
हिंदी अनुवाद: विषयों का बार-बार चिन्तन करने वाले मनुष्य की उन विषयों में आसक्ति उत्पन्न हो जाती है; आसक्ति से कामना जन्म लेती है और कामना से क्रोध उत्पन्न होता है।
भावार्थ: श्रीकृष्ण यहाँ पतन की शृंखला का पहला भाग समझाते हैं। 'ध्यायतः' अर्थात् बार-बार मन में किसी विषय को घुमाते रहना — यही आसक्ति की जड़ है। आसक्ति से इच्छा बनती है और जब इच्छा पूरी नहीं होती तो क्रोध उठता है। यह क्रम बहुत स्वाभाविक और सूक्ष्म है — व्यक्ति को पता भी नहीं चलता कि वह कब विचार से वासना की ओर खिंच गया।
आज के जीवन में: जिस वस्तु या विचार को हम बार-बार मन में दोहराते हैं, उसी की ओर हम खिंचते चले जाते हैं — इसलिए मन को सँभालकर रखना आवश्यक है।
श्लोक 2.63
वक्ता: श्रीकृष्ण
क्रोधाद्भवति संमोहः संमोहात्स्मृतिविभ्रमः।
स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति ॥2.63॥
krodhād bhavati sammohaḥ sammohāt smṛiti-vibhramaḥ / smṛiti-bhranśhād buddhi-nāśho buddhi-nāśhāt praṇaśhyati
हिंदी अनुवाद: क्रोध से मूढ़ता (सम्मोह) उत्पन्न होती है, सम्मोह से स्मृति भ्रष्ट हो जाती है, स्मृति के भ्रष्ट होने से बुद्धि का नाश होता है और बुद्धि के नाश से मनुष्य का सर्वनाश हो जाता है।
भावार्थ: यह पतन की शृंखला का दूसरा और अन्तिम भाग है। 'संमोह' अर्थात् भले-बुरे का विवेक खो देना। जब विवेक जाता है तो 'स्मृति' — अर्थात् शास्त्र, संस्कार और उचित-अनुचित की याद — भी जाती है। फिर बुद्धि काम नहीं करती और अन्त में मनुष्य का पूर्ण पतन हो जाता है। यह शृंखला दिखाती है कि एक छोटी-सी असावधानी कितने गहरे तक ले जा सकती है।
आज के जीवन में: क्रोध के क्षण में लिया गया निर्णय प्रायः विवेकहीन होता है — इसीलिए उस समय रुककर सोचना सबसे बुद्धिमानी है।
श्लोक 2.64
वक्ता: श्रीकृष्ण
रागद्वेषवियुक्तैस्तु विषयानिन्द्रियैश्चरन्।
आत्मवश्यैर्विधेयात्मा प्रसादमधिगच्छति ॥2.64॥
rāga-dveṣha-viyuktais tu viṣhayān indriyaiśh charan / ātma-vaśhyair-vidheyātmā prasādam adhigachchhati
हिंदी अनुवाद: किन्तु जो साधक राग और द्वेष से रहित होकर, अपने वश में की हुई इन्द्रियों द्वारा विषयों का सेवन करता है, वह अन्तःकरण की निर्मलता को प्राप्त होता है।
भावार्थ: श्रीकृष्ण अब उस मार्ग को बताते हैं जो पतन से बचाता है। 'रागद्वेषवियुक्त' अर्थात् न किसी विषय में अत्यधिक आकर्षण, न घृणा। 'विधेयात्मा' का अर्थ है जिसका अन्तःकरण वश में है। ऐसा साधक संसार में रहते हुए भी विषयों का उपयोग करता है, पर उनमें डूबता नहीं। इस सन्तुलन से उसके चित्त में 'प्रसाद' — अर्थात् स्वच्छता और शान्ति — आती है।
आज के जीवन में: संसार से भागना नहीं, बल्कि राग-द्वेष छोड़कर उसमें रहना — यही सच्चा संयम है।
श्लोक 2.65
वक्ता: श्रीकृष्ण
प्रसादे सर्वदुःखानां हानिरस्योपजायते।
प्रसन्नचेतसो ह्याशु बुद्धिः पर्यवतिष्ठते ॥2.65॥
prasāde sarva-duḥkhānāṁ hānir asyopajāyate / prasanna-chetaso hyāśhu buddhiḥ paryavatiṣhṭhate
हिंदी अनुवाद: उस अन्तःकरण की निर्मलता से साधक के सम्पूर्ण दुःखों का नाश हो जाता है और ऐसे प्रसन्न चित्त वाले साधक की बुद्धि शीघ्र ही परमात्मा में स्थिर हो जाती है।
भावार्थ: पिछले श्लोक में बताई गई निर्मलता का फल यहाँ दिया गया है। 'प्रसाद' अर्थात् चित्त की स्वच्छता आने पर दुःख स्वयं विलीन होने लगते हैं। 'प्रसन्नचेतसः' — प्रसन्न चित्त वाले की बुद्धि 'आशु' अर्थात् शीघ्र ही परमात्मा में 'पर्यवतिष्ठते' — भली-भाँति स्थिर हो जाती है। यह श्लोक बताता है कि आन्तरिक शान्ति और ज्ञान की स्थिरता एक-दूसरे से जुड़े हैं।
आज के जीवन में: जब मन निर्मल और शान्त होता है, तभी जीवन के गहरे प्रश्नों पर बुद्धि स्थिरता से विचार कर पाती है।
श्लोक 2.66
वक्ता: श्रीकृष्ण
नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना।
न चाभावयतः शान्तिरशान्तस्य कुतः सुखम् ॥2.66॥
nāsti buddhir-ayuktasya na chāyuktasya bhāvanā / na chābhāvayataḥ śhāntir aśhāntasya kutaḥ sukham
हिंदी अनुवाद: जिसके मन और इन्द्रियाँ संयमित नहीं हैं, उसमें निश्चयात्मक बुद्धि नहीं होती; और ऐसी बुद्धि के बिना कर्तव्य-भावना नहीं होती, भावना के बिना शान्ति नहीं, और शान्ति के बिना सुख कैसे मिल सकता है?
भावार्थ: श्रीकृष्ण यहाँ असंयमी मनुष्य की दशा को चार चरणों में रखते हैं — बुद्धि नहीं, भावना नहीं, शान्ति नहीं, सुख नहीं। 'अयुक्त' अर्थात् जो योग में नहीं है, जिसका मन बिखरा हुआ है। 'भावना' का अर्थ यहाँ कर्तव्य में लगे रहने की भावना है। यह श्लोक दिखाता है कि सुख की जड़ बाहर नहीं, भीतर के संयम में है।
आज के जीवन में: सच्चा सुख संयम और शान्ति से आता है, बाहरी साधनों की अधिकता से नहीं।
श्लोक 2.67
वक्ता: श्रीकृष्ण
इन्द्रियाणां हि चरतां यन्मनोऽनुविधीयते।
तदस्य हरति प्रज्ञां वायुर्नावमिवाम्भसि ॥2.67॥
indriyāṇāṁ hi charatāṁ yan mano ’nuvidhīyate / tadasya harati prajñāṁ vāyur nāvam ivāmbhasi
हिंदी अनुवाद: अपने-अपने विषयों में विचरती इन्द्रियों में से जो एक भी इन्द्रिय मन को अपने पीछे खींच लेती है, वह अकेला मन उस मनुष्य की बुद्धि को उसी तरह हर लेता है जैसे जल पर वायु नाव को बहा ले जाती है।
भावार्थ: यहाँ एक सुन्दर उपमा दी गई है। जैसे तेज़ हवा जल पर चलती नाव को अपनी दिशा में बहा ले जाती है, वैसे ही एक भी इन्द्रिय यदि विषय की ओर दौड़े और मन उसके पीछे चला जाए, तो बुद्धि का नियन्त्रण समाप्त हो जाता है। 'प्रज्ञां हरति' अर्थात् विवेक को छीन लेता है। यह श्लोक इन्द्रिय-संयम की अनिवार्यता को बल देता है।
आज के जीवन में: एक भी इन्द्रिय की असावधानी पूरे मन को भटका सकती है — इसलिए सतत जागरूकता आवश्यक है।
श्लोक 2.68
वक्ता: श्रीकृष्ण
तस्माद्यस्य महाबाहो निगृहीतानि सर्वशः।
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥2.68॥
tasmād yasya mahā-bāho nigṛihītāni sarvaśhaḥ / indriyāṇīndriyārthebhyas tasya prajñā pratiṣhṭhitā
हिंदी अनुवाद: इसलिए हे महाबाहो! जिस मनुष्य की इन्द्रियाँ अपने-अपने विषयों से सर्वथा वश में की हुई हैं, उसी की बुद्धि स्थिर है।
भावार्थ: पिछले श्लोकों में पतन और भटकाव का वर्णन करने के बाद श्रीकृष्ण यहाँ निष्कर्ष देते हैं। 'महाबाहो' सम्बोधन से अर्जुन को उत्साहित किया जा रहा है। 'निगृहीतानि सर्वशः' अर्थात् सभी इन्द्रियाँ सब प्रकार से वश में हों — आधा-अधूरा संयम पर्याप्त नहीं। ऐसे पूर्ण संयम वाले की ही बुद्धि 'प्रतिष्ठिता' — दृढ़ और स्थिर — कही जाती है।
आज के जीवन में: इन्द्रियों पर पूर्ण संयम ही स्थिर बुद्धि और विवेकपूर्ण जीवन की नींव है।
श्लोक 2.69
वक्ता: श्रीकृष्ण
या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी।
यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः ॥2.69॥
yā niśhā sarva-bhūtānāṁ tasyāṁ jāgarti sanyamī / yasyāṁ jāgrati bhūtāni sā niśhā paśhyato muneḥ
हिंदी अनुवाद: जो सब प्राणियों के लिए रात है — अर्थात् परमात्मा से विमुखता — उसमें संयमी पुरुष जागता है; और जिसमें सब प्राणी जागते हैं — अर्थात् भोग और संग्रह में लगे रहते हैं — वह तत्त्वदर्शी मुनि की दृष्टि में रात है।
भावार्थ: यह श्लोक एक गहरी उलटबाँसी के रूप में है। सामान्य मनुष्य के लिए जो 'जागना' है — भोग, धन, यश की दौड़ — वह ज्ञानी के लिए 'रात' अर्थात् अज्ञान है। और जो ज्ञानी के लिए 'जागना' है — आत्मा और परमात्मा का बोध — वह सामान्य जन के लिए 'रात' अर्थात् अदृश्य और अज्ञात है। 'पश्यतः मुनेः' अर्थात् जो देखने वाला, तत्त्वदर्शी मुनि है।
आज के जीवन में: जो संसार को सबसे बड़ी सच्चाई लगती है, वह ज्ञानी की दृष्टि में भ्रम है — और जो ज्ञानी जानता है, वह सामान्य दृष्टि से ओझल रहता है।
श्लोक 2.70
वक्ता: श्रीकृष्ण
आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं समुद्रमापः प्रविशन्ति यद्वत्।
तद्वत्कामा यं प्रविशन्ति सर्वे स शान्तिमाप्नोति न कामकामी ॥2.70॥
āpūryamāṇam achala-pratiṣhṭhaṁ / samudram āpaḥ praviśhanti yadvat / tadvat kāmā yaṁ praviśhanti sarve / sa śhāntim āpnoti na kāma-kāmī
हिंदी अनुवाद: जैसे चारों ओर से जल आकर समुद्र में मिलता है, पर समुद्र अपनी मर्यादा में अचल बना रहता है — वैसे ही जिस संयमी पुरुष में सब भोग-पदार्थ बिना विकार उत्पन्न किए समा जाते हैं, वही परम शान्ति को प्राप्त होता है; भोगों की कामना करने वाला नहीं।
भावार्थ: समुद्र की यह उपमा अत्यन्त सटीक है। 'आपूर्यमाणम्' अर्थात् सदा भरा रहने वाला, 'अचलप्रतिष्ठम्' अर्थात् अपनी सीमा में अडिग। जैसे समुद्र नदियों का जल ग्रहण करता है पर उससे उद्वेलित नहीं होता, वैसे ही स्थितप्रज्ञ पुरुष के पास सांसारिक विषय आते हैं पर वह उनसे विचलित नहीं होता। जो कामना करता है वह कभी तृप्त नहीं होता; जो निष्काम है वही शान्त रहता है।
आज के जीवन में: जो व्यक्ति भीतर से परिपूर्ण और स्थिर है, वह परिस्थितियों से विचलित नहीं होता — यही सच्ची शान्ति है।
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