भगवद्गीता

भगवद्गीता अध्याय 2, श्लोक 71–72 | सांख्ययोग | अर्थ सहित

6 अक्तूबर 2026·2 मिनट में पढ़ें
भगवद्गीता अध्याय 2, श्लोक 71–72 | सांख्ययोग | अर्थ सहित

अध्याय 2 के इस अंतिम खंड में श्रीकृष्ण स्थितप्रज्ञ की विशेषताओं का समापन करते हैं। पहले वे बता चुके हैं कि ऐसा व्यक्ति दुःख में विचलित नहीं होता, सुख में लालायित नहीं होता, और इंद्रियों को वश में रखता है। अब वे उस अंतिम सत्य को प्रकट करते हैं जो शांति और मोक्ष का मूल है।

श्लोक 2.71

वक्ता: श्रीकृष्ण

विहाय कामान्यः सर्वान्पुमांश्चरति निःस्पृहः।
निर्ममो निरहंकारः स शांतिमधिगच्छति ॥2.71॥

vihāya kāmān yaḥ sarvān pumānśh charati niḥspṛihaḥ / nirmamo nirahankāraḥ sa śhāntim adhigachchhati

हिंदी अनुवाद: जो मनुष्य समस्त कामनाओं को त्यागकर, किसी वस्तु की चाह के बिना, 'यह मेरा है' इस भाव के बिना और अहंकार के बिना आचरण करता है, वही शांति को प्राप्त होता है।

भावार्थ: श्रीकृष्ण अर्जुन को बता रहे हैं कि शांति का मार्ग कामनाओं के दमन में नहीं, बल्कि उनके पूर्ण त्याग में है। 'निःस्पृहः' का अर्थ है — किसी भी वस्तु की लालसा न रखना; 'निर्ममः' का अर्थ है — किसी को भी 'मेरा' न मानना; और 'निरहंकारः' का अर्थ है — 'मैं हूँ' इस भाव का भी अभाव। जब मनुष्य इन तीनों बंधनों से मुक्त होकर जीवन में विचरण करता है, तब भीतर की वह गहरी शांति स्वयं प्रकट होती है जो बाहरी परिस्थितियों पर निर्भर नहीं होती।

आज के जीवन में: जब हम किसी वस्तु, पद या संबंध को 'मेरा' मानना छोड़ देते हैं और अहंकार को शिथिल करते हैं, तभी मन की सच्ची शांति मिलती है।


श्लोक 2.72

वक्ता: श्रीकृष्ण

एषा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ नैनां प्राप्य विमुह्यति।
स्थित्वाऽस्यामन्तकालेऽपि ब्रह्मनिर्वाणमृच्छति ॥2.72॥

eṣhā brāhmī sthitiḥ pārtha naināṁ prāpya vimuhyati / sthitvāsyām anta-kāle ’pi brahma-nirvāṇam ṛichchhati

हिंदी अनुवाद: हे पृथानन्दन! यही ब्राह्मी स्थिति है — इसे पाकर कोई भी मोहित नहीं होता। यदि कोई अंतकाल में भी इस स्थिति में स्थित हो जाए, तो उसे ब्रह्मनिर्वाण — परम शांत ब्रह्म से एकता — प्राप्त हो जाती है।

भावार्थ: श्रीकृष्ण इस पूरे अध्याय का समापन 'ब्राह्मी स्थिति' के वर्णन से करते हैं। 'ब्राह्मी स्थिति' वह अवस्था है जिसमें मनुष्य की चेतना ब्रह्म में टिकी रहती है — न कामना, न ममता, न अहंकार। 'विमुह्यति' अर्थात् मोह को प्राप्त होना — इस स्थिति में पहुँचने के बाद मोह का कोई अवसर नहीं रहता। 'ब्रह्मनिर्वाण' का अर्थ है ब्रह्म में लीन होकर परम शांति पाना। श्रीकृष्ण यह भी कहते हैं कि यदि यह स्थिति जीवन के अंतिम क्षण में भी प्राप्त हो जाए, तो भी मुक्ति मिल जाती है।

आज के जीवन में: जीवन में जितना भी हो सके, अपनी चेतना को शांत और निर्मल रखने का अभ्यास करें — यही मार्ग अंततः परम मुक्ति की ओर ले जाता है।


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