भगवद्गीता अध्याय 3, श्लोक 11–20 | कर्मयोग | अर्थ सहित
तीसरे अध्याय के पहले खंड में श्रीकृष्ण ने अर्जुन को बताया कि यज्ञ-भावना से किए गए कर्म ही मनुष्य का कर्तव्य हैं। इस खंड में वे उस यज्ञ-चक्र का विस्तार करते हैं — देवता, वर्षा, अन्न और प्राणियों की परस्पर निर्भरता समझाते हुए निष्काम कर्म की महिमा और आवश्यकता पर बल देते हैं।
श्लोक 3.11
वक्ता: श्रीकृष्ण
देवान्भावयतानेन ते देवा भावयन्तु वः।
परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ ॥3.11॥
devān bhāvayatānena te devā bhāvayantu vaḥ / parasparaṁ bhāvayantaḥ śhreyaḥ param avāpsyatha
हिंदी अनुवाद: तुम अपने कर्तव्य-कर्म द्वारा देवताओं को उन्नत करो और वे देवता अपने कर्तव्य से तुम्हें उन्नत करें। इस प्रकार एक-दूसरे को उन्नत करते हुए तुम परम कल्याण को प्राप्त होगे।
भावार्थ: श्रीकृष्ण अर्जुन को सृष्टि की मूल व्यवस्था समझा रहे हैं। 'भावयत' का अर्थ है — पुष्ट करो, उन्नत करो। मनुष्य यज्ञ-रूपी कर्तव्य-कर्म से देवताओं को शक्ति देते हैं और देवता उन्हें जीवन की आवश्यक सामग्री लौटाते हैं। यह परस्पर उपकार की एक दिव्य श्रृंखला है। जब मनुष्य केवल अपने लिए नहीं, बल्कि इस समग्र व्यवस्था के अंग के रूप में कर्म करता है, तभी सबका — और उसका स्वयं का भी — परम कल्याण संभव होता है।
आज के जीवन में: जब हम अपना कर्तव्य निःस्वार्थ भाव से निभाते हैं, तो समाज और प्रकृति दोनों हमारा पोषण करते हैं — यही परस्पर उपकार की नींव है।
श्लोक 3.12
वक्ता: श्रीकृष्ण
इष्टान्भोगान्हि वो देवा दास्यन्ते यज्ञभाविताः।
तैर्दत्तानप्रदायैभ्यो यो भुङ्क्ते स्तेन एव सः ॥3.12॥
iṣhṭān bhogān hi vo devā dāsyante yajña-bhāvitāḥ / tair dattān apradāyaibhyo yo bhuṅkte stena eva saḥ
हिंदी अनुवाद: यज्ञ से पुष्ट हुए देवता तुम्हें मनचाही आवश्यक वस्तुएँ देते हैं। जो मनुष्य उनसे मिली सामग्री को दूसरों की सेवा में लगाए बिना केवल स्वयं भोगता है, वह चोर के समान है।
भावार्थ: श्रीकृष्ण यहाँ स्वार्थी उपभोग की कठोर आलोचना करते हैं। 'स्तेन' अर्थात् चोर — जो दूसरों का हक़ लेकर लौटाता नहीं। देवता यज्ञ से प्रसन्न होकर वर्षा, अन्न, स्वास्थ्य आदि देते हैं। यदि मनुष्य इन सब का उपभोग तो करे, किंतु समाज, प्रकृति या दूसरों के लिए कुछ न करे, तो वह वास्तव में चोरी कर रहा है। कर्तव्य-कर्म और यज्ञ-भावना ही इस ऋण से मुक्ति दिलाती है।
आज के जीवन में: समाज और प्रकृति से जो भी हमें मिलता है, उसका कुछ अंश दूसरों की सेवा में लगाना हमारा नैतिक दायित्व है।
श्लोक 3.13
वक्ता: श्रीकृष्ण
यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषैः।
भुञ्जते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात् ॥3.13॥
yajña-śhiṣhṭāśhinaḥ santo muchyante sarva-kilbiṣhaiḥ / bhuñjate te tvaghaṁ pāpā ye pachantyātma-kāraṇāt
हिंदी अनुवाद: यज्ञ के बाद शेष बचे अन्न को ग्रहण करने वाले श्रेष्ठ मनुष्य सभी पापों से मुक्त हो जाते हैं, किंतु जो केवल अपने लिए ही पकाते और भोगते हैं, वे पाप का ही भक्षण करते हैं।
भावार्थ: 'यज्ञशिष्ट' अर्थात् यज्ञ के बाद बचा हुआ — अर्थात् पहले दूसरों को देकर, कर्तव्य निभाकर जो शेष बचे, उसे ग्रहण करना। 'किल्बिष' का अर्थ है पाप या दोष। श्रीकृष्ण का भाव है कि जो व्यक्ति पहले अपना कर्तव्य पूरा करता है और फिर जो मिले उसे स्वीकार करता है, वह शुद्ध रहता है। जो केवल अपने सुख के लिए जीता है, वह अपने हर कर्म में स्वार्थ का बोझ उठाता है।
आज के जीवन में: पहले दूसरों का ध्यान रखकर जो शेष बचे उसे ग्रहण करना — यही जीवन जीने की शुद्ध रीति है।
श्लोक 3.14
वक्ता: श्रीकृष्ण
अन्नाद्भवन्ति भूतानि पर्जन्यादन्नसम्भवः।
यज्ञाद्भवति पर्जन्यो यज्ञः कर्मसमुद्भवः ॥3.14॥
annād bhavanti bhūtāni parjanyād anna-sambhavaḥ / yajñād bhavati parjanyo yajñaḥ karma-samudbhavaḥ
हिंदी अनुवाद: सभी प्राणी अन्न से उत्पन्न होते हैं, अन्न वर्षा से होता है, वर्षा यज्ञ से होती है और यज्ञ कर्म से उत्पन्न होता है।
भावार्थ: श्रीकृष्ण यहाँ सृष्टि की एक अटूट श्रृंखला प्रस्तुत करते हैं — प्राणी, अन्न, वर्षा, यज्ञ और कर्म। 'पर्जन्य' अर्थात् वर्षा। यह श्रृंखला बताती है कि मनुष्य का कर्म केवल उसका व्यक्तिगत मामला नहीं है — वह समस्त सृष्टि के चक्र से जुड़ा है। जब मनुष्य यज्ञ-भावना से कर्म करता है, तो प्रकृति भी संतुलित रहती है और सबका पोषण होता है।
आज के जीवन में: हमारे कर्म केवल हमारे जीवन को नहीं, बल्कि समस्त प्रकृति और समाज को प्रभावित करते हैं।
श्लोक 3.15
वक्ता: श्रीकृष्ण
कर्म ब्रह्मोद्भवं विद्धि ब्रह्माक्षरसमुद्भवम्।
तस्मात्सर्वगतं ब्रह्म नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम् ॥3.15॥
karma brahmodbhavaṁ viddhi brahmākṣhara-samudbhavam / tasmāt sarva-gataṁ brahma nityaṁ yajñe pratiṣhṭhitam
हिंदी अनुवाद: कर्म को वेद (ब्रह्म) से उत्पन्न जानो और वेद को अक्षर-ब्रह्म से प्रकट हुआ जानो। इसीलिए वह सर्वव्यापी ब्रह्म यज्ञ में सदा प्रतिष्ठित है।
भावार्थ: 'अक्षर' अर्थात् अविनाशी, शाश्वत परमतत्त्व। 'ब्रह्म' यहाँ वेद या दिव्य ज्ञान के अर्थ में है। श्रीकृष्ण बताते हैं कि कर्म की यह पूरी श्रृंखला उस अविनाशी परमतत्त्व से आरंभ होती है। यज्ञ-रूपी कर्तव्य-कर्म में वह सर्वव्यापी परमात्मा स्वयं विद्यमान है। इसलिए कर्म केवल सांसारिक क्रिया नहीं, वह उस परम सत्ता से जुड़ा हुआ है।
आज के जीवन में: जब हम अपना कर्तव्य श्रद्धा और निष्काम भाव से करते हैं, तो उसमें परमात्मा की उपस्थिति होती है।
श्लोक 3.16
वक्ता: श्रीकृष्ण
एवं प्रवर्तितं चक्रं नानुवर्तयतीह यः।
अघायुरिन्द्रियारामो मोघं पार्थ स जीवति ॥3.16॥
evaṁ pravartitaṁ chakraṁ nānuvartayatīha yaḥ / aghāyur indriyārāmo moghaṁ pārtha sa jīvati
हिंदी अनुवाद: हे पार्थ! जो मनुष्य इस संसार में इस प्रकार चलाए गए सृष्टि-चक्र के अनुसार नहीं चलता और केवल इंद्रियों के भोगों में रमा रहता है, वह पापमय जीवन बिताता हुआ व्यर्थ ही जीता है।
भावार्थ: 'अघायु' अर्थात् पाप से भरा जीवन जीने वाला। 'इन्द्रियाराम' अर्थात् केवल इंद्रियों के सुख में रमने वाला। श्रीकृष्ण स्पष्ट करते हैं कि जो व्यक्ति यज्ञ-चक्र — अर्थात् परस्पर उपकार और कर्तव्य की इस व्यवस्था — में भाग नहीं लेता, वह सृष्टि के प्रवाह के विरुद्ध जाता है। ऐसे व्यक्ति का जीवन निरर्थक है, क्योंकि वह न स्वयं का भला करता है, न दूसरों का।
आज के जीवन में: जो व्यक्ति केवल अपने सुख के लिए जीता है और किसी के प्रति कर्तव्य नहीं निभाता, उसका जीवन सार्थक नहीं होता।
श्लोक 3.17
वक्ता: श्रीकृष्ण
यस्त्वात्मरतिरेव स्यादात्मतृप्तश्च मानवः।
आत्मन्येव च सन्तुष्टस्तस्य कार्यं न विद्यते ॥3.17॥
yas tvātma-ratir eva syād ātma-tṛiptaśh cha mānavaḥ / ātmanyeva cha santuṣhṭas tasya kāryaṁ na vidyate
हिंदी अनुवाद: किंतु जो मनुष्य केवल अपने आत्मा में ही रमण करता है, आत्मा से ही तृप्त है और आत्मा में ही संतुष्ट है, उसके लिए कोई कर्तव्य शेष नहीं रहता।
भावार्थ: 'आत्मरति' अर्थात् आत्मा में ही आनंद पाने वाला, 'आत्मतृप्त' अर्थात् आत्मा से ही तृप्त। यह श्लोक उस आत्मज्ञानी महापुरुष की बात करता है जो पूर्णतः आत्म-साक्षात्कार को प्राप्त हो चुका है। ऐसे व्यक्ति की कोई कामना नहीं बचती, इसलिए उसके लिए कोई बाह्य कर्तव्य भी नहीं रहता। यह अपवाद है — सामान्य मनुष्य के लिए नहीं, बल्कि उस विरले के लिए जो पूर्णतः आत्मस्थ हो चुका है।
आज के जीवन में: जो व्यक्ति आत्म-साक्षात्कार को प्राप्त हो जाता है, उसके सभी कर्म स्वाभाविक रूप से निर्मल हो जाते हैं।
श्लोक 3.18
वक्ता: श्रीकृष्ण
नैव तस्य कृतेनार्थो नाकृतेनेह कश्चन।
न चास्य सर्वभूतेषु कश्िचदर्थव्यपाश्रयः ॥3.18॥
naiva tasya kṛitenārtho nākṛiteneha kaśhchana / na chāsya sarva-bhūteṣhu kaśhchid artha-vyapāśhrayaḥ
हिंदी अनुवाद: उस महापुरुष का न कर्म करने से कोई प्रयोजन रहता है और न कर्म न करने से; तथा समस्त प्राणियों में से किसी पर भी उसकी किंचित् मात्र भी स्वार्थ की निर्भरता नहीं रहती।
भावार्थ: श्रीकृष्ण पिछले श्लोक की बात को और स्पष्ट करते हैं। जो व्यक्ति आत्मा में पूर्णतः स्थित हो गया है, उसे न कर्म करने से कुछ पाना है, न न करने से कुछ खोना है। 'अर्थव्यपाश्रय' अर्थात् स्वार्थ के लिए किसी पर निर्भरता। ऐसे महापुरुष का किसी से कोई स्वार्थ का संबंध नहीं रहता — वह जो भी करता है, वह स्वाभाविक और निःस्वार्थ होता है।
आज के जीवन में: जब मन की सभी कामनाएँ शांत हो जाती हैं, तब कर्म बोझ नहीं रहता — वह स्वाभाविक और निर्मल हो जाता है।
श्लोक 3.19
वक्ता: श्रीकृष्ण
तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर।
असक्तो ह्याचरन्कर्म परमाप्नोति पूरुषः ॥3.19॥
tasmād asaktaḥ satataṁ kāryaṁ karma samāchara / asakto hyācharan karma param āpnoti pūruṣhaḥ
हिंदी अनुवाद: इसलिए तू सदा आसक्ति रहित होकर कर्तव्य-कर्म का भलीभाँति आचरण कर, क्योंकि आसक्ति रहित होकर कर्म करने वाला मनुष्य परमात्मा को प्राप्त होता है।
भावार्थ: 'असक्त' अर्थात् आसक्ति रहित — फल की चाह के बिना। 'सततं' अर्थात् निरंतर। श्रीकृष्ण यहाँ निष्काम कर्म का सार एक ही वाक्य में दे देते हैं। पिछले श्लोकों में उन्होंने आत्मज्ञानी की बात की थी, किंतु अर्जुन जैसे सामान्य साधक के लिए मार्ग यही है — कर्म करते रहो, पर उसके फल से चिपको मत। यही निष्काम कर्म परमात्मा तक पहुँचाता है।
आज के जीवन में: अपना कर्तव्य पूरी लगन से निभाओ, पर फल की चिंता छोड़ो — यही जीवन में शांति और सफलता का सच्चा मार्ग है।
श्लोक 3.20
वक्ता: श्रीकृष्ण
कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः।
लोकसंग्रहमेवापि संपश्यन्कर्तुमर्हसि ॥3.20॥
karmaṇaiva hi sansiddhim āsthitā janakādayaḥ / loka-saṅgraham evāpi sampaśhyan kartum arhasi
हिंदी अनुवाद: राजा जनक जैसे अनेक महापुरुष भी कर्म के द्वारा ही परम सिद्धि को प्राप्त हुए हैं; इसलिए लोकसंग्रह — अर्थात् समाज के हित — को देखते हुए भी तुम्हें कर्म करना उचित है।
भावार्थ: 'जनकादयः' अर्थात् राजा जनक जैसे महापुरुष, जो राजकाज करते हुए भी आत्मज्ञानी थे। 'लोकसंग्रह' अर्थात् समाज को एकजुट और व्यवस्थित रखना। श्रीकृष्ण अर्जुन को उदाहरण देते हैं कि कर्म का त्याग किए बिना भी परम सिद्धि संभव है। इसके साथ ही वे एक और कारण जोड़ते हैं — समाज का हित। जो बड़े और सक्षम हैं, उनके कर्म से समाज को दिशा मिलती है।
आज के जीवन में: महान लोगों का कर्म केवल उनके लिए नहीं होता — उनके उदाहरण से पूरा समाज सीखता और आगे बढ़ता है।
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