भगवद्गीता

भगवद्गीता अध्याय 3, श्लोक 21–30 | कर्मयोग | अर्थ सहित

6 अक्तूबर 2026·8 मिनट में पढ़ें
भगवद्गीता अध्याय 3, श्लोक 21–30 | कर्मयोग | अर्थ सहित

अर्जुन के प्रश्न के उत्तर में श्रीकृष्ण ने बताया कि ज्ञान और कर्म दोनों का अपना स्थान है, और कर्म किए बिना कोई भी एक क्षण भी नहीं रह सकता। अब इस खंड में श्रीकृष्ण यह समझाते हैं कि श्रेष्ठ पुरुष का आचरण समाज के लिए आदर्श बनता है, स्वयं ईश्वर भी कर्म क्यों करते हैं, और ज्ञानी व्यक्ति को अनासक्त होकर किस प्रकार कर्म करना चाहिए।

श्लोक 3.21

वक्ता: श्रीकृष्ण

यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः।
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते ॥3.21॥

yad yad ācharati śhreṣhṭhas tat tad evetaro janaḥ / sa yat pramāṇaṁ kurute lokas tad anuvartate

हिंदी अनुवाद: श्रेष्ठ मनुष्य जो-जो आचरण करता है, दूसरे लोग वैसा ही करने लगते हैं। वह जो मानक या प्रमाण स्थापित करता है, संसार उसी के अनुसार चलता है।

भावार्थ: श्रीकृष्ण अर्जुन को समझा रहे हैं कि समाज में श्रेष्ठ और प्रभावशाली व्यक्ति का आचरण ही दूसरों के लिए मार्गदर्शक बन जाता है। 'श्रेष्ठ' का अर्थ है — जो गुण, ज्ञान या पद में ऊँचा हो। 'प्रमाण' का अर्थ है — वह कसौटी या मानक जिसे वह अपने कर्म से स्थापित करता है। साधारण लोग स्वयं सोचने की बजाय बड़ों का अनुकरण करते हैं, इसलिए श्रेष्ठ पुरुष का उत्तरदायित्व और भी अधिक हो जाता है।

आज के जीवन में: जो व्यक्ति परिवार, समाज या कार्यक्षेत्र में आगे है, उसका आचरण ही दूसरों के लिए उदाहरण बनता है — इसलिए अपने व्यवहार के प्रति सदा सचेत रहें।


श्लोक 3.22

वक्ता: श्रीकृष्ण

न मे पार्थास्ति कर्तव्यं त्रिषु लोकेषु किञ्चन।
नानवाप्तमवाप्तव्यं वर्त एव च कर्मणि ॥3.22॥

na me pārthāsti kartavyaṁ triṣhu lokeṣhu kiñchana / nānavāptam avāptavyaṁ varta eva cha karmaṇi

हिंदी अनुवाद: हे पार्थ! तीनों लोकों में मेरा कोई कर्तव्य शेष नहीं है और न ही कोई वस्तु ऐसी है जो मुझे पानी हो, फिर भी मैं कर्म में लगा रहता हूँ।

भावार्थ: श्रीकृष्ण यहाँ स्वयं को उदाहरण के रूप में प्रस्तुत करते हैं। वे कहते हैं कि ईश्वर को किसी फल की आवश्यकता नहीं, कोई इच्छा अधूरी नहीं, फिर भी वे कर्म करते हैं। 'त्रिषु लोकेषु' अर्थात् स्वर्ग, पृथ्वी और पाताल — तीनों में उनका कोई स्वार्थ नहीं। यह श्लोक यह सिद्ध करता है कि निष्काम कर्म केवल उपदेश नहीं, ईश्वर स्वयं उसे जीते हैं। इससे अर्जुन को प्रेरणा मिलती है कि फल की चाह छोड़कर कर्म करना ही सर्वोच्च आदर्श है।

आज के जीवन में: जब कोई बड़ा उद्देश्य सामने हो, तो व्यक्तिगत लाभ-हानि की चिंता छोड़कर अपना कर्तव्य निभाना ही सच्ची महानता है।


श्लोक 3.23

वक्ता: श्रीकृष्ण

यदि ह्यहं न वर्तेयं जातु कर्मण्यतन्द्रितः।
मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः ॥3.23॥

yadi hyahaṁ na varteyaṁ jātu karmaṇyatandritaḥ / mama vartmānuvartante manuṣhyāḥ pārtha sarvaśhaḥ

हिंदी अनुवाद: हे पार्थ! यदि मैं किसी समय सावधानी से कर्म न करूँ, तो बड़ी हानि हो, क्योंकि सभी मनुष्य हर प्रकार से मेरे ही मार्ग का अनुसरण करते हैं।

भावार्थ: श्रीकृष्ण पिछले श्लोक की बात को आगे बढ़ाते हैं। वे कहते हैं कि यदि वे — जिनका अनुसरण सारा संसार करता है — कर्म करना छोड़ दें, तो लोग भी कर्म से विमुख हो जाएँगे। 'अतन्द्रितः' का अर्थ है — आलस्य रहित, सावधान। यह श्लोक यह भाव देता है कि जो जितना प्रभावशाली है, उसकी निष्क्रियता उतनी ही हानिकारक होती है। नेतृत्व करने वाले की जिम्मेदारी केवल कार्य करने में नहीं, बल्कि निरंतर और सजग रहकर कार्य करने में है।

आज के जीवन में: जो व्यक्ति दूसरों के लिए प्रेरणा का स्रोत है, उसकी उदासीनता या निष्क्रियता पूरे समूह को प्रभावित कर सकती है।


श्लोक 3.24

वक्ता: श्रीकृष्ण

उत्सीदेयुरिमे लोका न कुर्यां कर्म चेदहम्।
सङ्करस्य च कर्ता स्यामुपहन्यामिमाः प्रजाः ॥3.24॥

utsīdeyur ime lokā na kuryāṁ karma ched aham / sankarasya cha kartā syām upahanyām imāḥ prajāḥ

हिंदी अनुवाद: यदि मैं कर्म न करूँ तो ये सब लोक नष्ट हो जाएँ, मैं सामाजिक व्यवस्था बिगाड़ने वाला और इस समस्त प्रजा का नाश करने वाला बन जाऊँ।

भावार्थ: इस श्लोक में श्रीकृष्ण अपने कर्म न करने के परिणाम स्पष्ट करते हैं। 'उत्सीदेयुः' का अर्थ है — नष्ट हो जाएँ, डूब जाएँ। 'सङ्कर' का अर्थ है — व्यवस्था का विघटन। जब समाज का मार्गदर्शक कर्म छोड़ दे, तो व्यवस्था टूटती है और लोग दिशाहीन हो जाते हैं। यह श्लोक यह भी बताता है कि ईश्वर का कर्म करना केवल उनकी इच्छा नहीं, बल्कि सृष्टि की रक्षा के लिए आवश्यक है। इस प्रकार कर्म एक दायित्व है, न कि केवल व्यक्तिगत विकल्प।

आज के जीवन में: समाज में जिम्मेदार पद पर बैठे व्यक्ति का कर्तव्य-पालन केवल उसके लिए नहीं, बल्कि उस पर निर्भर सभी लोगों के लिए आवश्यक होता है।


श्लोक 3.25

वक्ता: श्रीकृष्ण

सक्ताः कर्मण्यविद्वांसो यथा कुर्वन्ति भारत।
कुर्याद्विद्वांस्तथासक्तश्िचकीर्षुर्लोकसंग्रहम् ॥3.25॥

saktāḥ karmaṇyavidvānso yathā kurvanti bhārata / kuryād vidvāns tathāsaktaśh chikīrṣhur loka-saṅgraham

हिंदी अनुवाद: हे भरतवंशी अर्जुन! जिस प्रकार अज्ञानी लोग कर्म में आसक्त होकर कर्म करते हैं, उसी प्रकार ज्ञानी को भी आसक्ति रहित होकर, लोकसंग्रह की इच्छा से कर्म करना चाहिए।

भावार्थ: श्रीकृष्ण यहाँ ज्ञानी और अज्ञानी के कर्म में अंतर बताते हैं। अज्ञानी फल की आसक्ति से कर्म करता है, जबकि ज्ञानी बिना आसक्ति के, केवल 'लोकसंग्रह' — अर्थात् समाज के कल्याण और व्यवस्था को बनाए रखने — के लिए कर्म करता है। बाहर से दोनों का कर्म एक जैसा दिखता है, पर भीतर की भावना अलग होती है। यह श्लोक यह सिखाता है कि ज्ञान प्राप्त होने पर कर्म छोड़ना नहीं, बल्कि उसे निःस्वार्थ भाव से करना है।

आज के जीवन में: कार्य करते समय केवल अपने लाभ की नहीं, बल्कि दूसरों के भले की भावना रखना ही परिपक्व और जागरूक व्यक्ति की पहचान है।


श्लोक 3.26

वक्ता: श्रीकृष्ण

न बुद्धिभेदं जनयेदज्ञानां कर्मसङ्गिनाम्।
जोषयेत्सर्वकर्माणि विद्वान् युक्तः समाचरन् ॥3.26॥

na buddhi-bhedaṁ janayed ajñānāṁ karma-saṅginām / joṣhayet sarva-karmāṇi vidvān yuktaḥ samācharan

हिंदी अनुवाद: ज्ञानी पुरुष को चाहिए कि वह कर्म में आसक्त अज्ञानियों की बुद्धि में भ्रम उत्पन्न न करे, बल्कि स्वयं सभी कर्म भली-भाँति करते हुए उन्हें भी वैसे ही करने के लिए प्रेरित करे।

भावार्थ: इस श्लोक में श्रीकृष्ण ज्ञानी के व्यवहार की सूक्ष्म नीति बताते हैं। 'बुद्धिभेद' का अर्थ है — बुद्धि में भ्रम या दुविधा उत्पन्न करना। यदि ज्ञानी व्यक्ति अचानक कर्म छोड़ दे या अज्ञानियों को उनके कर्म से विरत करे, तो वे दिशाहीन हो जाएँगे। इसलिए ज्ञानी को चाहिए कि वह स्वयं कर्म करे और दूसरों को भी उनके स्तर के अनुसार कर्म में लगाए रखे। यह एक व्यावहारिक और करुणामय दृष्टिकोण है।

आज के जीवन में: जो अधिक जानता है, उसकी जिम्मेदारी है कि वह दूसरों को भ्रमित करने की बजाय धीरे-धीरे सही दिशा में प्रेरित करे।


श्लोक 3.27

वक्ता: श्रीकृष्ण

प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः।
अहङ्कारविमूढात्मा कर्ताऽहमिति मन्यते ॥3.27॥

prakṛiteḥ kriyamāṇāni guṇaiḥ karmāṇi sarvaśhaḥ / ahankāra-vimūḍhātmā kartāham iti manyate

हिंदी अनुवाद: सभी कर्म वास्तव में प्रकृति के गुणों द्वारा ही किए जाते हैं, परंतु अहंकार से मोहित अंतःकरण वाला अज्ञानी 'मैं कर्ता हूँ' — ऐसा मान लेता है।

भावार्थ: यह श्लोक कर्म के वास्तविक स्वरूप को उजागर करता है। 'प्रकृति के गुण' — सत्त्व, रजस् और तमस् — ही सभी कार्यों के मूल कारण हैं। 'अहंकारविमूढात्मा' का अर्थ है — जिसका मन अहंकार से मोहित हो गया है। ऐसा व्यक्ति यह नहीं समझ पाता कि वह केवल एक माध्यम है; वास्तविक क्रिया तो प्रकृति के गुण कर रहे हैं। यह भ्रम ही बंधन का कारण बनता है। ज्ञान इसी भ्रम को दूर करता है।

आज के जीवन में: जब हम यह मान लेते हैं कि सब कुछ 'मैंने' किया, तो अहंकार बढ़ता है — वास्तव में हम परिस्थितियों, शक्तियों और प्रकृति के माध्यम मात्र हैं।


श्लोक 3.28

वक्ता: श्रीकृष्ण

तत्त्ववित्तु महाबाहो गुणकर्मविभागयोः।
गुणा गुणेषु वर्तन्त इति मत्वा न सज्जते ॥3.28॥

tattva-vit tu mahā-bāho guṇa-karma-vibhāgayoḥ / guṇā guṇeṣhu vartanta iti matvā na sajjate

हिंदी अनुवाद: हे महाबाहो! जो गुणों के विभाग और कर्मों के विभाग को तत्त्व से जानता है, वह यह समझकर कि 'गुण ही गुणों में बरत रहे हैं', उनमें आसक्त नहीं होता।

भावार्थ: पिछले श्लोक के विपरीत, यहाँ तत्त्वज्ञ — अर्थात् सत्य को जानने वाले — का वर्णन है। 'गुणा गुणेषु वर्तन्ते' — इंद्रियाँ (जो गुणों से बनी हैं) अपने विषयों (जो भी गुणों से बने हैं) में विचरण करती हैं। ज्ञानी इस सत्य को समझता है, इसलिए वह न तो कर्म का अभिमान करता है और न उसमें आसक्त होता है। 'महाबाहो' संबोधन अर्जुन की वीरता को स्वीकार करते हुए उसे इस ज्ञान के योग्य बताता है।

आज के जीवन में: जब हम यह समझ लेते हैं कि इंद्रियाँ अपना स्वभाव कर रही हैं, तो हम उनके प्रवाह में बहने की बजाय साक्षी बनकर रह सकते हैं।


श्लोक 3.29

वक्ता: श्रीकृष्ण

प्रकृतेर्गुणसम्मूढाः सज्जन्ते गुणकर्मसु।
तानकृत्स्नविदो मन्दान्कृत्स्नविन्न विचालयेत् ॥3.29॥

prakṛiter guṇa-sammūḍhāḥ sajjante guṇa-karmasu / tān akṛitsna-vido mandān kṛitsna-vin na vichālayet

हिंदी अनुवाद: प्रकृति के गुणों से अत्यंत मोहित हुए अज्ञानी लोग गुणों और कर्मों में आसक्त रहते हैं। पूर्ण ज्ञान रखने वाला व्यक्ति उन अधूरे ज्ञान वाले मंदबुद्धि लोगों को विचलित न करे।

भावार्थ: यह श्लोक श्लोक 3.26 की बात को और स्पष्ट करता है। 'कृत्स्नविद्' अर्थात् जो पूर्ण सत्य जानता है, और 'अकृत्स्नविद्' अर्थात् जो अधूरा जानता है। जो लोग अभी भी प्रकृति के गुणों में उलझे हैं, उन्हें अचानक सब कुछ छोड़ने को कहना उनके लिए हानिकारक हो सकता है। ज्ञानी का कर्तव्य है कि वह उन्हें उनकी गति से चलने दे और धीरे-धीरे सही दिशा दिखाए, न कि उनकी वर्तमान स्थिति को अस्थिर करे।

आज के जीवन में: जो सत्य को जानता है, उसे दूसरों पर वह सत्य थोपने की बजाय उनकी समझ और परिस्थिति का सम्मान करते हुए मार्गदर्शन करना चाहिए।


श्लोक 3.30

वक्ता: श्रीकृष्ण

मयि सर्वाणि कर्माणि संन्यस्याध्यात्मचेतसा।
निराशीर्निर्ममो भूत्वा युध्यस्व विगतज्वरः ॥3.30॥

mayi sarvāṇi karmāṇi sannyasyādhyātma-chetasā / nirāśhīr nirmamo bhūtvā yudhyasva vigata-jvaraḥ

हिंदी अनुवाद: तू अपनी विवेकशील बुद्धि से सभी कर्तव्य-कर्मों को मुझे अर्पित करके, कामना, ममता और संताप से रहित होकर युद्धरूपी अपने कर्तव्य को कर।

भावार्थ: यह श्लोक इस खंड का समापन करता है और श्रीकृष्ण का सीधा निर्देश है। 'अध्यात्मचेतसा' का अर्थ है — आत्मा की ओर उन्मुख चेतना से। 'निराशीः' अर्थात् कामना रहित, 'निर्ममः' अर्थात् ममता रहित, और 'विगतज्वरः' अर्थात् मानसिक संताप से मुक्त। जब सभी कर्म ईश्वर को समर्पित हों, तो न फल की चिंता रहती है, न अहंकार। यह निष्काम कर्म का व्यावहारिक सूत्र है।

आज के जीवन में: अपना कर्तव्य करते समय यदि फल की चिंता, ममता और मानसिक बोझ छोड़ दें, तो कार्य भी बेहतर होता है और मन भी शांत रहता है।


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