भगवद्गीता अध्याय 3, श्लोक 31–40 | कर्मयोग | अर्थ सहित
श्रीकृष्ण अर्जुन को कर्मयोग का मार्ग समझाते हुए बता चुके हैं कि लोकसंग्रह के लिए निष्काम कर्म करना आवश्यक है। इस खंड में वे पहले अपने उपदेश को श्रद्धापूर्वक मानने और न मानने के परिणाम बताते हैं, फिर प्रकृति, राग-द्वेष और स्वधर्म की बात करते हैं; और अंत में अर्जुन के प्रश्न पर काम-क्रोध को मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु बताकर उसके निवास-स्थान का वर्णन करते हैं।
श्लोक 3.31
वक्ता: श्रीकृष्ण
ये मे मतमिदं नित्यमनुतिष्ठन्ति मानवाः।
श्रद्धावन्तोऽनसूयन्तो मुच्यन्ते तेऽपि कर्मभिः ॥3.31॥
ye me matam idaṁ nityam anutiṣhṭhanti mānavāḥ / śhraddhāvanto ’nasūyanto muchyante te ’pi karmabhiḥ
हिंदी अनुवाद: जो मनुष्य बिना दोष निकाले, श्रद्धापूर्वक मेरे इस मत का सदा पालन करते हैं, वे भी कर्मों के बंधन से मुक्त हो जाते हैं।
भावार्थ: श्रीकृष्ण अर्जुन को बता रहे हैं कि पूर्व श्लोकों में जो कर्मयोग का सिद्धांत कहा गया है, उसे जो कोई भी 'श्रद्धावान' — अर्थात् विश्वास और आस्था के साथ — और 'अनसूयन्तः' — अर्थात् बिना आलोचना किए — अपने जीवन में उतारता है, वह भी कर्मफल के बंधन से छूट जाता है। यहाँ 'ते अपि' (वे भी) शब्द महत्त्वपूर्ण है — अर्थात् साधारण मनुष्य भी, केवल श्रद्धा और अनुसरण से, मुक्ति का मार्ग पा सकता है।
आज के जीवन में: किसी भी श्रेष्ठ सिद्धांत को श्रद्धा और ईमानदारी से अपनाने पर ही उसका पूरा लाभ मिलता है।
श्लोक 3.32
वक्ता: श्रीकृष्ण
ये त्वेतदभ्यसूयन्तो नानुतिष्ठन्ति मे मतम्।
सर्वज्ञानविमूढांस्तान्विद्धि नष्टानचेतसः ॥3.32॥
ye tvetad abhyasūyanto nānutiṣhṭhanti me matam / sarva-jñāna-vimūḍhāns tān viddhi naṣhṭān achetasaḥ
हिंदी अनुवाद: किंतु जो मेरे इस मत में दोष निकालते हैं और उसका पालन नहीं करते, उन सब ज्ञानों में मोहित और विवेकहीन मनुष्यों को नष्ट हुआ ही समझो।
भावार्थ: श्रीकृष्ण यहाँ उन लोगों की दशा बताते हैं जो कर्मयोग के उपदेश की आलोचना करते हैं और उसे जीवन में नहीं अपनाते। 'सर्वज्ञानविमूढान्' का अर्थ है — जो सभी प्रकार के ज्ञान में भटके हुए हैं; 'अचेतसः' का अर्थ है — विवेकशून्य। ऐसे व्यक्ति बाहर से ज्ञानी दिखते हुए भी भीतर से दिशाहीन होते हैं और अंततः अपना पतन कर लेते हैं।
आज के जीवन में: केवल ज्ञान की बातें करना पर्याप्त नहीं; उसे आचरण में उतारना ही वास्तविक विवेक है।
श्लोक 3.33
वक्ता: श्रीकृष्ण
सदृशं चेष्टते स्वस्याः प्रकृतेर्ज्ञानवानपि।
प्रकृतिं यान्ति भूतानि निग्रहः किं करिष्यति ॥3.33॥
sadṛiśhaṁ cheṣhṭate svasyāḥ prakṛiter jñānavān api / prakṛitiṁ yānti bhūtāni nigrahaḥ kiṁ kariṣhyati
हिंदी अनुवाद: ज्ञानी पुरुष भी अपनी प्रकृति के अनुसार ही कार्य करता है; सभी प्राणी अपनी प्रकृति के अनुसार चलते हैं — फिर हठ या दमन क्या कर सकता है?
भावार्थ: श्रीकृष्ण यहाँ एक गहरी बात कहते हैं — प्रत्येक प्राणी अपनी स्वाभाविक प्रकृति के अनुसार ही प्रवृत्त होता है, यहाँ तक कि ज्ञानी भी। 'निग्रहः किं करिष्यति' — अर्थात् केवल बाहरी दमन या जबरदस्ती से प्रकृति नहीं बदलती। इसका आशय यह नहीं कि प्रयास व्यर्थ है, बल्कि यह है कि परिवर्तन भीतर से, स्वाभाविक रूप से आना चाहिए — केवल बाहरी दबाव से नहीं।
आज के जीवन में: स्वयं को या दूसरों को केवल बाहरी दबाव से बदलने की कोशिश प्रायः निष्फल होती है; भीतरी समझ से ही स्थायी परिवर्तन आता है।
श्लोक 3.34
वक्ता: श्रीकृष्ण
इन्द्रियस्येन्द्रियस्यार्थे रागद्वेषौ व्यवस्थितौ।
तयोर्न वशमागच्छेत्तौ ह्यस्य परिपन्थिनौ ॥3.34॥
indriyasyendriyasyārthe rāga-dveṣhau vyavasthitau / tayor na vaśham āgachchhet tau hyasya paripanthinau
हिंदी अनुवाद: प्रत्येक इंद्रिय के प्रत्येक विषय में राग और द्वेष स्वाभाविक रूप से बसे हुए हैं; मनुष्य को इन दोनों के वश में नहीं होना चाहिए, क्योंकि ये दोनों ही उसके शत्रु हैं।
भावार्थ: श्रीकृष्ण बताते हैं कि 'राग' अर्थात् किसी विषय के प्रति आसक्ति और 'द्वेष' अर्थात् किसी विषय के प्रति घृणा — ये दोनों इंद्रियों में स्वाभाविक रूप से विद्यमान रहते हैं। इनका होना स्वाभाविक है, किंतु इनके वश में हो जाना हानिकारक है। 'परिपन्थिनौ' का अर्थ है — मार्ग में बाधा डालने वाले शत्रु। ये दोनों मनुष्य को उसके वास्तविक लक्ष्य से भटका देते हैं।
आज के जीवन में: पसंद और नापसंद स्वाभाविक हैं, किंतु उनके दास बन जाना ही जीवन में अशांति और पतन का कारण बनता है।
श्लोक 3.35
वक्ता: श्रीकृष्ण
श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्।
स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः ॥3.35॥
śhreyān swa-dharmo viguṇaḥ para-dharmāt sv-anuṣhṭhitāt / swa-dharme nidhanaṁ śhreyaḥ para-dharmo bhayāvahaḥ
हिंदी अनुवाद: गुणों में कम होने पर भी अपना धर्म, दूसरे के अच्छी तरह निभाए गए धर्म से श्रेष्ठ है; अपने धर्म में मृत्यु भी कल्याणकारक है, किंतु दूसरे का धर्म भय उत्पन्न करने वाला है।
भावार्थ: श्रीकृष्ण 'स्वधर्म' और 'परधर्म' का अंतर स्पषष्ट करते हैं। 'स्वधर्म' का अर्थ है — अपनी प्रकृति, योग्यता और स्थिति के अनुसार कर्तव्य। 'विगुणः' अर्थात् भले ही वह कम प्रभावशाली लगे, तब भी वह अपना है। दूसरे का धर्म बाहर से आकर्षक लग सकता है, किंतु वह अपनी प्रकृति के विरुद्ध होने से भीतरी संघर्ष और भय उत्पन्न करता है। अपने मार्ग पर चलते हुए मृत्यु भी श्रेयस्कर है।
आज के जीवन में: दूसरों की नकल करने के बजाय अपनी स्वाभाविक क्षमता और कर्तव्य को ईमानदारी से निभाना ही सच्ची उन्नति का मार्ग है।
श्लोक 3.36
वक्ता: अर्जुन
अथ केन प्रयुक्तोऽयं पापं चरति पूरुषः।
अनिच्छन्नपि वार्ष्णेय बलादिव नियोजितः ॥3.36॥
arjuna uvācha / atha kena prayukto ’yaṁ pāpaṁ charati pūruṣhaḥ / anichchhann api vārṣhṇeya balād iva niyojitaḥ
हिंदी अनुवाद: अर्जुन ने पूछा — हे वार्ष्णेय! यह मनुष्य न चाहते हुए भी, जैसे किसी ने जबरदस्ती लगाया हो, किससे प्रेरित होकर पाप करता है?
भावार्थ: अर्जुन का यह प्रश्न बहुत स्वाभाविक और मानवीय है। वे श्रीकृष्ण से पूछते हैं कि जब मनुष्य स्वयं पाप नहीं करना चाहता, तब भी वह उसकी ओर क्यों खिंच जाता है? 'वार्ष्णेय' वृष्णि वंश में जन्मे श्रीकृष्ण का संबोधन है। 'बलादिव नियोजितः' — जैसे किसी बाहरी शक्ति ने बाध्य कर दिया हो। यह प्रश्न हर युग के मनुष्य के मन की जिज्ञासा है।
श्लोक 3.37
वक्ता: श्रीकृष्ण
काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः।
महाशनो महापाप्मा विद्ध्येनमिह वैरिणम् ॥3.37॥
śhrī bhagavān uvācha / kāma eṣha krodha eṣha rajo-guṇa-samudbhavaḥ / mahāśhano mahā-pāpmā viddhyenam iha vairiṇam
हिंदी अनुवाद: श्रीभगवान् बोले — रजोगुण से उत्पन्न यह काम ही क्रोध बनता है; यह सब कुछ भक्षण करने वाला और महापापी है — इसी को इस संसार में अपना शत्रु जानो।
भावार्थ: श्रीकृष्ण अर्जुन के प्रश्न का सीधा उत्तर देते हैं — मनुष्य को पाप की ओर धकेलने वाला 'काम' है, जो 'रजोगुण' से उत्पन्न होता है। जब काम पूरा नहीं होता, तो वही क्रोध बन जाता है। 'महाशनः' अर्थात् जो कभी तृप्त नहीं होता, सब कुछ खा जाता है। 'वैरिणम्' अर्थात् शत्रु — यह काम ही मनुष्य का सबसे बड़ा आंतरिक शत्रु है।
आज के जीवन में: अपनी इच्छाओं और उनसे उत्पन्न क्रोध को पहचानना ही उन पर विजय पाने का पहला कदम है।
श्लोक 3.38
वक्ता: श्रीकृष्ण
धूमेनाव्रियते वह्निर्यथाऽऽदर्शो मलेन च।
यथोल्बेनावृतो गर्भस्तथा तेनेदमावृतम् ॥3.38॥
dhūmenāvriyate vahnir yathādarśho malena cha / yatholbenāvṛito garbhas tathā tenedam āvṛitam
हिंदी अनुवाद: जैसे धुएँ से अग्नि, मैल से दर्पण और झिल्ली से गर्भ ढका रहता है, वैसे ही काम के द्वारा यह ज्ञान ढका हुआ है।
भावार्थ: श्रीकृष्ण तीन उपमाओं से समझाते हैं कि काम किस प्रकार ज्ञान को आवृत करता है। धुएँ से अग्नि दिखती तो है पर धुंधली हो जाती है; मैल से दर्पण प्रतिबिंब नहीं दिखाता; और झिल्ली (जेर/उल्ब) में गर्भ पूरी तरह ढका रहता है। ये तीनों आवरण की अलग-अलग मात्राएँ दर्शाते हैं — इसी प्रकार काम मनुष्य के विवेक को कम या अधिक मात्रा में ढक देता है।
आज के जीवन में: जब मन इच्छाओं से भरा हो, तब सही-गलत का निर्णय करने की शक्ति स्वतः धुंधली पड़ जाती है।
श्लोक 3.39
वक्ता: श्रीकृष्ण
आवृतं ज्ञानमेतेन ज्ञानिनो नित्यवैरिणा।
कामरूपेण कौन्तेय दुष्पूरेणानलेन च ॥3.39॥
āvṛitaṁ jñānam etena jñānino nitya-vairiṇā / kāma-rūpeṇa kaunteya duṣhpūreṇānalena cha
हिंदी अनुवाद: हे कुंतीनंदन! इस अग्नि के समान कभी न बुझने वाले और ज्ञानियों के नित्य शत्रु, काम के द्वारा मनुष्य का विवेक ढका हुआ है।
भावार्थ: पूर्व श्लोक में काम द्वारा ज्ञान के आवृत होने की बात कही गई थी; यहाँ श्रीकृष्ण उसकी प्रकृति और स्पष्ट करते हैं। 'दुष्पूरेण' — जो कभी पूर्ण नहीं होता, 'अनलेन' — अग्नि के समान; जितना दो, उतना और माँगे। 'नित्यवैरिणा' — यह ज्ञानियों का भी नित्य शत्रु है। अर्थात् काम केवल अज्ञानियों को नहीं, बल्कि विवेकशील मनुष्यों को भी सदा चुनौती देता रहता है।
आज के जीवन में: इच्छाएँ जितनी पूरी की जाएँ, उतनी ही बढ़ती हैं — इस सत्य को जानना ही उनसे मुक्त रहने की दिशा में पहला प्रयास है।
श्लोक 3.40
वक्ता: श्रीकृष्ण
इन्द्रियाणि मनो बुद्धिरस्याधिष्ठानमुच्यते।
एतैर्विमोहयत्येष ज्ञानमावृत्य देहिनम् ॥3.40॥
indriyāṇi mano buddhir asyādhiṣhṭhānam uchyate / etair vimohayatyeṣha jñānam āvṛitya dehinam
हिंदी अनुवाद: इंद्रियाँ, मन और बुद्धि — ये काम के निवास-स्थान कहे गए हैं; यह काम इन्हीं के द्वारा ज्ञान को ढककर देहाभिमानी मनुष्य को मोहित करता है।
भावार्थ: श्रीकृष्ण बताते हैं कि काम कहाँ रहता है — इंद्रियों में (विषयों की ओर खिंचाव), मन में (कल्पना और संकल्प) और बुद्धि में (तर्क को तोड़-मरोड़ कर)। 'देहिनम्' — जो स्वयं को केवल शरीर मानता है, वह सबसे अधिक इसके प्रभाव में आता है। इन तीनों स्तरों पर काम का अधिकार होने से वह मनुष्य के विवेक को पूरी तरह आच्छादित कर देता है।
आज के जीवन में: अपने मन, बुद्धि और इंद्रियों पर सजग दृष्टि रखना ही काम के प्रभाव से बचने का उपाय है।
आगे पढ़िए
← पिछला भाग: अध्याय 3, श्लोक 21–30
अगला भाग: अध्याय 3, श्लोक 41–43 →
मन में कुछ भारी लग रहा है?
अपनी बात कृष्ण से कहिए — बिना किसी फ़ैसले के, बस एक सच्ची बातचीत। शुरुआत मुफ़्त।
कृष्ण से बात करें →