भगवद्गीता

भगवद्गीता अध्याय 3, श्लोक 41–43 | कर्मयोग | अर्थ सहित

6 अक्तूबर 2026·3 मिनट में पढ़ें
भगवद्गीता अध्याय 3, श्लोक 41–43 | कर्मयोग | अर्थ सहित

श्रीकृष्ण ने अर्जुन को बताया कि काम ही मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है, जो इन्द्रियों, मन और बुद्धि में बसकर ज्ञान को ढक लेता है। अब इस अंतिम खंड में वे अर्जुन को इस शत्रु को जीतने का व्यावहारिक मार्ग बताते हैं — पहले इन्द्रियों को वश में करो, फिर बुद्धि की श्रेष्ठता को पहचानकर काम को जड़ से नष्ट करो।

श्लोक 3.41

वक्ता: श्रीकृष्ण

तस्मात्त्वमिन्द्रियाण्यादौ नियम्य भरतर्षभ।
पाप्मानं प्रजहि ह्येनं ज्ञानविज्ञाननाशनम् ॥3.41॥

tasmāt tvam indriyāṇyādau niyamya bharatarṣhabha / pāpmānaṁ prajahi hyenaṁ jñāna-vijñāna-nāśhanam

हिंदी अनुवाद: इसलिए हे भरतवंशियों में श्रेष्ठ अर्जुन! तू सबसे पहले इन्द्रियों को वश में कर और ज्ञान तथा विज्ञान का नाश करने वाले इस महापापी काम को बलपूर्वक अवश्य नष्ट कर दे।

भावार्थ: श्रीकृष्ण ने पहले काम को शत्रु बताया, अब उसे जीतने का पहला कदम सुझाते हैं — इन्द्रियों का संयम। 'ज्ञानविज्ञाननाशनम्' का अर्थ है — जो शास्त्रीय ज्ञान और अनुभव से प्राप्त विवेक, दोनों को नष्ट कर देता है। काम का प्रवेश द्वार इन्द्रियाँ ही हैं; इसलिए उन्हें पहले साधना आवश्यक है। 'पाप्मानम्' शब्द काम को पाप का मूल बताता है। यह उपदेश अर्जुन को सीधी कार्य-योजना देता है।

आज के जीवन में: किसी भी बुरी आदत या विकार को जीतने की शुरुआत इन्द्रियों पर संयम से होती है।


श्लोक 3.42

वक्ता: श्रीकृष्ण

इन्द्रियाणि पराण्याहुरिन्द्रियेभ्यः परं मनः।
मनसस्तु परा बुद्धिर्यो बुद्धेः परतस्तु सः ॥3.42॥

indriyāṇi parāṇyāhur indriyebhyaḥ paraṁ manaḥ / manasas tu parā buddhir yo buddheḥ paratas tu saḥ

हिंदी अनुवाद: इन्द्रियाँ स्थूल शरीर से श्रेष्ठ और सूक्ष्म हैं; इन्द्रियों से भी श्रेष्ठ मन है; मन से भी श्रेष्ठ बुद्धि है; और जो बुद्धि से भी परे है, वह (आत्मा अथवा काम का मूल स्रोत) है।

भावार्थ: श्रीकृष्ण यहाँ मनुष्य की अंतरंग संरचना का क्रम समझाते हैं। 'पराणि' का अर्थ है — श्रेष्ठ, सूक्ष्म और अधिक व्यापक। इन्द्रियाँ शरीर से सूक्ष्म हैं, मन इन्द्रियों से, बुद्धि मन से। इस क्रम को जानना इसलिए आवश्यक है क्योंकि काम इन सभी स्तरों में घुसकर मनुष्य को भटकाता है। जो जितना सूक्ष्म है, वह उतना ही शक्तिशाली है — इसलिए बुद्धि को जागृत रखना सबसे महत्त्वपूर्ण है।

आज के जीवन में: जब हम अपनी बुद्धि को सजग रखते हैं, तो मन और इन्द्रियाँ स्वयं नियंत्रण में आने लगती हैं।


श्लोक 3.43

वक्ता: श्रीकृष्ण

एवं बुद्धेः परं बुद्ध्वा संस्तभ्यात्मानमात्मना।
जहि शत्रुं महाबाहो कामरूपं दुरासदम् ॥3.43॥

evaṁ buddheḥ paraṁ buddhvā sanstabhyātmānam ātmanā / jahi śhatruṁ mahā-bāho kāma-rūpaṁ durāsadam

हिंदी अनुवाद: इस प्रकार बुद्धि से भी परे जो है उसे जानकर, अपने आप को अपने द्वारा वश में करके, हे महाबाहो! तू इस काम रूपी दुर्जय शत्रु को मार डाल।

भावार्थ: यह अध्याय का समापन श्लोक है। 'संस्तभ्य आत्मानम् आत्मना' का अर्थ है — अपने उच्चतर स्वरूप (बुद्धि और आत्मा) के बल से अपने निम्नतर स्वरूप (मन और इन्द्रियों) को स्थिर करना। 'दुरासदम्' अर्थात् जिसे जीतना कठिन है — फिर भी असंभव नहीं। श्रीकृष्ण अर्जुन को 'महाबाहो' कहकर उसकी शक्ति का स्मरण कराते हैं। यह उपदेश बाहरी युद्ध से पहले भीतरी विजय की प्रेरणा देता है।

आज के जीवन में: अपनी उच्चतर बुद्धि और विवेक को जागृत रखकर ही हम अपने भीतर के विकारों पर विजय पा सकते हैं।


आगे पढ़िए

← पिछला भाग: अध्याय 3, श्लोक 31–40

अगला भाग: अध्याय 4, श्लोक 1–10 →

पूरी भगवद्गीता, अध्याय-वार

भगवद्गीताअध्याय 3कर्मयोगश्लोक अर्थगीता हिंदी

मन में कुछ भारी लग रहा है?

अपनी बात कृष्ण से कहिए — बिना किसी फ़ैसले के, बस एक सच्ची बातचीत। शुरुआत मुफ़्त।

कृष्ण से बात करें →